Skip to main content

Posts

Showing posts from October, 2009

कैसे करें मानवाधिकार की रक्षा?

देश की हर जनता को असीमित अधिकार प्राप्त है मगर अधिकांश को अपने अधिकार की जानकारी ही नहीं है । यह अलग बात है कि अधिकार के साथ-साथ कर्त्तव्य की जानकारी भी नहीं है । जब तक हम अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करेंगे तब तक अधिकार की माँग करना बेतुकी बात है । आज अधिकार को कानूनी जामा पहनाकर एक्ट का रूप दिया जा रहा है जो कानून का रूप लेगा । कानून में व्याप्त खामियों को दूर करके ही सही और त्वरित न्याय व्यवस्था कायम की जा सकती है । शिक्षा का अधिकार, नौकरी या रोजगार पाने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, देश के किसी भी प्रान्त में जाने और रहने का अधिकार आदि हमारे मूलभूत अधिकार हैं । दुर्भाग्य की बात यह है कि आज हमारे अधिकार पर कटौती की जा रही है । अधिकार पर हमले हो रहे हैं । नक्सलवादी देश में समानांतर सत्ता चला रहे हैं । महाराष्ट्र में राजठाकरे द्वारा अन्य प्रांत के लोगों को खदेड़ने का अभियान या असम में अन्य राज्य के लोगों पर हमले से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमें अधिकार से वंचित किया जा रहा है । दूसरे शब्दों में कहें तो यह मानवाधिकार पर हमला है । आश्‍चर्य इस बात का है कि सरकार मूकदर्शक बनी बैठी है और …

मखाने के कारोबार के सरताज हैं सत्यजीत

शक्‍ति सुधा इंडस्ट्रीज के संस्थापक सत्यजीत कुमार सिंह ने एक जबर्दस्त मिसाल कायम की है । सिंह ने पूरे देश का नब्बे प्रतिशत बिहार में उत्पादित होने वाले मखाना के प्रसंस्करण का उद्योग लगाया और आज उनका टर्नओवर ५० करोड़ रूपए का है । यह उद्योग लगाने से पूर्व वह उपभोक्‍ता वस्तुओं का कारोबार करते थे । बिहार जैसे प्रदेश में जहां उद्योग-धंधों का वैसे ही टोटा है और राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी उद्योग लगाने वाले लोग सामने नहीं आ रहे हैं वहां सत्यजीत ने मेहनत के बल पर जो मुकाम हासिल की है वह जरूर दूसरों को उत्साहित करेगा ।
प्राकृतिक आपदा, सीमित संसाधन और आधारभूत संरचना के अभाव के कारण बिहार आज भी उद्योगों का रेगिस्तान बना हुआ है । चार साल पूर्व सत्ता परिवर्तन के बाद उद्योग नीति में परिवर्तन, तमाम सहूलियतों के प्रावधान और कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार के बूते राज्य ने निवेश आकर्षित करने की मुहिम छेड़ी लेकिन कामयाबी नहीं मिल पायी । ऐसे में कोई उद्योगपति खाद्य संस्करण की इकाई स्थापित कर कामयाबी का अध्याय लिखे तो यह साधारण बात नहीं है । शक्‍ति सुधा इंडस्ट्रीज के संस्थापक सत्यजीत कुमार सिंह…

बाजारू न बनने पाए हिंदी

परिवहन, जनसंचार, पूंजीवाद और बाजार के विस्तार ने हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय भाषा का स्वरूप प्रदान किया है । यही वह कारण है, जिसके चलते आज बाजार में जिन्दी अनुवादों की बाढ़ आ रही है । मौलिक किताबों से ज्यादा अनुवाद की गई किताबें आ रही हैं और यदि अनुवाद का जोर ऐसा ही रहा तो अनुवाद की यह प्रक्रिया हिन्दी के लिए भाषा बंधन की प्रक्रिया बनने की बजाए, भाषा भक्षण की प्रक्रिया बन जायेगी । हिन्दी के बाजारू हो रहे स्वरूप पर चिंता व्यक्‍त करते हुए ये बातें जाने-माने आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहीं । जे‍एनयू हिन्दी यूनिट द्वारा भाषा बंधन विषय पर कला और सौंदर्यशास्त्र संस्थान सभागार में आयोजित सेमिनार में शिरकत करने पहुंचे नामवर सिंह ने कहा कि वर्तमान में मीडिया की नजर से हिन्दी अंतरराष्ट्रीय भाषा हो गई है, लेकिन इसके कारणों पर विचार करना होगा । हमें देखना होगा कि हिन्दी के इस नए रूप निर्माण से वह अपनी जड़ों से लोकबोलियों से कितनी जुड़ी रह पाएगी । इस मौके पर कुलपति प्रो. बी.बी. भट्‌टाचार्य ने हिन्दी यूनिट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहा कि हिन्दी का भविष्य उज्जवल तभी बनेगा, जब किसी भी विषय की मौलिक अवधारण…

आरटीआई से खत्म हो सकता है भ्रष्टाचार और लालफीताशाही

सरकार, सरकारी योजनाएँ और तमाम सरकारी गतिविधियाँ हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । आम आदमी से जुड़ा कोई भी मामला हो प्रशासन में बैठकर भ्रष्ट, लापरवाह या अक्षम कर्मचारियों/अधिकारियों के कारण सरकारी योजनाएँ सिर्फ कागज का पुलिंदा बनकर रह जाती हैं ।
सन्‌ १९४७ में मिली कल्पित आजादी के बाद से अब तक हम मजबूर थे । व्यवस्था को कोसने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे परन्तु शायद अब हम मजबूर नहीं हैं क्योंकि आज हमारे पास सूचना का अधिकार नामक औजार है, जिसका प्रयोग करके हम सरकारी विभागों में अपने रूके हुए काम आसानी से करवा सकते हैं। हमें सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ की बारीकियों को पढ़कर समझना और सामाजिक क्षेत्र में इसको अपनाना होगा । इस अधिनियम के तहत आवेदन करके हम किसी भी विभाग से कोई भी जानकारी माँग सकते हैं और अधिकारी/विभाग द्वारा माँगी गई सूचना को उपलब्ध करवाने हेतु बाध्य होगा । यही बाध्यता/ जवाबदेही न केवल पारदर्शिता की गारंटी है बल्कि इसमें भस्मासुर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार का उन्मूलन भी निहित है । यह अधिनियम आम आदमी के लिए आशा की किरण ही नहीं बल्कि आत्मविश्‍वास भी लेकर आया है…

नक्सलवाद : सरकार के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएच‍आरसी) के सोलहवें स्थापना दिवस समारोह में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और एनएस‍आरसी के पूर्व अध्यक्ष ए.एस. आनंद ने कहा कि मानवाधिकार के संरक्षकों ने समाज में अहम भूमिका अदा की है लेकिन उन्हें भी प्रशासन के हाथों बहुत कुछ झेलना पड़ता है । आरोपों से लेकर सजा तक मानवाधिकाअर संरक्षकों में झेली है । उन्होंने कहा था कि मानवाधिकार में सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकार भी शुमार हैं । आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस जी.वी. माथुर ने कहा कि सामाजिक विकास मानवाधिकारों के प्रति सम्मान के बगैर संभव नहीं है । देश के हर नागरिक को मानवाधिकार सुनिश्‍चित करने के मकसद से आगे आना चाहिए ।
वहीं दूसरे तरफ आलम यह है कि नक्सली अपने खूनी संघर्ष में बच्चों की हत्या करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं । प्रश्‍न यह उठता है कि क्या नक्सली मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं कर रहे? इसके साथ ही प्रश्न यह भी उठता है कि नक्सली आखिर नक्सली क्यों बने? जब भूख, अन्याय, बेबसी और उत्पीड़न बढ़ेगा और उसके स्थायी समाधान योजनाबद्ध तरीके से नहीं चलाए जाएँगे तब-तब नक्सलवाद और पनपेगा । नक्सलवाद के दलदल में य…

नए संपूर्ण क्रांति की आवश्यकता

यह क्रांति है मित्रों ! संपूर्ण क्रांति ! जमाने की पुकार है यह । संपूर्ण क्रांति समाज और व्यक्‍ति को बदलने के लिए है । संघर्ष और रचना की दोहरी प्रक्रिया उसके लिए जरूरी है । संपूर्ण क्रांति समूची जनता की निष्ठा और शक्‍ति से ही मुमकिन है । हर गांव, हर शहर, हर स्कूल हर कारखाने में ऐसे लोग सामने आएं जो संपूर्ण क्रांति के मूल्यों को स्वीकार करते हों ।
५ जून १९७४ को पटना के गांधी मैदान की ऐतिहासिक रैली में बोलते हुए जेपी ने सहज की संपूर्ण क्रांति की बात की थी । हालांकि इसकी अवधारणा व्यापक थी, लेकिन समझा इसे सीमित अर्थों में गया । दर‍असल, इस शब्द का राजनीतिक जुमले के रूप में इतना और इस कदर दुरूपयोग हुआ कि इसका वास्तविक और सारगर्भित अर्थ पूरी तरह सामने नहीं आ सका । आज भी संपूर्ण क्रांति की बात होती है तो इसे ७४ के छात्र आंदोलन या ७७ के इंदिरा गांधी के पराभव और जनता पार्टी सरकार की स्थापना के अर्थ में ही लिया जाता है ।
अधिकतर लोग इंदिरा सरकार की तानाशाही की मुखालफत को ही इसका अंतिम उद्देश्य मान बैठे । लेकिन किसी भी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए तो सिर्फ क्रांति क्यों? संपूर्ण क्रांति इसलिए कि ब…

जलवायु पर भारत का नया नजरिया

पर्यावरण पर संयुक्‍त राष्ट्र की नई संधि पर दिसंबर में कोपेनहेगन में दस्तखत होने हैं । ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनी ग्रीन हाउस गैसों को किस तरह कम किया जाए, इस पर विकसित विश्‍व और विकासशील देशों को सहमति बनानी है । अमेरिका चाहता है कि भारत और चीन जैसे देश लक्ष्य बनाकर इन गैसों का उत्सर्जन कम करें । तेजी से बढ़ रही दोनों देशों की अर्थव्यवस्था में इस उत्सर्जन की मात्रा भी बढ़ रही है । भारत का तर्क है कि इसका उसके आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा, वह चाहता है कि विकसित विश्‍व इन्हें नियंत्रित करें, साथ ही उत्सर्जन कम करने की नई तकनीक में निवेश करें । भारत ने साफ कर दिया है कि वह कार्बन उत्सर्जन पर किसी भी तरह की कानूनी अनिवार्यता स्वीकार्य करने को तैयार नहीं है । इस समय कार्बन उत्सर्जन की ८० फीसदी वृद्धि भारत और चीन जैसे देशों में ही हो रही है । भारत का तर्क है कि अगर उसकी अर्थवयवस्था इसी दर से तरक्‍की करती रही, तब भी अगले एक या दो दशक में उसका प्रति व्यक्‍ति कार्बन उत्सर्जन विकसित देशों के मुकाबले काफी कम होगा । हाल में ही अमेरिका के प्रतिनिधि सदन में एक बिल पास किया गया है, जिसमें यह प्रावधान है …

राजीव के जमाने में आईटी में आई हलचल

अपने लेख के पिछले अंश में मैंने इस बात का जिक्र किया था कि आईटी को राजीव गांधी का किस कदर समर्थन मिला । प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी पहली कुछ घोषणाओं में आईटी नीति शामिल थी । वह समय आईटी उद्योग के उभरने का दौर था । वर्ष १९८४ में आईटी नीति आने तक सरकार की नजर में हम उद्यमी ही नहीं थे । सॉफ्टवेयर के कारोबार को कोई कारोबार मानने के लिए तैयार नहीं था । इसलिए बैंक हमें लोन देने को तैयार नहीं थे । हमारी पहली पूंजी आपस में जोड़ी गई कुछ रकम ही थी । हमें एक कंप्यूटर हासिल करने तक में खासी मशक्‍कत करनी पड़ी । हमें अपना पहला कंप्यूटर बाहर से मंगाना पड़ा । वह भी इस नियम के तहत कि सॉफ्टवेयर निर्यातक तभी कंप्यूटर का आयात कर सकते हैं जब उसके पास ग्राहकों के ऑर्डर हों ।
वर्ष १९८२ में इन्फोसिस ने १५० एमबी का हार्ड डिस्क ड्राइव के आयात की अनुमति के लिए आवेदन किया था । (मुझे पता है कि आप हंस रहे होंगे लेकिन १५० एमबी १९८२ में एक बड़ी बात है ) । लेकिन जब तक हमें अनुमति मिली, ड्राइव बनाने वाली कंपनी ने इसकी क्षमता बढ़ाकर ३०० एमबी कर दी थी और दाम १५ फीसदी घटा दिए थे । इसका मतलब यह था कि हमें फिर से बदले हुए आया…

निजी जीवन में पुलिस की नई भूमिका

निजी जीवन में पुलिस की नई भूमिका

पिछले दिनों उड़ीसा के गंजम जिले के पाटापुर थाना प्रभारी एस.एल.के. प्रसाद ने कहा कि अपराध रोकने के अलावा भी पुलिस की कुछ जिम्मेदारी होती है । इस थाने में पिछले छह महीने में तीन शादियां कराई जा चुकी हैं । २२ साल के श्याम गौड़ २० साल की राजेश्‍वरी से हाल ही में थाने के अंदर ही परिणय सूत्र में बंधे । लड़के के घर वाले शादी के लिए राजी नहीं थे । झगड़े का बहाना बना कर श्याम के पिता लड़की वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने थाने गए थे, जिससे पुलिस को दोनों के बीच के प्रेम-प्रसंग का पता चला । थाना प्रभारी ने दोनों परिवारों को बुलाकर समझाया और बाद में उनकी उपस्थिति में थाने में ही शादी संप‍न हुई ।
गंजम पुलिस की यह कार्यवाही पुलिस की खास किस्म की छवि से आतंकित समाज के लिए आश्‍चर्यचकित कर सकती है । जिस तरह उड़ीसा के एस. एल. के. प्रसाद ने अपने स्तर पर लोगों में मेलमिलाप की प्रक्रिया शुरू की है, उसी तरह इधर दिल्ली हाई कोर्ट से खबर आई है कि उसने दंपतियों के बढ़ते तनाव के मद्‌देनजर एक मध्यस्थता सेल का गठन किया है । इसके लिए उसने कई जगह विज्ञापन लगवाए हैं । इसके अलावा लीगल ऐड कम…

खटिक समाज के अंबेडकर डॉ. गंगाराम निर्वाण

अनसूचित जाति (खटिक) के कर्मठ समाजसेवी डॉ. गंगाराम निर्वाण का निधन ३० अगस्त २००९ को ९० वर्ष की आयु में हो गया । जीवट व्यक्‍तित्व के धनी और खटीकों को राजनीति में आने का आग्रह करते हुए अपना पूरा जीवन लगाने वाले इस महापुरूष का जन्म ६ अप्रैल १९१९ को हुआ था । छात्र राजनीति ः तिब्बिया कॉलेज में जाने के बाद छात्र राजनीति के माध्यम से इन्होंने अपने संघर्ष की शुरूआत की । वहाँ दलितों पर होनेवाले अत्याचारों को लेकर विरोध करते हुए अनेक माँगपत्र व ज्ञापन दिए । छात्रों को संगठित करने के कारण बी.ए.एम. एस. की डिग्री पूरी न करने के इरादे से इनको तिब्बिया कॉलेज से निकाल दिया गया परन्तु निष्कासन इनका मनोबल न तोड़ पाया । इनके आंदोलन को साथी छात्रों से मिल रहे समर्थन को देखते हुए दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री ब्रह्म प्रकाश जी से मिल रहे समर्थन के कारण इनको कॉलेज में दोबारा दाखिला मिल गया । इस आंदोलन से एक फायदा यह हुआ कि दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री ब्रह्मप्रकाशजी के सीधे सम्पर्क में आ गए ।
अंबेडकर के अनुयायी
१९६१ में कौमी मुसाफिर बाबा प्रभाती ने इनका परिचय डॉ. भीमराव अंबेडकर से कराया । उसके बाद नियमति रूप से…

मीडिया की निगरानी

पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि स्वतंत्रता के दुरूपयोग के तमाम खतरों के बावजूद मैं दमित और नियंत्रित प्रेस के बजाय एक स्वतंत्र प्रेस का पक्षधर हूं । भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के इस विनम्र रुख के विपरीत कांग्रेसनीत केंद्रीय सरकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाने जा रही है । विभिन्‍न पक्षों से सलाह-मशविरा जारी है, जिनमें नागरिक संगठनों के अलावा उद्योग जगत भी शामिल है । सरकार इस कदम का औचित्य सिद्ध करते हुए दलील देती है कि प्रसारण सेवा के नियामक के गठन और आचार संहिता लागू करने का कारण पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्‍न संसदीय समितियों की रपटों, अदालत के फैसलों, राज्य सरकारों के अनुरोध और नागरिक संगठनों की राय है । उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवहार से विमुख दिखाई देने से बचने के लिए सरकार ने प्रसारण सेवा के नियमन संबंधी विधेयक के मसौदे में प्रसारण नियमन प्राधिकरण (बीआरएआई) के गठन का प्रस्ताव किया है । प्रस्तावित विधेयक के अनुसार प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों का चुनाव एक समिति की अनुशंसा के आधार पर केंद्र सरकार करेगी । इस समिति में राज्यसभा के अध्यक्ष, लोकसभा के स्पीकर…

दलित महिला आंदोलन की प्रेरणास्त्रोत थीं शांताबाई दाणी

‘दलित स्त्रियों की यातना, उनका संघर्ष और उनकी उपलब्धियाँ इतिहास में अपनी दस्तक देती रही हैं । उगते हुए सूरज की किरणों की तरह अपनी आभा बिखेर कर वे समाज को ऊर्जावान बनाती रही हैं । संघर्षशील दलित नायिकाएँ कीचड़ में कमल और धूसरित पगडंडी के किनारे पड़े चमकते मोती की तरह बरबस अपनी ओर सबका ध्यान खींच लेती हैं ।
बाबासाहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन समानता के आंदोलन का प्रतीक बना, अतः ऊँची-नीच, जात-पाँत और और लैंगिक असमानता के विरूद्ध इसका मुखर आह्वान रहा है । दलित समाज तीन हजार साल से अधिक अपनी गुलामी से मुक्‍ति की मशाल जलाए ब्राह्मणवाद को ललकारता रहा है । वह ब्राह्मणवाद के विरूद्ध अपने संघर्ष में अपने पुस्तैनी धंधे छोड़ रहा था तो नई दुनिया में नए-नए आदर्श स्थापित कर रहा था । दलित स्त्रियाँ भी कंधे से कंधा मिलाकर इन संघर्षों को नेतृत्व दे रही थीं ।
डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन ने भूखी-प्यासी, गरीबी से त्रस्त दलित जनता में अपने अधिकारों के लिए लड़ने की जान फूँकी । मंदिरों में घुसकर देवताओं के दर्शन का अधिकार, सार्वजनिक स्थलों पर आने-जाने और उन्हें इस्तेमाल करने के सम…

वंदे मातरम् गाने पर काफ़िर घोषित कर दिया

आगरा शहर में वंदे मातरम् गाने पर मुस्लिम महिला को उसके पति ने ही काफ़िर घोषित कर दिया और उसे मारपीट कर घर से भी निकाल दिया। इस अत्याचार की शिकार हु‌ई सलमा उस्मानी ने इसके खिलाफ थाने में रिपोर्ट लिखा‌ई है।
आगरा के शाहगंज क्षेत्र के न्यू खबासपुरा में रहने वाली सलमा का कहना है कि उसके पति अब्दुल सत्तार अपने मित्र से किसी फतवे को लेकर चर्चा कर रहे थे। उनका कहना था कि वंदे मातरम् गाने वाले की तो शवयात्रा में जाना भी मुस्लिम के लिये काफिर होने जैसा है। इस पर सलमा भड़क ग‌ई और उसने कहा कि भारत में रहते हैं वंदे मातरम् गाने में किसी को क्या हर्ज है। इसी बात पर बहस शुरू हो ग‌ई। इस पर सलमा के पति और उसके दोस्त ने उसको उलाहना दिया कि तू भी वंदे मातरम् गायेगी तो काफिर हो जा‌एगी। इस बहस में सलमा जोश में आ ग‌ई और उसने जोर से ’वंदे मातरम्’ बोल दिया। यह बात उसके पति अब्दुल सत्तार और उसके दोस्त को इतनी नागुवार गुजरी कि उन्होंने मोहम्मद शमीम, मोहम्मद अली, जीनत बेगम, अंजुम बेगम और बबलू खान के साथ मिलकर सलमा से मारपीट की और घर से निकाल दिया।

एटमी युद्ध छिड़ा तो जीतेगा भारत, पाक होगा नेस्तनाबूद

भारत-पाकिस्तान के बीच अगर परमाणु युद्ध छिड़ा तो आखिरकार जीत भारत की ही होगी और पाकिस्तान का सफाया हो जाएगा । लेकिन इसकी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ जाएगी । पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल पर आधारित एक पुस्तक में दावा किया गया है कि भारत को इसके लिए अपने ५० करोड़ लोगों की जान गंवानी पड़ जाएगी । पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक और इतिहासकार टेलर ब्रांच ने दावा किया है कि वर्ष १९९९ में करगिल युद्ध के दौरान भारतीय नेताओं ने तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को दोनों के बीच परमाणु युद्ध के हालात के बाद के परिदृश्य बताए थे ।
इस पुस्तक में ‘ऐट मिसाइल्स इन बगदाद’ अध्याय नाम से परमाणु युद्ध के बारे में बताया गया है जिसमें लेखक ने दावा किया है कि क्लिंटन ने उन्हें बताया था कि पाकिस्तान में यदि भारत पर परमाणु बम दागे गए तो भारत पूरे देश को तबाह कर देगा । व्हाइट हाउस में क्लिंटन से हुई बातचीत और उसके रिकॉर्ड किए अंशों का हवाला देते हुए ब्रांच ने ७०० पन्‍ने की पुस्तक ‘द क्लिंटन टेप्स : रेसलिंग हिस्ट्री विद द प्रेसिडेंट’ लिखी है । पुस्तक में उन्होंने लिखा है ‘राष्ट्रपति ने एक संक्षिप्त नोट म…

क्या है श्‍वेत क्रांति ?

भारत दुनिता का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है । देश की जीडीपी में डेयरी उद्योग की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है और आर्थिक परिदृश्य में इसकी दमदार उपस्थिति भी । देश के अन्य उद्योगों की तरह डेयरी उद्योग की भी अपनी खामियां हैं । इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस उद्योग की संरचना बहुत संगठित नहीं है । देश में काम कर रहे तकरीबन सभी को-ऑपरेटिव फेडरेशन स्मॉल एवं मीडियम सेक्टर से ताल्लुक रखते हैं ।
एसएमई की आपूर्ति श्रृंखला में कई कमियां हैं । मध्यस्थों की बढ़ती दखलंदाजी और विभिन्‍न आपूर्ति श्रृंखला के बीच तालमेल के अभाव की वजह से काफी मुश्किलें आती हैं । इससे दूध की गुणवत्ता और आपूर्त्ति श्रृंखला की कार्यप्रणाली पर असर पड़ता है । इस श्रृंखला में कई कमजोर कड़ियां होती हैं, इसके अलावा अनावश्यक मानवीय दखल होता है जिससे गलतियों की संभावना बढ़ती है और खर्च बढ़ता है । देश में डेयरी को-ऑपरेटिव्स खासकर एसएमई खिलाड़ियों को मुनाफा बढ़ाने के लिए इन समस्याओं को सुलझाना जरूरी है ।
इस क्षेत्र से जुड़े एसएमई के लिए समन्वय की कमी सबसे गंभीर समस्या है, खासकर उन मामलों में जहां मांग से जुड़ी भविष्यवाणी करने की जरूरत हो । मांग से…

शिक्षा का अधिकार कानूनी बनी चुनौती

शिक्षा के अधिकार कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए भारी-भरकम राशि का इंतजाम केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती साबित होने जा रहा है । मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल स्वीकार कर चुके हैं कि केंद्र के पास कानून को लागू करने के लिए तकरीबन एक लाख ६४ हजार करोड़ रूपए का इंतजाम बड़ी चुनौती है ।
लेकिन केंद्र की चिंता को दरकिनार करते हुए राज्य सरकारों ने केंद्र से इस एक्ट को लागू करने के लिए ज्यादा पैसे की मांग शुरू कर दी है । वित्तीय साझेदारी के सवाल पर केंद्र को पहली चिठ्ठी भाजपा शासित मध्यप्रदेश से मिली है । मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को पत्र लिखकर कहा है कि शिक्षा के अधिकार कानून के लिए जरूरी कवायद शुरू करने के लिए जो पैसा खर्च होगा, उसका ९० प्रतिशत हिस्सा केंद्र वहन करे ।
चौहान ने लिखा है कि वित्तीय आवश्यकता पूरी होने पर ही कानून पर प्रभावी अमल संभव हो पाएगा । उन्होंने कानून का समर्थन करते हुए कहा है कि इसके प्रावधानों से निश्‍चित रूप से शिक्षा के मामले में बुनियादी फर्क दिखने लगेगा, लेकिन पैसे की उपलब्धता को उन्होंने बड़ी समस्या बताया है । गौरतलब है कि …

विचार बम से भी खतरनाक होता है

ब्रतानिया हुकूमत के खिलाफ हमारे नौजवान, वीर-वीरांगनाओं व बुद्धिजीवियों तथा महापुरूषों के मन में विचार ही तो फूटा था जिसका परिणाम ब्रतानिया हुकूमत का पतन हुआ । वास्तव में जिसको वर्तमान में विकास समझा जा रहा है वह विकास नहीं विनाश है । जब तक समाज को वर्तमान शिक्षा पद्धति से होनेवाली क्षति को रोककर प्राकृतिक ऐच्छिक शिक्षा पद्धति के आधार पर शिक्षार्थी की प्रतिभा को विकसित कर पराकाष्ठा तक नहीं ले जाया जाएगा तब तक बहुमुखी विकास असंभव है । विद्यालयों में बुनियादी शिक्षा बोध शिशु को प्राकृतिक बौद्धिक प्रवृत्ति के अनुसार समय व समाज की जरूरतों से जुड़ी हुई शिक्षा दी जाय तभी प्रत्येक शिक्षार्थी निश्‍चित रूप से पराकाष्ठा को प्राप्त कर सकेगा व्यावहारिक, आर्थिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक विकास के तह सदाचारी, मानवधर्मी, विश्‍वासी, सद्‌कर्मी, एकात्मावादी, एकेश्‍वरवादी, स्वाबलंबी आदि मानव मूल्य कायम करते हुए राष्ट्र तथा अपने भविष्य को उज्जवल कर मानव कल्याण कर सकेगा । समाज की राजनैतिक, आर्थिक, मानसिक, सामाजिक दरिद्रता के निराकरण के लिए एकमात्र रास्ता दीक्षित शिक्षा की उन्‍नत प्राकृतिक ऐच्छिक शिक्षा पद्धति को…

अंतरराष्ट्रीय व्यापार विधि एवं सीमापार निवेश के विधिक पहलू’

अंतरराष्ट्रीय विधि एसोसिएशन एक ऐसा निकाय है जिसका गठन अंतरराष्ट्रीय विधि के अध्ययन, विकास, समझ और सम्मान के लिए किया गया है । भारत में सम्मेलन का आयोजन किया जाना अंतरराष्ट्रीय विधि एसोसिएशन की भारतीय शाखा के अंतरराष्ट्रीय विधिशास्त्र में दिए योगदान के महत्व को प्रदर्शित करता है ।
मैं आयोजकों को बधाई देती हूँ जिन्होंने सम्मेलन के विषय के रूप में अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश से जुड़े विभिन्‍न पक्षों से संबंधित मुद्दे वर्तमान में काफी प्रासंगिक और रूचिकर हैं । सब-प्राइम संकट के कारण, पिछले वर्ष विकसित देशों की कई प्रतिष्ठित कंपनियाँ दिवालिया हो गई जिससे वैश्‍विक मंदी उत्पन्‍न हो गई । पिछले कुछ दशकों के दौरान वस्तुओं, सेवाओं और पूंजी के अत्यधिक सीमापार आवाजाही से विश्‍व में भारी बदलाव आया था प्रौद्योगिक प्रगति से सम्पर्क सहज और तेज गति से होना शुरू हुआ । इस तरह वैश्‍विक अर्थव्यवस्था ऐसी आर्थिक मंदी की चपेट में आई जो १९३०. के दशक के बाद पहली बार आई और इसका प्रभाव तुरंत हर तरफ फैल गया । वास्तव में, इस वैश्‍विक और लगातार एकीकृत हो रहे विश्‍व में कोई भी देश इस वित्तीय संकट के दुष्प्रभावो…

कफन की वैकुंठ-यात्रा

‘कफन’ प्रेमचंद की ही नहीं, हिंदी-उर्दू की ही नहीं- विश्‍व की श्रेष्ठ कहानियों में से है । यह कहानी इतनी विशिष्ट क्यों है? मानवीय संवेदना की अभिव्यक्‍ति की दृष्टि से ‘कफन’ अप्रतिम है । ‘कफन’ में इंसानी जिंदगी का जो चित्र अंकित किया गया है: वह क्रूर इंसानों का नहीं, निरीह-बेहद निरीह-इंसानों की विवशता का स्याह-बेहद्स्याह-चित्र है । समाज में घीसू और माधव जैसे इंसानों की उपस्थिति का कारण क्या है? जिंदगी जीकर, उन्होंने जिंदगी का अर्थ क्या जाना-समझा? इसके पीछे सामाजिक दुर्व्यवस्था, धोखाधड़ी का पर्याय अंधधार्मिक मान्यताएँ समाज का विषमतापूर्ण आर्थिक ढाँचा और राज्य के द्वारा मानवीय उपेक्षा है । कोई निठल्ला क्यों रहे, कोई आलसी क्यों बने, कोई भूखा क्यों रहे, इंसान के उपचार के प्रति समाज इतनी निर्मम तटस्थता क्यों बरते, जबकि मरते हुए पशुओं तक के प्रति मानवीय संवेदना जागती है? इंसानी दुनिया में शराब का खुलेआम इतने धड़ल्ले से व्यापार क्यों, जबकि सर्वविदित है कि शराब-सेवन सोचने-विचारने की शक्‍ति को निष्क्रिय कर देता है इत्यादि अनेक प्रश्न ‘कफन’ की मुत्यु-गाथा को पढ़ने से सहज ही उठते हैं ।
‘कफन’ के पात्र…

इनका कहना है

“कश्मीर समस्या के समाधान में जम्मू-कश्मीर के इतिहास और भूगोल को ध्यान में रखा जाएगा । भारत की अन्य समस्याओं के समाधान की यहां नकल नहीं की जा सकती । ”
- पी. चिदंबरम, गृहमंत्री

“मध्यप्रदेश को एक उचित शिल्पकार की जरूरत है । इसके अभाव में प्रदेश आज भी पिछड़ा हुआ है । यहां का निवेश बाहर जा रहा है । और प्रतिभाएं भी पलायन कर रही हैं । ”
- ज्योतिरादित्य सिंधिया, केन्द्रीय वाणिज्य राज्यमंत्री

“पाकिस्तान अगर बहुत छोटा देश है, तो राहुल गांधी बताएं कि मनमोहन सिंह ने मिस्र में पाक के प्रधानमंत्री के साथ जारी संयुक्‍त बयान में बलूचिस्तान को शामिल करने की शर्मनाक चूक क्यों की ।”
- रविशंकर प्रसाद, भाजपा प्रवक्‍ता

“यहां दो भारत हैं । एक में मूलभूत सुविधाएं और अवसर हैं, जबकि दूसरा गरीबी से जूझ रहा है । कांग्रेस का प्रयास है कि उन्हें विकास से जोड़ा जाए ताकि सभी समृद्ध हो सकें । ”
- एके एंटनी…

दलितराज में दलित की हत्या

आज दलित सत्तासीन ही अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम को खतम करने, रिजर्वेशन खत्म करने हेतु निजीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं । निजीकरण का अर्थ है जो रिजर्वेशन का लाभ सरकारी संस्था से मिलता है वह निजी संस्था से नहीं मिलेगा । जनसंख्या दिन पर दिन बढ़ रही है । निजीकरण भी तेजी से हो रहा है तथा विभागीय पदों की संख्या घटा‌ई जा रही है । इसका सीधा प्रभाव दलित समाज पर पड़ रहा है । संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है । लोकतंत्र अब राजतन्त्र से भी बदतर हो गया है । आज समाज में दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों तथा गरीबों को तिरस्कृत जीवन जीने हेतु विवश होना पड़ रहा है । कैसे पुन: बाबा साहब द्वारा निर्मित संविधान पर आधारित लोकतंत्र को और दलितों के अधिकारों को बचाया जा‌ए? कैसे दलित आन्दोलन को पुनर्जीवित किया जा‌ए ? बाबा साहब डॉ . बी०आर० अंबेडकर जी द्वारा अछूत एवं शूद्र कहलाने वाली जन जातियों को एक शब्द में दलित समाज कहकर उनके समान विकास के लि‌ए जिस दलित आन्दोलन की आधारशिला रखी गयी थी, वह दलित आन्दोलन आज कमजोर हो रहा है । कुछ स्वार्थवादी और मनुवादी विचारधारा रखने वाले दलित सत्तासीन नेता‌ओं जिन्होंने बाबा साहब की व…

जलवायु पर भारत का नया नजरिया

पर्यावरण पर संयुक्‍त राष्ट्र की नई संधि पर दिसंबर में कोपेनहेगन में दस्तखत होने हैं । ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनी ग्रीन हाउस गैसों को किस तरह कम किया जाए, इस पर विकसित विश्‍व और विकासशील देशों को सहमति बनानी है । अमेरिका चाहता है कि भारत और चीन जैसे देश लक्ष्य बनाकर इन गैसों का उत्सर्जन कम करें । तेजी से बढ़ रही दोनों देशों की अर्थव्यवस्था में इस उत्सर्जन की मात्रा भी बढ़ रही है । भारत का तर्क है कि इसका उसके आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा, वह चाहता है कि विकसित विश्‍व इन्हें नियंत्रित करें, साथ ही उत्सर्जन कम करने की नई तकनीक में निवेश करें । भारत ने साफ कर दिया है कि वह कार्बन उत्सर्जन पर किसी भी तरह की कानूनी अनिवार्यता स्वीकार्य करने को तैयार नहीं है । इस समय कार्बन उत्सर्जन की ८० फीसदी वृद्धि भारत और चीन जैसे देशों में ही हो रही है । भारत का तर्क है कि अगर उसकी अर्थवयवस्था इसी दर से तरक्‍की करती रही, तब भी अगले एक या दो दशक में उसका प्रति व्यक्‍ति कार्बन उत्सर्जन विकसित देशों के मुकाबले काफी कम होगा । हाल में ही अमेरिका के प्रतिनिधि सदन में एक बिल पास किया गया है, जिसमें यह प्रावधान है …

प्रगति मैदान में आई. आई. टी. एफ. १४ नवंम्बर से

प्रगति मैदान में १४ से २७ नवंबर तक लगने वाले इंडिया इंटरनैशनल ट्रेड फेयर में इस बार स्मोकिंग करना बैन होगा । यदि कोई व्यक्‍ति धुएं के छल्ले उड़ाता हुआ पाया जाता है तो उसे मेले से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा । इसके अलावा पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकेगा । इस बार मेले के समय में भी बदलाव किए गए हैं ।
इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन (आईटीपीओ) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ट्रेड फेयर के दौरान प्रगति मैदान नो स्मोकिंग जोन होगा । चाहे कोई प्रगति मैदान का अधिकारी या कर्मचारी हो, दुकानदार हो या फिर दर्शक किसी को भी स्मोकिंग करने की अनुमति नहीं होगी । ऐसा करने पर उसे प्रगति मैदान से बाहर कर दिया जाएगा । स्मोकिंग करने वालों की देखभाल के लिए अलग से टीम बनाई जाएगी और सीसीटीवी कैमरों की मदद से भी ऐसे लोगों को पकड़ा जाएगा । मेले में पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल भी बैन होगा । शामिल होने वाली सभी कंपनियों, दुकानदारों और देशों को इस बारे में जानकारी दे दी गई है । आईटीपीओ का कहना है कि वह इस बार ग्रीन फेयर आयोजित करना चाहते हैं । इसलिए मेले में ऐसी चीजों पर रोक लगाई जा रही है जिससे पर्या…