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Showing posts from 2009

अपना देश बचा लो आज

भारत सरकार और माफिया में क्या अंतर है? भारत सरकार को कानूनी मोहर (अधिकार) है जबकि माफिया को कानूनी अधिकार नहीं है । आज माफिया सरकार चला रही है । भारत में झूठ बोलकर वोट ले लेने को राजनीति कहते हैं जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है । वहाँ पार्टी के घोषणा पत्र पर पूर्णतः अमल करना पड़ता है । इस समस्या के समाधान के लिए “राइट टू रिकॉल” अर्थात जनता को अपने प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार मिलने चाहिए । गवाहों की सुरक्षा की योजना बने । जाति और धर्म आरक्षण का आधार नहीं होना चाहिए बल्कि यह आर्थिक आधार पर तय होना चाहिए ।
कुछ लोग हमेशा विरूद्ध मत में होते हैं । वे बहस करते रहे हैं कि अंडा पहले आया या मुर्गी, गाय दूध देती है या हम दूध लेते हैं । जब तक वर्षा के जल को संरक्षित नहीं किया जाएगा तब तक पानी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है । भ्रष्टाचार का कारण जरूरत है या लालच? आप खाली पेट में उसूल नहीं सिखा सकते । टैक्स परिसीमन को भी बदलना होगा । १० करोड़ बच्चों को विद्यालय भेजना हो तो संसद को बंद कर देना चाहिए । क्योंकि संसद में जूतमपैजार, आरोप प्रत्यारोप के सिवा देश की मूलभूत आवश्यकताओं के निदान पर क्या…

देश का दुर्भाग्य (26/11)

शायद किसी ने यह उम्मीद न किया हो कि एक तरफ हमारा देश प्रगति कर रहा है, नई ऊँचाईयों को छू रहा हैं । वही दूसरी तरफ एक निहायत ही कमजोर एवं लाचार होता जा रहा है, और हम इसके रखवाले, दिन व दिन अपंग होते जा रहे है । अगर ऐसा नही होता तो हर साल, हर महीने हम ऐसी घटनाओं के शिकार नहीं होते आज २६/११ के वर्षगांठ पर पूरा देश भावमीनी श्रद्धांजली दे रहा है । तो कोई उन शहीदों को पुष्पमाल्यार्पण कर रहा है । मैं पूछता हूँ कि क्या यह भावभीनी श्रद्धांजली, और उनकी याद में २ मिनट का मौन काफी है । उनके लिये या इस देश के लिए जिसका हदय बार-बार विद्रोहियों के द्वारा ब्यथित हो रहा हो । यह देश का दुर्भाग्य नही तो क्या है, यहाँ के रहने वालों के लिए शर्म की बात नहीं तो क्या है? यह एक ऐसा कलंक है जो मिटाये नही मिटने वाला है ।
कुछ लोगों को श्रद्धांजली फिल्म बनाने से है, वो सोचते हैं कि हम फिल्मों के माध्यम से, रेडियों के माध्यम से यहाँ के लोगों को बदलेंगे, उनके सोच को बदलेंगे, लेकिन ऐसा होना, एक ऐसे स्वप्न की तरह है, जो शायद ही पूरा हो सके । क्योंकि बदलती तो वो चीजे हैं, जिसमें चेतना हो परन्तु दुर्भाग्यवश सारे चेत हो…

मेरा दिल है बड़ा उदास

मेरा दिल है बड़ा उदास

आओ पापा मेरे पास
मेरा दिल है बड़ा उदास
मम्मी की भी याद सताती
भैया को मैं भूल न पाती ।

तुमसे मैं कुछ न मागूँगी
पढ़ने में प्रथम आऊँगी
रखो मुझको अपने पास
मेरा दिल है बड़ा उदास ।

नहीं सहेली संग खेलूँगी
गुड़िया को भी बन्द कर दूँगी
बैठूंगी भैया के पास
मेरा दिल है बड़ा उदास ।

जाओगे जब क्लब में आप
मम्मी को लेकर के साथ
रह लूँगी दादी के पास
मेरा दिल है बड़ा उदास ।

नहीं चाहिये बिस्किट टॉफी
नहीं चाहिये मुझको फ्रॉक
मम्मी पापा मुझे चाहिये
मेरा दिल है बड़ा उदास ।

राजा रानी के किस्से
भगवान की प्यारी बात
दादी हमको रोज सुनाती
आती मुझको उनकी याद ।

बुआ से चोटी करवाना
चाचा के संग बाजार जाना
जिद नहीं मैं कभी करूँगी
पापा मुझको घर ले जाना ।

कहना मान्‌, दूध पीऊँगी
घर की छत पर नहीं चढूँगी
घर ले जाओ मुझको पापा
हॉस्टल में मैं नही पढूँगी ।

- डॉ. ए. कीर्तिवर्द्धन

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया ।…

सत्य अहिंसा का नहीं, बल्कि घोटालों का देश बन गया बापू का भारत

झारखंड जैसे पिछड़े प्रदेश में वहाँ के मुख्यमंत्री ने ही इतना बड़ा घोटाला किया, यकीन करना मुश्किल लगता है, लेकिन ये है सच । मधू कोड़ा, जी हाँ ये वही मधू कोड़ा हैं जो एक छोटे से गरीब परिवार से आते हैं और काफी संघर्ष करते हुए उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री पद को हथिया लिया । मधू कोड़ा आदिवासी परिवार में आते हैं । इन्होंने अपने जिंदगी में इतने संघर्ष किये कि जिसके कारण इन्होंने शादी भी मुख्यमंत्री बन जाने के बाद की ।
मधू कोड़ा और उनके साथियों ने मिलकर कोड़ा शासनकाल के दौरान झारखंड में करोड़ों डॉलर का घोटला किया । इस घोटाले की रकम तकरीबन ४००० करोड़ आंकी जा रही है । भारत एक विकासशील देश है, और यहाँ एक मुख्यमंत्री अपने शासनकाल के दौरान लाख-पचास नहीं ४००० करोड़ का घोटाला कर जाता है । जिस देश में आधी से ज्यादा आबादी एक वक्‍त भूखे पेट सोती है, उस देश की ऐसी हालत चिंताजनक ही नहीं विचारणीय है ।
कोड़ा और उसके साथियों ने मिलकर करोड़ों का वारा न्यारा किया । इनके तार दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों- लाओस, वियतनाम, थाईलैण्ड आदि से लेकर यूरोप, अमेरिका तक फैले थे । खाड़ी के देश भी इसमें शामिल हैं । इन्होंने थाईलैण्ड…

संविधान के मन्दिर में भारत के गरिमा पर थप्पड़

९ नवंम्बर को महाराष्ट्र विधान सभा में बारहवें सत्र की शुरूआत विधायकों के शपथग्रहण समारोह के साथ शुरू होनी थी । यही होता है, होता आया है, और होता रहेगा । परन्तु महाराष्ट्र विधानसभा में उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि गुंडई का नंगा नाच विधानसभा के भीतर किया गया । दर‍असल अबुआजमी जो कि सपा विधायक के तौर पर महाराष्ट्र विधानसभा में चुनकर आये थे, इन्होंने हिंदी में शपथ ग्रहण करना शुरू किया । अब संविधान द्वारा हमें अधिकार प्राप्त है कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जितनी भाषाएं हैं हम उन सब में शपथ ग्रहण कर सकते हैं, तो हिंदी तो हमारी राष्ट्रभाषा है, तो आजमी साहब ने हिंदी में शपथ लेना शुरू ही किया था कि राज ठाकरे की मंडली (४ विधायक) ने उनपर इस बात के लिए हमला बोल दिया कि, इसने विधासभा में हिंदी में शपथ लेना कैसे शुरू कर दिया ।
अगर हमें ठीक से याद है तो हम शायद हिंदुस्तान में ही रह रहे हैं और हिंदी में शपथ ग्रहण करना हमारा संवैधानिक अधिकार है, लेकिन शायद ये बातें अपना महत्व खो देती हैं, मनसे जैसी ओछी राजनीति करने वाली पार्टियों के आगे । आजमी को हिंदी में शपथ ग्रहण करने के कारण अपमानित तो …

सेक्स में ध्यान रखें सेफ्टी का

एक गोली ने औरतों की दुनिया बदल दी। कॉन्ट्रासेप्टिव पिल के आने के बाद महिला‌एं महज बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं रह ग‌ईं , बल्कि वे खुद से फैसला करने लगीं कि उन्हें मां कब बनना है। इस रिवोल्यूशन का अगला स्टेप था इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल , जिसे एहतियात बरते बिना सेक्स करने के फौरन बाद खा लेने से गर्भ ठहरने की आशंका नहीं रहती। मगर इस गोली की वजह से महिला‌ओं का भला ही नहीं , बुरा भी हो रहा है। इन गोलियों के अंधाधुंध इस्तेमाल की वजह से होने वाली दिक्कतों और प्रेग्नेंसी रोकने और फैमिली प्लानिंग के दूसरों तरीकों पर तमाम एक्सर्पट्स से बात के बाद जो जानकारी हमने इकट्ठा की , उसके अनुसार ...

क्या होती है इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल

अनसेफ सेक्स के बाद प्रेग्नेंसी रोकने के लि‌ए खा‌ई जाने वाली गोली। इस गोली में दो - तीन तरह के हॉर्मोंस की हेवी डोज होती है। ये हॉर्मोन हैं - इस्ट्रजन और प्रजेस्टिन। कुछ गोलियों में इन दोनों का कॉम्बिनेशन होता है तो कुछ में इनके साथ एंटीप्रजेस्टिन भी …

ताजमहल...........

बी.बी.सी. कहता है...........
ताजमहल...........
एक छुपा हु‌आ सत्य..........
कभी मत कहो कि.........
यह एक मकबरा है..........


ताजमहल का आकाशीय दृश्य......




आतंरिक पानी का कुंवा............

ताजमहल और गुम्बद के सामने का दृश्य
गुम्बद और शिखर के पास का दृश्य.....

शिखर के ठीक पास का दृश्य.........
आँगन में शिखर के छायाचित्र कि बनावट.....

प्रवेश द्वार पर बने लाल कमल........
ताज के पिछले हिस्से का दृश्य और बा‌इस कमरों का समूह........
पीछे की खिड़कियाँ और बंद दरवाजों का दृश्य........
विशेषतः वैदिक शैली मे निर्मित गलियारा.....
मकबरे के पास संगीतालय........एक विरोधाभास.........

ऊपरी तल पर स्थित एक बंद कमरा.........


निचले तल पर स्थित संगमरमरी कमरों का समूह.........

दीवारों पर बने हु‌ए फूल......जिनमे छुपा हु‌आ है ओम् ( ॐ ) ....

निचले तल पर जाने के लि‌ए सीढियां........

कमरों के मध्य 300फीट लंबा गलियारा..
निचले तल के२२गुप्त कमरों मे से‌एककमरा...
२२ गुप्त कमरों में से एक कमरे का आतंरिक दृश्य.......


अन्य बंद कमरों में से एक आतंरिक दृश्य..
एक बंद कमरे की वैदिक शैली में
निर्मित छत......

ईंटों से बंद किय…

वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

काले धन एवं नकली नोटों से छुटकारा - भ्रष्टाचार पूर्णत: खत्म

प्राय: सभी देशों की सरकारों का एक रोना साझा है और वो भी अति भयंकर रोना! देश की अर्थ व्यवस्था में काला धन । यह काला धन बहुत से देशों को, बहुत सी सरकारों को बहुत रुलाता है और बुद्धिजीवी वर्ग को अत्यंत चिंतित करता है । अर्थशास्त्रियों की नाक में दम करके रखता है । रोज न‌ए-न‌ए सुझाव दि‌ए जाते हैं, विचार कि‌ए जाते हैं कि किस तरह इस काले धन पर रोक लगा‌ई जा‌ए. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट तो छापों में विश्वास रखता है, जहाँ कहीं सुंघनी मिली नहीं कि पहुँच ग‌ए दस्ता लेकर । अजी! काले धन की बात तो छोड़ि‌ए! नोटों को लेकर इससे भी बड़ी समस्या का सामना क‌ई देशों को करना पड़ता है, और वो है नकली नोटों की समस्या । दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करना हो या बेहाल करना हो, प्रिंटिंग प्रेस में दूसरे देश के नोट हूबहू छापि‌ए और पार्सल कर दीजि‌ए उस देश में, बस फ़िर क्या है - बिना पैसों के तमाशा देखि‌ए उस देश का । अब तो उस देश की पुलिस भी परेशान, गुप्तचर संस्था‌एं भी परेशान और सरकार भी परेशान! नकली नोट कहां-कहाँ से ढ़ूंढ़े और किस जतन से? बड़ी मुश्किल में सरकार ।
बचपन से छलाँग लगाकर जब हमने भी होश सँभाला तो आ‌ए दिन काले धन …

कुछ सत्य घटनायें

१ * ईसाईयों ने गोवा में जहां लाखों निरपराध हिन्दू स्त्री, पुरूषों व बच्चों का कत्‍ल किया, वहाँ २८० मन्दिर भी तोड़े और दैनिक जीवन पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये । जैसे हिन्दू रीति-रिवाजों के तहत विवाह व नामकरण संस्कार न करने देना, यज्ञोपवीत न होने देना, चोटी न रखने देना, घर के आँगन में तुलसी का पौधा न लगाने देना आदि । जिन हिन्दू स्त्रियों ने अपने साथ बलात्कार का विरोध किया, उन्हें जेलों में डालकर अपनी कामवासना की पूर्ति के बाद उन्हें हेरेटिक्स यानी ईसाई अन्धविश्‍वासी कहकर जिन्दा जलाने का आदेश दे दिया ।
२ * जब मदर टेरेसा से पूछा गया कि आप वहां के गरीबों को बिना ईसाई बनाये सहायता क्यों नहीं करतीं तो उन्होंने उत्तर दिया “बाइबिल में लिखा है कि जो ईसाई बनकर बयतिस्मा लेंगे, वे बचाये जायेंगे, शेष नष्ट कर दिये जायेंगे ।” इसी मदर टेरेसा को नवम्बर १९९४ में बी.बी.सी फिल्म में ‘नरक की परी’ कहा था ।
३ * हिन्दूओं को धोखे से ईसाई बनाने के लिये उत्तरांचल के गढ़वाल क्षेत्र के पर्वतीय नगर में योग आश्रम तथा अहमदाबाद से १२० किमी. दूर सच्चिदानन्द आश्रम के नाम से दो रोमन कैथोलिक चर्च चल रहे हैं । यहाँ की रूप रेखा व …

हिन्दुस्तान में मानव का अधिकार

सृष्टि का सबसे उन्‍नत जीव मानव है, जिसने प्राकृतिक संसाधनों को अपने श्रम, से नये रूप में ढालकर नई दुनिया की रचना कर डाली । आज उसी मानव के अधिकार की बात हो रही है । विकास के साधन के साथ-साथ मानव ने प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग किया, प्रकृति की सीमा रेखा का उल्लंघन भी किया । पृथ्वी की हरियाली का विनाश किया जो सभ्यता को स्थायित्व प्रदान करती है । पशुओं से उनका घर, आश्रम पर मानव कब्जा जमाते जा रहा है । यहां तक कि मानव अपने स्वार्थ में अनेकों पशुओं, जलचरों का शिकार कर रहा है, जिससे अनेक प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं । यहाँ तक कि मानव ने ही मानव पर अपने स्वार्थ के लिए उनका दमन शुरू कर दिया है ।
मानवाधिकार की परिभाषा क्या है? प्रकृति ने हर मानव को उसके परिवेश, स्थान के अनुसार इस पृथ्वी के नैसर्गिक अधिकार प्रदान किये हैं । किसी भी सामाजिक या राजनीतिक कारण से उनका ये अधिकार कोई मानव संगठन या सरकार हनन नहीं कर सकती । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और स्वस्थ समाज अपने बनाये हुए आदर्श आचारसंहिता के आधार पर ही चलता है, चूंकि हम मानव हैं । पशुओं के साथ में प्रकृति प्रदत्त आचारसंहिता है …

धर्म, प्रेम और संवेदना का महत्व

जिन नियमों के आचरण एवं अनुष्ठान से इस लोक और परलोक में अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वही धर्म है । देवताओं के पूजन-अर्चन में मन की पवित्रता का भी विशेष महत्व है । कर्मपुराण में स्नान के बारे में कहा गया है कि यह दृष्ट और अदृष्ट फल प्रदान करनेवाला है । प्रातः स्नान करने से निःसंदेह अलक्ष्मी, बुरे स्वप्न और बुरे विचार तथा अन्य पाप नष्ट हो जाते हैं । सत्संग का मतलब है सत्य की संगति । सत्य की संगति परमात्मा के नाम और उनकी कथा के कहने और सुनने में होती है । सत्संग में भगवान की कथा कहने और सुनने वालों का मन एवं शरीर दिव्य तेज से प्रकाशित हो उठता है । कथा श्रवण से प्रभु की कृपा सहज सुलभ हो जाती है । श्रीमद्‌भागवत में कहा गया है कि नियमित सत्संग और कथा श्रवण करने से भगवान अपने भक्‍तों के हदय में समा जाते हैं । धर्मशास्त्रों में भगवद कथाओं को आधिभौतिक, आधिदैविक और आधिदैहिक तापों को नष्ट करनेवाली कहा गया है । इन कथाओं का पुण्य फल मृत्यु के बाद ही नहीं बल्कि अगले जीवन में भी मिलता है । कथा श्रवण से निराश जीवन में भी आशा का संचार होता है ।
प्रख्यात आध्यात्मिक गुरू श्री रविशंकर कहते हैं- “ज…

भारतीय नववर्ष तथा कालगणना

प्राचीन काल में मुर्गे की बाँग, पक्षियों की उड़ान आकाश में चाँद, तारों व सूर्य की स्थिति, सूर्य की किरणों के कारण वृक्ष, पहाड़ आदि की छाया से लोग समय व कालखंड का अनुमान लगाते थे । इस कालखंड को मापने के लिये मानव ने जिस विधा या यंत्र का आविष्कार किया, उसे हम काल निर्णय, कालनिर्देशिका व कैलेन्डर कहते हैं । दुनिया का सबसे प्राचीनतम कैलेण्डर भारतीय है । इसे सृष्टि संवत कहते हैं । भारतीय कालगणना का आरम्भ सृष्टि के प्रथम दिवस से माना जाता है । इसलिये इसे सृष्टि संवत कहते हैं । यह संवत 1975949109 एक अरब सत्तानबे करोड़, उनतीस लाख, उनचास हजार, एक सौ नौ वर्ष पुराना है ।
कैलेण्डर के निर्माण में अनेक अवधारणायें उपलब्ध हैं । वैदिक काल में साहित्य में ऋतुओं के आधार पर कालखंड के विभाजन द्वारा कैलेण्डर के निर्माण का उल्लेख मिलता है । बाद में नक्षत्रों की चाल, स्थिति, दशा और दिशा से वातावरण व मानव स्वभाव पर पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन के आधार पर भी कैलेण्डर का निर्माण किया गया । हमारे खगोलशास्त्रियों ने ३६० अंश के पूरे ब्रह्याण्ड को २७ बराबर भागों में बांटा । इन्हें नक्षत्र कहते हैं । इन नक्षत्रों क…

बाल अधिकार एवं बाल साहित्य

अगर राष्ट्र को सशक्‍त बनाना चाहते हैं तो बच्चों को शिक्षित एवं चरित्रवान्‌ बनायें । शिक्षा एवं स्वास्थ्य बच्चों का मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय दायित्व हो । शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में शिथिलता एवं भ्रष्टाचार राष्ट्रीय अपराध घोषित हों । बच्चे राष्ट्र निर्माण में नींव का पत्थर तथा माँ व शिक्षक दोनों शिल्पकार होते हैं जो बच्चों को शिक्षित एवं उनके चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं । भारतीय संस्कृति में सदैव ही इस तथ्य के महत्व को स्वीकारा गया । हमारे पौराणिक ग्रन्थ इस बात के साक्षी हैं कि सदैव ही बाल शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर राज कृपा रही और ऋषि, मुनियों, व गुरूजनों ने सबको शिक्षा देने का कार्य किया । कालान्तर में, समय विशेष के दौरान भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में न केवल रूकावटें आयीं अपितु उसका क्षरण भी हुआ । परिणामतः हमारी सोच गुलामी की ओर अग्रसर हुई और शिक्षा एक गौण विषय बन गयी । यद्यपि समय-समय पर बाल शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने पर आवाजें उठती रहीं, तथापि आजादी के ५० वर्ष बाद तक भी इसमें पूर्ण सफलता नहीं मिल सकी थी । सन्‌ १९९० में थाईलैन्ड के नगर जोमेनियन में विश्‍व शिक…

बच्चों की पसंदीदा हीरो:गणेश,हनुमान और कृष्ण

भारत में बनने वाली कार्टून फ़िल्मों में पिछले कुछ समय से पौराणिक पात्रों पर आधारित फ़िल्मों में बढ़ोत्तरी हु‌ई है.

इनकी लोकप्रियता बाल गणेश, मा‌ई फ्रेंड गणेश, हनुमान, रिटर्न ऑफ हनुमान जैसी फ़िल्मों की सफलता से साफ़ झलकती है.

पौराणिक कथा‌एं और उनके किरदार, उनके हाव-भाव, उनकी शक्तियां, बहुत ही दिलचस्प हैं. एनिमेशन और स्पेशल इफेक्ट्स के माध्यम से ये सब अनोखे तरीके से प्रस्तुत कि‌ए जा सकते हैं.

कृष्णा देसा‌ई, डायरेक्टर, टर्नर इंटरनेशल इंडिया

तो आख़िर क्या वजह है बच्चों में इन फ़िल्मों की बढ़ती लोकप्रियता की, एनिमेशन सिरीज़ लिटिल कृष्णा बनाने वाली बिग एनिमेशन्स के सी‌ई‌ओ आशीष कुलकर्णी का कहना है कि हिन्दुस्तानी एनिमेशन इंडस्ट्री फ़िलहाल शुरु‌आती चरण में है और एनिमेशन किरदारों को बनाने और स्थापित करने में काफ़ी समय, मेहनत और ख़र्चा लगता है.

आशीष कुलकर्णी कहते हैं,” पौराणिक कथा‌ओं के पात्रों पर इसलि‌ए एनिमेशन फ़िल्म बन रही हैं क्योंकि वो किरदार और उनकी कहानियां बच्चों की जानी-पहचानी है. इसलि‌ए उन किरदारों को स्थापित करने में, उनका ब्रांड बनाने में सुविधा हो जाती है और ज़्यादा से ज़्यादा पैसा प्रोड्क्शन में …

बच्चों में पर्यावरण चेतना जगाती है यह

एक कहावत है जिसका अर्थ है- मूर्ति देखने में छोटी तो होती है किन्तु मान्यता या प्रभविष्णुता में विराट । कमोवेश यही बात समीक्ष्य पुस्तिका “सुबह सवेरे” के लिए सुसंगत है । बहुश्रुत एवं बहुपठित लेखनधर्मी डॉ. ए. कीर्तिवर्द्धन की यह चौथी कृति है किन्तु बालोपयोगी होने के कारण पूर्व कृतियों से भिन्‍न है ।
अल्पवयी पाठकों को सम्बोधित करते हुये कृतिकार चिड़ियों की सामान्य प्रसन्‍नता का कारण यह बताते हैं कि वह हमेशा गाया करती हैं । बच्चों को प्रसन्‍न देखते रहने के लिये ही उनकी सलाह है कि सुबह-सवेरे की कवितायें वह गायें और चिडियों की तरह ही प्रसन्‍न रहा करें- ऐसा करने से वह स्वस्थ भी रहेंगे, जीवन में यशार्जन भी करेंगे ।
सोलह पृष्ठों में बड़े अक्षरों में सुमुद्रित कृति बच्चों ही नहीं, सभी आयुवर्ग के पाठकों के लिये पठनीय है । सुबह-सवेरे शीर्षक वाली एक लम्बी रचना विशेषकर बच्चों को सूर्योदय से पूर्व जागकर अपने माता-पिता के चरण स्पर्श करने के उपरान्त समस्त रोजमर्रा की प्राकृतिक जरूरतों से निपटने स्नान-ध्यान के अलावा पक्षियों का कलरव सुनने, साफ-सुथरी हवा में विचरण करने, अपना-अपना भविष्य उत्कर्षमय बनाने क…

आतंकवाद के खात्में के लिए महारूद्राभिशेक

विश्‍व की सबसे बड़ी समस्या बनते जा रहे आतंकवाद से निपटने के लिए अब धार्मिक क्षेत्रों से भी पहल होने लगी है । पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में उज्जैन के विश्‍व प्रसिद्ध महाकालेश्‍वर मंदिर के मुख्य पुजारी रमण गुरू ने यही अनूठा प्रयोग किया । बिड़ला मंदिर में आयोजित इस रूद्राभिशेक कार्यक्रम में धर्म, अध्यात्म के जरिये आतंकवाद की समूल नष्ट करने के लिए भव्य आयोजन हुआ । जिसमें देश भर से आये ४०० लोगों ने एक स्वर से धर्म के मूल तत्वों को अपनाने, मानवता को मजबूत करने के लिए महारूद्राभिशेक में शिरकत की । इस अनूठे आयोजन में प्रथमतः महालेश्‍वर मंदिर के मुख्य पुजारी रमण गुरू ने देश भर में आतंक के खात्में के लिए आये ४०० लोगों के बीच शिवालिंग-रूद्राभिशेक किया । तत्पश्‍चात्‌ लोगों को शपथ दिलायी कि - “हम देशहित, समाजहित में आतंकी खात्मे के लिए प्राणपण से जुटेंगे ” । मुख्य पुजारी रमण गुरू ने तत्पश्‍चात लोगों के महाकालेश्‍वर के उद्‌घोष “जय महाकाल” के जरिये आत्म विभोर कर दिया । समाज हित के लिए दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी एवं सरहदी गांधी की तर्ज पर इस आयोजन को आगे बढ़ाने के लिए जन सहयोग की अपील की । उपस्थित भ…

अनुभूति की काव्य श्रुंखला से श्रोतागण मुग्ध

साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान २ दिसंबर को रविन्द्र भवन प्रांगण में कवियों ने कविताओं की बारिश की . इस काव्यपाठ में गगन गिल(हिन्दी), अनुभूति चतुर्वेदी (हिन्दी), शाहीना खान (अंग्रेजी),नुसरत जहीर(उर्दू) ने भाग लिया .गगनजी की "थोडी सी उम्मीद चाहिये" ,शाहीना खान की मानवाधिकार पर अंग्रेजी कविता तथा नुसरत जहीद की गजल और नज्म "शाखों पर दरख्तों को कुर्बान नहीं करते" , "ख्वाबों में ही कुछ शक्ल आए तो आ जाए", " "मोहब्बत अब नही होगी"को सराहना मिली .
सबसे अंत में हिन्दी कवियित्री अनुभूति चतुर्वेदी की कविताओं ने ऐसा शमाँ बाँधा कि श्रोतागण भावविभोर हो गए .अनुभूति ने कहा कि मैं ऐसी कविता सुनाउँगी जो गरमी पैदा कर दे .उनकी कविता " वर्तमान राजनीति के संदर्भ में"-
"बरगद उग आए हैं /पूरे शहर को ढक लिया है/बर्षों से जी रहे हैं /फिर भी जीना चहते हैं और /जडें पाताल तक पहुँच गई हैं /डालें लटक गई हैं झुककर /पत्ते झड गए हैं /पीली पडती टहनियाँ /उनकी बीमारियों का खुला दस्तावेज है /न जाने कितनों ने अभी तक ,गिद्ध और ची…

लोहिया ऑटो इंडस्ट्रीज के ‘इलेक्ट्रिक बाईक’ की धूम

लोहिया ऑटो इंडस्ट्रीज (एल ए आई) लोहिया समूह की पर्यावरण-अनुकूल, किफायती बिजली से चलने वाली बाईक- ओमा स्टार को बाजार में उतारा । ये कंपनी भारत में बिजली से चलने वाले दो- पहिए वाहनो का उत्पादन करने वाली औद्योगिक इकाइयों में से एक प्रमुख इकाई है ।
ओमा स्टार, सुरक्षा, स्टाईल और आराम का अद्वितीय सम्मिश्रण है । अप्ने नए रूप के साथ डिजिटल स्पीडोमीटर, एलॉए के स्टाइलिश पहियों, ज्यादा स्टोरेज क्षमता, उच्च ग्राउंड क्लीयरेंस, टेलिस्कोपिक सस्पेंशन, आदि सभी विशेषताएं इस बाइक में मौजूद हैं । हमेशा की तरह ही लोहिया ऑटो इंडस्ट्रीज का ये मॉडल भी अपने संभावित खरीदारों को पैसे की सही कीमत अदा करने में सक्षम है ।
ओम स्टार तीन तरह के रंगों में उपलब्ध है- मैको ब्लैक, फाइरी रीड और स्पीरीटेड सिल्वर । आम आदमी की जरूरतों के मुताबिक दिल्ली में ओमा स्टार की कीमत २५,९९९ रूपए और फेम की कीमत २४,६५० रूपए रखी गई है । २५ किमी/घंटा की रफ्तार के साथ ओ एन ए स्टार हर बार चार्ज करने पर ६० किमी की दूरी तय करती है । ये इलेक्ट्रोनिक बाइक अलाने में आसान और बेहतर है, इसका स्टाईल अनुपम है और इसके जरिए अच्छी खासी बचत की जा सकती है…

जिनका उद्देश्य है ग्राहकों को आकर्षित करना

मेले में किसी भी उत्पाद के प्रचार के लिए कंपनी विभिन्‍न हथकंडे अपनाती है ।ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कंपनियाँ दर्शकों के भीड़ जुटाकर अपने उत्पाद हेतु प्रचार-प्रसार करना ज्यादा फायदेमंद मानती है । इसके तहत रोड शो, नुक्‍कड़ नाटक, ऑस्केस्ट्रा, लकी ड्रा, लॉटरी, पजल गेम, क्विज आदि तरीके आते हैं । ग्राहकों के मन में उत्पाद के प्रति संभावना, माँग, नकारात्मक एवं सकारात्मक पहलुओं को जानना समझना अति आवश्यक होता है । इसके लिए हर बड़ी कंपनी सर्वेक्षण एजेंसी का सहारा लेती है । देश के विभिन्‍न क्षेत्रों से ग्राहकों की मानसिकता का अध्ययन कुछ पन्‍नों में विभिन्‍न प्रश्नों को पूछकर किया जाता है । सी-४, नेल्सन, मार्ग, क्रेड आदि सर्वेक्षण कंपनियाँ उत्पाद निर्माताओं, राजनैतिक दलों, गैर सरकारी/ सरकारी संस्थाओं व व्यक्‍ति विशेष के संदर्भ में व्यापक रूप से आँकड़ा इकट्‌ठा कर पूरी योजनाओं को मूर्त्त रूप देते हैं ।
इसी के अगली कड़ी के रूप में उत्पाद निर्माता अपने उत्पादों के लांचिंग हेतु ज्यादा से ज्यादा भी जुटाने हेतु विभिन्‍न कलाकारों को भी हायर करती है । इस असायनमेंट के तहत उन कलाकारों की जिम्मेवारी भीड़ क…

अप्रवासी भारतीय वेंकटरमण को रसायनशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार

वेंकटरमन रामचंदन नोबेल से सम्मानित होनेवाले सातवें भारतीय हैं । वास्तव में इससे भारत गौरवान्वित हुआ है । उल्लास में उनका बड़ौदा वि. वि. भी है । वैसे यह गलत चलन है कि काम का महत्व पुरस्कारों से तय होता है । खुद उनके कार्य (अनेक लाइलाज बीमारियों का निदान), उनसे जुड़े वैज्ञानिकों एवं उनके साथ सम्मानित अदा योनोथ व थामस स्टीज को लख-लख बधाई ।
भले ही वह बहुत पहले अमेरिका में बस गए लेकिन रसायन विज्ञान के लिए भारतीय अमेरिकी वैंकटरमन रामाकृष्णन को नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा ने करोड़ों भारतीयों को गौरवान्वित कर दिया । कोशिकीय तंत्र में प्रोटीन की रचना करने वाले अंगक राइबोजोम पर उल्लेखनीय अनुसंधान कार्य के लिए यह पुरस्कार मिला ।
मंदिरों के शहर तमिलनाडु के चिदंबरम में १९५२ में जन्में ५७ वर्षीय रामाकृष्णन ऐसे सातवें भारतीय या भारतीय मूल के व्यक्‍ति हैं जिन्हें इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना गया है । रामाकृष्णन्‌ ने गुजरात के बड़ौदा वि. वि. से १९७१ में विज्ञान में स्नातक की उपाधि हासिल की और फिर उच्चतर अध्ययन के लिए अमेरिका चले गए । बाद में वह पूरी तरह अमेरिका में बस गए और उन्होंने वहाँ की न…

कैसे करें मानवाधिकार की रक्षा?

देश की हर जनता को असीमित अधिकार प्राप्त है मगर अधिकांश को अपने अधिकार की जानकारी ही नहीं है । यह अलग बात है कि अधिकार के साथ-साथ कर्त्तव्य की जानकारी भी नहीं है । जब तक हम अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करेंगे तब तक अधिकार की माँग करना बेतुकी बात है । आज अधिकार को कानूनी जामा पहनाकर एक्ट का रूप दिया जा रहा है जो कानून का रूप लेगा । कानून में व्याप्त खामियों को दूर करके ही सही और त्वरित न्याय व्यवस्था कायम की जा सकती है । शिक्षा का अधिकार, नौकरी या रोजगार पाने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, देश के किसी भी प्रान्त में जाने और रहने का अधिकार आदि हमारे मूलभूत अधिकार हैं । दुर्भाग्य की बात यह है कि आज हमारे अधिकार पर कटौती की जा रही है । अधिकार पर हमले हो रहे हैं । नक्सलवादी देश में समानांतर सत्ता चला रहे हैं । महाराष्ट्र में राजठाकरे द्वारा अन्य प्रांत के लोगों को खदेड़ने का अभियान या असम में अन्य राज्य के लोगों पर हमले से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमें अधिकार से वंचित किया जा रहा है । दूसरे शब्दों में कहें तो यह मानवाधिकार पर हमला है । आश्‍चर्य इस बात का है कि सरकार मूकदर्शक बनी बैठी है और …

मखाने के कारोबार के सरताज हैं सत्यजीत

शक्‍ति सुधा इंडस्ट्रीज के संस्थापक सत्यजीत कुमार सिंह ने एक जबर्दस्त मिसाल कायम की है । सिंह ने पूरे देश का नब्बे प्रतिशत बिहार में उत्पादित होने वाले मखाना के प्रसंस्करण का उद्योग लगाया और आज उनका टर्नओवर ५० करोड़ रूपए का है । यह उद्योग लगाने से पूर्व वह उपभोक्‍ता वस्तुओं का कारोबार करते थे । बिहार जैसे प्रदेश में जहां उद्योग-धंधों का वैसे ही टोटा है और राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी उद्योग लगाने वाले लोग सामने नहीं आ रहे हैं वहां सत्यजीत ने मेहनत के बल पर जो मुकाम हासिल की है वह जरूर दूसरों को उत्साहित करेगा ।
प्राकृतिक आपदा, सीमित संसाधन और आधारभूत संरचना के अभाव के कारण बिहार आज भी उद्योगों का रेगिस्तान बना हुआ है । चार साल पूर्व सत्ता परिवर्तन के बाद उद्योग नीति में परिवर्तन, तमाम सहूलियतों के प्रावधान और कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार के बूते राज्य ने निवेश आकर्षित करने की मुहिम छेड़ी लेकिन कामयाबी नहीं मिल पायी । ऐसे में कोई उद्योगपति खाद्य संस्करण की इकाई स्थापित कर कामयाबी का अध्याय लिखे तो यह साधारण बात नहीं है । शक्‍ति सुधा इंडस्ट्रीज के संस्थापक सत्यजीत कुमार सिंह…

बाजारू न बनने पाए हिंदी

परिवहन, जनसंचार, पूंजीवाद और बाजार के विस्तार ने हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय भाषा का स्वरूप प्रदान किया है । यही वह कारण है, जिसके चलते आज बाजार में जिन्दी अनुवादों की बाढ़ आ रही है । मौलिक किताबों से ज्यादा अनुवाद की गई किताबें आ रही हैं और यदि अनुवाद का जोर ऐसा ही रहा तो अनुवाद की यह प्रक्रिया हिन्दी के लिए भाषा बंधन की प्रक्रिया बनने की बजाए, भाषा भक्षण की प्रक्रिया बन जायेगी । हिन्दी के बाजारू हो रहे स्वरूप पर चिंता व्यक्‍त करते हुए ये बातें जाने-माने आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहीं । जे‍एनयू हिन्दी यूनिट द्वारा भाषा बंधन विषय पर कला और सौंदर्यशास्त्र संस्थान सभागार में आयोजित सेमिनार में शिरकत करने पहुंचे नामवर सिंह ने कहा कि वर्तमान में मीडिया की नजर से हिन्दी अंतरराष्ट्रीय भाषा हो गई है, लेकिन इसके कारणों पर विचार करना होगा । हमें देखना होगा कि हिन्दी के इस नए रूप निर्माण से वह अपनी जड़ों से लोकबोलियों से कितनी जुड़ी रह पाएगी । इस मौके पर कुलपति प्रो. बी.बी. भट्‌टाचार्य ने हिन्दी यूनिट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहा कि हिन्दी का भविष्य उज्जवल तभी बनेगा, जब किसी भी विषय की मौलिक अवधारण…

आरटीआई से खत्म हो सकता है भ्रष्टाचार और लालफीताशाही

सरकार, सरकारी योजनाएँ और तमाम सरकारी गतिविधियाँ हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । आम आदमी से जुड़ा कोई भी मामला हो प्रशासन में बैठकर भ्रष्ट, लापरवाह या अक्षम कर्मचारियों/अधिकारियों के कारण सरकारी योजनाएँ सिर्फ कागज का पुलिंदा बनकर रह जाती हैं ।
सन्‌ १९४७ में मिली कल्पित आजादी के बाद से अब तक हम मजबूर थे । व्यवस्था को कोसने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे परन्तु शायद अब हम मजबूर नहीं हैं क्योंकि आज हमारे पास सूचना का अधिकार नामक औजार है, जिसका प्रयोग करके हम सरकारी विभागों में अपने रूके हुए काम आसानी से करवा सकते हैं। हमें सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ की बारीकियों को पढ़कर समझना और सामाजिक क्षेत्र में इसको अपनाना होगा । इस अधिनियम के तहत आवेदन करके हम किसी भी विभाग से कोई भी जानकारी माँग सकते हैं और अधिकारी/विभाग द्वारा माँगी गई सूचना को उपलब्ध करवाने हेतु बाध्य होगा । यही बाध्यता/ जवाबदेही न केवल पारदर्शिता की गारंटी है बल्कि इसमें भस्मासुर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार का उन्मूलन भी निहित है । यह अधिनियम आम आदमी के लिए आशा की किरण ही नहीं बल्कि आत्मविश्‍वास भी लेकर आया है…