शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009

कैसे करें मानवाधिकार की रक्षा?



देश की हर जनता को असीमित अधिकार प्राप्त है मगर अधिकांश को अपने अधिकार की जानकारी ही नहीं है । यह अलग बात है कि अधिकार के साथ-साथ कर्त्तव्य की जानकारी भी नहीं है । जब तक हम अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करेंगे तब तक अधिकार की माँग करना बेतुकी बात है । आज अधिकार को कानूनी जामा पहनाकर एक्ट का रूप दिया जा रहा है जो कानून का रूप लेगा । कानून में व्याप्त खामियों को दूर करके ही सही और त्वरित न्याय व्यवस्था कायम की जा सकती है । शिक्षा का अधिकार, नौकरी या रोजगार पाने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, देश के किसी भी प्रान्त में जाने और रहने का अधिकार आदि हमारे मूलभूत अधिकार हैं । दुर्भाग्य की बात यह है कि आज हमारे अधिकार पर कटौती की जा रही है । अधिकार पर हमले हो रहे हैं । नक्सलवादी देश में समानांतर सत्ता चला रहे हैं । महाराष्ट्र में राजठाकरे द्वारा अन्य प्रांत के लोगों को खदेड़ने का अभियान या असम में अन्य राज्य के लोगों पर हमले से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमें अधिकार से वंचित किया जा रहा है । दूसरे शब्दों में कहें तो यह मानवाधिकार पर हमला है । आश्‍चर्य इस बात का है कि सरकार मूकदर्शक बनी बैठी है और क्षेत्र तथा भाषा के माध्यम से तोड़ने की साजिश में लगे लोगों का मनोबल बढ़ रहा है । लोकतंत्र का पाँचवा स्तंभ गैर सरकारी संस्थाएँ ( NGO) इस दिशा में अपना योगदान देकर बहुत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकती है । जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण २०१० में कर्नाटक के गुलवर्गा में देखने को मिलेगा । आज हमें उस जगह दीया जलाने की आवश्यकता है, जहाँ अभी तक अंधेरा है । जनजागरण के माध्यम से सर्जन शक्‍तियों के समन्वय एवं उनके बीच संवाद स्थापित किए जाने की परमावश्यकता है । शिक्षा का अलख जगाने एवं विकास हेतु सरकार पर पर निर्भरता से काम नहीं चलनेवाला है । इस दिशा में कार्य करनेवाले व्यक्‍तियों/संस्थाओं को कदम से कदम मिलाकर चलना होगा । हर क्षेत्र में हमें एक रोल मॉडल बनाने होंगे । उस रोल मॉडल के देखा देखी विचारधारा के समन्वय और संवाद से विस्तार को बल मिलेगा । नए विकल्प नए लड़ाके, नए औजार और नई परिस्थितियाँ बनानी होंगी ताकि समस्याओं का निदान हो सके ।
आज समस्या यह है कि ज्यादातर लोग अपनी शक्‍ति को समस्याओं की चर्चा करने में अपनी शक्‍ति को लगाकर नष्ट कर देते हैं । वे समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास ही नहीं करते है । आज हर किसी को समाधान चाहिए न कि समस्याओं का वही पुराना खटराग । अधिकार के साथ कर्तव्य और समस्या के साथ समाधान हेतु संतुलन कायम करने होंगे । अच्छे विचारों अच्छे लोगों और अच्छे कार्यों को एक साथ आना ही होगा, यही समय की माँग है । देश की गाढ़ी कमाई राजनेताओं के माध्यम से स्विस बैंकों में जमा हो रही है । जनता बेहाल, बेबस और कंगाल है और नेता मालामाल हो रहे हैं । झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । क्वात्रोची के खिलाफ चल रहे मामले को सीबीआई द्वारा वापस लिया जा रहा है । क्या देश की हर जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि देश का पैसा कहाँ, किस मद में और कैसे खर्च हुआ है? देश की विश्‍वसनीय संस्था सीबीआई के अनेक कृत्य ने यह साबित कर दिया है कि देश सर्वोपरि नहीं बल्कि वह भी सत्ता की चापलूसी और दलाली करनेवाली संस्था है । आखिर यह देश किस ओर जा रहा है? भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहराई तक प्रवेश कर चुकी हैं कि सच्चाई और ईमानदारी नामक शब्द अब इतिहास सा प्रतीत होता है । पारदर्शिता हेतु आज आरटीआई जैसे कानून को और अधिक सशक्‍त किए जाने की आवश्यकता होगी । आज जरूरत यह है कि सारी योजनाओं को बहुआयामी बनाया जाय ताकि उसकी व्यापकता में वृद्धि हो तथा वह कम खर्चीला हो ताकि जन-जन तक पहुँच सके । जनता को व्यापक अधिकार दिए जाँय ताकि वह अपने खिलाफ हर अन्याय का प्रतिकार कर सके । वर्तमान व्यवस्था से आज हर कोई दुखी है । सुखी वही है जो लूटने में लगा है । व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला पुनः एक नई संपूर्ण क्रांति का आगाज करेगी जिसकी व्यापक संभावना है । शरीर से जिंदे किंतु संवेदना से मृत लोग कभी क्रांति नहीं कर सकते । वैसे लोग केवल बहस कर सकते हैं । वैसे लोग ये चाहते हैं कि भगत सिंह चन्द्रशेखर आजाद, खुद्‌दीराम बोस, सुभाष चंद्र बोस आदि हमारे घर नहीं अन्य के घर में पैदा हो । ऐसी संकीर्ण एवं स्वार्थी मानसिकता वाले लोगों को जीने का, देश में रहने का कोई हक नहीं । प्रस्तुत अंक मानवाधिकार विशेषांक की उपयोगिता सही मायने में तभी सिद्ध होगी जब आप भी देश के विकास, मान-सम्मान हेतु संकल्पित एवं प्रतिबद्ध होंगे । याद रखें जब-जब संवेदना या संवेदनशीलता खत्म होगी तब-तब एक नया युद्ध होगा । मानवाधिकार की रक्षा हेतु हमें कई मोर्चों पर एक साथ जंग लड़ना होगा तभी विकास और शांति की परिकल्पना पूरी हो सकती है ।
- गोपाल प्रसाद

मखाने के कारोबार के सरताज हैं सत्यजीत

शक्‍ति सुधा इंडस्ट्रीज के संस्थापक सत्यजीत कुमार सिंह ने एक जबर्दस्त मिसाल कायम की है । सिंह ने पूरे देश का नब्बे प्रतिशत बिहार में उत्पादित होने वाले मखाना के प्रसंस्करण का उद्योग लगाया और आज उनका टर्नओवर ५० करोड़ रूपए का है । यह उद्योग लगाने से पूर्व वह उपभोक्‍ता वस्तुओं का कारोबार करते थे । बिहार जैसे प्रदेश में जहां उद्योग-धंधों का वैसे ही टोटा है और राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी उद्योग लगाने वाले लोग सामने नहीं आ रहे हैं वहां सत्यजीत ने मेहनत के बल पर जो मुकाम हासिल की है वह जरूर दूसरों को उत्साहित करेगा ।
प्राकृतिक आपदा, सीमित संसाधन और आधारभूत संरचना के अभाव के कारण बिहार आज भी उद्योगों का रेगिस्तान बना हुआ है । चार साल पूर्व सत्ता परिवर्तन के बाद उद्योग नीति में परिवर्तन, तमाम सहूलियतों के प्रावधान और कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार के बूते राज्य ने निवेश आकर्षित करने की मुहिम छेड़ी लेकिन कामयाबी नहीं मिल पायी । ऐसे में कोई उद्योगपति खाद्य संस्करण की इकाई स्थापित कर कामयाबी का अध्याय लिखे तो यह साधारण बात नहीं है । शक्‍ति सुधा इंडस्ट्रीज के संस्थापक सत्यजीत कुमार सिंह ने ऐसी ही मिसाल कायम की है । सिंह ने पूरे देश का नब्बे प्रतिशत बिहार में उत्पादित होने वाले मखाना के प्रसंस्करण का उद्योग लगाया और आज उनका टर्न ओवर ५० करोड़ रूपए है । यह उद्योग लगाने से पूर्व वह उपभोक्‍ता वस्तुओं का कारोबार करते थे । सत्यजीत ने बताया कि वर्ष २००३ में वह एक बैठक के सिलसिले में दिल्ली गए और वहां उनकी मुलाकात आईसीएआर के डॉ. जनार्दन से हुई । डॉ. जनार्दन ने उन्हें बताया कि मखाना का नब्बे प्रतिशत उत्पादन बिहार में होता है । साथ ही, उन्होंने इसकी मांग और खूबियों के बारे में भी उन्हें बताया । सत्यजीत ने बिहार आकर सबसे पहले मखाना उत्पादन वाले इलाके में जाकर इसकी खेती के हर पहलू का अध्ययन किया । इसके बाद २००४ में उद्योग की नींव डाली । उन्होंने बताया कि मखाना की आमद सुनिश्‍चित करने के लिए उन्होंने चार जिलों में पंचायत स्तर पर तीन-तीन किसानों से करार किया और शून्य बैलेंस पर बैंकों में उनके खाते खुलवाए । इस तरह ८ हजार २०० सदस्य उन्होंने जोड़े । वर्ष २००४ में जब मखाना की कीमत उन्होंने ५० से १०० रुपए प्रति किलो थी, उन्होंने किसानों से सौ रूपए प्रति किलो के दर से खरीद कर आज १२५ रूपए प्रति किलो की दर से किसानों को भुगतान कर रहे हैं । सत्यजीत ने जिस तरह खेत से बाजार तक खरीद, ढुलाई और प्रसंस्करण का नेटवर्क तैयार किया है, उसे उत्पादन में क्रांति की संज्ञा दी जा रही है ।
आज शक्‍ति सुधा मखाना की बिक्री देश के १५ राज्यों में हो रही है । इसके अलावा पाकिस्तान, कनाडा समेत कई देशों में इसका निर्यात हो रहा है । सत्यजीत सिंह ने बताया कि अभी प्रति वर्ष उत्पादन ढाई हजार टन और टर्न ओवर ५० करोड़ का है । वर्ष २०१२ तक उनका लक्ष्य टर्न ओवर १०० करोड़ पर पहुंचाने का है और उन्हें भरोसा है कि वह इसे हासिल कर लेंगे । हालांकि आज भी उन्हें कई दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है । मसलन, तालाबों में उत्पादित मखाने की खरीद, उसकी ढुलाई और भंडारण आसान नहीं है । मखाना खरीद के लिए एक-एक किसान के दरवाजे पर दस्तक देनी होती है । वह राज्य सरकार से मंडियों में थोड़ी जगह आवंटित करने की मांग करते रहे हैं । उनका कहना है कि ऐसा होने पर वह मंडियों में एक जगह अनेक किसानों से मखाना की खरीद कर सकेंगे ।
-विनोद बंधु

बाजारू न बनने पाए हिंदी


परिवहन, जनसंचार, पूंजीवाद और बाजार के विस्तार ने हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय भाषा का स्वरूप प्रदान किया है । यही वह कारण है, जिसके चलते आज बाजार में जिन्दी अनुवादों की बाढ़ आ रही है । मौलिक किताबों से ज्यादा अनुवाद की गई किताबें आ रही हैं और यदि अनुवाद का जोर ऐसा ही रहा तो अनुवाद की यह प्रक्रिया हिन्दी के लिए भाषा बंधन की प्रक्रिया बनने की बजाए, भाषा भक्षण की प्रक्रिया बन जायेगी । हिन्दी के बाजारू हो रहे स्वरूप पर चिंता व्यक्‍त करते हुए ये बातें जाने-माने आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहीं । जे‍एनयू हिन्दी यूनिट द्वारा भाषा बंधन विषय पर कला और सौंदर्यशास्त्र संस्थान सभागार में आयोजित सेमिनार में शिरकत करने पहुंचे नामवर सिंह ने कहा कि वर्तमान में मीडिया की नजर से हिन्दी अंतरराष्ट्रीय भाषा हो गई है, लेकिन इसके कारणों पर विचार करना होगा । हमें देखना होगा कि हिन्दी के इस नए रूप निर्माण से वह अपनी जड़ों से लोकबोलियों से कितनी जुड़ी रह पाएगी । इस मौके पर कुलपति प्रो. बी.बी. भट्‌टाचार्य ने हिन्दी यूनिट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहा कि हिन्दी का भविष्य उज्जवल तभी बनेगा, जब किसी भी विषय की मौलिक अवधारणाओं को हिन्दी में सोचा, समझा और लिखा जाएगा ।
भारत में लुप्त होती बोलियों को बचाने के लिए दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई । इसमें देश और दुनिया के बड़े भाषा विशेषज्ञ शिरकत कर रहे हैं । संगोष्ठी का आयोजन इंटैक ने किया है । संगोष्ठी के बारे में जानकारी देते हुए संस्था के अध्यक्ष एसके मिश्रा ने बताया कि देश की ९६ प्रतिशत बोलियों को बोलने वाले महज चार प्रतिशत हैं । इससे साबित होता है कि किस तरह बोलियां दिन ब दिन खत्म होती जा रही हैं । यूनेस्को रिपोर्ट के अनुसार भी भारत में १९६ बोलियों का अस्तित्व खतरे में है । इस अवसर पर जे‍एनयू की प्रोफेसर अन्विता अब्बी ने बताया कि बोलियों को बचाने के लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए । अगर बोलियों को बचाना है तो उन्हें स्कूली शिक्षा में शामिल करना होगा, तभी ये बोलियां फल-फूल सकेंगी ।

आरटीआई से खत्म हो सकता है भ्रष्टाचार और लालफीताशाही

सरकार, सरकारी योजनाएँ और तमाम सरकारी गतिविधियाँ हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । आम आदमी से जुड़ा कोई भी मामला हो प्रशासन में बैठकर भ्रष्ट, लापरवाह या अक्षम कर्मचारियों/अधिकारियों के कारण सरकारी योजनाएँ सिर्फ कागज का पुलिंदा बनकर रह जाती हैं ।
सन्‌ १९४७ में मिली कल्पित आजादी के बाद से अब तक हम मजबूर थे । व्यवस्था को कोसने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे परन्तु शायद अब हम मजबूर नहीं हैं क्योंकि आज हमारे पास सूचना का अधिकार नामक औजार है, जिसका प्रयोग करके हम सरकारी विभागों में अपने रूके हुए काम आसानी से करवा सकते हैं। हमें सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ की बारीकियों को पढ़कर समझना और सामाजिक क्षेत्र में इसको अपनाना होगा । इस अधिनियम के तहत आवेदन करके हम किसी भी विभाग से कोई भी जानकारी माँग सकते हैं और अधिकारी/विभाग द्वारा माँगी गई सूचना को उपलब्ध करवाने हेतु बाध्य होगा । यही बाध्यता/ जवाबदेही न केवल पारदर्शिता की गारंटी है बल्कि इसमें भस्मासुर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार का उन्मूलन भी निहित है । यह अधिनियम आम आदमी के लिए आशा की किरण ही नहीं बल्कि आत्मविश्‍वास भी लेकर आया है । इस अधिनियम रूपीऔजार का प्रयोग करके हम अपनी आधी-अधूरी आजादी को मुकम्मल आजादी बना सकते हैं ।
“भगत सिंह ने क्रांति को जनता के हक में सामाजिक एवं राजनैतिक बदला के रूप में देखा था । उन्होंने कहा था कि क्रांति एक ऐसा करिश्मा है जिससे प्रकृति भी स्नेह करती है । क्रांति बिना सोची-समझी हत्याओं और आगजनी की दरिन्दगी भरी मुहिम नहीं है और न ही क्रांति मायूसी से पैदा हुआ दर्शन ही है । लोगों के परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है । ”
भगत सिंह के इन्हीं प्रेरक वाक्यों के संदर्भ में कहें तो यह अकाट्‌य सत्य है कि सब जगह पारदर्शिता हो जाय तो आधी से अधिक समस्याएँ खुद ब खुद हल हो जाएंगी । जरूरत केवल जनजागरण की है । अभी तक आर. टी. आई. ( Right to information / सूचना का अधिकार) में ऐसा कोई मैकेनिज्म ही नहीं बनाया गया जिससे पता चल सके कि किस आवेदक को सूचना मिली या नहीं मिली और न ही संबंधित विभाग/सेक्शन माँगी गई सूचना के जवाब की प्रतिलिपि ही आर.टी.आई. सेल में देने की नैतिक जिम्मेदारी ही पूरी करते हैं । अधिकांश जगह आर.टी.आई. सेल में कर्मचारियों की भयंकर कमी है । आर.टी.आई. के तहत आवेदनों का ढेर लगता जा रहा है । लेकिन कर्माचारियों की संख्या बढ़ाने के मामले में प्रशासन उदासीन है, दूसरे आर.टी.आई. सेल की सूखी सीट पर आने को कर्मचारी तैयार ही नहीं होते और जो कर्मचारी इस सेल में आने के लिए उत्सुक भी हैं उन्हें विभिन्‍न कारणों से यहाँ लगाया ही नहीं जाता । सूचना अधिकारियों के ऊपर भी काम का अत्यधिक बोझ है । सूचना अधिकारियों को अपने दिनचर्या कार्यों के साथ-साथ आर.टी.आई. का कार्य भी देखना पड़ता है और इसी दोहरे बोझ की वजह से आर.टी.आई. कार्य भी अत्यधिक प्रभावित होता है । आर.टी.आई. सेल में कोई समन्वयक (कोऑर्डिनेटर) ही नहीं है जिससे यह सुनिश्‍चित हो सके कि आवेदक को ३० दिनों के भीतर और सही सूचनाप्राप्त हुई या नहीं ।
सामाजिक परिवर्तन सदा ही सुविधा संपन्‍न लोगों के दिलों मे खौफ पैदा करता रहा है । आज सूचना का अधिकार भी धीरे-धीरे ही सही परन्तु लगातार सफलता की ओर बढ़ रहा है । पुरानी व्यवस्था से सुविधाएँ भोगनेवाला तबका भी इस अधिनियम का पैनापन खत्म करने की कोशिश में शुरू से ही रहा है । कुछ सूचना आयुक्‍तों के रवैये से ऐसा लगता है कि कहीं इस कानून की लुटिया ही ना डूब जाए । कई महीनों इंतजार के बाद भी माँगी गई सूचनाएँ नहीं मिलतीं या फिर अधूरी और भ्रामक मिलती हैं । उसके बाद भी यदि कोई आवेदक सूचना आयोग में जाने की हिम्मत भी करता है, तब भी कोई आयुक्‍त, प्रशासन के खिलाफ कोई कारवाही नहीं करते । कुल मिलाकर मानना ही होगा, कि हम तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी उसी जगह खड़े हैं जहाँ दर्शक पहले खड़े थे । क्या हम मान लें कि क्रांतिकारियों की कुर्बानियाँ बेकार हुईं जिनके लिए आजाद हिंदुस्तान से आजादी के बादवाला हिंदुस्तान ज्यादा महत्वपूर्ण था । प्रश्न है कि “क्या क्रांतिकारियों को दी गई यातनाएँ उन्हें झुका पाईं? ठीक उसी तरह हमारा उत्पीड़न या कोई भी असफलता हमारे इरादों को नहीं तोड़ सकती है । सूचना अधिकार से जुड़े कार्यकर्त्ता इस अधिकार का और भी मजबूती से प्रयोग करेंगे क्योंकि यह देश हमारा है, सरकार भी हमारी है, इसलिए अपने घर को साफ रखने की जिम्मेदारी भी हमारी है ।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कहा है कि सरकारी व्यवस्था से भ्रष्टाचार और लाल फीताशाही दूर कर बेहतर शासन हासिल करना भारत का सपना रहा है और आरटीआई कानून के व्यापक व सजग इस्तेमाल के जरिए इसे हकीकत में बदला जा सकता है । उन्होंने कहा कि सरकार से सवाल पूछने का जो अधिकार पहले सांसदों और विधायकों को था, वह इस कानून ने हर आम नागरिक को दे दिया है ।
सूचना के अधिकार कानून के चार साल पूरे होने के मौके पर केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा आहूत सम्मेलन में राष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार जनता की होती है । जनता जब चाहे, उसे हर योजना की तरक्‍की के बारे में सही-सही जानकारी मिलनी चाहिए । आरटीआई ने यह तो मुमकिन कर ही दिया है । इस कानून के व्यापक और सजग इस्तेमाल से देश को भ्रष्टाचार और लाल फीताशाही से मुक्‍त करने का सपना भी पूरा हो सकता है । हालांकि उन्होंने नागरिकों को जिम्मेदारी के साथ इसका इस्तेमाल करने की सलाह भी दी ।
पेंशन और जन शिकायत व प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि सूचना के अधिकार कानून को और प्रभावी बनाने के लिए ई-गवर्नेंस और ई-मेल के जरिये संवाद सेवा को सरकार ने सैद्धान्तिक मंजूरी दी है । उन्होंने कहा, सरकार ने आरटीआई को कारगर बनाने के लिए पिछले वर्ष केंद्र प्रायोजित पेंशन योजना पेश की थी । इसके तहत राष्ट्रीय आरटीआई प्रत्युत्तर केंद्र के गठन का कार्य शुरू किया गया था । उन्होंने कहा कि इसी प्रयास को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने आरटीआई में ई-गवर्नेंस और ई-मेल के जरिये संवाद की सेवा को सौद्धांतिक रूप में मंजूरी दी है । सूचना के अधिकार अधिनियम के वार्षिक सम्मेलन में चव्हाण ने कहा कि सूचना के अधिकार अधिनियम को प्रभावी बनाने के लिए पहले चार वर्ष में सूचना मांगने वालों, सूचना प्रदान करने वालों, स्वयंसेवी संस्थाओं, नागरिक संगठनों, मीडिया आदि सभी पक्षों ने काफी समर्थन किया है ।
अब जल्दी ही इसे लागू किया जा सकेगा । मुख्य सूचना आयुक्‍त वजाहत हबीबुल्ला ने कहा कि इस कानून ने भारत को एक आदर्श लोकतंत्र बनने की राह पर अपना सफर तेज करने में मदद की है । भारत में यह कानून लागू होने के बाद नेपाल बांग्लादेश और भूटान ने भी अपने यहां इसे लागू कर लिया है । लोकतंत्र में जनता की भागीदारी के लिए पारदर्शिता एवं जवाबदेही की माँग के अभियान को गतिशील करने हेतु प्रश्न-उत्तर के रूप में एक पुस्तक “सूचना का अधिकार” में आवश्यक जानकारियों को बड़े ही सुलभ तरीके से “दादी मां” नामक (सच्चों एवं बुर्जुगों के प्रति समर्पित स्वयंसेवी, संगठन) १४/६, सेवा नगर, नई दिल्ली- ११०००३ द्वारा प्रकाशित की गई है । जनहित में इसे अवश्य पढ़ें, पढ़ाएँ एवं प्रचार-प्रसार में योगदान दें ।
- गोपाल प्रसाद

नक्सलवाद : सरकार के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएच‍आरसी) के सोलहवें स्थापना दिवस समारोह में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और एनएस‍आरसी के पूर्व अध्यक्ष ए.एस. आनंद ने कहा कि मानवाधिकार के संरक्षकों ने समाज में अहम भूमिका अदा की है लेकिन उन्हें भी प्रशासन के हाथों बहुत कुछ झेलना पड़ता है । आरोपों से लेकर सजा तक मानवाधिकाअर संरक्षकों में झेली है । उन्होंने कहा था कि मानवाधिकार में सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकार भी शुमार हैं । आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस जी.वी. माथुर ने कहा कि सामाजिक विकास मानवाधिकारों के प्रति सम्मान के बगैर संभव नहीं है । देश के हर नागरिक को मानवाधिकार सुनिश्‍चित करने के मकसद से आगे आना चाहिए ।
वहीं दूसरे तरफ आलम यह है कि नक्सली अपने खूनी संघर्ष में बच्चों की हत्या करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं । प्रश्‍न यह उठता है कि क्या नक्सली मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं कर रहे? इसके साथ ही प्रश्न यह भी उठता है कि नक्सली आखिर नक्सली क्यों बने? जब भूख, अन्याय, बेबसी और उत्पीड़न बढ़ेगा और उसके स्थायी समाधान योजनाबद्ध तरीके से नहीं चलाए जाएँगे तब-तब नक्सलवाद और पनपेगा । नक्सलवाद के दलदल में युवाओं और बच्चों के साथ-साथ महिलाओं के शोषण-उत्पीड़न की बात अब-जगजाहिर हो चुकी है । मगर सरकार को इन मूलभूत नागरिक आवश्यकताओं की पूर्त्ति के हल ढूँढने एवं उपाय सुनिश्‍चित करने के बजाय नक्सलवाद को फौज और पुलिस के द्वारा कुचलना ज्यादा आसान लगता है । सरकार को इसके आगामी दृष्परिणाम की भयावह स्थिति का अवश्य आकलन कर लेना चाहिए । एक ओर कोई करोड़ों में मासिक वेतन उठाता है वहीं दूसरी ओर किसी को ३००० रू० मासिक वेतन या रोजगार के मद में प्राप्त नहीं हो पाता है । ऐसी विषम परिस्थिति में नक्सलवाद को खत्म कर देने की कल्पना कोरी बकवास ही होगी । यह भी एक अकाट्‌अय सत्य है कि कोई भी नक्सली शिक्षक या डॉक्टर का अपहरण नहीं किया अन्याय का प्रतिकार करने एवं पुलिस, नेता व न्यायपालिका से त्वरित न्याय न मिल पाने के कारण गी शोषितों ने बंदूक का दामन पकड़ा । यह अलग बात है कि उस दलदल में जाने के बाद वे चाहकर भी नहीं निकल सकते हैं । छत्तीसगढ़ में वनवासी सेवा आश्रम के माध्यम से आदिवासियों के पुनर्वास हेतु कार्य करने वाले हिमांशु कुमार कहते हैं कि “राशन और दवा के जगहपर सरकार गोली मारती है । आज भी हम आजाद नहीं है ।
देशभर में नक्सली तांडव से निपटने के लिए सरकार लगातार विकास की गति को तेज करने की बात कहती हैं परंतु उसपर अमल कितना हो रहा है? गरीब और आदिवासी समुदाय व्यवस्था की विसंगतियों के चलते बंदूक का सहारा ले रहे हैं । मध्यप्रदेश में संसाधन, आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया को टेलीफोन पर जान से मारने की धमकी देनेवाला अपनी बीमार बहन की जान बचाने के मकसद से नकली बना । दमोह देहांत थानान्तर्गत नरसिंहगढ़ गाँव का १६ वर्षीय युवक शैलेष ने अपनी बहन स्वाति की ब्रेन हेमरेज बीमारी के इलाज में सरकारी उपेक्षा से परेशान होकर मंत्री को नक्सली बनकर धमकी दे डाली । इस घटना से ऐसा प्रतीत होता है कि पीड़ित पक्ष द्वारा लगातार गुहार लगाए जाने पर जन्मा आक्रोश अब कुछ भी करने को आमदा है ।
खूनी संघर्ष में मासूमों केवे ‘बलि’
नक्सलियों के समर्थन में एकजुट हो रहे बुद्धिजीवियों का मुंह बंद करने के लिए गृह मंत्रालय ने इस तथ्य का सहारा लिया है । दिल्ली में आदिवासी बच्चों के साथ जुटी बुद्धिजीवियों की संस्था ने नक्सलियों के प्रति हमदर्दी जुटाने की कोशिश की तो गृहमंत्रालय ने जबाब में माओवादियों को बच्चों का दुश्मन करार देते हुए उनका क्रूर चेहरा आगे कर दिया । दर‍असल, नक्सलियों के खिलाफ अभियान का विरोध करने के लिए तमाम ख्यातिनाम बुद्धिजीवियों की संस्था सिटीजंस इनीशिएटिव फार पीस ने दिल्ली में आदिवासी बच्चों को आगे किया । संगठन ने बेहद दयनीय अवस्था में रह रहे छतीसगढ़ व अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों के आदिवासी बच्चों को मीडिया के सामने पेशकर तर्क दिया की बुनियादी सुविधाएं व लोकतांत्रिक हक न मिलने के विरोध में लोग हथियार उठा रहे है । केंद्र की निर्णायक जंग की नीति के विरोध में ओजपूर्ण भाषण भी दिए गए । जवाब में गृह मंत्रालय ने नक्सलियों को बच्चों का दुश्मन करार देने वाली रिपोर्ट का खुलासा किया । नक्सली जबरन बच्चों को किस तरह हथियार थमाकर उनकी जान खतरे में डाल रहे हैं, यह बताकर गृह मंत्रालय ने बुद्धिजीवियों पर ही सवाल उछाल दिया । खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक नक्सली २००७ में एक गांव से पांच लड़के या लड़कियों को अपनी सशस्त्र सेना में शामिल करने का फरमान जारी कर चुके हैं । मंत्रालय के प्रवक्‍ता ने कहा कि नक्सली न सिर्फ बच्चों को मार रहे हैं, बल्कि उन्हें हथियार थमाकर उनकी जिंदगी खतरे में डाल रहे हैं । गृह मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को आगे कर नक्सलियों को यह संदेश भी दे दिया है कि उनकी इस रणनीति का नक्सलियों के खिलाफ अभियान पर कोई असर नहीं पड़ेगा ।
सिटिजंस इनीशिएटिव फार पीस के बैनर तले वामपंथी बुद्धिजीवियों ने सरकार के समक्ष पांच मागें रखी है । इनमें नक्सलियों के खिलाफ अभियान रोक सीजफायर करने, सीपीआई (माओवादी) और अन्य नक्सली दलों को सीजफायर के दौरान मिलने वाली सभी सुविधाएं देने, केंद्र सरकार की ओर से उनसे संवाद शुरू किए जाने, मीडिया और स्वतंत्र नागरिक संगठनों को नक्सल इलाकों में जाने की अनुमति दिए जाने और नक्सल प्रभावित इलाकों में लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरा करने के लिए कदम उठाए जाने की मांग शामिल है ।
बुद्धिजीवियों के पाले में ही डाल दी गेंद
नक्सलियों के सफाये के लिए संयुक्‍त अभियान के खिलाफ मानवाधिकार का परचम उठाकर लामबंद हुए बुद्धिजीवियों की मुहिम की काट के लिए गृहमंत्री पी. चिदंबरम खुद आगे आए है । हथियारबंद नक्सलियों को वार्ता की मेज पर लाने के लिए बुद्धुजीवियों से ही गुजारिश कए चिदंबरम ने गेंद उनके ही पाले में डाल दी है ।
साथ ही गृहमंत्री ने बुद्धिजीवियों से वादा किया है, ‘अगर नक्सली हिंसा का मार्ग छोड़कर बात करने आएं तो उनसे केंद्र राज्य स्तर पर हर मुद्दे पर बातचीत के लिए सरकार तैयार है ।’ नक्सलियों के खिलाफ सरकार ने आक्रामक अभियान का विरोध कर रहे बुद्धिजीवियों की लामबंदी की काट के लिए सिटिजंस इनीशिएटिव फार पीस के सदस्य व पूर्व लोकसभा अध्यक्ष रवि राय और उनके तमाम साथियों को गृहमंत्री ने पत्र लिखा है । इसमें सीपीआई (माओवादी) को हथियार छोड़कर बातचीत के लिए आमंत्रित करने के सरकारी प्रयासों का ब्यौरा दिया गया है । साथ ही इन बुद्धिजीवियों से भी हिंसा का रास्ता अपना रहे नक्सलियों को वार्ता की मेज में लाने में उनसे मदद की गुजारिश की । पत्र में चिदंबरम ने कहा है कि वार्ता में बाधा सिर्फ हिंसा है । उन्होंने बुद्धिजीवियों का ध्यान माओवादी नेताओं एम. लक्ष्मण राव (गणपति) और मलोजुला कोटेश्‍वर राव (किशन जी) के हालिया बयानों की तरफ भी खींचा । दोनों नेताओं ने नक्सल हिंसा को न सिर्फ सही ठहराया, बल्कि सरकार को मुहंतोड़ जबाब देने की दलील भी दी । गृहमंत्री ने पत्र में नक्सलियों की हिंसक कार्रवाई का भी ब्यौरा दिया है ।
आज छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्‍चिम बंगाक, आंध्रप्रदेश नक्सलवाद समस्या से सबसे अधिक पीड़ित राज्य हैं । पश्‍चिम बंगाल ः यहाँ माओवादियों के साथ-साथ माकपा को विपक्षी एकजुटता भी खूब परेशान कर रही है । यही वजह है कि “माकपा सांसद सीताराम येचुरी जहाँ माओवादी हिंसा पर अंकुश को वक्‍त की जरूरत मान रहे रहे हैं वही इसके लिए वह तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेता ममता को बनर्जी को जिम्मेदार ठहराते हैं । पश्‍चिम बंगाल में आतंक फैला रहे माओवादियों पर नकेल कसने के लिए केन्द्र से मदद की गुहार के साथ-साथ उन पर पाबंदी से परहेज माकपा का माओवाद पर दोतरफा रूख दर्शाता है । माकपा के अनुसार हिंसा पर आमदा माओवादीय़ॊं फार आंखूश जरूरी है । लोगों की हिफाजत कानून व्यवस्था का मामला है और मौजूदा स्थिति है । इसका दूसरा राजनीतिक पहलू है जिसके चलते उन्हें प्रोत्साहन भी मिलता है । इसे दुरूस्त करना चाहिए । दोनों तरीके एक साथ चलने चाहिए । माओवादियोंके खिलाफ मौजूदा पुलिस अभियान पर रोक लगाने की माँग के पीछे तृणमूल कांग्रेस का मकसद भी इस समस्या के राजनीतिक हल तलाशने का है । बुद्धिजीवी तृणमूल कांग्रेस के प्रोत्साहन की वजह से जुड़ रहे हैं । बंगाल में वामपंथियों के बराबर ही विरोधी विचारधारा का भी प्रभाव है । उसी विचारधारा के विरोध का यह रूप है । बाम विरोधी राजनीतिक जमावड़े से यह वर्ग चिपका हुआ है । बंगाल में माओवादियों के उत्पात पर शिकंजा कसने में सबसे बड़ी बाधा ऐसे तत्वों को तृणमूल का समर्थन है । प्रधानमंत्री के माओवादी हिंसा को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताए जाने के बावजूद उन्हीं के कैबिनेट मंत्री माओवादिओं को संरक्षण दे रहे हैं । माक्पा के इस आरोप पर प्रधानमंत्री भी चुप है । ममता की माँ है कि माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई में जुटे केंद्रीय बल वापस बुलाए जाए लेकिन उन्हें नहीं हटाया जा रहा उल्टे और बल भेजा गया है । यह ममता की माँग का जबाब है कि केन्द्र राज्य मिलकर अभियान चला रहे हैं । ” माओवादियों ने पश्‍चिम बंगाल सरकार के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूँक दिया है । ऑरेशन लालगढ़ के जवाब में ऑपरेशन वीनस शुरू करते हुए नक्सलियों ने अपने गढ़ लालगढ़ क्षेत्र के सांकराइल में थाने पर हमला कर ११ असलहे भी ले गए । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के शीर्ष नेता कोटेश्‍वर राव उर्फ किशन ने कहा है कि सांकराइल थाने पर हमला पश्‍चिम बंगाल सरकार के खिलाफ युद्ध का ऐलान है । पुलिस संत्रास और सुरक्षा बलों के ऑपरेशन के खिलाफ माओवादियों की ओर से अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई ऑपरेशन वीनस की शुरूआत है । किशन ने धमकी दी है कि मेदिनीपुर आ रहे सुरक्षाबलों को रोका नहीं गया तो सांकराइल के अपहृत एसओ अतिन्द्रनाथ दत्त का भी वही हश्र होगा जो झारखंड के खुफिया विभाग के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदवार का हुआ था ।
झारखंड ः
झारखंड में नक्सलियों ने एक नृत्य कार्यक्रम के दौरान अंधाधुंध गोलीबारी कर तीन लोगों की हत्या कर दी । पुलिस के अनुसार राजधानी राँची से २०० कि.मी. दूर चतरा जिले के राजपुरा गाँव में हमला किया, जिससे तीन लोगों की मौत हो गई जबकि दो पुलिसकर्मियों सहित सात लोग घायल हो गर । माओवादियों ने लातेहार जिला के कुरूंड गाँव में झारखंड मुक्‍ति मोर्चा के स्थानीय नेता अमृत जोय कुजूर के घर पर रात में धावा बोलकर उनका ट्रैक्टर जला दिया । माओवादी उनकी जीप भी गुमला ले गए और वहाँ जाकर उसे जला दिया । झारखंड के आदिवासी नेता एवं मानवाधिकार कार्यकर्त्ता ग्लैडसन डुंगडंग समय दर्पण को दिए साक्षात्कार में कहा कि राज्य और केन्द्र सरकार आदिवासियों के जमीन हड़पने का अभियान जारी रखे हुए है । मानवाधिकार का कत्ल हो रहा है । झारखंड में अभी तक मानवाधिकार आयोग नहीं है । सरकार का नजरिया है कि माओवादी बढ़ गए है । नक्सली बढ़ गए हैं जबकि उनके अधिकार एवं मूलभूत सुविधाओं को देने से वे कतरा रहे है । ४०% मिनरल आदिवासियों के पास है । एमओयू पर ज्यादा काम नहीं हुआ है, जिसके कारण उद्योगपतियों का दबाब बढा है । ३५०५ लोगों पर हत्या, हथियार रखने आदि का एफ.आइ.आर विभिन्‍न थानों में दर्ज किए गए है । निर्दोष आदिवासियों पर हत्या, उत्पीड़न बढ़ गया है । आजादी के ६२ वर्ष बीतने पर भी जल, जंगल और जमीन से उन्हें वंचित किया जा रहा है । २० एकटु जमीन के ऐवज में २० हजार थमा दिया गया है । कलम उठाने पर आवाज उठाने पर विकास विरोधी एवं नक्सली होने का ठप्पा लगा दिया जाता है । वास्तव में माओवाद के लिए सत्ता की चंद विरोधी शक्‍तियां हैं । १५ लाख विस्थापित लोगों के पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है । केवल सेज कानून बनाया गया । इन सारी स्थितियों की जिम्मेदार सत्ता है । पूँजीवाद का घिनौना खेल जारी है । २ रू० से ४०० रू० एकड़ दर पर टाटा को जमीन दिया जाता है । ६० करोड़ रूपया टैक्स फ्री कर दिया जाता है । आदिवासियों की आवाज है कि पहले धरती हमारी है । खेतों से होकर डैम बनाए जाने एवं नदी जोड़ों अभियान से काफी बूरा प्रभाव पड़ा है । आदिवासियों को पनबिजली का लाभ नहीं मिल रहा है । मानवाधिकार रिपोर्ट के अनुसार भारत १६ साल में भी १३४ वें स्थान पर ही है । कुपोषण के शिकार बच्चों को दो वक्‍त की रोटी नहीं मिल पा रही है । दलितों आदिवासियों के बच्चों को क्या विकास का मुख्यधारा से जुड़ने का अधिकार नही है? सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक अन्याय रोकना होगा । अन्याय के प्रतिकार स्वरूप बंदूक उठाने से कौन रोकेगा । सरकार जब तक नक्सलवाद को बंदूक से कुचलने का स्वप्न देखेगी तब तक उसकी दो पीढ़ी फिर प्रतिकार हेतु तैयार हो जायेगी । इतिहास में भी आदिवासियों को जंगली, दानव, शैतान, सूअर, कभी विकास नहीं करनेवाला शख्स कहा गया है । पेशा, कानून का पालन नही हो रहा है । आदिवासिओं की अपनो धर्म को स्थान नहीं मिला । १० करोड़ से अधिक आबादी को सेंसेक्स ८ करोड़ ही बताती है । आदिवासी अगर अन्य राज्य में जाते हैं तो उसे सामान्य में गिना जाता है । राजनैतिक दल कहते हैं कि आदिवासी मुख्यमंत्री बर्दाश्त नहीं, यह अन्याय नहीं तो और क्या है? २२ लाख आदिवासी जमीन खो चुके हैं । विकास परियोजनाओं में उन्हें नौकरी नहीं दिया जाता है । ईमानदारी पूर्वक नियम, कानून का पालन नहीं हो रहा है । यहाँ तक की न्यायपालिका में भी सौदेबाजी हो रही है । समस्या का समादान यह है कि विकास के साथ-साथ, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक अधिकार मिले । वे कहते है :
“ सदियों से अन्याय ढोते-ढोते कंधा झुक गया है ।
फिर भी अंधकार से लड़ने का निश्‍चय कर लिया है । ”
- गोपाल प्रसाद

नए संपूर्ण क्रांति की आवश्यकता

यह क्रांति है मित्रों ! संपूर्ण क्रांति ! जमाने की पुकार है यह । संपूर्ण क्रांति समाज और व्यक्‍ति को बदलने के लिए है । संघर्ष और रचना की दोहरी प्रक्रिया उसके लिए जरूरी है । संपूर्ण क्रांति समूची जनता की निष्ठा और शक्‍ति से ही मुमकिन है । हर गांव, हर शहर, हर स्कूल हर कारखाने में ऐसे लोग सामने आएं जो संपूर्ण क्रांति के मूल्यों को स्वीकार करते हों ।
५ जून १९७४ को पटना के गांधी मैदान की ऐतिहासिक रैली में बोलते हुए जेपी ने सहज की संपूर्ण क्रांति की बात की थी । हालांकि इसकी अवधारणा व्यापक थी, लेकिन समझा इसे सीमित अर्थों में गया । दर‍असल, इस शब्द का राजनीतिक जुमले के रूप में इतना और इस कदर दुरूपयोग हुआ कि इसका वास्तविक और सारगर्भित अर्थ पूरी तरह सामने नहीं आ सका । आज भी संपूर्ण क्रांति की बात होती है तो इसे ७४ के छात्र आंदोलन या ७७ के इंदिरा गांधी के पराभव और जनता पार्टी सरकार की स्थापना के अर्थ में ही लिया जाता है ।
अधिकतर लोग इंदिरा सरकार की तानाशाही की मुखालफत को ही इसका अंतिम उद्देश्य मान बैठे । लेकिन किसी भी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए तो सिर्फ क्रांति क्यों? संपूर्ण क्रांति इसलिए कि बाद में जो सरकार बने उसके कार्यक्रम में कैसे जनता की भागीदारी अधिक से अधिक हो, कैसे वह निरंकुश न हो, ये सारी बातें तय हो सकें । क्रांति के लिए आवश्यक है । केवल संघर्ष और विध्वंस से दुनिया नहीं चलती, उसके बाद निर्माण भी करना होता है । भविष्य का ब्लूप्रिंट जिसके पास नहीं होता वह विपक्ष में रहकर उत्साही विरोधी की भूमिका तो निभा सकता है, लेकिन मौकामिलने पर जनहित के कार्यक्रम नहीं बना सकता । संपूर्ण क्रांति का उद्देश्य ऐसी स्थिति उत्पन्‍न होने से रोकना था । जेपी ने ७४ के आंदोलन के दौरान यह भी कहा था कि जनता के पास अपने चुने गए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का भी अधिकार होना चाहिए । यह बात आज जोरशोर से उठाई जा रही है । संपूर्ण क्रांति का मकसद शिक्षा के क्षेत्र में भी बदलाव है । १९७७ में एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में जेपी ने कहा था कि बालिग साक्षरता पर मैं ज्यादा जोर नहीं देता हूं, लेकिन जो बच्चे पैदा हो रहे हैं, उन सबकी शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए । उत्तर भारत राज्यों में आई जेपी आंदोलन के सिपाही रहे रहनुमाओं की सरकारें हर बच्चे के लिए शिक्षा कितनी सुनिश्‍चित कर सकीं?
भ्रष्टाचार रोकना, राजसत्ता के ऊपर लोकसत्ता की स्थापना, व्यक्‍तिगत स्वतंत्रता आदि ऐसे मुद्दे थे, जिन पर जेपी जीवनभर अडिग रहे । आज ऐसी राजनीति करने वालों की पौ-बारह है, मजबूत फेमिली बैकग्राउंड से आए लोग संसद और विधानसभाओं पर काबिज हैं और देश का मीडिया युवा प्रतिनिधित्व बढ़ने की बात कहकर गदगद है । ऐसे में सामान्य कार्यकर्त्ताओं के लिए कहां स्पेस है? हरेक पार्टी के अपने युवराज हैं । जीवित देवियां मूर्तियां लगवा रही हैं । दो फीसदी अंग्रेजीदां लोगों की कोशिश है कि देश कोई सीईओ चलाए । इन स्थितियों में संपूर्ण क्रांति की जरूरत फिर से है क्योंकि गांधी की तरह जेपी एक-एक आदमी में सुधार की जरूरत पर जोर देते थे ।
-नवीन कृष्ण

जलवायु पर भारत का नया नजरिया


पर्यावरण पर संयुक्‍त राष्ट्र की नई संधि पर दिसंबर में कोपेनहेगन में दस्तखत होने हैं । ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनी ग्रीन हाउस गैसों को किस तरह कम किया जाए, इस पर विकसित विश्‍व और विकासशील देशों को सहमति बनानी है । अमेरिका चाहता है कि भारत और चीन जैसे देश लक्ष्य बनाकर इन गैसों का उत्सर्जन कम करें । तेजी से बढ़ रही दोनों देशों की अर्थव्यवस्था में इस उत्सर्जन की मात्रा भी बढ़ रही है । भारत का तर्क है कि इसका उसके आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा, वह चाहता है कि विकसित विश्‍व इन्हें नियंत्रित करें, साथ ही उत्सर्जन कम करने की नई तकनीक में निवेश करें । भारत ने साफ कर दिया है कि वह कार्बन उत्सर्जन पर किसी भी तरह की कानूनी अनिवार्यता स्वीकार्य करने को तैयार नहीं है । इस समय कार्बन उत्सर्जन की ८० फीसदी वृद्धि भारत और चीन जैसे देशों में ही हो रही है । भारत का तर्क है कि अगर उसकी अर्थवयवस्था इसी दर से तरक्‍की करती रही, तब भी अगले एक या दो दशक में उसका प्रति व्यक्‍ति कार्बन उत्सर्जन विकसित देशों के मुकाबले काफी कम होगा । हाल में ही अमेरिका के प्रतिनिधि सदन में एक बिल पास किया गया है, जिसमें यह प्रावधान है कि जो देश उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य को पूरा नहीं करेंगे, उनके उत्पादों पर खास टैक्स लगाया जाएगा । इसे एक तरह का संरक्षणवादी कदम माना जा रहा है, जिसका मकसद अपने देश के व्यापार को बचाना है । पर्यावरण पर अंतरराष्ट्रीय वार्ता में एक बड़ी बाधा यह है कि विकसित देश इसके लिए समुचित तकनीक न तो विकासशील देशों को देना चाहते हैं और न ही उसमें पर्याप्त निवेश करना चाहते हैं । वे चाहते हैं कि विकासशील देश खुद ही उत्सर्जन में कटौती करें और खुद ही उसकी लागत का भार भी उठाएं । भारत इस मामले में अमेरिका से द्विपक्षीय समझौता करने की कोशिश कर रहा है । अगर इस पर कोई सहमति बनती है तो वह कोपनहेगन सम्मेलन में विकसित और विकासशील देशों के समझौता मॉडल के रूप में रखी जा सकेगी ।
लेकिन इस सम्मेलन से पहले कई बाधाओं को पार करना होगा । अमेरिका के वर्तमान प्रशासन ने १९९० के मुकाबले २०५० तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में ८० फीसदी कटौती करने का वादा किया है । जापान के नए प्रधानमंत्री यूकियो हतोयामा ने भी २५ फीसदी कटौती की बात कही है । इसके चलते विकासशील देशों पर भी दबाव बन रहा है कि वे अपने यहां गरीबी उन्मूलन की कोशिशों को चलाते हुए भी पर्यावरण बदलाव के लिए कुछ करें । यही वजह है कि पिछले हफ्ते पर्यावरण बदलाव पर न्यूयॉर्क में हुए संयुक्‍त राष्ट्र सम्मेलन में चीन और भारत ने इस सिलसिले में सकारात्मक संकेत दिए ।
जुलाई में जब अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत आई थीं तो लग रहा था कि इस मामले में भारत का स्वर अवज्ञापूर्ण है । पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने तब सार्वजनिक तौर पर कहा था, ‘उत्सर्जन कटौती पर हम कानूनी बाध्यता नहीं स्वीकार करेंगे । ’ भारत और चीन पर विकसित देश लगातार यह दबाव डाल रहे हैं कि वे उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य को स्वीकार करें । भारत का तर्क यह है कि ऐसे दबाव के आगे झुकने का सवाल ही नहीं है, क्योंकि भारत में प्रति व्यक्‍ति उत्सर्जन सबसे कम है । भारत ने पश्‍चिम के देशों में कार्बन टैक्स लगाए जाने का भी खासा विरोध किया है, क्योंकि इसका उसे निर्यात पर पड़ेगा ।
लेकिन न्यूयॉर्क के सम्मेलन में जयराम रमेश की टिप्पणियों से ऐसा लगा कि भारत इस मसले पर अपना रवैया लगातार बदल रहा है । जहां उन्होंने कहा कि भारत कोई बहानेबाजी नहीं कर रहा वह स्वैच्छिक रूप से कटौती के लिए तैयार है । हलांकि अभी अंतरराष्ट्रीय कटौती स्वीकार करने का सवाल ही नहीं है, लेकिन भारत अब अपनी वैश्‍विक साख के लिये यह भी कह रहा है कि वह राष्ट्रीय लक्ष्य बनाकर उसे हासिल करने की कोशिश करेगा ।
रवैये में इस बदलाव के दो कारण हैं । एक तो पर्यावरण बदलाव पर चीन का नजरिया । चीन ने घोषणा की है कि वह राष्ट्रीय पर्यावरण परिवर्तन प्रोग्राम बनाकर उत्सर्जन कम करने और जंगलों को बढ़ाने के अपने लक्ष्य को हासिल करेगा । भारत को पता ही नहीं था कि चीन संयुक्‍त राष्ट्र महासभा में इस तरह की घोषणा करने वाला है, और अब वह इसी राह पर चलना चाहता है । भारत इस पर चीन से बातचीत की योजना भी बना रहा है ।
दूसरा कारण यह है कि देश के सामरिक विशेषज्ञों की यह धारणा बन रही हैकि बढ़ती ताकत के कारण भारत को अपनी ही शर्तों पर वैश्‍विक मसलों में दखल देनी चाहिए । दो महीने पहले इटली में हुए मेजर इकॉनमी फोरम के सम्मेलन में भारत इस बात पर सहमत हो गया था कि सभी देशों को उत्सर्जन घटाना चाहिए, ताकि विश्‍व तापमान को दो डिग्री से ज्यादा न बढ़ने दिया जाए । आलोचकों का कहना है कि इसने कोपहेगन सम्मेलन में भारत की राजनयिक संभावनाओं को कम कर दिया है । लेकिन भारत को उम्मीद है कि इससे उसकी रंग में भंग डालने वाली छवि खत्म होगी । इसी के चलते भारत ने ईधन और ऊर्जा के कई लक्ष्य स्वीकार भी किए हैं । भारत एक जिम्मेदार विश्‍व ताकत की छवि बनाना चाहते है, जो दुनिया की समस्याओं के हल के लिए हर बात पर न कहने के बजाए सकारात्मक मदद देना चाहता है ।
लेकिन इन सबके बावजूद यह अभी स्पष्ट नहीं है कि अगर पर्यावरण बदलाव की बातचीत सफल होती है तो अमीर औद्योगिक देश विकासशील देशों को तकनीक और वित्तीय मदद देने का काम करेंगे या नहीं । ऐसा कोई वायदा अभी नजर नहीं आ रहा है । वित्तीय और तकनीकी मदद के बगैर भारत जो देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने की कोशिश की अंतरराष्ट्रीय जांच नहीं होने देंगे । पर्यावरण बदलाव की बातचीत से सिर्फ परस्पर विरोधी आर्थिक हित सामने आ गए हैं विकसित और विकासशील देशों के आपसी रिश्तों के सैद्धान्तिक मुद्दे भी खड़े हो गए हैं । अतीत में भारत हमेशा ही विकासशील देशों की अगुवाई में खड़ा होता रहा है, उन समझौतों को वीटो करता रहा है, जो भेदभावपूर्ण थे । पर्यावरण प्रदूषण को रोकने की पश्‍चिम की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी ऐसा ही मसला है, जिसमें सहमति बनाना भारत के लिए आसान नहीं होगा । लेकिन दुनिया के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है, भारत ने धीरे-धीरे उसके प्रति अपना रवैया बदल दिया है ।
हर्ष वी. पंत

राजीव के जमाने में आईटी में आई हलचल

अपने लेख के पिछले अंश में मैंने इस बात का जिक्र किया था कि आईटी को राजीव गांधी का किस कदर समर्थन मिला । प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी पहली कुछ घोषणाओं में आईटी नीति शामिल थी । वह समय आईटी उद्योग के उभरने का दौर था । वर्ष १९८४ में आईटी नीति आने तक सरकार की नजर में हम उद्यमी ही नहीं थे । सॉफ्टवेयर के कारोबार को कोई कारोबार मानने के लिए तैयार नहीं था । इसलिए बैंक हमें लोन देने को तैयार नहीं थे । हमारी पहली पूंजी आपस में जोड़ी गई कुछ रकम ही थी । हमें एक कंप्यूटर हासिल करने तक में खासी मशक्‍कत करनी पड़ी । हमें अपना पहला कंप्यूटर बाहर से मंगाना पड़ा । वह भी इस नियम के तहत कि सॉफ्टवेयर निर्यातक तभी कंप्यूटर का आयात कर सकते हैं जब उसके पास ग्राहकों के ऑर्डर हों ।
वर्ष १९८२ में इन्फोसिस ने १५० एमबी का हार्ड डिस्क ड्राइव के आयात की अनुमति के लिए आवेदन किया था । (मुझे पता है कि आप हंस रहे होंगे लेकिन १५० एमबी १९८२ में एक बड़ी बात है ) । लेकिन जब तक हमें अनुमति मिली, ड्राइव बनाने वाली कंपनी ने इसकी क्षमता बढ़ाकर ३०० एमबी कर दी थी और दाम १५ फीसदी घटा दिए थे । इसका मतलब यह था कि हमें फिर से बदले हुए आयात लाइसेंस की जरूरत होती और इसे हासिल करने में छह और आठ सप्ताह का समय और लग जाता । वर्ष १९८४ की आईटी नीति में आईटी आयात से जुड़े कुछ प्रावधानों को शिथिल किया गया । इसमें आईटी क्षेत्र को पूंजी मुहैया कराने और कर नीति के सवाल पर कुछ सहूलियत दी गई । लेकिन आईटी नीति के आने के बावजूद चीजों को ठीक होने में काफी वक्‍त लगना था ।
जैसा कि मोटेक सिंह आहलूवालिया ने गौर किया था कि सरकार की चीजों को नियंत्रण में रखने की संस्कृति खत्म नहीं हुई थी । लेकिन आईटी और टेलीकॉम सेक्टर में हलचल दिखने लगी थी । इसके लिए राजीव की टीम के सलाहकार और कंप्यूटर ब्वॉय के नाम से जाने जाने वाले सैम पित्रोदा का शुक्रिया अदा किया जाना था । उस समय तक टेलीकॉम की तरक्‍की बहुत धीमी थी । दूरसंचार विभाग नौकरशाही की जकड़न में बंधा था । टेलीकॉम सेक्टर पर सरकार का एकाधिकार था । एक फोनलाइन हासिल करने के लिए बरसों इंतजार करना पड़ता था । सैम पित्रोदा ने मुझसे कहा कि जब वह अमेरिका गए तो पहली बार जिंदगी में फोन देखा । सैम बेहद उत्साही व्यक्‍ति हैं, जबकि १९८४ के दौर में उनके बाल सफेद होने लगे थे । हर शख्स को फोन सुलभ कराने का लक्ष्य सामने रखकर उन्होंने गांवों और शहरी इलाकों में एक के बाद एक कई एक्सचेंज खुलवाए । कुछ लोगों ने टेलीकॉम और कंप्यूटर के बीच का संपर्क ढूंढ़ लिया था । दोनों की समांतर भूमिका जीवंत और सुगठित अर्थवयवस्था के लिए जरूरी थी । विरोध के समंदर के बावजूद प्रधानमंत्री समर्थन के एक टापू की तरह थे । वामपंथियों में से कुछ ने सैम पित्रोदा पर सीईए का एजेंट होने का आरोप लगा दिया और फिर १९८४ की आईटी नीति भंवर में फंस गई ।
बैंक कर्मचारियों ने कंप्यूटर के पुतले फूंके और भारत जनता पार्टी से जुड़ी ट्रेड यूनियन भारतीय मजदूर संघ ने श्रम दिवस को कंप्यूटर विरोधी दिवस के तौर पर मनाया । गरीबी हटाने के लिए देश में इलेक्ट्रॉनिक नीति को तवज्जो देने का राजीव गांधी का दर्शन उपहास का पात्र बन गया । उनकी नीतियों का विरोध करने वालों को लगता था कि राजीव और उनके लोगों को इस देश की वास्तविकता समस्या का भान नहीं है ।
एक बड़े अधिकारी ने मुझे बताया कि जहां तक तकनीक का मामला है तो राजीव गांधी अपनी सरकार के कई लोगों से काफी आगे थे । उनके ही शब्दों में एक बार रेलवे बोर्ड की बैठक में अधिकारियों ने राजीव गांधी को कागज पर बने चार्ट दिखाए । उन्होंने कहा आप लोग स्प्रेडसीट का इस्तेमाल क्यों नहीं करते । अधिकारियों को स्प्रेडसीट के बारे में कुछ भी पता नहीं था । वे उनके पास कागज की पूरी ही सीट उठा लाए, जिस पर कई जगह आंकड़े लिखे हुए थे ।
- नंदन नीलकनी

निजी जीवन में पुलिस की नई भूमिका

निजी जीवन में पुलिस की नई भूमिका

पिछले दिनों उड़ीसा के गंजम जिले के पाटापुर थाना प्रभारी एस.एल.के. प्रसाद ने कहा कि अपराध रोकने के अलावा भी पुलिस की कुछ जिम्मेदारी होती है । इस थाने में पिछले छह महीने में तीन शादियां कराई जा चुकी हैं । २२ साल के श्याम गौड़ २० साल की राजेश्‍वरी से हाल ही में थाने के अंदर ही परिणय सूत्र में बंधे । लड़के के घर वाले शादी के लिए राजी नहीं थे । झगड़े का बहाना बना कर श्याम के पिता लड़की वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने थाने गए थे, जिससे पुलिस को दोनों के बीच के प्रेम-प्रसंग का पता चला । थाना प्रभारी ने दोनों परिवारों को बुलाकर समझाया और बाद में उनकी उपस्थिति में थाने में ही शादी संप‍न हुई ।
गंजम पुलिस की यह कार्यवाही पुलिस की खास किस्म की छवि से आतंकित समाज के लिए आश्‍चर्यचकित कर सकती है । जिस तरह उड़ीसा के एस. एल. के. प्रसाद ने अपने स्तर पर लोगों में मेलमिलाप की प्रक्रिया शुरू की है, उसी तरह इधर दिल्ली हाई कोर्ट से खबर आई है कि उसने दंपतियों के बढ़ते तनाव के मद्‌देनजर एक मध्यस्थता सेल का गठन किया है । इसके लिए उसने कई जगह विज्ञापन लगवाए हैं । इसके अलावा लीगल ऐड कमिटी ने एक महीने के लिए १० एफएम चैनलों के १२ स्लॉट मध्यस्थता सेल के प्रचार के लिए बुक कराए हैं । इस तरह के मध्यस्थता केंद्र (मीडिएशन सेंटर) फिलहाल दिल्ली की विभिन्‍न अदालतों तथा नानकपुरा स्थित क्राइम अगेंस्ट वूमेन सेल से संचालित हो रहे हैं । बताया जा रहा है कि दिनोंदिन इन केंद्रों की लोकप्रियता बढ़ रही है । इन केंद्रों पर सबसे ज्यादा केस २५-३० साल के बीच के उम्र के आए हैं । नानकपुरा केंद्र में प्रतिदिन ४-६ केस रजिस्टर हो रहे हैं ।
इन मध्यस्थता केंद्रों को समाज में तलाक की बढ़ती हुई दर पर चिंताओं की प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा सकता है । सरकारी स्तर पर इन उपायों का मकसद समाज में परिवार टूटने को लेकर बढ़ती बेचैनी को देखते हुए इस मसले का कोई हल खोजना है । ऐसी ही एक पहल दिल्ली महिला आयोग ने भी की । उसने विवाह पूर्व सलाह-मशवरा केंद्र के निर्माण के बारे में जोरशोर से प्रचार किया । इसके लिए विज्ञापन देकर कौंसिलरों के आवेदन मंगाए गए और चुने हुए कौंसिलरों को विशेषज्ञों से ट्रेनिंग दिलवाई । इन कौसिलरों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे केंद्र में पहुंचने वाले ऐसे युवा-युवतियों की काउंसलिंग करेंगे जो विवाह करने जा रहे होंगे । हालांकि अभी इसका कोई अंदाजा नहीं मिला है कि गाजे-बाजे के साथ शुरू की गई इस योजना में फिलहाल क्या प्रगति है । पर इस कड़ी में उल्लेखनीय यह है कि केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड ने भी इस दिशा में एक कदम उठाते हुए देश भर में चल रहे महिला विकास केंद्र- जो बोर्ड के आर्थिक सहयोग से विभिन्‍न गैरसरकारी संगठन चलाते हैं- का नाम बदल कर फैमली काउंसलिंग सेंटर’ अर्थात परिवार परामर्श केंद्र कर दिया है । वैसे तो इस तरह के परिवार परामर्श केंद्र बनाने की यह प्रक्रिया एनडीए सरकार के शासनकाल में शुरू हुई थी, लेकिन उस दौरान तमाम विरोधों के चलते यह फैसला लागू नहीं हो सका था । बाद में इसे यूपीए सरकार ने लागू किया । बहरहाल, अच्छी बात यह है कि अब परिवार- उनके अंदर के विवाद, उनका टूटना आदि विषय सरकार, अदालत, थाना तथा गैरसरकारी संस्थाओं आदि सभी के सरोकार के विषय बन रहे हैं ।
अभी तक परिवारों के अंदर पैदा होने वाले विवादों की जानकारी समाज के भीतर से निकलकर इस तरह बाहर नहीं आ पाती थी कि सरकारी-गैरसरकारी संस्थाएं उनके समाधान का कोई हल खोज सकें । पुलिस की मध्यस्थता और संस्थाओं की मदद से इन समस्याओं के हल की कोई आसान राह अवश्य खुल सकती है, क्योंकि दंपतियों के परस्पर संबंधों और तालाक जैसे मामलों को सुलझाने को लेकर कायम रही झिझक अब टूट रही है । अब दंपति आपसी रिश्तों की शिकायत लेकर बाहरी इकाइयों के पास मदद के लिए निःसंकोच पहुँचने लगे हैं । ऐसा भी माना जा सकता है कि निजी दायरा अब खुल रहा है और बंद दरवाजों के पीछे मतभेद, तनाव तथा अन्याय अब भीतर ही दफन हो जाने के लिए बाध्य नहीं रह गए हैं । स्त्री आंदोलन ने भी तो पर्सनल इज पॉलिटिकल का नारा दिया था । लेकिन दूसरी तरफ यह भी सोचने की बात है कि दो बालिग या समझदार लोगों के बीच आपसी रिश्ता तय करने के लिए इतने बड़े पैमाने पर पुलिस की मध्यस्थता की जरूरत क्यों पड़ने लगी? लोग मसलों को स्वयं निपटा लेने के सक्षम क्यों नहीं बन रहे? साथ जीवन व्यतीत करने का फैसला लेने से पहले कैसे साथ-साथ रहना है-इसकी योजना ठीक से क्यों नही बनती या समस्या कहां है, इसे चिन्हित करने में वे असफल होते हैं? असल में मामला सिर्फ दो व्यक्‍तियों के अहम की टकराहट का नहीं होता है, बल्कि दायित्व बोध का अभाव और गैरवाजिब अपेक्षाओं का भी होता होगा । चूंकि पुराने हालात और वास्तविकताएं बदल रही हैं, इसलिए नई स्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप परिवारों का पुनर्गठन होना चाहिए ।
लेकिन इसके बावजूद अगर किसी अन्य हस्तक्षेप या प्रयास से दो लोग अपनी गलतफमी दूर कर पुनः शांति से जीवन जीने लगते हैं, तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए । लेकिन यह भी समझना चाहिए कि हर तनाव सिर्फ गलतफहमी से पैदा नहीं होता है । लिहाजा सारे उपायों के बाद भी उन समस्याओं का निदान मुमकिन नहीं तो रहा हो, तो बेहतर होता है कि किसी का सुकून न छीन कर कोई नया ही रास्ता तलाशा जाए । इस काम में भी मध्यस्थ की भूमिका अपनाती पुलिस और सरकारी-गैरसरकारी संस्थाएं मददगार साबित हो सकती हैं । -अंजलि सिन्हा

खटिक समाज के अंबेडकर डॉ. गंगाराम निर्वाण

अनसूचित जाति (खटिक) के कर्मठ समाजसेवी डॉ. गंगाराम निर्वाण का निधन ३० अगस्त २००९ को ९० वर्ष की आयु में हो गया । जीवट व्यक्‍तित्व के धनी और खटीकों को राजनीति में आने का आग्रह करते हुए अपना पूरा जीवन लगाने वाले इस महापुरूष का जन्म ६ अप्रैल १९१९ को हुआ था । छात्र राजनीति ः तिब्बिया कॉलेज में जाने के बाद छात्र राजनीति के माध्यम से इन्होंने अपने संघर्ष की शुरूआत की । वहाँ दलितों पर होनेवाले अत्याचारों को लेकर विरोध करते हुए अनेक माँगपत्र व ज्ञापन दिए । छात्रों को संगठित करने के कारण बी.ए.एम. एस. की डिग्री पूरी न करने के इरादे से इनको तिब्बिया कॉलेज से निकाल दिया गया परन्तु निष्कासन इनका मनोबल न तोड़ पाया । इनके आंदोलन को साथी छात्रों से मिल रहे समर्थन को देखते हुए दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री ब्रह्म प्रकाश जी से मिल रहे समर्थन के कारण इनको कॉलेज में दोबारा दाखिला मिल गया । इस आंदोलन से एक फायदा यह हुआ कि दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री ब्रह्मप्रकाशजी के सीधे सम्पर्क में आ गए ।
अंबेडकर के अनुयायी
१९६१ में कौमी मुसाफिर बाबा प्रभाती ने इनका परिचय डॉ. भीमराव अंबेडकर से कराया । उसके बाद नियमति रूप से बाबा साहेब की शिक्षा का अवलोकन एवं अनुसरण करना उनका धर्म ही बन गया । इनकी कर्मठता, निष्ठा एवं जुझारूपन को देखते इन्हें दिल्ली प्रदेश रिपब्लिकन पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया । डॉ. गंगाराम निर्वाण ने इस पार्टी की पहचान को दिल्ली में एक मुकाम तक पहुँचाया ।
संसद में सभी महानुभावों की मूर्ति थी, मगर जिसने भारत को संसदीय लोकतंत्र दिया उसकी मूर्ति लोकतंत्र के मंदिर अर्थात संसद में न होने से भारत के करोड़ों दलितों को अच्छा नहीं लगा । इसलिए १९६२ में दादा साहेब गायकवाड़ के नेतृत्व में संसद में बाबा साहेब की मूर्ति लगाने का आंदोलन किया । उस आंदोलन में उत्तर भारत से कमान बी.पी. मौर्य ने तथा दिल्ली में बाबा प्रभाती, डॉ. गंगाराम निर्वाण और उनके सहयोगियों ने संभाल रखी थी । इस आंदोलन में लाखों लोग जेल भरो अभियान में शामिल हुए । इसके परिणामस्वरूप जेल में जगह न होने के कारण अनेक स्कूलों को भी जेल का रूप देना पड़ा । इस आंदोलन में इनकी माता मनवरी देवी ने भी अपनी गिरफ्तारी दी । अंत में तिब्बिया कॉलेज यहाँ भी इनकी व इनके साथियों की विजय हुई । संसद भवन में बाबा साहेब की विशाल मूर्ति लगी है, वहाँ हर वर्ष लाखों लोग १४ अप्रैल व ६ दिसम्ब्बर को अपने प्रिय नेता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर को श्रद्धांजलि देने जाते हैं ।
आजीविकाः
१९५५ से १९६९ तक करोलबाग में अपनी मोडिकल प्रैक्टिसनर की प्रैक्टिस शुरू की, जो अच्छी चल रही थी, परन्तु राजनीति में आने के कारण कई बार इस पर भी असर पड़ा । प्रसाद नगर, करोलबाग उठने के बाद १९६९ से मादीपुर में चिकित्सालय खोला । वे गरीब लोगों की हालत देखकर मुफ्त में ही इलाज करते थे ।
राजनीति ः
दिल्ली में रिपब्लिकन पार्टी की जड़ें मजबूत करने के बाद स्वयं भी चुनाव लड़े व अन्य को भी चुनाव लड़ाया । इन्होंने १९६२ का संसदीय चुनाव लड़ा । १९६७ में जब ये संसदीय चुनाव लड़े तो बच्चे-बच्चे की जुबान पर एक ही स्वर था- “बटन खोलो छाती के, मोहर लगेगी हाथी पर” । इनके साथ संघर्ष करनेवालों में से अनेक आज दिल्ली की राजनीति के शीर्ष स्थान पर हैं । अशिक्षा एवं छोटी सीट, बड़ी सीट के चक्‍कर में इनके स्थान पर इनके सहयोगी को विजय मिल गई और ये मात्र कुछ वोटों से चुनाव हारे ।
हालांकि इनके मार्गदर्शन प्राप्त अनेक कार्यकर्ता बाद में सांसद व विधायक बने । १९६९ में प्रसाद नगर टूटने पर मादीपुर, नांगलोई आदि पर २५ गज के प्लॉट दिए गए तो उसके खिलाफ ३० गज के प्लॉट देने हेतु सघन आंदोलन चलाया । १९७१ में लोगों ने इनको अपने बलबूते पर चुनाव में खड़ा करवाया । वोटों की कथित धांधली के कारण एक बार फिर ये कुछ वोटों से चुनाव हार गए । जिसके खिलाफ हर तरफ आंदोलन प्रारंभ हो गए और इन्होंने दो माह तक अन्‍न ग्रहण नहीं किया तथा मौन व्रत धारण किए रहे । अत्याचार के खिलाफ इस आंदोलन को देखकर वर्तमान दलित आंदोलन के एक प्रहरी नेतराम ठगेला पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा । खटिक महिलाएँ काफी समय से रद्‌दी से लिफाफे बनाने का काम करती थीं परन्तु एक हजार लिफाफे बनाने पर उन्हें मात्र कुछ आने ही मिलते थे । इसके खिलाफ डॉ. गंगाराम निर्वाण ने बहुत बड़ा आंदोलन शुरू किया । पहली बार खटिक महिलाओं हजारों की संख्या में घर से बाहर निकलकर एक-दो दिन नहीं बल्कि लंबे समय तक आंदोलन में हिस्सा लिया । इस आंदोलन की बदौलत लिफाफे की मजदूरी में काफी बढ़ोत्तरी हुई ।
सामाजिक आंदोलन ः
रिपब्लिकन पार्टी के लगातार कमजोर होने से इनको गहरा धक्‍का लगा और मनीराम बडगूजर, बद्री प्रसाद सांखला के साथ मिलकर इन्होंने मजदूर एकता यूनियन बनाई । उनके बैनर तले मजदूरों की काफी समस्याओं को सुलझाने में सफलता मिली । राजनीति में बढ़ रहे अत्याचारों को रोकने के लिए १९७६ में इन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी समिति बनाई और काले धन को निकालने का प्रयास किया ।
बहुजन समाज पार्टी में प्रवेश ः
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचार धारा को आगे लेकर चलनेवालों में डॉ. गंगाराम निर्वाण के एक विशिष्ट लेकर चलनेवालों में देखते मान्यवर कांशीराम ने उनसे १९८९ में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने का आग्रह किया जिसे वह टाल नहीं सके । उसके उपरान्त वे दिन-रात एक करके बहुजन समाज पार्टी के लिए काम किए । आज बहुजन समाज पार्टी इतनी बड़ी पार्टी बनी है तो उसमें कहीं न कहीं डॉ. गंगाराम निर्वाण का भी योगदान है ।
डॉ. निर्वाण अंबेडकर भवन के संस्थापकों में से एक रहे । इन्होंने जीवन भर प्रयास किया कि खटीक समाज के लोग राजनीति में आकर बाबा साहब के संदेश को अपनाएँ, संसद में पहुँचें । तभी उनका भला होगा और समतामूलक समाज बनने की दिशा में काम होगा । जब दिल्ली प्रदेश खटिक समाज का गठन नेतराम ठगेला एवं सामचंद रिवाड़िया ने किया तो डॉ. गंगाराम निर्वाण ने उन्हें सांगठनिक समस्याओं के प्रति सचेत किया । दिल्ली प्रदेश खटिक समाज को आंदोलनरत करने में तथा समाज के जनजागरण में डॉ. गंगाराम निर्वाण के सलाह का प्रमुख योगदान है ।
शोक संदेश ः
मादीपुर (दिल्ली) के कांग्रेस विधायक मालाराम गंगवाल ने कहा कि डॉ. गंगाराम निर्वाण समाज के अग्रज बंधुओं में से एक थे, जिन्होंने अपने जीवन का सब कुछ लगाकर समाज को राजनीति में आने को प्रेरित किया ।उनके प्रेरणा के बलबूते पर विभिन्‍न राजनैतिक दलों में हमारे समाज की भागीदारी सुनिश्‍चित की । बाबासाहेब अंबेडकर के दिखाए रास्ते पर चलकर पूरी जिंदगी लोकसभा, महानगर परिषद के कई चुनाव लड़कर समाज के लोगों को जगाया । अपनी संघर्षमयी जिंदगी से दिल्ली ही नहीं वरन्‌ उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, व राजस्थान के लोगों के बीच भी अलख जगाई । केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने कहा कि डॉ. निर्वान से मेरे पिता व ससुर के साथ पारिवारिक रिश्ते थे । इनके साथ-साथ उस समय अनेक दलित नेताओं के बदौलत दिल्ली में करोलबाग को दलित आंदोलन की रीढ़ कहा जाता था । यदि हम डॉ. निर्वाण को सच्ची श्रद्वांजलि देना चाहते हैं तो दलित समाज की सभी उपजातियों को साथ मिलकर समाज का स्तर ऊँचा करने के प्रयास करने चाहिए ।
पूर्व सांसद सज्जन कुमार ने कहा कि डॉ. गंगाराम निर्वाण वास्तव में शेरे दिल्ली थे । वे न केवल दलित बल्कि पिछड़े वर्ग सहित सभी के विकास के लिए काम करते थे । समतामूलक समाज का निर्माण करना उसका सपना था । यदि वे चाहते तो सांसद आदि बन सकते थे मगर उनमें परिवार से ज्यादा त्याग व विचारधारा से प्यार था । उन्होंने कहा कि विधायक मालाराम गंगवाल से बात करके मादीपुर में एक रोड का नाम डॉ. गंगाराम निर्वाण के नाम पर रखा जाएगा ।
अनुसूचित जाति/जनजाति परिसंघ एवं इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष डॉ. उदितराज ने कहा कि डॉ. गंगाराम निर्वाण ने बाबा साहब के आंदोलन व बुद्ध के मार्ग का जिंदगी भर अनुसरण किया । वे अपनी जाति में पैदा होने के कारण ऊँचाइयों को नहीं पा सके । बाबा साहेब का आंदोलन चलाने वालों में एक ऐसा ग्रुप भी है जो दिखाने के लिए जातिवाद के खिलाफ आवाज बुलंद करता है, मगर स्वयं जातिवाद का घिनौना उदाहरण पेश करते हैं । वास्तव में डॉ. निर्वाण भी उसी जातिवादी सोच के शिकार हुए वर्ना इतने लंबे समय तक बाबा का मिशन पूरी ईमानदारी व पूरी ताकत और लगन से करने के बाद भी उन्हें राजनैतिक मंजिल नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे । वे विशुद्ध रूप से मानवतावादी थे तथा जातिवाद के खिलाफ थे । यदि हमारा देश उनके दिखाए राह पर चले तो यह देश विश्‍व की महाशक्‍ति बन सकता है ।
अखिल भारतीय खटिक समाज के प्रधान महासचिव मामचंद रिवाड़िया ने कहा कि डॉ. निर्वाण ने “जागते रहो” का नारा लगाते हुए समाज को जगाने का काम किया । वे अपनी बात पूरी निडरता से कहते थे । उन्होंने कहा कि उनकी मुत्यु से १५ दिन पूर्व मैं उनसे मिला था । उन्होंने समाज के कार्य के लिए मुझे हमेशा की भाँति कुछ गुर बताए । हमें उनके बताए मार्ग पर चलकर उन्हें श्रद्वांजलि देनी चाहिए ।
दिल्ली प्रदेश बहुजन समाजपार्टी के सचिव ने कहा कि आज जब किसी की मुत्यु हो जाती है तो लोग शाम तक भूल जाते हैं लेकिन आज इतने दिन बाद शोकसभा होने पर इतनेलोग आए तो समझा जा सकता है कि उन्होंने समाज के प्रति कितना काम किया होगा । मुझे इतने महान व्यक्‍ति का शिष्य होने का मौका मिला है । कांशीरामजी कहते थे कि माँगना नहीं देना सीखो आओ अपना घर मजबूत बनाएँ । यही डॉ. निर्वाण की सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।
- गोपाल प्रसाद

मीडिया की निगरानी

पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि स्वतंत्रता के दुरूपयोग के तमाम खतरों के बावजूद मैं दमित और नियंत्रित प्रेस के बजाय एक स्वतंत्र प्रेस का पक्षधर हूं । भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के इस विनम्र रुख के विपरीत कांग्रेसनीत केंद्रीय सरकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाने जा रही है । विभिन्‍न पक्षों से सलाह-मशविरा जारी है, जिनमें नागरिक संगठनों के अलावा उद्योग जगत भी शामिल है । सरकार इस कदम का औचित्य सिद्ध करते हुए दलील देती है कि प्रसारण सेवा के नियामक के गठन और आचार संहिता लागू करने का कारण पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्‍न संसदीय समितियों की रपटों, अदालत के फैसलों, राज्य सरकारों के अनुरोध और नागरिक संगठनों की राय है । उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवहार से विमुख दिखाई देने से बचने के लिए सरकार ने प्रसारण सेवा के नियमन संबंधी विधेयक के मसौदे में प्रसारण नियमन प्राधिकरण (बीआरएआई) के गठन का प्रस्ताव किया है । प्रस्तावित विधेयक के अनुसार प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों का चुनाव एक समिति की अनुशंसा के आधार पर केंद्र सरकार करेगी । इस समिति में राज्यसभा के अध्यक्ष, लोकसभा के स्पीकर और विपक्ष के नेता शामिल होंगे । अब सवाल उठता है कि बीआरएआई पर किसका नियंत्रण होगा? इसके अध्यक्ष और सदस्य सरकार द्वारा चुने हुए होंगे ।
जाहिर है, ये सभी राजनीतिक वर्ग से होंगे । यह एक ऐसा वर्ग है, जिसकी जनता के बीच साख मीडिया से बेहतर नहीं है । विधेयक के अनुसार केंद्र सरकार ऐसे किसी भी सदस्य या अध्यक्ष को पद से हटा सकती है या बर्खास्त कर सकती है जो जनहित के खिलाफ अपने पद का दुरूपयोग करता हो । पूरे मसौदे से यह आभास होता है कि देश में केवल सरकार ही जनहित की चिंतक है और राजनेता इसके मूल्यों के प्रति समर्पित हैं । एक स्वतंत्र नियामक के प्रावधानों के तहत नौकरशाही को यह सुनिश्‍चित करने का दायित्व सौंपा गया है कि वह भटके हुए और दोषी ब्राडकास्टिंग मीडिया को दंडित करे । प्रस्तावित विधेयक के अनुच्छेद २५ के तहत जिलों में पुलिस अधीक्षकों और उप जिलाधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे निगरानी, तलाशी कर सकें, उपकरण जब्त कर सकें और संबंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण की लिखित शिकायत पर मीडियाकर्मियों पर मुकदमा चला सकें ।
विधेयक की प्रस्तावना में लिखा है- “एयरवेव सार्वजनिक संपत्ति होती है और राष्ट्रीय व जनहित में इन्हें नियंत्रित रखना जरूरी है, खासतौर से उपयुक्‍त विषयवस्तु के प्रसार को सुनिश्‍चित करने के लिए । ” नीयत साफ है । सरकार तय करेगी कि देशहित और जनहित में क्या है? स्वतंत्र लोकतंत्र में यह अस्वीकार्य समीकरण है । अति उत्साहित सरकार मीडिया के पैरों में विचारों और मूल्यों की बेड़ी बांधकर उसे अपने अधीन करना चाहती है और इस प्रकार संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करना चाहती है । संविधान के अनुसार अभिव्यक्‍ति का अधिकार मौलिक अधिकार है, बशर्ते इससे एकता और अखंडता खतरे में न पड़ती हो तथा देश की सुरक्षा, अन्य देशों से संबंध, अदालत की अवमानना, नैतिकता व शालीनता पर आंच न आए । विडंबना यह है कि जनहित या राष्ट्रहित इसके दायरे में ही नहीं आते और इस प्रकार सरकार अभिव्यक्‍ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं कर सकती ।
संवैधानिक प्रावधानों में यह बारीक अंतर सरकार को समझना चाहिए । विधेयक के मसौदे के अनुसार, प्राधिकरण को चैनल के पंजीकरण से इनकार करने का अधिकार है, यदि वह इस निषकर्ष पर पहुंचता है कि चैनल की विषयवस्तु देश की एकता-अखंडता, सुरक्षा और शांति व सद्‌भाव के लिए खतरा बन सकती है तथा अन्य राष्ट्रों के साथ संबंध खराब कर सकती है । यह विचित्र है कि मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाले करीब एक दर्जन कानूनों के बावजूद सरकार खबरों पर नियंत्रण रखने के लिए नियामक बनाना चाहती है । १७८६ में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति थाम जेफरसन ने कहा था कि प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा किए बिना हमारी स्वतंत्रता कायम नहीं रह पाएगी, न ही प्रेस की स्वतंत्रता को गंवाने के खतरे के बिना इसे सीमित किया जा सकता है ।
- एनके सिंह

दलित महिला आंदोलन की प्रेरणास्त्रोत थीं शांताबाई दाणी

‘दलित स्त्रियों की यातना, उनका संघर्ष और उनकी उपलब्धियाँ इतिहास में अपनी दस्तक देती रही हैं । उगते हुए सूरज की किरणों की तरह अपनी आभा बिखेर कर वे समाज को ऊर्जावान बनाती रही हैं । संघर्षशील दलित नायिकाएँ कीचड़ में कमल और धूसरित पगडंडी के किनारे पड़े चमकते मोती की तरह बरबस अपनी ओर सबका ध्यान खींच लेती हैं ।
बाबासाहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन समानता के आंदोलन का प्रतीक बना, अतः ऊँची-नीच, जात-पाँत और और लैंगिक असमानता के विरूद्ध इसका मुखर आह्वान रहा है । दलित समाज तीन हजार साल से अधिक अपनी गुलामी से मुक्‍ति की मशाल जलाए ब्राह्मणवाद को ललकारता रहा है । वह ब्राह्मणवाद के विरूद्ध अपने संघर्ष में अपने पुस्तैनी धंधे छोड़ रहा था तो नई दुनिया में नए-नए आदर्श स्थापित कर रहा था । दलित स्त्रियाँ भी कंधे से कंधा मिलाकर इन संघर्षों को नेतृत्व दे रही थीं ।
डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन ने भूखी-प्यासी, गरीबी से त्रस्त दलित जनता में अपने अधिकारों के लिए लड़ने की जान फूँकी । मंदिरों में घुसकर देवताओं के दर्शन का अधिकार, सार्वजनिक स्थलों पर आने-जाने और उन्हें इस्तेमाल करने के समान अधिकार को हासिल करने के लिए सड़क पर उतर कर लड़ने में दलित पुरूषों के साथ-साथ स्त्रियों ने भी सक्रिय भूमिका अदा की । १९४२ में नागपुर में दलित महिलाओं का ऐतिहासिक अधिवेशन इसी बात की ओर इशारा करता है । अनेक अंबेडकरवादी स्त्रियाँ गाँव-गाँव जाकर अंबेडकर की आवाज अन्य स्त्रियों तक पहुँचा रही थीं । वे भाषण देने से लेकर स्कूल खोलने के अभियान में जुट गई थीं । उनमें शांताबाई दाणी का नाम और उनके कार्य समाज में अपना विशेष स्थान रखते हैं । महाराष्ट्र की राजनीति और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेताओं की सूची ताई शांताबाई दाणी के नाम के बिना अधूरी है ।
शांताबाई दाणी का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के खड़कली गाँव की एक झोंपड़ी में हुआ । महाराष्ट्र के प्रख्यात कविवर वि. वा. शिरवाडकर शांताबाई के सम्मान में कहते हैं, “महार जाति में जन्मी, उच्च शिक्षित कुशल नेतृत्व की क्षमता से ओत-प्रोत, युवावस्था में बाबासाहब के भाषण और कार्यों से प्रेरित हो अपना समस्त जीवन विद्रोही दलित आंदोलन को समर्पित करने वाली शान्ताबाई एकमात्र कार्यकर्ता थीं । उसके हृदय में कभी न अस्त होने वाला सूर्य था जिसका प्रकाश आज तक चमक रहा है । ” शांताबाई का जन्म एक महार परिवार में हुआ था । शांता के जन्म से पूर्व उनके परिवार को खासतौर से उनके पिता और दादी को घर में एक लड़का होने की उम्मीद थी और जन्म लिया लड़की ने । लड़की के जन्म से उन्हें बेहद तकलीफ हुई ।
पिता ने अपनी इस तकलीफ के बावजूद शांता को खूब प्यार किया । वह उसे अपने पास बिठाकर पढ़ाते, अपने साथ-साथ लेकर घूमते । उनका दूध बेचने का धंधा था । अचानक शांता के एक भाई की मृत्यु से उन्हें इतना सदमा हुआ कि उन्होंने उसकी क्षतिपूर्ति शराब पीकर की । उनके इस भटकाव से घर बुरी तरह से गरीबी और तंगहाली में आ गया । शांता का बड़ा भाई अण्णा, जो उनका सौतेला भाई था, अब घर की जिम्मेवारी निभाने लगा । शांता की माँ की बड़ी इच्छा थी कि शांता पढ़े । शायद इसलिए कि उनकी बड़ी बेटी की गृहस्थी बहुत खराब चल रही थी । इसकी एक वजह वो अपनी बेटी के पाँव पर खड़ा न होना भी मानती थीं । इसलिए उसने शांता को खूब पढ़ा-लिखाकर पाँव पर खड़ा करने का संकल्प कर लिया था । चौथी कक्षा तक इनकी पढ़ाई गाँव में हुई, पांचवीं के लिए इन्हें गाँव से दूर जाना पड़ा जहाँ इन्हें एक अध्यापक दाणी मिले जिन्होंने इनकी पढ़ाई-लिखाई और व्यक्‍तित्व विकास में बहुत सहयोग दिया । जागरूक माँ बच्ची की पढ़ाई के बारे में पूछने जाती । दाणी मास्टरजी ने पढ़ाई के प्रति उनकी जागरूकता और महत्वाकांक्षा को पहचान कर शांता को ७वीं कक्षा में पूना के सरकारी विद्यालय में दाखिला दिया ।
इस तरह वे घर से बाहर छात्रावास में रहकर १०वीं की पढ़ाई तक आ पहुँची । इसी दौरान उनकी मुलाकात डॉ. लोंढे से हुई जिनसे इन्हें बड़ी बहन का प्यार व आगे पढ़ने की प्रेरणा मिली । दसवीं के रिजल्ट से पूर्व की इनकी माँ का देहांत हो गया । अब शांता के जीवन ने एक नया मोड़ ले लिया । इन्होंने आगे की पढ़ाई जारी रखी । जब बीए की छात्रा थीं तो इनकी मुलाकात दादासाहब गायकवाड़ से हुई । दादासाहब गायकवाड़ डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ मिलकर छुआछूत के भेदभाव से त्रस्त दलित समाज में विद्रोह के स्वर भर रहे थे । उन्होंने शांता को इन सब बातों की जानकारी दी और बाबासाहब डॉ. अंबेडकर से उनका परिचय कराया । पढ़ी-लिखी दलित युवती दलित आंदोलन की जिम्मेवारी अपने कंधों पर उठाए इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है ।
एक बार कार्यकर्ताओं की बैठक में बाबासाहब बोल रहे थे तो उनकी आवाज भर्रा गई । स्वयं को संभालते हुए उन्होंने कहा, “मुम्बई जैसे शहर के बंधुओं की शिक्षा के लिए मैंने बहुत कुछ किया है, परन्तु गाँव में रहने वाले अपने बंधुओं और खासतौर अपनी लड़कियों के लिए मैं कुछ न कर सका, इसका मुझे बेहद दुःख है । ”
शांता इस सभा में उपस्थित थीं । शायद डॉ. अंबेडकर की भर्राई आवाज ने उन्हें जीवन भर ग्रामीण दलित भाई-बहनों के लिए काम करने का संकल्प लेने को प्रेरित किया । शांता ने ताउम्र शादी न करके मिशन का काम करने का संकल्प ले लिया । सार्वजनिक कामों के लिए शांता ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी । एक कार्यकर्ता और महिला नेता के रूप में से उन्हें काफी सम्मान मिला । वे नासिक जिले की शेड्‌यूल्ड कास्ट फेडरेशन की अध्यक्ष मनोनीत कर दी गईं । उनके ओजस्वी भाषण महिलाओं के लिए विशेष आकर्षण थे ।
शांता ने महाराष्ट्र के गाँव-गाँव जाकर दलितों खासकर दलित स्त्रियों को जगाने में अपना जीवन लगा दिया । अपनी सहेली उजागरे बाई की देखरेख में स्कूल खोला । सरकार से उनके कार्यों के लिए जब उन्हें दलित मित्र अवार्ड मिला तो अवार्ड की राशि को उन्होंने डॉ. अंबेडकर शताब्दी के लिए दान कर दिया ।
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेता दादासाहब गायकवाड़ के साथ मिलकर इनके प्रयासों से भूमि सुधार आंदोलन में तेजी आई । दादासाहब गायकवाड़ के बीमार हो जाने पर पार्टी के नेतृत्व में बंदरबाँट व षड्‌यंत्र को रोकने में उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए उसे सुलझाने की पहलकदमी की । शांताबाई दाणी ने आरपीआई में टूट-फूट व गुटबंदी को रोकने और एकता लाने के कई बार प्रयास किए ।
आज शांताबाई दाणी हमारे बीच में नहीं हैं परन्तु दलित राजनीति में तथाकथित दिग्गजों की महत्वाकाँक्षा से उभरे विवादों को उन्होंने जिस तरह उन्हें एक साथ लाकर सुलझाने के प्रयास किए वे आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक हैं ।
शांताबाई का व्यक्‍तित्व व उनके कार्यों को उत्तर भारत में लाने का यह प्रथम प्रयास सेंटर फॉर आल्टरनेटिव दलित मीडिया(कदम) कर रहा है ।
शांताबाई दाणी के व्यक्‍तित्व और कार्यों से भारत के पाठकों का परिचय कराने के पीछे हमारा उद्देश्य है दलित राजनीति में दलित महिला नेत्रियों के जीवन पर प्रकाश डालने के साथ-साथ तत्कालीन आंदोलन में पितृसत्तात्मक रूझानों को स्पष्ट करना । आरपीआई के अनेक नेताओं में शांताबाई दाणी का नाम अग्रणी है । परन्तु हमारे आंदोलन के कर्णधारों ने स्त्रियों के नेतृत्व व योगदान को जाने-अनजाने में पर्दे के पीछे खिसका देने की भूमिका अदा की है ।
- रजनी तिलक

वंदे मातरम् गाने पर काफ़िर घोषित कर दिया

आगरा शहर में वंदे मातरम् गाने पर मुस्लिम महिला को उसके पति ने ही काफ़िर घोषित कर दिया और उसे मारपीट कर घर से भी निकाल दिया। इस अत्याचार की शिकार हु‌ई सलमा उस्मानी ने इसके खिलाफ थाने में रिपोर्ट लिखा‌ई है।
आगरा के शाहगंज क्षेत्र के न्यू खबासपुरा में रहने वाली सलमा का कहना है कि उसके पति अब्दुल सत्तार अपने मित्र से किसी फतवे को लेकर चर्चा कर रहे थे। उनका कहना था कि वंदे मातरम् गाने वाले की तो शवयात्रा में जाना भी मुस्लिम के लिये काफिर होने जैसा है। इस पर सलमा भड़क ग‌ई और उसने कहा कि भारत में रहते हैं वंदे मातरम् गाने में किसी को क्या हर्ज है। इसी बात पर बहस शुरू हो ग‌ई। इस पर सलमा के पति और उसके दोस्त ने उसको उलाहना दिया कि तू भी वंदे मातरम् गायेगी तो काफिर हो जा‌एगी। इस बहस में सलमा जोश में आ ग‌ई और उसने जोर से ’वंदे मातरम्’ बोल दिया। यह बात उसके पति अब्दुल सत्तार और उसके दोस्त को इतनी नागुवार गुजरी कि उन्होंने मोहम्मद शमीम, मोहम्मद अली, जीनत बेगम, अंजुम बेगम और बबलू खान के साथ मिलकर सलमा से मारपीट की और घर से निकाल दिया।

एटमी युद्ध छिड़ा तो जीतेगा भारत, पाक होगा नेस्तनाबूद

भारत-पाकिस्तान के बीच अगर परमाणु युद्ध छिड़ा तो आखिरकार जीत भारत की ही होगी और पाकिस्तान का सफाया हो जाएगा । लेकिन इसकी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ जाएगी । पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल पर आधारित एक पुस्तक में दावा किया गया है कि भारत को इसके लिए अपने ५० करोड़ लोगों की जान गंवानी पड़ जाएगी । पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक और इतिहासकार टेलर ब्रांच ने दावा किया है कि वर्ष १९९९ में करगिल युद्ध के दौरान भारतीय नेताओं ने तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को दोनों के बीच परमाणु युद्ध के हालात के बाद के परिदृश्य बताए थे ।
इस पुस्तक में ‘ऐट मिसाइल्स इन बगदाद’ अध्याय नाम से परमाणु युद्ध के बारे में बताया गया है जिसमें लेखक ने दावा किया है कि क्लिंटन ने उन्हें बताया था कि पाकिस्तान में यदि भारत पर परमाणु बम दागे गए तो भारत पूरे देश को तबाह कर देगा । व्हाइट हाउस में क्लिंटन से हुई बातचीत और उसके रिकॉर्ड किए अंशों का हवाला देते हुए ब्रांच ने ७०० पन्‍ने की पुस्तक ‘द क्लिंटन टेप्स : रेसलिंग हिस्ट्री विद द प्रेसिडेंट’ लिखी है । पुस्तक में उन्होंने लिखा है ‘राष्ट्रपति ने एक संक्षिप्त नोट में सबसे पहले लिखा था कि स्ट्रॉब टालबॉट ने उनकी हाल की दक्षिण एशिया यात्रा पर एक रिपोर्ट सौंपी है । वर्ष १९९१-२००१ के दौरान क्लिंटन प्रशासन में कार्यरत टालबॉट फिलहाल बुकिंग्स इंस्टीट्‌यूट के अध्यक्ष हैं । इन दिनों बाजार में धूम मचा रही इस पुस्तक में क्लिंटन के आठ साल के कार्यकाल की ऐसी गहन अंतदृष्टि पेश करने का दावा किया गया है, जिसे पहले कभी नहीं सुना गया ।
ब्रांच लिखते हैं, ‘उन्होंने विश्‍व को दो देशों भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध के गंभीर खतरे का सामना करने को लेकर बातचीत भी की थी । उनकी आपसी दुश्मनी ऐतिहासिक रूप से स्थायी है और इसे कम करने की जरूरत है । व्यक्‍तिगत तौर पर क्लिंटन ने खुलासा किया कि भारतीय अधिकारियों ने उन्हें पाकिस्तान के पास परमाणु बमों की संख्या के बारे में मोटे तौर पर जानकारी दी थी जिससे अनुमान लगाया गया था कि दोनों के बीच परमाणु बमों की बौछार से ३० से ५० करोड़ भारतीयों की मौत हो सकती है जबकि पाकिस्तान के सभी १२ करोड़ लोग मौत के घाट उतारे जा सकते हैं । भारत इसके बाद अपने कुछ लाख लोगों के बचने के बाद जीत का दावा कर सकता है । दूसरी तरफ पाकिस्तान के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले उनके लोग भारत के मैदानी इलाकों में रहने वालों की अपेक्षा ज्यादा बचेंगे । ’ क्लिंटन ने खेद जताते हुए कहा कि वे सचमुच इसी तरीके से बात करते हैं और हमारे दोनों देशों के साथ अच्छे संबंध नहीं रहे ।
राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान क्लिंटन के साथ अपनी बातचीत की श्रृंखला पर आधारित लेख में ब्रांच कहते हैं, ‘उनके बीच हथियारों की होड़ में भारत इस बात से क्षुब्ध था कि अमेरिका पाकिस्तान को एफ-१६ लड़ाकू विमान बेचने पर सहमत हो गया है और पाकिस्तान भी कम नाराज नहीं हुआ जब अमेरिका ने राशि पाने के बाद विमानों की आपूर्त्ति करने से इंकार कर दिया । ’ प्रेसलर विधेयक में संशोधन के तहत वर्ष १९९० के बाद इस तरह का हस्तांतरण रोक दिया गया था । इस विधेयक के मुताबिक किसी भी देश को परमाणु अप्रसार संधि के उल्लंघन के कारण परमाणु हथियार विकसित करने के लिए सैन्य सामग्री की बिक्री पर रोक लगा दी गई थी । ब्रांच ने कहा, ‘क्लिंटन ने बताया कि पाकिस्तान के लिए और ज्यादा नाराजगी इस बात से रही कि अमेरिकी कानून ने अपने एफ-१६ के भंडारण के लिए प्रशासन को तो पाकिस्तान से भुगतान पाने की अनुमति दे दी लेकिन ये विमान अमेरिकी कब्जे में सड़ते रहे । ’

क्या है श्‍वेत क्रांति ?

भारत दुनिता का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है । देश की जीडीपी में डेयरी उद्योग की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है और आर्थिक परिदृश्य में इसकी दमदार उपस्थिति भी । देश के अन्य उद्योगों की तरह डेयरी उद्योग की भी अपनी खामियां हैं । इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस उद्योग की संरचना बहुत संगठित नहीं है । देश में काम कर रहे तकरीबन सभी को-ऑपरेटिव फेडरेशन स्मॉल एवं मीडियम सेक्टर से ताल्लुक रखते हैं ।
एसएमई की आपूर्ति श्रृंखला में कई कमियां हैं । मध्यस्थों की बढ़ती दखलंदाजी और विभिन्‍न आपूर्ति श्रृंखला के बीच तालमेल के अभाव की वजह से काफी मुश्किलें आती हैं । इससे दूध की गुणवत्ता और आपूर्त्ति श्रृंखला की कार्यप्रणाली पर असर पड़ता है । इस श्रृंखला में कई कमजोर कड़ियां होती हैं, इसके अलावा अनावश्यक मानवीय दखल होता है जिससे गलतियों की संभावना बढ़ती है और खर्च बढ़ता है । देश में डेयरी को-ऑपरेटिव्स खासकर एसएमई खिलाड़ियों को मुनाफा बढ़ाने के लिए इन समस्याओं को सुलझाना जरूरी है ।
इस क्षेत्र से जुड़े एसएमई के लिए समन्वय की कमी सबसे गंभीर समस्या है, खासकर उन मामलों में जहां मांग से जुड़ी भविष्यवाणी करने की जरूरत हो । मांग से जुड़ी भविषयवाणी के मामले में अकुशलता की वजह से ग्राहकों की मांग की तुलना में आपूर्ति कई बार अधिक हो जाती है जिससे दूध के खराब होने का खतरा उत्पन्‍न हो जाता है । इससे दूध को संभालकर रखने में समस्या का सामना करना पड़ता है । ए‍आरजी फूड्‌स के मैनेजिंग डायरेक्टर गौरव वर्मा कहते हैं, ‘सटीक भविषयवाणी नहीं हो पाने की वजह से भारतीय डेयरी उद्योग में मांग-आपूर्ति का गंभीर संकट उत्पन्‍न हो जाता है कई बार आपूर्ति मांग की तुलना में अधिक हो जाती है जिससे दूध बर्बाद हो जाता है । ’
भारतीय डेयरी उद्योग में सप्लाई चेन में तत्परता की कमी है । यह एसएमई और बड़े खिलाड़ी दोनों क्षेत्रों में पाया जाता है । इससे लंबी अवधि तक कारोबार करने के उद्देश्य प्रभावित होते हैं । डेयरी उद्योग को ऐसे आईटी सॉल्यूशंस की सख्त जरूरत है जिससे दूध संग्रह के बारे में तुरंत अपडेट हासिल किया जा सके और रीयल टाइम बेसिस पर आंकड़े जमा किए जा सकें । आईआईटी खड़गपुर में कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के प्रोफेसर एच दास कहते हैं, ‘भारतीय डेयरी बाजार का स्ट्रक्चर बहुस्तरीय है और पिरामिड की तरह के संगठन हैं । अगर आधार के हिसाब से बात करें तो यह बड़े पैमाने पर असंगठित है । इसमें छोटी डेयरी, ग्रामीण दूध उत्पादन, मिल्कमैन (दूधिए) और वेंडर्स शामिल हैं । आधुनिक तकनीक के इस जमाने में एक आईटी आधारित सॉल्यूशंस इस क्षेत्र में काम करने वाले एसएमई के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकता है ।
इन हालात में इंफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजीज (आईसीटी) डेयरी उद्योग में कार्यरत एसएमई एवं बड़े को-ऑपरेटिव के लिए भी कारगर साबित हो सकता है । आईसीटी में रीयल टाइम बेसिस पर डाटा एनालिसिस और डाटा ट्रांसफर के लिए तकनीक उपलब्ध हो सकती है । घरेलू डेयरी उद्योग में काम करने वाली एसएमई के लिए आईसीटी से कैश पेमेंट ऑटोमेशन, ऑटोमेटेड मिल्क कलेक्शन सेंट्रलाइज्ड सिस्टम मॉनिटरिंग और विभिन्‍न सप्लाई चेन के बीच रीयल टाइम नेटवर्किंग जैसी सुविधाएं हासिल हो सकती हैं ।
सहकारी दूध संग्रह समितियों तक पहुंचने वाला दूध किसानों के जरिए पहुंचता है जिसकी गुणवत्ता भी अलग-अलग होती है । अपनी अलग पहचान कायम रखने के लिए किसानों को इलेक्ट्रॉनिक कोड से युक्‍त प्लास्टिक कार्ड उपलब्ध कराया जा सकता है । इन्हें एक बॉक्स में जमा किया जा सकता है जो पहचान संख्या को पढ़कर सूचनाएं जमा कर लेता है । इसके बाद यह सूचना कंप्यूटर तक पहुंच जाती है । जब इलेक्ट्रॉनिक स्केल पर रखे एक बर्तन में दूध डाला जाता है तो इसकी मात्रा नापकर मशीन इस सूचना को भी कंप्यूटर तक पहुंचा देती है । इसके बाद एक ट्यूब से डेयरी तक पहुंच रहा दूध बीच में ही एक अलग ट्यूब से सैंपल के रूप में इलेक्ट्रॉनिक मिल्क टेस्टिंग यूनिट तक पहुंच जाता है । दूध में वसा की मात्रा के हिसाब से दूध की गुणवत्ता नापी जाती है और फिर इसका हिसाब कर एक स्लिप के रूप में उसकी कीमत मशीन से बाहर आ जाती है जिसका दूध उत्पादक को भुगतान कर दिया जाता है । इस प्रक्रिया में बिना मानवीय दखल के २० सेकेंड से भी कम का समय लगता है ।

पायल अग्रवाल

शिक्षा का अधिकार कानूनी बनी चुनौती

शिक्षा के अधिकार कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए भारी-भरकम राशि का इंतजाम केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती साबित होने जा रहा है । मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल स्वीकार कर चुके हैं कि केंद्र के पास कानून को लागू करने के लिए तकरीबन एक लाख ६४ हजार करोड़ रूपए का इंतजाम बड़ी चुनौती है ।
लेकिन केंद्र की चिंता को दरकिनार करते हुए राज्य सरकारों ने केंद्र से इस एक्ट को लागू करने के लिए ज्यादा पैसे की मांग शुरू कर दी है । वित्तीय साझेदारी के सवाल पर केंद्र को पहली चिठ्ठी भाजपा शासित मध्यप्रदेश से मिली है । मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को पत्र लिखकर कहा है कि शिक्षा के अधिकार कानून के लिए जरूरी कवायद शुरू करने के लिए जो पैसा खर्च होगा, उसका ९० प्रतिशत हिस्सा केंद्र वहन करे ।
चौहान ने लिखा है कि वित्तीय आवश्यकता पूरी होने पर ही कानून पर प्रभावी अमल संभव हो पाएगा । उन्होंने कानून का समर्थन करते हुए कहा है कि इसके प्रावधानों से निश्‍चित रूप से शिक्षा के मामले में बुनियादी फर्क दिखने लगेगा, लेकिन पैसे की उपलब्धता को उन्होंने बड़ी समस्या बताया है । गौरतलब है कि मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने बीते दिनों सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र भेजकर शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने की दिशा में ठोस पहल शुरू करने का अनुरोध किया था ।
मानवसंसाधन मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय ने वित्तीय जरूरतों के संबंध में वित्तमंत्रालय को लिखा है । वित्तमंत्रालय से अनुरोध किया गया है कि वह इस संबंध में जरूरी दिशा-निर्देश वित्त आयोग को दें । केंद्र की मंशा यह है कि सर्वशिक्षा अभियान सहित बुनियादी तालीम के लिए चल रही अलग-अलग योजनाओं को शिक्षा के अधिकार का हिस्सा बना दिया जाए । मानवसंसाधन मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि कानून लागू करने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं । जल्द ही वित्तीय साझेदारी का फार्मूला ढूंढ़ लिया जाएगा । लेकिन केंद्र की मंशा यह है कि जिस तरह से एसएसए सहित अन्य केंद्रीय योजनाओं में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी तय है उसी तर्ज पर शिक्षा के अधिकार के लिए पैसा खर्च हो ।
उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए बनेगा वित्त निगम
गरीब छात्रों की पढ़ाई के लिए मुक्‍त लोन की योजना पेश करने के बाद अब केंद्र सरकार उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए एक वित्त निगम गठित करना चाहती है । यह निगम शिक्षण संस्थानों व सामाजिक संगठनों को सस्ते कर्ज मुहैया कराएगा ताकि वे उच्च शिक्षा के ढांचे को मजबूत करने में मदद कर सकें । मानव संसाधन मंत्रालय की योजना के अनुसार, प्रस्तावित नेशनल हायर एजुकेशन फाइनेंस कॉपोर्रेशन (एनएचएफसी) उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाएगा । उसकी पूंजीगत जरूरतों को पूरा करेगा । शिक्षा के क्षेत्र में यह परोपकारी संगठनों को बढ़ावा देगा । पिछड़े इलाकों में व्यावसायिक व उच्च शिक्षा संस्थान स्थापित करने के लिए उन्हें कम दरों में कर्ज उपलब्ध कराएगा । एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, यह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नाबार्ड जैसे संस्थान की तरह काम करेगा । यह बांड जारी कर या बेचकर बाजार से धन जुटाएगा । विश्‍वविद्यालयों की स्थापना के लिए कर्ज मुहैया कराएगा ।

विचार बम से भी खतरनाक होता है

ब्रतानिया हुकूमत के खिलाफ हमारे नौजवान, वीर-वीरांगनाओं व बुद्धिजीवियों तथा महापुरूषों के मन में विचार ही तो फूटा था जिसका परिणाम ब्रतानिया हुकूमत का पतन हुआ । वास्तव में जिसको वर्तमान में विकास समझा जा रहा है वह विकास नहीं विनाश है । जब तक समाज को वर्तमान शिक्षा पद्धति से होनेवाली क्षति को रोककर प्राकृतिक ऐच्छिक शिक्षा पद्धति के आधार पर शिक्षार्थी की प्रतिभा को विकसित कर पराकाष्ठा तक नहीं ले जाया जाएगा तब तक बहुमुखी विकास असंभव है । विद्यालयों में बुनियादी शिक्षा बोध शिशु को प्राकृतिक बौद्धिक प्रवृत्ति के अनुसार समय व समाज की जरूरतों से जुड़ी हुई शिक्षा दी जाय तभी प्रत्येक शिक्षार्थी निश्‍चित रूप से पराकाष्ठा को प्राप्त कर सकेगा व्यावहारिक, आर्थिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक विकास के तह सदाचारी, मानवधर्मी, विश्‍वासी, सद्‌कर्मी, एकात्मावादी, एकेश्‍वरवादी, स्वाबलंबी आदि मानव मूल्य कायम करते हुए राष्ट्र तथा अपने भविष्य को उज्जवल कर मानव कल्याण कर सकेगा । समाज की राजनैतिक, आर्थिक, मानसिक, सामाजिक दरिद्रता के निराकरण के लिए एकमात्र रास्ता दीक्षित शिक्षा की उन्‍नत प्राकृतिक ऐच्छिक शिक्षा पद्धति को लागू किए जाने की जरूरत है । शिक्षा और रोजगार के गड़बड़ाते समीकरण को ठीक करने की आवश्यकता है । राष्ट्र में वर्तमान समय में दस करोड़ से भी अधिक स्नातक तथा स्नातकोत्तर हैं । हम सोचने लगते हैं कि हमारी डिग्रियाँ और हमारा जीवन क्या है? जब इन डिग्रियों से रोजगार नहीं मिलता है तो क्या जरूरत है इनको प्राप्त करने की? क्या नरक का जीवन जीने के लिए प्राप्त की थी शिक्षा? जब यह डिग्रियाँ इस जीवन में काम नहीं आ रही हैं तो क्या मरने के पश्‍चात स्वर्ग में काम आएंगी? दुर्भाग्य का विषय है कि सभी पार्टियों और नेताओं की समझ में यह आज तक नहीं आ सका कि समाज में मजबूत शिक्षा स्तंभ से ही सुशासन पद्धति लागू की जा सकती है । सन्‌ १९४७ से आज तक राष्ट्र व समाज के सभी नेताओं द्वारा दिशा भ्रमित किया जाता रहा है । आज युवा जगत रूपी प्रकाशपुंज को विश्‍वपटल पर अग्रगण्य कर सकेगा । बुद्धिजीवियों, सूफी-संतों, महापुरूषों, नौजवान युवक-युवतियों की तरह से समाज का पतन हो रहा है । महाभारत काल में भीष्मपितामह की तटस्थता कौरव दल में स्त्री को नग्न होते देख रही थी और आज हम सभी की तटस्थता से वर्तमान राजनैतिक पार्टियों के गठबंधन “घटक दल” अधर्मी रूप में पनप रहे हैं । उस दौरे के अधर्मी कौरव दल भी आज के गठबंधनों के घटक दलों जैसे ही तो थे । क्या यही भारतीय संस्कृति है? और क्या होंगे? अभी भी वक्‍त है कि समय रहते अपने सहयोग सद्‌विचारों से समाज की मूलभूत आवश्यकताओं को समझते हुए अपने कर्तव्य का पालन करें तो निश्‍चित रूप से सुदृढ़ एवं चहुमुखी विकास होगा ।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार विधि एवं सीमापार निवेश के विधिक पहलू’

अंतरराष्ट्रीय विधि एसोसिएशन एक ऐसा निकाय है जिसका गठन अंतरराष्ट्रीय विधि के अध्ययन, विकास, समझ और सम्मान के लिए किया गया है । भारत में सम्मेलन का आयोजन किया जाना अंतरराष्ट्रीय विधि एसोसिएशन की भारतीय शाखा के अंतरराष्ट्रीय विधिशास्त्र में दिए योगदान के महत्व को प्रदर्शित करता है ।
मैं आयोजकों को बधाई देती हूँ जिन्होंने सम्मेलन के विषय के रूप में अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश से जुड़े विभिन्‍न पक्षों से संबंधित मुद्दे वर्तमान में काफी प्रासंगिक और रूचिकर हैं । सब-प्राइम संकट के कारण, पिछले वर्ष विकसित देशों की कई प्रतिष्ठित कंपनियाँ दिवालिया हो गई जिससे वैश्‍विक मंदी उत्पन्‍न हो गई । पिछले कुछ दशकों के दौरान वस्तुओं, सेवाओं और पूंजी के अत्यधिक सीमापार आवाजाही से विश्‍व में भारी बदलाव आया था प्रौद्योगिक प्रगति से सम्पर्क सहज और तेज गति से होना शुरू हुआ । इस तरह वैश्‍विक अर्थव्यवस्था ऐसी आर्थिक मंदी की चपेट में आई जो १९३०. के दशक के बाद पहली बार आई और इसका प्रभाव तुरंत हर तरफ फैल गया । वास्तव में, इस वैश्‍विक और लगातार एकीकृत हो रहे विश्‍व में कोई भी देश इस वित्तीय संकट के दुष्प्रभावों से सुरक्षित नहीं था ।
इस आर्थिक मंदी के साथ तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और खाद्य पदार्थों की ऊँची कीमतों का दौर शुरू हुआ । विकासशील देशों में विकास के कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और बढ़ती गरीबी और भुखमरी की स्थिति और भी गंभीर हो गई । इससे खाद्य सुरक्षा सहित विकास के मुद्दों पर निरंतर ध्यान केंद्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आवश्यकता महसूस की गई ।
इन वित्तीय संकटों से आपात स्थिति से निपटने, मध्य, एवं दीर्घकालीन नीतिगत उपाय तैयार करने तथा विश्‍व अर्थव्यवस्था को अधिक स्थिर, अधिक समतापूर्ण और अधिक जिम्मेदार बनाने के लिए तुरंत मिलकर विश्‍व प्रयास करने की आवश्यकता पैदा हो गई । इस संकट से निपटने के लिए अनेक देशों ने वित्तीय व मौद्रिक उपाय किए । समूह-२० तंत्र ने राजनैतिक स्तर पर चर्चा के लिए एक मंच प्रदान किया । इन हस्तक्षेपों से एक संकट को फैलने से रोकने में मदद मिली और अर्थव्यवस्था में उत्थान के संकेत दिखाई दिए । लेकिन मध्यम एवं दीर्घकालिक ठोस वित्तीय प्रणाली के लिए विभिन्‍न क्षेत्रों, विशेष रूप से १. वैश्‍विक वित्तीय रूपरेखा तैयार करने, २. वित्तीय नियमन और निगरानी नियम, ३. व्यवस्थित जोखिम के मूल्यांकन के लिए बेहतर तरीका, ४ विकास के परिप्रेक्ष्य में व्यापार और निवेश पर विचार करने के लिए नई सोच और प्रयासों की जरूरत है । व्यापक स्तर पर यह मान्यता है कि वैश्‍विक प्रगति को कायम रखने के लिए विश्‍व व्यापार और निवेश को पुनः सशक्‍त बनाना जरूरी है ।
संकट के बाद की विश्‍व वित्तीय स्वरूप की विशेषताएं दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद जैसी नहीं होंगी । आपस में जुड़े हुए विश्‍व में, वित्तीय नियंत्रण, बैंकिंग कार्यों, क्रेडिट एजेंसियों का श्रेणी निर्धारण और निगरानी के वैश्‍विक नियम और मापदण्ड अधिक स्पष्ट और बड़े सख्त होने चाहिए । इन मुद्दों से संबंधित राष्ट्रीय नीतियों के सामंजस्य तथा अधिक संगतता के लिए जहां तक आवश्यक और संभव हो, देशों के बीच और ज्यादा व्यवस्थित सहयोग और सूचना के आदान-प्रदान की जरूरत पड़ेगी । नए वित्तीय स्थिरता बोर्ड को सभी व्यवस्थित महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थाओं, माध्यमों और बाजार पर नियंत्रण व निगरानी बढ़ाने का निर्देश दिया गया है । लेकिन इसके साथ-साथ बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार किया जाना चाहिए जिससे वे अलग-अलग हितों का ज्यादा प्रतिनिधित्व कर सकें और सामयिक सच्चाईयों को प्रतिबिम्बित कर सकें ताकि ये संस्थाएं अधिक प्रभावी बन सकें । मेरा मानना है कि सुधरे हुए विश्‍व वित्तीय स्थिति की जटिलताओं पर ध्यान देने के साथ-साथ गरीबी और भूख में कमी और सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों की प्राप्ति विश्‍व का प्रमुख उद्देश्य बना रहना चाहिए ।
विश्‍व व्यापार कम होने से सामाजिक और आर्थिक आशय पैदा हुए हैं और अमीर व गरीब राष्ट्र अलग-अलग तरह प्रभावित हुए हैं । इस परिदृश्य में, ‘विकास आयाम’ पर केन्द्रित दोहा व्यापार बातचीत के दौरे को आगे बढ़ाना जरूरी है । कुछ देशों की संरक्षवाद की बढ़ती प्रवृत्ति से स्थिरता प्रक्रिया धीमी हो जाएगी । यह याद रखना चाहिए कि जिस प्रकार के वातारण में विकसित देशों ने प्रगति की है वह विकासशील देशों के लिए मुश्किल है और उनसे अपने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए । विकासशील देशों को व्यापार और विकास नीति सांचे में बहुत सारी प्रतिबद्धताओं को संभालना और संतुलित करना होता है । इसलिए विश्‍व कार्यसूची में विकासशील देशों की अपने लोगों के कल्याण के बारे में चिंताओं को शामिल करना चाहिए ।
मंदी का प्रकोप कम होता प्रतीत हो रहा है । कंपनियां नए व्यापार अवसरों की तलाश कर रही हैं इसके अलावा, हमारे लिए खुशी की बात यह है कि भारत में औद्योगिक उत्पादन बढ़ रहा है । विश्‍व की चौथी विशाल और मुश्किल समय में विकास कायम रखने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में भारत, विश्‍व अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक है । भारत निवेश स्थान के मामले में मजबूत आधार-स्तंभों पर टिका हुआ है । इसके पास विशाल बाजार है, कुशल जनशक्‍ति, स्वतंत्र न्यायपालिका तथा एक व्यापक कानूनी और आर्थिक मूलभूत ढांचा है । इसी प्रकार, भारतीय कंपनियां या तो विलय और अधिग्रहण या सीधे निवेश के जरिए विदेशों में निवेश कर रही हैं । इसलिए, यह स्वाभाविक है कि एक देश जो निवेश प्राप्त कर रहा है और विदेशों में निवेश कर रहा है, उसकी वित्तीय नियंत्रण, विभिन्‍न प्रकार के जोखिमों का आकलन और पूंजी मात्रा की व्यवस्थित निगरानी मे मुद्दों में गहरी दिलचस्पी है । हमारा जिन देशों के साथ व्यापार और निवेश संबंध है, उनके यहां मौजूद विधिक ढांचों में भी हमे
ं रूचि है ।
व्यावसायिक उद्यमों के कानूनी ढ़ांचे अनुमानित होने चाहिए और ये इस प्रकार बनाए जाने चाहिए कि ये सुचारू रूप से कार्य कर सकें । निवेश आकर्षित करने, उत्पादन को बढ़ावा देने और प्रौद्योगिक संवर्धन को सहयोग देने के लिए विधान और नीतियों को प्रगतिशील व पारदर्शी होना चाहिए । इसी प्रकार कार्पोरेट प्रतिष्ठानों, चाहे वे राष्ट्र में या राष्ट्र के बाहर और महाद्वीपों में काम करते हों, की जिम्मेदारी और जवाबदेही पर बल भी उतना ही जरूरी है । निजी क्षेत्र की यह जिम्मेदारी है कि वह संचालन मुद्दों पर ध्यान देकर और जोखिम प्रबंधन सुधार कर एक विश्‍वास का माहौल तैयार करें । लापरवाह व्यवहार तथा अत्यधिक जोखिम का मतलब होगा कि संकट से कोई सबक नहीं सीखा गया है । ऐसे नजरिए अब स्वीकार्य नहीं हो सकते । इसलिए, व्यवसायियों द्वारा नियमों का पालन करना चाहिए तथा सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को बढ़ावा देने के प्रति अपना निष्ठाभाव दर्शाना चाहिए ।
-GOPAL PRASAD
विश्‍व व्यापार संगठन नियमों, बौद्धिक सम्पत्ति अधिकारों, क्षेत्रीय व्यापार समझौतें और अधिमान प्राप्त व्यापार समझौतों विवाद समाधान और विवाचन तंत्रों जैसे जटिल मुद्दों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार निवेश के कानूनी पहलू चुनौतीपूर्ण हैं । घरेलू कानून बनाने, नियम तैयार करने और उनके कार्यान्वयन में सभी भागीदारों का योगदान आवश्यक है । अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को ध्यान में रखा जाना चाहिए । राष्ट्रीय स्तर पर, सरकार, व्यवसायिकों, वकीलों, अर्थशास्त्रियों के बीच संवाद प्रक्रिया नीति निर्माण और कार्यान्वयन के लिए बहुत उपयोगी है । मुझे खुशी है कि इस सम्मेलन में भारत की कार्यपालिका, विधानपालिका और न्यायपालिका के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं ।
विधि समुदाय प्रारम्भिक विचार-विमर्श से लेकर विवाद समाधान की कारोबार प्रकिया के प्रत्येक स्तर का हिस्सा है । इस प्रयास में ज्ञान पूंजी एक प्रमुख चुनौती है । भारत को ऐसे वकीलों, अर्द्ध विधिकों और पेशेवरों की क्षमता बढ़ानी चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार व निवेश कानूनों के जानकार हों और जो उनकी जटिलताओं को सुलझा सकें । इसी प्रकार, हमारे अकादमिकों और विधि शौक्षिक संस्थानों को विश्‍व व्यापार माहौल के साथ गति बनाकर चलना चाहिए और उन्हें इसे संवारने में भी मदद करनी चाहिए । सम्मेलन में विभिन्‍न पसंद और विकल्पों पर विचार-विमर्श किया जाएगा । इसलिए यह भली-भांति याद रखना चाहिए कि इसका प्रमुख उद्देश्य समतामूलक विश्‍व को बढ़ावा देना, अधिक नियंत्रित आर्थिक कार्य करना तथा बेहतर निगरानी के लिए प्रणालियों की स्थापना करना है ताकि भविष्य में दुनिया को अस्थिर करने वाला कोई भी संकट पैदा न हो सके ।
इस सम्मेलन में विश्‍व व्यापार संगठन वार्ताओं, क्षेत्रीय और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों, निवेश सुरक्षा संधियों, एशिया प्रशांत सहयोग, विवाद समाधान तथा वर्तमान आर्थिक व विधिक परिस्थितियों से संबंधित दूसरे मुद्दों पर ध्यान दिया जाएगा तथा विश्‍व व्यापार व निवेश व्यवस्था को चुनौती देने वाले कानूनी मुद्दों पर नई रोशनी डाली जाएगी और नए विचार पेश किए जाएंगे ।

कफन की वैकुंठ-यात्रा

‘कफन’ प्रेमचंद की ही नहीं, हिंदी-उर्दू की ही नहीं- विश्‍व की श्रेष्ठ कहानियों में से है । यह कहानी इतनी विशिष्ट क्यों है? मानवीय संवेदना की अभिव्यक्‍ति की दृष्टि से ‘कफन’ अप्रतिम है । ‘कफन’ में इंसानी जिंदगी का जो चित्र अंकित किया गया है: वह क्रूर इंसानों का नहीं, निरीह-बेहद निरीह-इंसानों की विवशता का स्याह-बेहद्स्याह-चित्र है । समाज में घीसू और माधव जैसे इंसानों की उपस्थिति का कारण क्या है? जिंदगी जीकर, उन्होंने जिंदगी का अर्थ क्या जाना-समझा? इसके पीछे सामाजिक दुर्व्यवस्था, धोखाधड़ी का पर्याय अंधधार्मिक मान्यताएँ समाज का विषमतापूर्ण आर्थिक ढाँचा और राज्य के द्वारा मानवीय उपेक्षा है । कोई निठल्ला क्यों रहे, कोई आलसी क्यों बने, कोई भूखा क्यों रहे, इंसान के उपचार के प्रति समाज इतनी निर्मम तटस्थता क्यों बरते, जबकि मरते हुए पशुओं तक के प्रति मानवीय संवेदना जागती है? इंसानी दुनिया में शराब का खुलेआम इतने धड़ल्ले से व्यापार क्यों, जबकि सर्वविदित है कि शराब-सेवन सोचने-विचारने की शक्‍ति को निष्क्रिय कर देता है इत्यादि अनेक प्रश्न ‘कफन’ की मुत्यु-गाथा को पढ़ने से सहज ही उठते हैं ।
‘कफन’ के पात्र नाम-भर के चमार हैं । वे चर्म-कर्म नहीं करते । वस्तुतः ‘कफन’ के पात्र गरीब- अत्यधिक गरीब, सही अर्थों में सर्वहारा हैं( भले ही जागरूक न हों) गरीबी आदमी को कितना गिरा देती है, गरीबी आदमी को कितना निरीह-विवश बना देती है, यह ‘कफन’ के पात्र मरकर/जीकर बड़े प्रभावी ढंग से समाज को बताते हैं । घीसू और माधव की मनोवृत्ति जन्म से ही बननी शुरू होती है । अपने अतीत और वर्तमान में उन्हें जब कोई अंतर दिखाई नहीं देता, तो भविष्य के प्रति भी उनका दृष्टिकोण यथावत्‌ बना रहे तो आश्‍चर्य क्या ! वे न बदल सकते हैं, न सुधर सकते हैं ।
साठ-वर्षीय घीसू (घिसुआ) माधव का बाप है । विधुर है । कर्ज से लदा हुआ है । दीन है । आलसी है । लकड़ियाँ तोड़-बेचकर स्वयं को और अपने परिवार को बमुश्किल जिला पा रहा है । अन्यथा उसकी और उसके बेटे की प्रमुख वृत्ति आकाश-वृत्ति है- दूसरों के खेत से मटर, आलू, ऊख चुराकर पेट भरना । माधव भी अपने पिता के पदचिह्‌नों पर चलता है । पिछले साल ही उसका बुधिया से विवाह हुआ है । कामचोर है । विवाह के बाद और भी आरामतलब हो गया ।
जवान बुधिया प्रसव-वेदना से तड़पती-पछाड़ खाती बताई गई है । जाड़ों की रात है । घीसू के मत से वह ‘चुड़ैल के फिसाद’ का शिकार है । एक साल तक बुधिया ने ‘इन दोनों बे-गैरतों का दोजख’ भरा । ‘इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली । ’ सुबह बुधिया मर जाती है । उसके पेट का बच्चा भी मर गया था । बुधिया की मुत्यु के बाद समाज के आर्थिक-धार्मिक परिदृश्य सामने आते हैं । अवलोकन करें, -
(१) जिस समाज में रात-दिन मेहनत करनेवालों की हालत उनकी हालत से बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलता से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा संपन्‍न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी । उसे (घीसू को) यह तस्कीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है त कम-से-कम उसे किसानों की-सी-जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीं उठाते । ’
(२) घीसू बोला, - ‘कफन लगाने से क्या मिलता ? आखिर जल ही तो जाता । कुछ बहू के साथ तो न जाता । ’
माधव आसमान की तरफ देखकर बोला, मानो देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो,- ‘दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बाँभनों को हजारों रूपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं । ’
(३) ‘तू कैसे जानता है कि उसे कफन नहीं मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफन मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा । घीसू गरम होकर बोला, - मैं कहता हूँ उसे कफन मिलेगा, तू क्यों नहीं? वही देंगे, जिन्होंने अबकी दिया । हाँ, अबकी रूपए हमारे हाथ न आएँगे । ’
(४) घीसू ने कहा, - ‘ले जा खूब खा और आशीर्वाद दे ! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई । मगर तेरा आशीर्वाद उसे जरूर पहुँचेगा । रोयें-रोयें से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं’ ।
माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा,- ‘वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी । ’
घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला,- ‘हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी । किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं । मरते-मरते हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई । वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, औत अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं । ’
घीसू और माधव दोनों पात्र प्रेमचंद की सृष्टि हैं, लेकिन इन दोनों पात्रों का चयन प्रेमचंद ने समाज से ही किया है । प्रेमचंद घीसू और माधव की मानसिकता जीकर ही न पात्रों के कार्य और वार्तालाप निश्‍चित करते हैं । वास्तव में, घीसू और माधव के मुख से प्रेमचंद ही बोलते हैं अन्यथा घीसू और माधव-जैसे शराबी और अज्ञानी इतने सटीक और सार्थक संवाद कभी बोल ही नहीं सकते । माना कि उनकी भावना को ही लेखक-प्रेमचंद-ने वाणी दी है । सिद्धहस्त लेखक ही अपने पात्रों को जीवत्‌ बनाने के लिए सुविचारित संवादों की रचना करते हैं । इसी प्रकार, घीसू और माधव के गरम-गरम आलू छीलकर खाते समय के चित्र में, दोनों की मानसिकता विनोदपूर्ण इतनी नहीं, जितनी कि हदय-विदारक है । आलू खाते रहने का लोभ दोनों को है । पृष्ठभूमि में दम तोड़ती हुई बुधिया है । इस परिप्रेक्ष्य में घीसू और माधव के बहाने और उनके कथन हास्य की सृष्टि नहीं करते . वातावरण को करूण बना देते हैं । दोनों की चालाकियाँ उनकी तीव्र भूख को जाहिर करती हैं । दोनों एक-दूसरे के लिए थोड़ा भी आलू-त्याग करने को तैयार नहीं । दोनों के लिए आलुओं का खाद्‌अय इस समय भगवान्‌ है, बहू/पत्‍नी की असह्‌य पीड़ा उपेक्षणीय और नगण्य । यह सब तभी संभव हुआ जब लेखक-प्रेमचंद-स्वयं घीसू और माधव बने ।
धार्मिक भावनाओं को लेकर भी ‘कफन’ में चुभते हुए व्यंग्य हैं । फटे चीथड़े पहननेवालों को मरण के पश्‍चात्‌ नए कपड़े का कफन ओढ़ाना, नंगोभूखों के लिए बैकुंठ की कल्पना करना, मृतक का माया-जाल से, जंजाल से मुक्‍त होना आदि पक्ष कितने खोखले नजर आते हैं, यह ‘कफन’ की कलात्मक बुनावट के फलस्वरूप ही है । प्रेमचंद ने प्रसंग के गांभीर्य को पूरा-पूरा महत्व दिया है । कोई भी अनावश्यक और असंबद्ध टिप्पणी नहीं की है ।
‘कफन’ कोई शराबबंदी पर लिखी हुई कहानी नहीं है, यद्‌यपि उसका माहौल प्रमुख रूप से शराब से सराबोर है । पाठक यह अनुभव करते हैं कि यदि घीसू-माधव क्रिया-कर्म के लिए एकत्र किए गए पाँच रूपए शराब में बर्बाद नहीं करते तो स्थिति इतनी खराब नहीं होती । काश, घीसू-माधव पियक्‍कड़ न होते ! शराबी शराब की गंध सूँघते ही अपना ईमान खो देता है । यह उसकी मजबूरी है । माना ऐसा सोचना अपनी जगह सही है, किंतु यह भी सही है कि घीसू-माधव को शराबी चित्रित करना युक्‍तियुक्‍त है । इसमें भी दो मत नहीं, शराब के नशे में अभिव्यक्‍त घीसू-माधव के उद्‌गारों को जो प्रभविष्णुता मिली है, वह सामान्य सचेत कथन में मिलना संभव नहीं थी ।
निस्संदेह, प्रेमचंद का अनुभव-संसार बड़ा व्यापक था । अपने पात्रों की मानसिकता वे बखूबी जानते थे । ‘कफन’ कहानी का परिवेश, जीवन और चिंतन विशुद्ध भारतीय है । भले ही प्रेमचंद ने ‘कफन-जैसी और कहानियाँ नहीं लिखी, किंतु उसपर विश्‍व की किसी भी कहानी की छाप नहीं है । वह स्वतःस्फूर्त और पूर्णतया मौलिक है । उसके एक-एक शब्द में प्रेमचंद का व्यक्‍तित्व समाहित है । पद्दलित, तिरस्कृत-उपेक्षित एवं बुभुक्षित मानवता के प्रति प्रेमचंद की सहानुभूति ने बुधिया की मुत्यु को और भी अधिक जीवत्‌ बना दिया है । ‘कफन’ अपने कथ्य और शिल्प में अद्वितीय है ।

- डॉक्टर महेंद्र भटनागर ,110 बलवंतनगर, गाँधी रोड ,ग्वालियर(मध्य-प्रदेश)







































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इनका कहना है

“कश्मीर समस्या के समाधान में जम्मू-कश्मीर के इतिहास और भूगोल को ध्यान में रखा जाएगा । भारत की अन्य समस्याओं के समाधान की यहां नकल नहीं की जा सकती । ”
- पी. चिदंबरम, गृहमंत्री

“मध्यप्रदेश को एक उचित शिल्पकार की जरूरत है । इसके अभाव में प्रदेश आज भी पिछड़ा हुआ है । यहां का निवेश बाहर जा रहा है । और प्रतिभाएं भी पलायन कर रही हैं । ”
- ज्योतिरादित्य सिंधिया, केन्द्रीय वाणिज्य राज्यमंत्री

“पाकिस्तान अगर बहुत छोटा देश है, तो राहुल गांधी बताएं कि मनमोहन सिंह ने मिस्र में पाक के प्रधानमंत्री के साथ जारी संयुक्‍त बयान में बलूचिस्तान को शामिल करने की शर्मनाक चूक क्यों की ।”
- रविशंकर प्रसाद, भाजपा प्रवक्‍ता

“यहां दो भारत हैं । एक में मूलभूत सुविधाएं और अवसर हैं, जबकि दूसरा गरीबी से जूझ रहा है । कांग्रेस का प्रयास है कि उन्हें विकास से जोड़ा जाए ताकि सभी समृद्ध हो सकें । ”
- एके एंटनी, रक्षा मंत्री

“लोग सैकड़ों फिल्मों में काम करने वालों को याद नहीं रखते । मैनें तो चंद ही फिल्मों में काम किया, पर वे फिल्में इंडस्ट्री में मील का पत्थर साबित हुईं । इसी का परिणाम है कि मुझे स्वतंत्र पहचान मिली । ”
- आशुतोष राणा, अभिनेता
“मेरे पास फोन टैप किया जा रहा है । मुझे पूरा यकीन है कि इसके लिए केंद्र सरकार ने इजाजत नहीं दी है । यह राज्य सरकार कर रही है । पिछले दो-तीन सालों से ऐसा हो रहा है । ”
- ममता बनर्जी, केंद्रीय रेलमंत्री

“मेरी कलमाड़ी के साथ सार्वजनिक बहस में उलझने की कोई इच्छा नहीं है । दोषारोपण का खेल खेलने की जगह सभी संबंधित पक्षों को एक साथ मिलकर खेलों के सफल आयोजन को अंजाम देना चाहिए ।
- माइक हूपर, राष्ट्रमंडल खेलों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी

दलितराज में दलित की हत्या

आज दलित सत्तासीन ही अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम को खतम करने, रिजर्वेशन खत्म करने हेतु निजीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं । निजीकरण का अर्थ है जो रिजर्वेशन का लाभ सरकारी संस्था से मिलता है वह निजी संस्था से नहीं मिलेगा । जनसंख्या दिन पर दिन बढ़ रही है । निजीकरण भी तेजी से हो रहा है तथा विभागीय पदों की संख्या घटा‌ई जा रही है । इसका सीधा प्रभाव दलित समाज पर पड़ रहा है । संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है । लोकतंत्र अब राजतन्त्र से भी बदतर हो गया है । आज समाज में दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों तथा गरीबों को तिरस्कृत जीवन जीने हेतु विवश होना पड़ रहा है । कैसे पुन: बाबा साहब द्वारा निर्मित संविधान पर आधारित लोकतंत्र को और दलितों के अधिकारों को बचाया जा‌ए? कैसे दलित आन्दोलन को पुनर्जीवित किया जा‌ए ? बाबा साहब डॉ . बी०आर० अंबेडकर जी द्वारा अछूत एवं शूद्र कहलाने वाली जन जातियों को एक शब्द में दलित समाज कहकर उनके समान विकास के लि‌ए जिस दलित आन्दोलन की आधारशिला रखी गयी थी, वह दलित आन्दोलन आज कमजोर हो रहा है । कुछ स्वार्थवादी और मनुवादी विचारधारा रखने वाले दलित सत्तासीन नेता‌ओं जिन्होंने बाबा साहब की विचारधारा और उनके बौद्ध धर्म दर्शन का उपभोग कर सत्ता पा‌ई है , के दलित समाज से मुहं फेर लेने और मनुवादियों के साथ हाथ मिला कर दलितों के अधिकारों और उनके लि‌ए बने कानून का धीरे-धीरे अंत किये जाने के कारण दलित समाज घोर निराशा और पीड़ा के साथ फिर से अपना अस्तित्व अलग- अलग बिखेर कर ढूंढ़ रहा है।
जैसा कि डॉ . अंबेडकर ने दलितों को संगठित रहने को कहा था , ऐसे में दलित संगठन का टूटना दलित समाज के लि‌ए ही नहीं बाबा साहब द्वारा निर्मित संविधान और उसपर आधारित लोकतंत्र को भी खतरा पैदा कर देगा । संगठन से ही दलितों ने अपनी सत्ता हासिल की है । यह और बात है कि वह सत्ता दलित समाज के काम की नहीं रही । यदि व्यक्ति का एक हाथ काम करने योग्य न रहे तो व्यक्ति अपने दूसरे हाथ पर दोनों हाथों का दायित्व डाल देता है ताकि उसे किसी की दया का पात्र न बनना पड़े, वह स्व आश्रित रहे अर्थात यदि एक दलित नेता ने समाज को धोखा दिया है और बाबा साहब का कद कम करने का प्रयास किया है तो समाज को समाज का दूसरा नेतृत्व खोजना चाहि‌ए न कि किसी दूसरे मनुवादी की सत्ता स्वीकारनी चाहि‌ए । आज दलित सत्तासीन ही अनुसूचित ज़ाति जनजाति अधिनियम को खतम करने, रिजर्वेशन खत्म करने हेतु निजीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं । निजीकरण का अर्थ है जो रिज़र्वेशन का लाभ सरकारी संस्था से मिलता है वह निजी संस्था से नहीं मिलेगा और जनसंख्या दिन पर दिन बढ़ रही है निजीकरण भी तेजी से हो रहा है तथा विभागीय पदों की संख्या घटा‌ई जा रही है । इसका सीधा प्रभाव दलित समाज पर पड़ रहा है और संवैधानिक अधिकारों का हनन और लोकतंत्र का बनता राजतन्त्र आज समाज में दलितों, पिछडों, अल्पसंख्यकों तथा गरीबों को तिरस्कृत जीवन जीने हेतु विवश कर रहा है । कैसे पुन: बाबा साहब द्वारा निर्मित संविधान पर आधारित लोकतंत्र को और दलितों के अधिकारों को पुनर्जीवित किया जा‌ए । "शिक्षित बनो संगठित रहो, और संघर्ष करो" : राजनीति ही हर विकास की कुंजी है । एकता की सोच के साथ जन संगठन क्या संभव नहीं कर सकता?
बहादुर सोनकर एक दलित अनुसूचित ज़ाति खटीक से सम्बन्ध रखते थे जिनकी निर्मम हत्या एक कटीले पेड़ से टांग कर की गयी । शहीद बहादुर सोनकर का गुनाह इतना था कि उन्होंने बाबा साहब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर जी से मिली शिक्षा पर चलते हु‌ए दलित समाज का प्रतिनिधित्व लोक सभा द्वारा करने की राह पकड़ जौनपुर लोकसभा सीट से प्रत्याशी के रूप में नामांकन किया था जो दलित राज में दलितों को ही रास न आया और खुद को अम्बेडकरवादी कह कर पूरे दलित समाज को मूर्ख बनाने वाले लोगों ने मनुवादियों के साथ मिल कर जातिवादी मानसिकता में एक दलित श्री बहादुर की ही हत्या करवा दी । कटीले पेड़ पर टांग कर पूरे दलित समाज को सन्देश दिया कि दलित अब दलितों के ही गुलाम होंगे । शहीद बहादुर सोनकर हत्या मामले में क‌ई बार सरकार से मांग किये जाने के बाद भी कार्यवाही नहीं हु‌ई उनके परिवार के लि‌ए किसी धनराशि दि‌ए जाने की भी घोषणा नहीं हु‌ई जबकि एक रैली में मरने वाले को ५ लाख दि‌ए जाते रहे हैं । शहीद बहादुर खटीक के परिवार में उनके ७ बच्चे हैं । सबसे बड़ा बेटा पोलियो ग्रस्त है जिसकी उम्र लगभग १८ साल होगी। उच्च न्यायालय में उनकी हत्या को आत्म हत्या सिद्ध करने के खिलाफ लड़ा‌ई डॉ. उदित राज और इंडियन जस्टिस पार्टी लड़ रही है ।

for help State Bank of India Account of The All India Confederation of SC/ST Organisations no-30899921752

-गोपाल प्रसाद

जलवायु पर भारत का नया नजरिया

पर्यावरण पर संयुक्‍त राष्ट्र की नई संधि पर दिसंबर में कोपेनहेगन में दस्तखत होने हैं । ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनी ग्रीन हाउस गैसों को किस तरह कम किया जाए, इस पर विकसित विश्‍व और विकासशील देशों को सहमति बनानी है । अमेरिका चाहता है कि भारत और चीन जैसे देश लक्ष्य बनाकर इन गैसों का उत्सर्जन कम करें । तेजी से बढ़ रही दोनों देशों की अर्थव्यवस्था में इस उत्सर्जन की मात्रा भी बढ़ रही है । भारत का तर्क है कि इसका उसके आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा, वह चाहता है कि विकसित विश्‍व इन्हें नियंत्रित करें, साथ ही उत्सर्जन कम करने की नई तकनीक में निवेश करें । भारत ने साफ कर दिया है कि वह कार्बन उत्सर्जन पर किसी भी तरह की कानूनी अनिवार्यता स्वीकार्य करने को तैयार नहीं है । इस समय कार्बन उत्सर्जन की ८० फीसदी वृद्धि भारत और चीन जैसे देशों में ही हो रही है । भारत का तर्क है कि अगर उसकी अर्थवयवस्था इसी दर से तरक्‍की करती रही, तब भी अगले एक या दो दशक में उसका प्रति व्यक्‍ति कार्बन उत्सर्जन विकसित देशों के मुकाबले काफी कम होगा । हाल में ही अमेरिका के प्रतिनिधि सदन में एक बिल पास किया गया है, जिसमें यह प्रावधान है कि जो देश उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य को पूरा नहीं करेंगे, उनके उत्पादों पर खास टैक्स लगाया जाएगा । इसे एक तरह का संरक्षणवादी कदम माना जा रहा है, जिसका मकसद अपने देश के व्यापार को बचाना है । पर्यावरण पर अंतरराष्ट्रीय वार्ता में एक बड़ी बाधा यह है कि विकसित देश इसके लिए समुचित तकनीक न तो विकासशील देशों को देना चाहते हैं और न ही उसमें पर्याप्त निवेश करना चाहते हैं । वे चाहते हैं कि विकासशील देश खुद ही उत्सर्जन में कटौती करें और खुद ही उसकी लागत का भार भी उठाएं । भारत इस मामले में अमेरिका से द्विपक्षीय समझौता करने की कोशिश कर रहा है । अगर इस पर कोई सहमति बनती है तो वह कोपनहेगन सम्मेलन में विकसित और विकासशील देशों के समझौता मॉडल के रूप में रखी जा सकेगी ।
लेकिन इस सम्मेलन से पहले कई बाधाओं को पार करना होगा । अमेरिका के वर्तमान प्रशासन ने १९९० के मुकाबले २०५० तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में ८० फीसदी कटौती करने का वादा किया है । जापान के नए प्रधानमंत्री यूकियो हतोयामा ने भी २५ फीसदी कटौती की बात कही है । इसके चलते विकासशील देशों पर भी दबाव बन रहा है कि वे अपने यहां गरीबी उन्मूलन की कोशिशों को चलाते हुए भी पर्यावरण बदलाव के लिए कुछ करें । यही वजह है कि पिछले हफ्ते पर्यावरण बदलाव पर न्यूयॉर्क में हुए संयुक्‍त राष्ट्र सम्मेलन में चीन और भारत ने इस सिलसिले में सकारात्मक संकेत दिए ।
जुलाई में जब अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत आई थीं तो लग रहा था कि इस मामले में भारत का स्वर अवज्ञापूर्ण है । पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने तब सार्वजनिक तौर पर कहा था, ‘उत्सर्जन कटौती पर हम कानूनी बाध्यता नहीं स्वीकार करेंगे । ’ भारत और चीन पर विकसित देश लगातार यह दबाव डाल रहे हैं कि वे उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य को स्वीकार करें । भारत का तर्क यह है कि ऐसे दबाव के आगे झुकने का सवाल ही नहीं है, क्योंकि भारत में प्रति व्यक्‍ति उत्सर्जन सबसे कम है । भारत ने पश्‍चिम के देशों में कार्बन टैक्स लगाए जाने का भी खासा विरोध किया है, क्योंकि इसका उसे निर्यात पर पड़ेगा ।
लेकिन न्यूयॉर्क के सम्मेलन में जयराम रमेश की टिप्पणियों से ऐसा लगा कि भारत इस मसले पर अपना रवैया लगातार बदल रहा है । जहां उन्होंने कहा कि भारत कोई बहानेबाजी नहीं कर रहा वह स्वैच्छिक रूप से कटौती के लिए तैयार है । हलांकि अभी अंतरराष्ट्रीय कटौती स्वीकार करने का सवाल ही नहीं है, लेकिन भारत अब अपनी वैश्‍विक साख के लिये यह भी कह रहा है कि वह राष्ट्रीय लक्ष्य बनाकर उसे हासिल करने की कोशिश करेगा ।
रवैये में इस बदलाव के दो कारण हैं । एक तो पर्यावरण बदलाव पर चीन का नजरिया । चीन ने घोषणा की है कि वह राष्ट्रीय पर्यावरण परिवर्तन प्रोग्राम बनाकर उत्सर्जन कम करने और जंगलों को बढ़ाने के अपने लक्ष्य को हासिल करेगा । भारत को पता ही नहीं था कि चीन संयुक्‍त राष्ट्र महासभा में इस तरह की घोषणा करने वाला है, और अब वह इसी राह पर चलना चाहता है । भारत इस पर चीन से बातचीत की योजना भी बना रहा है ।
दूसरा कारण यह है कि देश के सामरिक विशेषज्ञों की यह धारणा बन रही हैकि बढ़ती ताकत के कारण भारत को अपनी ही शर्तों पर वैश्‍विक मसलों में दखल देनी चाहिए । दो महीने पहले इटली में हुए मेजर इकॉनमी फोरम के सम्मेलन में भारत इस बात पर सहमत हो गया था कि सभी देशों को उत्सर्जन घटाना चाहिए, ताकि विश्‍व तापमान को दो डिग्री से ज्यादा न बढ़ने दिया जाए । आलोचकों का कहना है कि इसने कोपहेगन सम्मेलन में भारत की राजनयिक संभावनाओं को कम कर दिया है । लेकिन भारत को उम्मीद है कि इससे उसकी रंग में भंग डालने वाली छवि खत्म होगी । इसी के चलते भारत ने ईधन और ऊर्जा के कई लक्ष्य स्वीकार भी किए हैं । भारत एक जिम्मेदार विश्‍व ताकत की छवि बनाना चाहते है, जो दुनिया की समस्याओं के हल के लिए हर बात पर न कहने के बजाए सकारात्मक मदद देना चाहता है ।
लेकिन इन सबके बावजूद यह अभी स्पष्ट नहीं है कि अगर पर्यावरण बदलाव की बातचीत सफल होती है तो अमीर औद्योगिक देश विकासशील देशों को तकनीक और वित्तीय मदद देने का काम करेंगे या नहीं । ऐसा कोई वायदा अभी नजर नहीं आ रहा है । वित्तीय और तकनीकी मदद के बगैर भारत जो देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने की कोशिश की अंतरराष्ट्रीय जांच नहीं होने देंगे । पर्यावरण बदलाव की बातचीत से सिर्फ परस्पर विरोधी आर्थिक हित सामने आ गए हैं विकसित और विकासशील देशों के आपसी रिश्तों के सैद्धान्तिक मुद्दे भी खड़े हो गए हैं । अतीत में भारत हमेशा ही विकासशील देशों की अगुवाई में खड़ा होता रहा है, उन समझौतों को वीटो करता रहा है, जो भेदभावपूर्ण थे । पर्यावरण प्रदूषण को रोकने की पश्‍चिम की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी ऐसा ही मसला है, जिसमें सहमति बनाना भारत के लिए आसान नहीं होगा । लेकिन दुनिया के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है, भारत ने धीरे-धीरे उसके प्रति अपना रवैया बदल दिया है ।
हर्ष वी. पंत

प्रगति मैदान में आई. आई. टी. एफ. १४ नवंम्बर से


प्रगति मैदान में १४ से २७ नवंबर तक लगने वाले इंडिया इंटरनैशनल ट्रेड फेयर में इस बार स्मोकिंग करना बैन होगा । यदि कोई व्यक्‍ति धुएं के छल्ले उड़ाता हुआ पाया जाता है तो उसे मेले से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा । इसके अलावा पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकेगा । इस बार मेले के समय में भी बदलाव किए गए हैं ।
इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन (आईटीपीओ) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ट्रेड फेयर के दौरान प्रगति मैदान नो स्मोकिंग जोन होगा । चाहे कोई प्रगति मैदान का अधिकारी या कर्मचारी हो, दुकानदार हो या फिर दर्शक किसी को भी स्मोकिंग करने की अनुमति नहीं होगी । ऐसा करने पर उसे प्रगति मैदान से बाहर कर दिया जाएगा । स्मोकिंग करने वालों की देखभाल के लिए अलग से टीम बनाई जाएगी और सीसीटीवी कैमरों की मदद से भी ऐसे लोगों को पकड़ा जाएगा । मेले में पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल भी बैन होगा । शामिल होने वाली सभी कंपनियों, दुकानदारों और देशों को इस बारे में जानकारी दे दी गई है । आईटीपीओ का कहना है कि वह इस बार ग्रीन फेयर आयोजित करना चाहते हैं । इसलिए मेले में ऐसी चीजों पर रोक लगाई जा रही है जिससे पर्यावरण और लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ता हो ।
अधिकारी ने बताया कि इस बार ट्रेड फेयर में शुरू के पांच दिन ही बिजनेस विजिटर्स की एंट्री होगी । आम दर्शकों के लिए मेला १९ नवंबर से खुलेगा । ऐसा इसलिए किया गया है ताकि कंपनियां आसानी से बिजनेस कर सकें । उम्मीद है, इससे बिजनेस में इजाफा होगा । पिछले साल शुरू के दो दिन ही बिजनेस विजिटर्स के लिए रिजर्व थे । अधिकारी के मुताबिक इस बार मेले के समय में भी बदलाव किया गया है । पहले ट्रेड फेयर का समय सुबह १० से रात ८ बजे तक होता था, जो अब सुबह ९ः३० से शाम ७ः३० बजे तक का रहेगा । ऐसा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किया है ।
इस बार मेले की थीम एक्सपोर्ट ऑफ सर्विसेज होगी । पार्टनर कंट्री थाइलैंड और फोकस कंट्री चीन होगा । पार्टनर स्टेट दिल्ली एवं फोकस स्टेट उत्तराखंड होगा इसके अलावा क्यूबा, नाइजीरिया और पापुआ न्यू गिनी जैसे देश पहली बार ट्रेड फेयर में शामिल होंगे ।