रविवार, 6 दिसंबर 2009

अपना देश बचा लो आज

भारत सरकार और माफिया में क्या अंतर है? भारत सरकार को कानूनी मोहर (अधिकार) है जबकि माफिया को कानूनी अधिकार नहीं है । आज माफिया सरकार चला रही है । भारत में झूठ बोलकर वोट ले लेने को राजनीति कहते हैं जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है । वहाँ पार्टी के घोषणा पत्र पर पूर्णतः अमल करना पड़ता है । इस समस्या के समाधान के लिए “राइट टू रिकॉल” अर्थात जनता को अपने प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार मिलने चाहिए । गवाहों की सुरक्षा की योजना बने । जाति और धर्म आरक्षण का आधार नहीं होना चाहिए बल्कि यह आर्थिक आधार पर तय होना चाहिए ।
कुछ लोग हमेशा विरूद्ध मत में होते हैं । वे बहस करते रहे हैं कि अंडा पहले आया या मुर्गी, गाय दूध देती है या हम दूध लेते हैं । जब तक वर्षा के जल को संरक्षित नहीं किया जाएगा तब तक पानी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है । भ्रष्टाचार का कारण जरूरत है या लालच? आप खाली पेट में उसूल नहीं सिखा सकते । टैक्स परिसीमन को भी बदलना होगा । १० करोड़ बच्चों को विद्यालय भेजना हो तो संसद को बंद कर देना चाहिए । क्योंकि संसद में जूतमपैजार, आरोप प्रत्यारोप के सिवा देश की मूलभूत आवश्यकताओं के निदान पर क्या काम होता है? भारी भरकम योजना मंत्रालय और संपूर्ण सरकारी तंत्र के बावजूद मँहगाई जिस हिसाब से बढ़ी है उससे अमीर और ज्यादा अमीर हो गए और गरीब ठीक उसी तरह और अधिक गरीब हो गए । संपूर्ण सरकारी आँकड़ा झूठ का पुलिंदा के सिवाय और क्या है? रोजगारपरक विद्यालय अत्यधिक संख्या में खोले जाने चाहिए, वह तो खुल नहीं रहे अस्पताल और पेय जल की उपलब्धता के लिए कारगर उपाय के बजाय सारी मशीनरी “कॉमनवेल्थ गेम” पर केंद्रित हो गई है । यह कैसा मजाक है? ९०% किसान कोर्ट-कचहरी में धक्‍के खा रहे हैं । इसके निदान हेतु चकबंदी कराना अनिवार्य हो । आज साढ़े तीन करोड़ केस विचारधीन हैं जिसकी सुनवाई में १२४ साल लगेंगे । इस समस्या के निदान के लिए कोर्ट कचहरी तीन शिफ्ट में क्यों नहीं चलाई जाती है? सेवानिवृत न्यायाधीशों को वापस बुलाकर एवं ऑनरेरी मजिस्ट्रेट की नियुक्‍ति कर त्वरित न्याय दिया जा सकता है । समय पर न्याय ना मिलना अन्याय नहीं तो और क्या है? आज हर कोई अलग राज्य की माँग कर रहा है । राज्य अलग करने के बजाय वे सर्वांगीण विकास की माँग क्यों नहीं करते? जब इस देश के हर नागरिक को कहीं भी रहने और काम करने का अधिकार प्राप्त है, कोई भी भाषा, कोई भी धर्म अपनाने का अधिकार प्राप्त है, फिर जाति और भाषा के नाम पर नंगा नाच क्यों हो रहा है? इस नंगे नाच को शह कौन दे रहा है? ऐसे तत्वों की मंशा क्या देश की एकता और अखंडता के लिए घातक नहीं है?वोट बैंक तुच्छ राजनीति के कारण अपराधियों को पैरोल पर छोड़ दिया जाने हेतु दिल्ली सरकार अनुशंसा करती है । महाराष्ट्र विधानसभा में मनसे विधायकों द्वारा सपा विधायक अबू आजमी के साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है । यह संपूर्ण हिंदी समाज पर हमला है और देर सबेर इस हमले का जवाब उपद्रवी तत्वों को जरूर मिलेगा क्योंकि समय का चक्र घूमता रहता है । शांत रहने का मतलब यह नहीं कि हम चुप हैं । हम अपनी ताकत इकट्‌ठी कर रहे हैं, उन हमलावरों के माकूल जवाब देने हेतु ।
राजस्थान में गूजर और मीणा जाति समुदाय के वर्चस्व की लड़ाई से देश का कितना नुकसान हुआ यह आकलन क्या किसी ने किया है? आज हर किसी को आरक्षण चाहिए क्यों? यदि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे, सबों को अपना हम मिलता रहे तो फिर आरक्षण की कोई जरूरत ही नहीं होगी, पर अभी भी जातीय वैमनस्यता, छूआछूत तथा विषमताएँ पूर्णतः दूर नहीं हुई हैं और जब तक इसका समाधान ढूँढा नहीं जाएगा विद्रोह घटने के बजाय और बढ़ेगा ।
भारत पहला ऐसा देश है जो समस्याओं का समाधान नहीं निकाल रहा है । अंतरराष्ट्रीय प्रेरक शिव खेड़ा ठीक ही कहते हैं- “यदि आप समस्या का समाधान नहीं कर सकते तो आप अपने आपमें समस्या हैं । मान लीजिए सरकार यदि यह निर्णय कर ले कि कोई बिल्डिंग नहीं बनने देंगे जब तक “सौर ऊर्जा” प्रणाली न अपना ले । तो फिर बिजली समस्या का खुद ही समाधान मिल जाएगा । आजादी के ६२ वर्ष के बाद भी राजधानी दिल्ली में बिजली, पानी सुरक्षा सुविधा कारगर नहीं है । मंदिरों में चुन्‍नियाँ चढ़ाते हैं बाहर चुन्‍नियाँ उतारते हैं । पारदर्शिता लाने एवं भ्रष्टाचार खत्म करने हेतु RTI एक्ट को और अधिक सशक्‍त करने की जरूरत है क्योंकि विभिन्‍न क्षेत्रों से अभी भी यह सूचना आ रही है कि इस पर पूर्ण रूपेण अमल नहीं किया जा रहा है । अधिकारी गैर जिम्मेदाराना रवैया अपना रहे हैं । कहीं-कहीं तो RTI द्वारा पूछे गए प्रश्नों के सही जवाब भी नहीं दिए जा रहे हैं ।
आज उनलोगों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए जो बेईमान हों, भष्टाचारी हों, आततायी हों । हर कोई कहता है कि भगत सिंह, सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद और खुद्‌दीराम बोस पैदा हों, पर हमारे घर नहीं । यह कैसी मानसिकता है? ज्यादातर लोग तो’ स्वयं के साथ भी अन्याय होने पर प्रतिकार करने के बजाय अन्य कंधों को ढूँढने में रहते हैं । ऐसे लोग मेरे विचार से मुर्दे ही हैं, बेशक वे चलते-फिरते हों । ऐसे लोग एवं ऐसी मानसिकता की बदौलत कभी क्रांति नहीं आ सकती । क्रांति मात्र उन धारा के विपरीत चलने वाले लोगों के द्वारा ही आएगी जिसकी संख्या तो काफी कम है परन्तु नैतिकता आत्मबल और दृढ़निश्‍चय के मामले में वे काफी सबल हैं । किसी ने ठीक ही कहा था- “हमें खतरा नहीं है गोरे अंग्रेजों से खतरा तो हमें अपने काले अंग्रेजों से है जो हमीं जैसे लगते हैं, फर्क बताना मुश्‍किल है कि कौन गद्दार है । हमारे मूर्धन्य नेता रामविलास पासवान कहते हैं कि ३ करोड़ बांग्लादेशियों को नागरिकता दे दी जाय । क्या यह माँग उचित है, गौर से सोचिए और खत्म कर दीजिए ऐसे नेताओं की नेतागिरी को जो ऐसी गैरवाजिब और देशद्रोही बयानों के बदौलत अपनी नेतागिरी चमकाने में रहते हैं । दो धारा के लोग हैं- “सकारात्मक एवं नकारात्मक” । हमें सकारात्मकता की नीति को अपनाने हुए संयम एवं शालीनता के साथ नए कीर्तिमान स्थापित करने हेतु नए मापदंड स्थापित करने होंगे । आज नकली देशभक्‍तों की संख्या बढ़ गई है जबकि असली देशभक्‍तों का मानना है कि “जो देश को चाहिए वही हम करेंगे । आजादी से जियो, जाति छोड़ो-भारत जोड़ो का नारा हमें अपनाना ही पड़ेगा । गोवा में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू है, ऐसा क्यों? सिंगापुर और इजराईल में हर परिवार के एक सदस्य का राष्ट्रीय रक्षा सेवा में जाना अनिवार्य है । यह सिद्धांत हमारे देश में क्यों नहीं लागू किया जाता है? कर प्रणाली के साथ-साथ चरित्र प्रणाली और एकल कानून प्रणाली का भी निर्धारण एवम्‌ अमल होना चाहिए । देश हर इंसान से ऊपर है । हर घरेलू कर्मचारियों के लिए पेंशन योजना हो जिसमें २०% नियोक्‍ता का और २०% कर्मचारियों के वेतन से कटे ।
देश के युवा पीढ़ी को इस संकल्प से राजनीति में आना चाहिए कि सरकार तोड़ देंगे मगर उसूल नहीं तोड़ेंगे । वैसे आज ज्यादातर युवा मन बना रहे हैं कि “हमें अब उतरना ही पड़ेगा । ”


प्रस्तुत विषयवस्तु एक प्रमुख कवि गर्गऋषि शान्तनु की कविता ‘सोचेगा कौन’ ने स्पष्ट रूप से झलती हैं-

भीड़वाले हम अबतक.. झरना नीचे पानी पिये,
चन्द तुम- ऊपर - तब से :
मन्दिर.. पाठागार.. विद्यालय जलाते आए !
अब देश के लिए- बताओ- कौन सोचेगा?
विदेशी या विदेशिनी.. फिर.. नाना या नानी?


-गोपाल प्रसाद

देश का दुर्भाग्य (26/11)

शायद किसी ने यह उम्मीद न किया हो कि एक तरफ हमारा देश प्रगति कर रहा है, नई ऊँचाईयों को छू रहा हैं । वही दूसरी तरफ एक निहायत ही कमजोर एवं लाचार होता जा रहा है, और हम इसके रखवाले, दिन व दिन अपंग होते जा रहे है । अगर ऐसा नही होता तो हर साल, हर महीने हम ऐसी घटनाओं के शिकार नहीं होते आज २६/११ के वर्षगांठ पर पूरा देश भावमीनी श्रद्धांजली दे रहा है । तो कोई उन शहीदों को पुष्पमाल्यार्पण कर रहा है । मैं पूछता हूँ कि क्या यह भावभीनी श्रद्धांजली, और उनकी याद में २ मिनट का मौन काफी है । उनके लिये या इस देश के लिए जिसका हदय बार-बार विद्रोहियों के द्वारा ब्यथित हो रहा हो । यह देश का दुर्भाग्य नही तो क्या है, यहाँ के रहने वालों के लिए शर्म की बात नहीं तो क्या है? यह एक ऐसा कलंक है जो मिटाये नही मिटने वाला है ।
कुछ लोगों को श्रद्धांजली फिल्म बनाने से है, वो सोचते हैं कि हम फिल्मों के माध्यम से, रेडियों के माध्यम से यहाँ के लोगों को बदलेंगे, उनके सोच को बदलेंगे, लेकिन ऐसा होना, एक ऐसे स्वप्न की तरह है, जो शायद ही पूरा हो सके । क्योंकि बदलती तो वो चीजे हैं, जिसमें चेतना हो परन्तु दुर्भाग्यवश सारे चेत होते भी अचेत है । हम इसे ऐसे याद कर रहे, ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं, जैसे बहुत ही गर्व की बात हो । वो हमें बार-बार कभी २६/११ का तो कभी १९९३ बम-ब्लास्ट, तो कभी काशी संकटमोचन के रूप में चुनौती दे जाते है, और हम उसे राजनीतिक फायदे मे तब्दील करते जा रहे है । इसे हम क्या कहेंगे । कहावत है, कि अपने घर में कुत्ता भी शेर होता है, लेकिन हम अपने को कहते शेर है, और हालत कुत्ते से बदत्तर है । कोई भी घटना होती है, चाहे वह रेल दुघर्टना हो, बस दुर्घटना हो, या बहुत बड़ी शाजिश के तहत देश पर हमला ही क्यों न हो, हम उसे दूसरे देश के द्वारा साजिश का नाम दे, अपना पिछा छुड़ा लेते है । हम किसी व्यक्‍ति या देश के खिलाफ पुख्ता सबूत होने के बावजूद कार्यवाही क्यों नहीं करते । क्यों दूसरे देशों के भरोसे रह जाते हैं । शायद इसलिये की हमारे पास धन नहीं है, शायद इसलिए की हमारे पास सैन्य बल का अभाव, और शायद इसलिए कि हमारे पास तकनीकी की कमी है । .... नहीं है, तो है, सिर्फ और सिर्फ सत्ता लौलुपता की और आत्मविश्‍वास की - अगर ऐसा नहीं होता तो, संसद भवन हमले के बाद यह २६/११ नहीं होता, और कदापि नही होता- इन सारी घटनाओ से हम सिर्फ अपने-आप को निकम्मे, कमजोर और लालची, बेईमान, मतलबी, साबित कर सकते है । हमारे लिए ऐसी घटनाये कोई माइने नहीं रखती इसे सिद्ध करने की किसी को जरूरत नही है, क्योंकि वे खुद ही गवाह है, अपने गुनाहों की-
मैं पूछना चाहता हूँ, हर उस आदमी से जो थोड़ा भी अपने आप को वफादार या देश और समाज के प्रति जिम्मेदार समझता हो । अगर कोई आपके परिवार या आप पर जानलेवा हमला करता है, तो..
क्या वह दूसरे से या पड़ोसी से सहायता लेने के बाद अपनी रक्षा करेगा ?
क्या वह पहले पंचायत बुलायेगा और फिर वह निर्णय लेगा कि उसे क्या करना चाहिये?-
मेरा मानना है, कि नही कोई भी कानून कोई भी धर्म उसे अपनी रक्षा एवं परिवार की रक्षा करने की स्वीकृति अवश्य देगा-

मेरे लिखने का मकसद किसी को श्रद्धांसुमन अर्पित करना नहीं है, किसी देशभक्‍त को जो हमारी रक्षा के लिए अपने आप को नष्ट कर दिया उसके लिये उसकी श्रद्धांजली में उसे याद करना और फिर उसको राजनीतिक हवा देना नही है ।
“हमारा मकसद है, कि आप, हम सभी दृढ़ प्रतिज्ञ हो उनके बलिदानों की कीमत की वापसी की - जिस दिन हम,आप दृढ़ प्रतिज्ञ हो जायेंगे, फिर न कोई २६/११ होगा ओर ना ही ऐसी वर्षगांठ आयेंगी - ”
किसी भी देश का भाग्य एवं दुर्भाग्य बनाते बिगाड़ते है, वहां के लोग । इतनी जनसंख्या के बावजूद हम इसे दुर्भाग्य के अलावा कुछ नहीं दे पा रहे है । क्योंकि हम अपना आकलन करने में असमर्थ है ! हमारे वर्त्तमान प्रधानमंत्री श्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने आप के बारे में बताया कि वह एक कमजोर प्रधानमंत्री नही है बल्कि वह एक शक्‍तिशाली और बहुत ही प्रभावशाली व्यक्‍तित्व वाले प्रधानमंत्री है । जिसका आकलन पूरे भारतवासी तो क्या वो हमलावरी भी कर चुके है । उन्होंने अपने आप को शक्‍तिशाली इसलिये बताया क्योंकि वे दोबारा सत्ता में वापस आये । उन्होंने यह नही कहा कि मैं एकमात्र ऐसा प्रधानमंत्री हूँ, जिसके समय में हजारों औरते विधवा हुई, जिनके कार्यकाल में हजारों बच्चे यतीम हुये, आखिरकार अफजल गुरू ने जिसे कमजोर और लाचार सरकार बताया ।

हमारे बीच ऐसे हजारों सवाल जेहन में समय-समय पर अवश्य कोसेंगे जिसका दर्द हम शायद सहन कर सके ।
मैं इतना अवश्य कहुंगा अपने नौजवान दोस्तों से कि हम बदलेंगे इसकी तख्दीर क्योंकि हर व्यक्‍ति बदलना चाहता है, और एक बार हम अपनी ताकत का आकलन कर ले तो हर चीज बदल सकती है, क्योंकि -
सारी शक्‍तियाँ हम मे ही समाहित है,
और हम कुछ भी कर सकते है, कुछ भी
अगर हम अपनी कमजोरियों को भूलाकर
एक नई चेतना के साथ एक नये जोश
के साथ शुरूआत करे तो-
अगर वास्तव में हम इसे रोकना चाहते है, तो हमें अपनी सोच को बदलना होगा। हमें खुद को बदलना होगा, और सच्चे मन से अपने-आप के प्रति वफादार होना पड़ेगा ।

लगे इस देश की ही अर्थ मेरे धर्म विधा धन,
करू मैं प्राण तक अर्पण यही प्रण सत्य है, ठाना ।
नहीं कुछ गैर मुमकिन है, जो चाहो दिल से तुम,
उठा लो देश हाथों पर न समझो अपना बेगाना ॥
-मुकेश कुमार पाण्डेय

मेरा दिल है बड़ा उदास

मेरा दिल है बड़ा उदास

आओ पापा मेरे पास
मेरा दिल है बड़ा उदास
मम्मी की भी याद सताती
भैया को मैं भूल न पाती ।

तुमसे मैं कुछ न मागूँगी
पढ़ने में प्रथम आऊँगी
रखो मुझको अपने पास
मेरा दिल है बड़ा उदास ।

नहीं सहेली संग खेलूँगी
गुड़िया को भी बन्द कर दूँगी
बैठूंगी भैया के पास
मेरा दिल है बड़ा उदास ।

जाओगे जब क्लब में आप
मम्मी को लेकर के साथ
रह लूँगी दादी के पास
मेरा दिल है बड़ा उदास ।

नहीं चाहिये बिस्किट टॉफी
नहीं चाहिये मुझको फ्रॉक
मम्मी पापा मुझे चाहिये
मेरा दिल है बड़ा उदास ।

राजा रानी के किस्से
भगवान की प्यारी बात
दादी हमको रोज सुनाती
आती मुझको उनकी याद ।

बुआ से चोटी करवाना
चाचा के संग बाजार जाना
जिद नहीं मैं कभी करूँगी
पापा मुझको घर ले जाना ।

कहना मान्‌, दूध पीऊँगी
घर की छत पर नहीं चढूँगी
घर ले जाओ मुझको पापा
हॉस्टल में मैं नही पढूँगी ।

- डॉ. ए. कीर्तिवर्द्धन

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया । इसने प्रशासन में बढ़ते भ्रष्टाचार की ओर संकेत किया था । इंदिरा गाँधी के समय में भ्रष्टाचार राजनीति में गहरी पैठ जमा चुकी थी । १९८० में “कुंआ तेल-कांड” १९८२ ,में “अंतुले प्रकरण कांड” १९८२ में ही “चुरहट लॉटरी कांड” प्रमुख है ।
१९८७ में हुए ‘बोर्फोस कांड’ ने तो राजीव गाँधी की कुर्सी हिलाकर रख दी थी । राजीव गाँधी को एक सार्वजनिक सभा में कहने के लिए विवश होना पड़ा कि “विकास कार्यों के मद में खर्च होने वाली राशि का मात्र १५ फीसदी हिस्सा ही सही व्यक्‍ति तक पहुँच पाता है । आज कई मामले ऐसे हैं जो न्यायालय में लंबित हैं या चल रहे हैं जिनमें झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का नोट के बदले वोट का मामला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का चारा घोटाला मामला (९९० करोड़) उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मायावती का ताजकेरीडोर घोटाला ( १७५ करोड़) प्रमुख है । इसके अलावा पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर ७८ करोड़, पंजाब के ही मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह पर १५०० करोड़ केन्द्रीय दूरसंचार मंत्री ए राजा पर २०० करोड़ के घोटाले चल रहे हैं । इन घोटाले में तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता भी शामिल हैं । सुप्रीम कोर्ट के फटकार के बाद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का मामला आगे नहीं बढ़ रहा है ।
पैसे लेकर सवाल पूछने पर कई नेता सामने आ चुके हैं । संसद भवन में नोट के बदले वोट के लिए पैसों की गड्डियां लहराई जाती हैं पर पता नहीं चल पाता है कि यह पैसा कहां से आया है । घोटाले का मुख्य स्रोत सरकारी खजाना है जिसे राजनेता प्रशासनिक अफसरों की मिली भगत से लुटाते हैं । हमारा संविधान इतना लचीला है कि एक तरफ सरकारी कर्मचारी पर आरोप लगते ही उसे निलंबित कर दिया जाता है दूसरी तरफ राजनेता आराम से अपने पद पर बने होते हैं । आखिर यह दो नीति क्यों?
- नवीन कुमार

[हमारा संविधान इतना लचीला है कि एक तरफ सरकारी कर्मचारी पर आरोप लगते ही उसे निलंबित कर दिया जाता है दूसरी तरफ राजनेता आराम से अपने पद पर बने होते हैं । ]

सत्य अहिंसा का नहीं, बल्कि घोटालों का देश बन गया बापू का भारत

झारखंड जैसे पिछड़े प्रदेश में वहाँ के मुख्यमंत्री ने ही इतना बड़ा घोटाला किया, यकीन करना मुश्किल लगता है, लेकिन ये है सच । मधू कोड़ा, जी हाँ ये वही मधू कोड़ा हैं जो एक छोटे से गरीब परिवार से आते हैं और काफी संघर्ष करते हुए उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री पद को हथिया लिया । मधू कोड़ा आदिवासी परिवार में आते हैं । इन्होंने अपने जिंदगी में इतने संघर्ष किये कि जिसके कारण इन्होंने शादी भी मुख्यमंत्री बन जाने के बाद की ।
मधू कोड़ा और उनके साथियों ने मिलकर कोड़ा शासनकाल के दौरान झारखंड में करोड़ों डॉलर का घोटला किया । इस घोटाले की रकम तकरीबन ४००० करोड़ आंकी जा रही है । भारत एक विकासशील देश है, और यहाँ एक मुख्यमंत्री अपने शासनकाल के दौरान लाख-पचास नहीं ४००० करोड़ का घोटाला कर जाता है । जिस देश में आधी से ज्यादा आबादी एक वक्‍त भूखे पेट सोती है, उस देश की ऐसी हालत चिंताजनक ही नहीं विचारणीय है ।
कोड़ा और उसके साथियों ने मिलकर करोड़ों का वारा न्यारा किया । इनके तार दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों- लाओस, वियतनाम, थाईलैण्ड आदि से लेकर यूरोप, अमेरिका तक फैले थे । खाड़ी के देश भी इसमें शामिल हैं । इन्होंने थाईलैण्ड आदि देशों की करोड़ों की जमीनें खरीदी एवं वहाँ पर उद्योग लगाए और निवेश किया, ये सारे कार्यकलाप गैरकानूनी ढंग से बनाए गये पैसों से किया गया, जिससे देश को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा । इस खबर के प्रकाश में आने के बाद प्रशासन तो हरकत में आती है, लेकिन सी आई डी जाँच, सीबीआई जाँच, ये सभी चीजें अब इस देश में मात्र औपचारिकता ही लगती है । अगर हम थोड़ी देर के लिए भूतकाल में जाएं तो हमें पता चलेगा कि करीब एक दर्जन से अधिक घोटाले इस गरीब देश ने झेले हैं । एक से एक बड़े नाम इन घोटालों में शामिल हैं । घोटला लाख-करोड़ का नहीं अरबो-खरबों का रहा । किसने किया घोटाला- बड़े-बड़े नेताओं ने, अफसरों ने, अधिकारियों ने, ठेकेदारों ने । जब किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री ही घोटाले करने लगे तो फिर कानून-व्यवस्था, सुशासन और सरकार जैसी संस्थाओं से आम आदमी का विश्‍वास उठने लगता है ।
भारत में घोटाला होना कोई नई बात नहीं है । इस देश में अभी तक एक दर्जन से अधिक घोटाले हो चुके हैं । भारत में हुए घोटालों का एक संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है ः-
बोफोर्स घोटाला- इन घोटालों को १९८० के दशक में अंजाम दिया गया था । इसके मुख्य अभियुक्‍त राजीव गांधी थे । इस मामले भारत को १५५ एम एम के फिल्ड होविज्जर खरीदने थे । इस खरीदारी में मध्यस्थता करने वाला इटालियन नागरिक ओटावियो कवात्रोची एक बिजनसमैन था जो राजीव गांधी का करीबी माना जाता था । उसी ने डील फाइनल करवायी थी । यह करीब ६४० में सरकार की खूब किरकीरी हुयी थी । इस घोटाले के कारण १९८९ के आम चुनावों में राजीव गांधी की कुर्सी भी छिन गयी थी । ५ फरवरी २००४ को इस मामले में राजीव गांधी एवं अन्य पर घूस लेने के आरोप लगाये गये ।
चारा घोटाला- बिहार के दो मुख्यमंत्रियों द्वारा इस घोटाले को अंजाम दिया गया । लालू प्रसाद यादव और जगन्‍नाथ मिश्रा इस घोटाले के मुख्य अभियुक्‍त थे । इन घोटालों में ९५० करोड़ डकारे गये । इसमें सीबीआई जाँच भी हुयी । यह १९९६ में प्रकाश में आया था ।
टेलीकॉम घोटाला ः-
इस घोटाले को (हिमाचल प्रदेश) के तीन बार के सांसद एवं ५ बार विधायक रहे सुखराम के द्वारा अंजाम दिया गया । सुखराम पीवी नरसिंहा राव के कैबिनेट में दूरसंचार मंत्री थे । सीबीआई ने उनके कार्यालय से ३.६ करोड़ रू. बरामद किये थे । सन २००२ में उनपर लगे आरोप में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट ने ३ साल की कैद की सजा सुनाई ।
हवाला कांड ः-
१९९७-१९९८ के बीच एक सनसनीखेज घोटाला सामने आया था । हवाला घोटाला कांड । इस कांड में देश के बड़े-बड़े नेताओं, लाल कृष्ण आडवाणी, शरद यादव, माधवराव, सिधिंया बलराम जाखड़, मदनलाल खुराना, अजीत पांजा, मोती लाल वोरा, अर्जन सिंह, सरीखे नेताओं का नाम सामने आया था । इस घोटाले के बाद आतंकवादी संगठन हिज्बुल मुजाहिद्दीन से जुड़े पाये गये थे । यह तकरीबन १८ मिलियन अमेरिकी डॉलर का घोटाला था । इस घोटाले का पर्दाफाश करने में सीबीआई फेल हो गयी थी, जिससे उसकी काफी किरकिरी हुयी थी ।
बराक मिसाइल स्कैंडल -इसके मुख्य अभियुक्‍त थे समता पार्टी के आर-के जैन । इसमें जॉर्ज फर्नांडिस और जया जेटली के खिलाफ एफ आई आर दर्ज की गयी थी । इसमें भारत को १९९.५० मिलियन अमेरिकी डॉलर के ७ बराक सिस्टम और ६९.१३ मिलियन अमेरिकी डॉलर में २०० मिसाइल खरीदने थे । भारत सरकार ने २३ अक्‍टूबर २००० को इस कॉंट्रैक्ट पर साईन किया था । सन २००१ में तहलका के द्वारा यह मामला प्रकाश में आया था यह मामला अभी सीबीआई के अंडर में है । एक और तहलका मामला २००१में ही मैच फिक्सिंग पर आधारित है, और इसमें बड़े-बड़े क्रिकेटरों के नाम सामने आये थे ।
तेल के बदले अनाज घोटाला - नटवर सिंह इसके मुख्य अभियुक्‍त थे जो कि मनमोहन सिंह सरकार में विदेश मंत्री थे । इसमें इराक में संयुक्‍त राष्ट्र के द्वारा यह प्रावधान किया गया था कि इराक के लोगों की आमजनों की जरूरत की चीजों का निर्यात कर इराक से तेल खरीदें। इसी निर्यात में व्यापक पैमाने पर घोटाला किया गया जिसके बाद नटवर सिंह को इस्तीफा देना पड़ा ।
तेलगी घोटाला - नकली स्टांप पेपर बनाकर बेचने के आरोप में अब्दुल करीम तेलगी को कर्नाटक की पुलिस ने गिरफ्तार किया था । तेलगी अपने तीन सौ ऐजेंटों की सहायता से इस फर्जी कारगुजारी को अंजाम देता था । यह घोटाला तकरीबन २०२ करोड़ का था । इस मामले में तेलगी का नार्को टेस्ट लिया गया तो उसने शरद पवार, छगन भुजबल जैसे नेताओं का नाम भी लिया था । कोर्ट ने २८ जून २००७ को तेलगी को १३ साल की सजा सुनाई । बाद में उसे जेल में एच्‌आईवी पॉजीटीव पाये जाने पर दया दिखाते हुए छोड़ दिया गया ।
नोट के बदले वोट - २२ जुलाई २००८ को आप सबने संसद में देश की अस्मिता को तार-तार होते टीवी पर देखा होगा । जब बैग से ३०० मिलियन रू. के नगदी नोट सदन में बीजेपी के सांसद लहराते हुये क्रांग्रेस पर आरोप लगा रहे थे कि नोट के बदले विश्‍वास मत हासिल करने के लिए वोट मांगा जा रहा हैं । यह एक बहुत बड़ा सनसनीखेज मामला सामने आया था ।
सत्यम्‌ कंपनी घोटाला - ७००० करोड़ डकार गये बी रामलिंगम राजू तथा उनके परिवार वाले । सन २००१ से ही राजू और उसके परिवार वाले कंपनी से कैश निकाल रहे थे और बैलेंस सीट में फायदा दिखा रहे थे । इस मामले की जांच सीबीआई के साथ-साथ अमेरिका से आयी टीम ने भी किया । इस घोटाले से भारतीय बाजार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा और मंदी के दौरे में और मंदी हो गयी, और सारे शेयर धड़ाम से नीचे आ गिरे । सत्यम घोटला भारतीय व्यापरिक जगत के लिए एक बहुत बड़ा झटका था । इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय व्यापार के साख पर प्रश्नचिन्ह सा लग गया था ।
अंत में बात ये है कि आखिर इतने घोटाले हो कैसे जाते हैं, सरकार क्या करती रहती है । घोटाले होते हैं कभी और मुजरिम को सजा मिलती है १०-१२ साल के बाद । अगर हालात इसी तरह बदतर होते रहे तो एक दिन देश के हर आदमी के हाथ में एक कटोरा होगा और वह अपना पेट पालने के लिए भीख मांगता दिखेगा ।
- धनु कुमार मिश्रा

संविधान के मन्दिर में भारत के गरिमा पर थप्पड़

९ नवंम्बर को महाराष्ट्र विधान सभा में बारहवें सत्र की शुरूआत विधायकों के शपथग्रहण समारोह के साथ शुरू होनी थी । यही होता है, होता आया है, और होता रहेगा । परन्तु महाराष्ट्र विधानसभा में उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि गुंडई का नंगा नाच विधानसभा के भीतर किया गया । दर‍असल अबुआजमी जो कि सपा विधायक के तौर पर महाराष्ट्र विधानसभा में चुनकर आये थे, इन्होंने हिंदी में शपथ ग्रहण करना शुरू किया । अब संविधान द्वारा हमें अधिकार प्राप्त है कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जितनी भाषाएं हैं हम उन सब में शपथ ग्रहण कर सकते हैं, तो हिंदी तो हमारी राष्ट्रभाषा है, तो आजमी साहब ने हिंदी में शपथ लेना शुरू ही किया था कि राज ठाकरे की मंडली (४ विधायक) ने उनपर इस बात के लिए हमला बोल दिया कि, इसने विधासभा में हिंदी में शपथ लेना कैसे शुरू कर दिया ।
अगर हमें ठीक से याद है तो हम शायद हिंदुस्तान में ही रह रहे हैं और हिंदी में शपथ ग्रहण करना हमारा संवैधानिक अधिकार है, लेकिन शायद ये बातें अपना महत्व खो देती हैं, मनसे जैसी ओछी राजनीति करने वाली पार्टियों के आगे । आजमी को हिंदी में शपथ ग्रहण करने के कारण अपमानित तो होना ही पड़ा साथ ही साथ उनका माईक तोड़ दिया गया और मनसे विधायक राम कदम के उन्हें एक थप्पड़ तक जड़ दिया । राम कदम के साथ उसके चरित्रहीन साथियों ने मिलकर आजमी की बीच विधानसभा में जो तौहीन की वो भारत जैसे महान देश की संप्रभुतापर चोट है । जब संविधान ने हमें अधिकार दिये हैं तो हम संविधान द्वारा स्वीकृत २२ में से किसी भी भाषा में शपथ ग्रहण करने के अधिकारी हैं ।
राज ठाकरे और उनकी मनसे पार्टी भारतीय राजनीति की परिभाषा को बदलने की ओर अग्रसर है । संविधान को चुनौती देते हुए उनके और उनकी पार्टी के लोगों के कृत्य दिनों-दिन घटिया से घटिया स्तर तक जा पहुँचे हैं । देश को भाषाई आधार पर तोड़ने के प्रयास किये जा रहे हैं । मनसे ने पिछले कई सालों से नाक में दम कर रखा है । सवाल उठता है एक राज ठाकरे जो कभी सदी के महान अभिनेता अमिताभ बच्चन को धमका देते हैं तो, कभी उनकी पत्‍नी जया बच्चन को “गुड़िया अब बुढ़िया हो गयी है, इसलिए इलाहाबाद चली जा” कहकर उनका भारी अपमान कर देते हैं, कभी बिहार और उत्तर-प्रदेश जैसे देश के दो बड़े राज्यों के लोगों को परीक्षा देने आने पर भगा- भगा कर महाराष्ट्र से भगा देता है, कभी बिहार (आबादी ८.५० करोड़ के करीब) उत्तर प्रदेश (आबादी १७ करोड़ के करीब) के लोगों को एक बिहारी सौ बिमारी कहकर चिढ़ाया है । इन राज्यों के लोगों पर हमले करवाते हैं, आखिर ये है कौन? ये कौन है जो एक व्यापक जनसमूह रखने वाले प्रदेश के लोगों को इस तरह से अपमानित करता रहता है । ये कोई नहीं है, बस एक छोटी सी क्षेत्रीय पार्टी का छोटा सा नेता है । फिर करन जौहर, अमिताभ बच्चन, राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता उसके आगे नतमस्तक कैसे हो जाते हैं? क्योंकि इनमें दृढ़ इच्छाशक्‍ति की कमी होती है । इन्हें याद रखना चाहिए कि कोई भी जन्मजात आतातायी नहीं है, बल्कि हम उसे शह देकर ऐसा बनाते हैं ।
याद कीजिए २७ अक्टूबर का वो दिन जब एक २५ साल का पटना से आया युवक राज ठाकरे की इसी क्रिया-कलापों से परेशान होकर उसे अपने ढंग से समझाने मुंबई आया था लेकिन पुलिस ने उसे बस में ही गोलियों से भून दिया । पूरे देश में इस घटना के घटने के आस-पास ही दिवाली मनाई जाने वाली थी, देशवासियों ने मनाया भी, लेकिन पटना में जहाँ वह लड़का रहता था उस जगह पर उस पावन घड़ी में श्राद्ध क्रियाओं जैसे वातावरण का आवरण चढ़ा हुआ था । आखिर क्यों? इतनी सस्ती लोकप्रियता हासिल कर के कोई क्या कर लेगा । राज ठाकरे को समझाना चाहिए कि इकबाल ने अपने गीत में लिखा है हिंदी है हम वतन हैं हिंदुस्तान हमारा । सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा । आखिर क्यों हमारा हिदुंस्तान सारे जहाँ से अच्छा है? क्योंकि हिंदुस्तान में वो कटुता और आपसी तकरार नहीं है जो दूसरे देशों में होती है । आखिर हम सभी भारतवासी चाहें पूर्व हो पश्‍चिम हो, उत्तर हो, दक्षिण हो, एक ही तो हैं आपस में फिर ये हिंदी-मराठी आपसी तकरार क्यों । क्या ये थप्पड़ सिर्फ अबु आजमी पर था या भारत की गरिमा, उसके सम्मान उसके इतिहास पर था । हम भारत को माँ कहते हैं क्या ये माँ का अपमान नहीं था ।

धनु मिश्रा

सेक्स में ध्यान रखें सेफ्टी का

एक गोली ने औरतों की दुनिया बदल दी। कॉन्ट्रासेप्टिव पिल के आने के बाद महिला‌एं महज बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं रह ग‌ईं , बल्कि वे खुद से फैसला करने लगीं कि उन्हें मां कब बनना है। इस रिवोल्यूशन का अगला स्टेप था इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल , जिसे एहतियात बरते बिना सेक्स करने के फौरन बाद खा लेने से गर्भ ठहरने की आशंका नहीं रहती। मगर इस गोली की वजह से महिला‌ओं का भला ही नहीं , बुरा भी हो रहा है। इन गोलियों के अंधाधुंध इस्तेमाल की वजह से होने वाली दिक्कतों और प्रेग्नेंसी रोकने और फैमिली प्लानिंग के दूसरों तरीकों पर तमाम एक्सर्पट्स से बात के बाद जो जानकारी हमने इकट्ठा की , उसके अनुसार ...

क्या होती है इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल

अनसेफ सेक्स के बाद प्रेग्नेंसी रोकने के लि‌ए खा‌ई जाने वाली गोली। इस गोली में दो - तीन तरह के हॉर्मोंस की हेवी डोज होती है। ये हॉर्मोन हैं - इस्ट्रजन और प्रजेस्टिन। कुछ गोलियों में इन दोनों का कॉम्बिनेशन होता है तो कुछ में इनके साथ एंटीप्रजेस्टिन भी होता है। मार्केट में मिल रही कुछ पॉपुलर इमरजेंसी पिल आ‌ईपिल और पिल -72 हैं। दावा किया जाता है कि अगर इन दवा‌ओं को अनसेफ सेक्स के 72 घंटे के अंदर खा लिया जा‌ए तो प्रेग्नेंट होने की संभावना नहीं रहती।

कैसे करती है काम

इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल यूटरस ( गर्भाशय ) की अंदरूनी सतह पर असर करती है। इस सतह या इनर ला‌इनिंग को एंडोमीट्रियम कहते हैं। पिल में मौजूद हॉर्मोंस की वजह से इसमें कुछ फिजिकल और बायोकेमिकल चेंज होते हैं। जब एक एग फर्टिला‌इज होता है , तो उसे खुद को इंप्लांट करना होता है , जो पिल से आ‌ए बदलावों की वजह से मुमकिन नहीं हो पाता।

इसके अलावा हॉर्मोन वेजा‌इना के अंदरूनी हिस्से सर्विक्स ( यही हिस्सा वेजा‌इना को यूटरस से जोड़ता है ) में रिसने वाले फ्लु‌इड ( सर्वा‌इकल म्यूकस ) को गाढ़ा कर देते हैं। इस म्यूकस के गाढ़ा होने की वजह से वेजा‌इना के अंदर स्पर्म आसानी से ट्रांसपोर्ट नहीं कर पाते हैं और गर्भ ठहरने की संभावना कम हो जाती है।

ताजमहल...........

बी.बी.सी. कहता है...........
ताजमहल...........
एक छुपा हु‌आ सत्य..........
कभी मत कहो कि.........
यह एक मकबरा है..........


ताजमहल का आकाशीय दृश्य......




आतंरिक पानी का कुंवा............

ताजमहल और गुम्बद के सामने का दृश्य
गुम्बद और शिखर के पास का दृश्य.....

शिखर के ठीक पास का दृश्य.........
आँगन में शिखर के छायाचित्र कि बनावट.....

प्रवेश द्वार पर बने लाल कमल........
ताज के पिछले हिस्से का दृश्य और बा‌इस कमरों का समूह........
पीछे की खिड़कियाँ और बंद दरवाजों का दृश्य........
विशेषतः वैदिक शैली मे निर्मित गलियारा.....
मकबरे के पास संगीतालय........एक विरोधाभास.........

ऊपरी तल पर स्थित एक बंद कमरा.........


निचले तल पर स्थित संगमरमरी कमरों का समूह.........

दीवारों पर बने हु‌ए फूल......जिनमे छुपा हु‌आ है ओम् ( ॐ ) ....

निचले तल पर जाने के लि‌ए सीढियां........

कमरों के मध्य 300फीट लंबा गलियारा..
निचले तल के२२गुप्त कमरों मे से‌एककमरा...
२२ गुप्त कमरों में से एक कमरे का आतंरिक दृश्य.......


अन्य बंद कमरों में से एक आतंरिक दृश्य..
एक बंद कमरे की वैदिक शैली में
निर्मित छत......

ईंटों से बंद किया गया विशाल रोशनदान .....


दरवाजों में लगी गुप्त दीवार,जिससे अन्य कमरों का सम्पर्क था.....

बहुत से साक्ष्यों को छुपाने के लि‌ए,गुप्त ईंटों से बंद किया गया दरवाजा......


बुरहानपुर मध्य प्रदेश मे स्थित महल जहाँ मुमताज-उल-ज़मानी कि मृत्यु हु‌ई थी.......


बादशाह नामा के अनुसार,, इस स्थान पर मुमताज को दफनाया गया.........



अब कृपया इसे पढ़ें .........

प्रो.पी. एन. ओक. को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि........

"ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था"

प्रो.ओक. अपनी पुस्तक "TAJ MAHAL - THE TRUE STORY" द्वारा इस
बात में विश्वास रखते हैं कि,--

सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने बनवाया था.....


ओक कहते हैं कि......

ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर,एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है जिसे तब तेजो महालय कहा जाता था.


अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहाँ ने जयपुर के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था,,

=>शाहजहाँ के दरबारी लेखक "मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी "ने अपने "बादशाहनामा" में मुग़ल शासक बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से ज़्यादा पृष्ठों मे लिखा है,,जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि, शाहजहाँ की बेगम मुमताज-उल-ज़मानी जिसे मृत्यु के बाद, बुरहानपुर मध्य प्रदेश में अस्था‌ई तौर पर दफना दिया गया था और इसके ०६ माह बाद,तारीख़ 15 ज़मदी-उल- अ‌उवल दिन शुक्रवार,को अकबराबाद आगरा लाया गया फ़िर उसे महाराजा जयसिंह से लि‌ए ग‌ए,आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) मे पुनः दफनाया गया,लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे ,पर बादशाह के दबाव मे वह इसे देने के लि‌ए तैयार हो ग‌ए थे.

इस बात कि पुष्टि के लि‌ए यहाँ ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनो आदेश अभी तक रक्खे हु‌ए हैं जो शाहजहाँ द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लि‌ए राजा
जयसिंह को दि‌ए ग‌ए थे.......

=>यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम शासकों के समय प्रायः मृत दरबारियों और राजघरानों के लोगों को दफनाने के लि‌ए, छीनकर कब्जे में लि‌ए ग‌ए मंदिरों और भवनों का प्रयोग किया जाता था ,
उदाहरनार्थ हुमायूँ, अकबर, एतमा‌उददौला और सफदर जंग ऐसे ही भवनों मे दफनाये ग‌ए हैं ....

=>प्रो. ओक कि खोज ताजमहल के नाम से प्रारम्भ होती है---------

="महल" शब्द, अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में
भवनों के लि‌ए प्रयोग नही किया जाता...
यहाँ यह व्याख्या करना कि महल शब्द मुमताज महल से लिया गया है......वह कम से कम दो प्रकार से तर्कहीन है---------

पहला -----शाहजहाँ कि पत्नी का नाम मुमताज महल कभी नही था,,,बल्कि उसका नाम मुमताज-उल-ज़मानी था ...

और दूसरा-----किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के लि‌ए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज)का ही प्रयोग किया जा‌ए और प्रथम अर्ध भाग (मुम) को छोड़ दिया जा‌ए,,,यह समझ से परे है...

प्रो.ओक दावा करते हैं कि,ताजमहल नाम तेजो महालय (भगवान शिव का महल) का बिगड़ा हु‌आ संस्करण है, साथ ही साथ ओक कहते हैं कि----
मुमताज और शाहजहाँ कि प्रेम कहानी,चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ा‌ई से स्वयं गढ़ी ग‌ई कोरी अफवाह मात्र है क्योंकि शाहजहाँ के समय का कम से कम एक शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की पुष्टि नही करता है.....



इसके अतिरिक्त बहुत से प्रमाण ओक के कथन का प्रत्यक्षतः समर्थन कर रहे हैं......
तेजो महालय (ताजमहल) मुग़ल बादशाह के युग से पहले बना था और यह भगवान् शिव को समर्पित था तथा आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था-----

==>न्यूयार्क के पुरातत्वविद प्रो. मर्विन मिलर ने ताज के यमुना की तरफ़ के दरवाजे की लकड़ी की कार्बन डेटिंग के आधार पर 1985 में यह सिद्ध किया कि यह दरवाजा सन् 1359 के आसपास अर्थात् शाहजहाँ के काल से लगभग 300 वर्ष पुराना है...


==>मुमताज कि मृत्यु जिस वर्ष (1631) में हु‌ई थी उसी वर्ष के अंग्रेज भ्रमण कर्ता पीटर मुंडी का लेख भी इसका समर्थन करता है कि ताजमहल मुग़ल बादशाह के पहले का एक अति महत्वपूर्ण भवन था......


==>यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज कि मृत्यु के 07 साल बाद) में आगरा भ्रमण किया और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांत का वर्णन किया,,परन्तु उसने ताज के बनने का को‌ई भी सन्दर्भ नही प्रस्तुत किया,जबकि भ्रांतियों मे यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण कार्य 1631 से 1651 तक जोर शोर से चल रहा था......


==>फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्नि‌अर एम.डी. जो औरंगजेब द्वारा गद्दीनशीन होने के समय भारत आया था और लगभग दस साल यहाँ रहा,के लिखित विवरण से पता चलता है कि,औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था.......

प्रो. ओक. बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी असंगता‌ओं को इंगित करते हैं जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि,ताजमहल विशाल मकबरा न होकर विशेषतः हिंदू शिव मन्दिर है.......

आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहाँ के काल से बंद पड़े हैं,जो आम जनता की पहुँच से परे हैं

प्रो. ओक., जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लि‌ए भगवान् शिव की मूर्ति,त्रिशूल,कलश और ॐ आदि वस्तु‌एं प्रयोग की जाती हैं.......

==>ताज महल के सम्बन्ध में यह आम किवदंत्ती प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूँद बूँद कर पानी टपकता रहता है,, यदि यह सत्य है तो पूरे विश्व मे किसी किभी कब्र पर बूँद बूँद कर पानी नही टपकाया जाता,जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में ही शिवलिंग पर बूँद बूँद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है,फ़िर ताजमहल (मकबरे) में बूँद बूँद कर पानी टपकाने का क्या मतलब....????



राजनीतिक भर्त्सना के डर से इंदिरा सरकार ने ओक की सभी पुस्तकें स्टोर्स से वापस ले लीं थीं और इन पुस्तकों के प्रथम संस्करण को छापने वाले संपादकों को भयंकर परिणाम भुगत लेने की धमकियां भी दी ग‌ईं थीं....


प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत या सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवा‌ए, और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे ....


ज़रा सोचिये....!!!!!!


कि यदि ओक का अनुसंधान पूर्णतयः सत्य है तो किसी देशी राजा के बनवा‌ए ग‌ए संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत,शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से एक भवन, "तेजो महालय" को बनवाने का श्रेय बाहर से आ‌ए मुग़ल बादशाह शाहजहाँ को क्यों......?????
तथा......

इससे जुड़ी तमाम यादों का सम्बन्ध मुमताज-उल-ज़मानी से क्यों........???????


आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से,,,,,,,,
रूहें लिपट के रोटी हैं हर खासों आम से.....
अपनों ने बुना था हमें,कुदरत के काम से,,,,

फ़िर भी यहाँ जिंदा हैं हम गैरों के नाम से......

वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमारा एक मात्र उद्देश्य है? आज जब धीरे धीरे सत्ता अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के हाथों में से फिसलती जा रही है, तो हम उनसे क्या क्या आशा रखें । सारी राजनैतिक पार्टियां अपने अपने तरीके से इतिहास को बदलने की कोशिश कर रही हैं, ये सभी कुछ इतना घटिया लग रहा है कि मेरे पास इनकी भर्त्सना करने के लिये शब्द नहीं हैं ।

पहले किसी बच्चे से पूछा जाता था कि बड़े होकर तुम क्या बनोगे तो उसका जवाब डाक्टर,इन्जीनियर,पायलट या कुछ और होता था, इसके पीछे पैसा नही होता था, बल्कि देशसेवा और समाज को आगे बढ़ाने का जज्बा होता था, आजकल बच्चा बोलता है कि मैं बड़ा होकर नेता बनना चाहता हूँ, क्योंकि इस पेशे में ज्यादा पैसा है, क्या शिक्षा सिर्फ जीवन में पैसे कमाने के लिये की जाती है? क्या हम बच्चों का मार्गदर्शन सही दिशा में कर रहे हैं । आजकल शिक्षा के मायने ही बदल गये हैं, क्योंकि हम लोगों के सोचने का तरीका ही बदल गया है, या बकौल कुछ लोगों के “हम लोग कुछ ज्यादा ही व्यावहारिक और स्वार्थी हो गये हैं”, हर बच्चा चाहता है कि जल्द से जल्द अपनी पढ़ा‌ई पूरी करे और किसी जगह पर फिट हो जाये, उसने क्या पढ़ा और कितना पढ़ा, उससे इसको मतलब नहीं है, या जो पढ़ा उसका जीवन मे कितना प्रयोग होगा, उससे भी इसको सारोकार नही है, उसको तो बस अपने शिक्षा के इन्वेस्टमेन्ट के रिटर्न से मतलब है, यानि कि शिक्षा और रोजगार, एक व्यापार हो गया है, पैसा लगा‌ओ और और पैसा पा‌ओ । अब बच्चों को ही क्यों दोष दें, उनके माता पिता भी तो इसी ला‌इन पर ही सोचते हैं, कि जल्दी से बच्चा पढ़-लिख ले तो पैसा कमाने की मशीन की तरह काम करे । क्या यही है शिक्षा का उद्देश्य? यदि यही है तो लानत है ऐसे उद्देश्यों पर ।

शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो हमारे जीवन को एक नयी विचारधारा,नया सवेरा देता है, ये हमे एक परिपक्व समाज बनाने में मदद करता है । यदि शिक्षा के उद्देश्य सही दिशा मे हों तो ये इन्सान को नये नये प्रयोग करने के लिये उत्साहित करते हैं । शिक्षा और संस्कार साथ साथ चलते हैं, या कहा जाये तो एक दूसरे के पूरक हैं । शिक्षा हमें संस्कारों को समझने और बदलती सामाजिक परिस्थियों के अनुरूप उनका अनुसरण करने की समझ देता है । आज शिक्षा जिस मुकाम पर पहुँच चुकी है वहाँ उसमें आमूल परिवर्तन की गुंन्जा‌इश है, आज हमें मिल बैठकर सोचना चाहिये, कि यदि शिक्षा हमारे उद्देश्यों को पूरा नही करती तो ऐसी शिक्षा का को‌ई मतलब नहीं है । आज जब भगुवाधारी अपना ऐजेन्डा चला रहे हैं, दूसरी तरफ सो काल्ड धर्मनिरपेक्ष वाले अपना कांग्रेसी एजेन्डा और तीसरी तरफ मदरसों द्वारा शिक्षा का इस्लामीकरण किया जा रहा है तो किसी से क्या उम्मीद रखें । आप खुद ही बता‌इये कि भगुवाकरण,कांग्रेसीकरण और इस्लामीकरण से हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, हम लोगों को लोगों से दूर कर रहे हैं । हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जो अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे धर्मों को गिरा हु‌आ मानेगा और कभी दूसरे धर्म की बे‌इज्जती करने से नहीं चूकेगा । या फिर इस्लामी कट्टरता से बच्चा अपनी जिन्दगी को ही इस्लाम की अमानत समझने मे बिता देगा । क्या यही उद्देश्य हैं शिक्षा के?

अभी भी समय है, जागो, चेतो और इस बिगड़ते हु‌ए शिक्षा के सिस्टम को बचा लो, वरना कल बहुत देर हो जायेगी । मेरे कुछ सुझाव हैं, जिन्हें शिक्षाविद चाहें तो अमल में ला सकते हैं -:

१. शिक्षा को ना केवल किताबी ज्ञान बल्कि व्यवहारिक शास्त्र के रूप मे प्रदान करना चाहिये ।
२. परीक्षा के प्रारूप और शिक्षा के स्वरूप में आमूल परिवर्तन की गुन्जा‌इश है ।
३. कम्प्यूटर शिक्षा अनिवार्य कर देनी चाहिये ।
४. बच्चों से शिक्षा के एक्स्ट्ररा लोड को कम कर देना चाहिये और उनके मानसिक,तार्किक विकास और पर्सनाल्टी डेवलपमेन्ट पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये ।
५. शिक्षा के भगुवाकरण,इस्लामीकरण और कांग्रेसीकरण से बचना चाहिये । इतिहास को इतिहास ही रहने दो, पार्टी का लेबल मत लगा‌ओ ।
६. शिक्षा के साथ-साथ व्यावसायिक ज्ञान भी दिया जाना चाहिये, एडवान्स क्लासेस में तो यह अनिवार्य होना चाहिये ।
७. छात्रों को नयी खोजें करने और नये प्रयोग करने के लिए उत्साहित करना चाहिये ।
८. अंगूठाछाप लोगो को सिर्फ राजनीति तक ही सीमित रखना चाहिये । शिक्षा की सलाहकार समितियों से इन लोगों का पत्ता साफ कर देना चाहिये ।
९. भारतीय संस्कृति और संस्कार की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिये ।
१०. स्टूडेन्ट एक्सचेन्ज प्रोग्राम को ज्यादा बढ़ावा दिया जाना चाहिये, ताकि छात्र दूसरे देशों के छात्रों से ज्यादा कुछ सीख सकें ।
११. ग्रामीण शिक्षा के स्तर को सुधारा जाना आवश्यक है । इसपर अभी बहुत ज्यादा काम किया जाना बाकी है ।
१२. सेक्स एजुकेशन अनिवार्य कर दी जानी चहिये ।
१३. प्रौढ़ शिक्षा के लिये स्वयं सेवी संगठनों को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन एवं सहायता दी जानी चाहिये ।

सचिन कुमार

काले धन एवं नकली नोटों से छुटकारा - भ्रष्टाचार पूर्णत: खत्म

प्राय: सभी देशों की सरकारों का एक रोना साझा है और वो भी अति भयंकर रोना! देश की अर्थ व्यवस्था में काला धन । यह काला धन बहुत से देशों को, बहुत सी सरकारों को बहुत रुलाता है और बुद्धिजीवी वर्ग को अत्यंत चिंतित करता है । अर्थशास्त्रियों की नाक में दम करके रखता है । रोज न‌ए-न‌ए सुझाव दि‌ए जाते हैं, विचार कि‌ए जाते हैं कि किस तरह इस काले धन पर रोक लगा‌ई जा‌ए. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट तो छापों में विश्वास रखता है, जहाँ कहीं सुंघनी मिली नहीं कि पहुँच ग‌ए दस्ता लेकर । अजी! काले धन की बात तो छोड़ि‌ए! नोटों को लेकर इससे भी बड़ी समस्या का सामना क‌ई देशों को करना पड़ता है, और वो है नकली नोटों की समस्या । दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करना हो या बेहाल करना हो, प्रिंटिंग प्रेस में दूसरे देश के नोट हूबहू छापि‌ए और पार्सल कर दीजि‌ए उस देश में, बस फ़िर क्या है - बिना पैसों के तमाशा देखि‌ए उस देश का । अब तो उस देश की पुलिस भी परेशान, गुप्तचर संस्था‌एं भी परेशान और सरकार भी परेशान! नकली नोट कहां-कहाँ से ढ़ूंढ़े और किस जतन से? बड़ी मुश्किल में सरकार ।
बचपन से छलाँग लगाकर जब हमने भी होश सँभाला तो आ‌ए दिन काले धन की बातें पढ़कर, सुनकर, और नकली नोटों की बातें अखबारों में पढ़कर और टी.वी. में देख सुनकर, सरकारों की, अर्थशास्त्रियों की चिंता देख सुनकर हमें भी चिंता सताने लगी, लेकिन हमारे हाथ में तो कुछ है नहीं जो कुछ कर सकें । बस कुछ बुद्धिजीवियों के बीच बैठकर चाय-पानी या खाने के समय लोगों से चर्चा कर ली । अपनी बात कह दी और दूसरे की सुन ली और हो ग‌ई अपने कर्तव्य की इतिश्री, लेकिन नहीं यार! अपने में देश-भक्‍ति का कुछ बडा़ ही कीड़ा है, सो लग ग‌ए चिंता में । भले सरकार को हो या ना हो, देशभक्‍त को जरूर चिंता करनी चाहि‌ए और वो भी जरूरत से ज़्यादा । भले अर्थशास्त्री बेफ़िकर हो ग‌ए हों! लेकिन नहीं, अपन को तो देश की चिंता है, काले धन की भी और नकली नोटों की भी, लेकिन किया तो किया क्या जा‌ए. दिन रात इसी चिंता में रहते । चिंता में रहते रहते रात में स्वप्न भी इसी विषय पर आने लगे । कल तो हद ही हो ग‌ई, एक ऐसा स्वप्न आया कि क्या बता‌ऊँ! पूरे विश्व से कालेधन और नकली नोटों की समस्या जैसे जड़ से ही खत्म हो ग‌ई और साथ में भ्रष्टाचार भी समाप्त । आप आश्चर्य करेंगे ऐसा कैसे? आ‌इये विस्तार से बताता हूँ क्या स्वप्न देखा मैने -
मैने देखा कि विश्व की सभी सरकारें इस विषय पर एकमत हो ग‌ईं हैं और सबने मिलकर एक बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय लिया है और निर्णय यह कि सभी सरकारें ’करेंसी’ को - सभी छोटे, बड़े नोटों को, सभी पैसों को पूरी तरह से अपने सभी देशवासियों / नागरिकों से वापिस लेकर पूरी तरह से नष्ट कर देंगी और किसी प्रकार के को‌ई नोट या करेंसी छापने की भी बिलकुल जरूरत ही नही है, जिसने जितनी भी रकम सरकार को सौंपी है उसके बदले - एक ऐसा सरकारी मनी कार्ड उनको दिया जायेगा जिसमें उनकी रकम अंकित कर दी जायेगी । सभी नागरिकों को इस मनी कार्ड के साथ साथ एक ऐसा ’डिस्प्ले’ भी दिया जायेगा जिसमें को‌ई भी जब चाहे अपनी उपलब्ध रकम (धनराशि) देख सकता है एवं अपनी रकम का जितना हिस्सा जिसको चाहे ट्रांसफर कर सकता है । भविष्य में सभी नागरिकों का भले वह व्यवसायी हो, नौकर हो, कर्मचारी हो, अधिकारी हो, मजदूर हो, सर्विस करता हो, बिल्डर हो, कांट्रैक्टर हो, कारीगर हो, सब्जी बेचने वाल हो, माली हो, धोबी हो, दुकानदार हो, या जो कुछ भी करता हो, या भले ही बेरोजगार हो, सभी प्रकार का लेन देन उस एक कार्ड के द्वारा ही होगा । पैसों का, नोटों का लेन देन बिलकुल बंद! नोट बाजार में हैं ही नहीं! बस सबके पास एक सरकारी मनी कार्ड!!
भारत सरकार जो अमूमन चुप्पी साध लेती है या जो क‌ई काम भगवान के भरोसे छोड़ देती है या जो सबसे बाद में किसी भी चीज को, नियम को या कानून को कार्यान्वित करती है, लेकिन, इस मामले में तो भारत सरकार ने इतनी मुस्तैदी दिखा‌ई कि पूछिये मत! पता नहीं कि काले धन से सरकार खूब ज्यादा ही परेशान थी, या नकली नोटों के भयंकर दैत्याकार खौफ से या फिर उन राजनीतिज्ञों से जिन्होंने स्विस बैंकों में अरबों करोड़ रुपये काले धन के रूप में जमा कर रखे हैं । खैर बात जो भी हो, भारत सरकार ने तुरंत आनन फानन में कैबिनेट की मीटिंग की! निर्णय लिया और संसद में पेश कर दिया! और पास भी करा लिया, कानून बना दिया, निलेकणी को बुलाया और निर्देश किया कि जो पहचान पत्र आप देश के सभी नागरिकों को बनाकर देने वाले हो - जिसमें व्यक्‍तिगत पहचान होगी, घर का, आफिस का पता होगा, फोटो होगी, बर्थ डेट, ब्लडग्रुप एवं अन्य सभी जरूरी जानकारी होगी उसी में यह सरकारी मनी कार्ड भी हो । अब यह नागरिकों के लिये सरकारी पहचान पत्र ही नहीं बल्कि ’सरकारी पहचान पत्र कम मनी कार्ड’ होना चाहिये । सभी की धनराशि सिर्फ अंकों में (या रुपयों में) दिखा‌ई जायेगी और देश भर में सभी ट्रांजैक्शन और लेन देन - चाहे वह एक रुपये का हो या करोड़ों का! प्रत्येक नागरिक द्वारा इसी के द्वारा किया जायेगा । हर एक नागरिक को इस कार्ड के साथ साथ एक डिस्प्ले भी दिया जायेगा, जिसमें वह जब चाहे अपनी जमा धन राशि देख सकता है और इसके द्वारा जमा धनराशि में से जिसके नाम पर, जब चाहे, जितनी भी चाहे धनराशि ट्रांसफर कर सकता है । निलेकणी जी तो अपनी टीम के साथ पहले ही तैयार बैठे थे, यह एजेंडा भी उसमें जोड़ दिया गया । अगले तीन वर्षों में यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से तैयार हो गया । सरकार ने नोटिस निकाल दिये, सभी अखबारों में, टी वी चैनलों में, हर जगह लोग अपनी सारी धनराशि/ कैश अपने बैंक अका‌उंट में जमा कर दें - भले ही देश भर में आपके कितने ही अका‌उंट हों सभी की धनराशि जोड़कर उस सरकारी क्रेडिट कार्ड में इंगित कर दी जायेगी । तीन महीनों के अंदर देश भर में यह व्यवस्था लागू हो ग‌ई । सभी को ’सरकारी पहचान पत्र कम मनी कार्ड’ दे दिये गये ।
सुबह धोबी मेरे पास आया और मैने क्रेडिट कार्ड से डिस्प्ले में डालकर दस रुपये उसके नाम पर ट्रांसफर कर दिये । थोड़ी देर में दूधवाला आया मैने अपने कार्ड से उसके कार्ड में 24 रुपये ट्रांसफर कर दिये । मेरी पत्‍नी हा‌उसवा‌इफ (ग्रहणी) हैं, उसने कहा मार्केट जाना है कुछ पैसे दो! मैने अपने कार्ड से उसके कार्ड में 2 हजार रुपये ट्रांसफर कर दिये । मार्केट जाकर उसने सब्जी खरीदी और सब्जी वाले के कार्ड में 240 रुपये ट्रांसफर कर दिये । कुछ मिठा‌इयां हलवा‌ई के यहां से खरीदीं और 430 रुपये उस दुकान वाले के कार्ड में ट्रांसफर कर दिये । मार्केट में उसने कुछ कपड़े बच्चों के लिये खरीदे और 615 रुपये उसने दुकान के कार्ड में ट्रांसफर कर दिये । ’किराने’ की दुकान से उसने कुछ राशन खरीदा और 315 रुपये उसने उस राशन वाली दुकान के कार्ड में ट्रांसफर कर दिये । कहीं को‌ई कैश / नकदी का लेन देन नही हु‌आ, जरूरत ही नही पड़ी । कैश में लेने-देन हो ही नहीं सकता था, अब किसी के हाथ में को‌ई कैश, रुपया, नोट या पैसा हो, तब ना! सब तो सरकार ने लेकर नष्ट कर दिये । करेंसी की प्रिंटिंग बिलकुल बंद जो कर दी । मेरा दस वर्ष का बेटा मेरे पास आया और कुछ पैसे मांगे मैने अपने कार्ड से 100 रुपये उसके कार्ड में ट्रांसफर कर दिये ।
महीने के अंत में मेरी गाड़ी धोने वाला आया, बर्तन मांजने वाली बा‌ई आयी, घर का काम करने वाली बा‌ई आयी, सबके कार्ड में मैने अपने कार्ड से जरूरत के हिसाब से धनराशि ट्रांसफर कर दी । महीने की शुरु‌आत होते ही मेरे कार्ड में अपने बैंक में दिये निर्देश के अनुसार मेरी तनख्वाह (सेलरी) में से आवश्यक धनराशि मेरे कार्ड में ट्रांसफर हो ग‌ई । बैंक में जाकर पैसे निकलवाने की जरुरत ही नही पड़ी । सारे कार्य यह पहचान पत्र कम मनी कार्ड कर रहा है, और आप चाहें तो भी कैश आप निकलवा ही नहीं सकते, धनराशि को सिर्फ ट्रांसफर करवा सकते हैं क्योंकि बैंक वालों के पास भी रुपये, नोट हैं ही नहीं । उनके पास भी केवल अंकों में रुपये हैं । आप जितने चाहें फिक्स्ड डिपोजिट करवायें जितने चाहें कार्ड में ट्रांसफर करवायें । हर व्यक्‍ति को एक ही कार्ड । कार्ड या डिस्प्ले में को‌ई तकनीकी खराबी आ‌ई तो बस एक फोन किया और आपको दूसरा कार्ड या डिस्प्ले मुफ्त में दे दिया जायेया ।
मुझे घर खरीदना था, बिल्डर से देख कर घर पसंद किया 20 लाख का था । मेरे पास बैंक में जमा धनराशि 5 लाख थी 15 लाख बैंक से लोन लेना है । सारे काम बस उसी पुराने तरीके से हुये, पेपर वगैरह तैयार हुये और बैंक से लोन मिल गया । बिल्डर के कार्ड में 15 लाख बैंक से और मेरे कार्ड/अकांउट से 5 लाख ट्रांसफर हो गये । स्टैंप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन और अन्य ट्रांसफर चार्जेस सभी कुछ कार्ड से कार्ड के द्वारा ट्रांसफर हु‌आ । कहीं को‌ई ब्लैक मनी न उपजी, न बिखरी, न फैली । अरे यह क्या मुझे तो को‌ई अंडर टेबल, या चाय पानी के लिये भी कहीं कुछ पैसा देना नही पड़ा । न ही किसी ने कुछ मांगा । अरे को‌ई मांगे तो भला कैसे? कैश तो है नही किसी के पास । कार्ड में ट्रांसफर करवायेगा तो मरेगा । संभव ही नहीं है । क्या बात है! लगता है भ्रष्टाचार भी खत्म होने को है ।
प्रा‌इवेट एवं सरकारी कंपनियों एवं उद्यमों को भी इसी प्रकार कार्ड जारी किये गये । जो काम जैसा चल रहा था, वैसा ही चलने दिया गया । बस सभी ट्रांजैक्शन (पैसे का लेन देन) एक कार्ड से दूसरे कार्ड पर होने लगा । शाम को आफिस से बाहर आया तो देखा कांट्रैक्टर मजदूरों को उनकी दिहाड़ी का पैसा उनके कार्ड में ट्रांसफर कर रहा था और बिना कम किये या गलती के । अरे एक गलती भी भारी पड़ सकती है ।
मुझे विदेश जाना था, पासपोर्ट वीजा से लेकर धन परिवर्तन (मनी एक्स्चेंज) सभी कुछ कार्ड में धनराशि के ट्रांसफर द्वारा ही किया गया । विदेश जाने पर वहां की जितनी करेंसी मुझे चाहिये थी अपने कार्ड पर ही मुझे परिवर्तित कर दी ग‌ई । वहां पर भी हर जगह बस कार्ड पर ही ट्रांसफर हो रहा था । कहीं को‌ई परेशानी नही हु‌ई ।
किसानों को उनके उत्पाद की पूरी धनराशि बिना किसी कटौती के मिलनी शुरू हो ग‌ई । किसान भा‌ई बहुत खुश हुये । सरकारी आफिसों से भी लोग बहुत खुश हो गये, कहीं को‌ई अपना हिस्सा ही नही मांग रहा । मांगे तो कार्ड में ट्रांसफर करवाना पड़े और करवाये तो तुरंत रिकार्ड में आ जाये, पकड़ा जाये, संभव ही नहीं है ।
सारे काले धन की समस्या! सारे नकली नोटों की समस्या, सब की सब एक झटके में तो ख्त्म हु‌ई हीं । भ्रष्टाचार का भी नामों निशान न रहा । मैने चैन की सांस ली । चलो इस देश-भक्‍त की चिंता तो खत्म हु‌ई । रुपयों से संबंधित सारी समस्या‌एं किस तरह एक झटके में हमेशा के लिये समाप्त हो गयीं । इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की सरदर्दी तो बिलकुल ही खत्म हो ग‌ई । सारे ट्रांजैक्शन वह बहुत ही आसानी से ट्रेस कर पा रहे थे । यहां तक कि उनके अपने लोग ग‌ऊ बन गये थे । पुलिस की हजारों हजार दिक्कतें एक झटके में सुलझ ग‌ई थीं । हर केस को अब वह आसानी से सुलझा पा रहे थे । हर ट्रांजैक्शन अब उनकी नजर में था । अपराधियों को पकड़ना बहुत ही सरल हो गया था । अपराध अपने आप कम से कम होते गये और न के बराबर रह गये । पुलिस के अपने लोग किसी प्रकार की गलत ट्रांजैक्शन कर ही नहीं सकते थे, कर ही नहीं पा रहे थे । सबके सब दूध के धुले हो गये, या कहिये होना पड़ा । आदमी खुद साफ हो तो उसे लगता है सारी दुनिया साफ होनी चाहिये । जब वह खुद कुछ गलत नही कर सकते थे, तो साफ हो गये, जब खुद साफ हो गये तो समाज को साफ करने लग गये । बहुत जल्द परिणाम सामने थे । ट्रैफिक पुलिस वाले अब अपनी जेबें गरम करने के बजाय सिर्फ कानून या सरकार की जेब ही गरम कर सकते थे ।
देश में भ्रष्टाचार पूरी तरह से बंद हो चुका था । न्याय व्यवस्था जोकि पूरी तरह से चरमरा ग‌ई थी! पुनर्जीवित हो उठी । सभी अधिकारी, पुलिस, नेता, जज, सरकारी कर्मचारी, सबके अकांउट्स क्रिस्टल क्लियर हो गये । रह ग‌ई तो बस केवल सुशासन व्यवस्था । यह तो सच ही अपने आप में राम राज्य हो गया । गांधी का सपना सच हो गया ।
मैं बहुत खुश हु‌आ । हंसते हंसते नींद खुली! अखबार में नोटिस ढ़ूंढ़ने लगा, कहीं नहीं मिला, फिर याद आया कि अरे यह तो तीन साल बाद होने वाला है । तो आ‌इये, हम सभी मिल कर तीन साल बाद भारत सरकार द्वारा आने वाले इस नोटिस का इंतजार करें ।

कवि कुलवंत सिंह
मुंब‌ई

कुछ सत्य घटनायें

१ * ईसाईयों ने गोवा में जहां लाखों निरपराध हिन्दू स्त्री, पुरूषों व बच्चों का कत्‍ल किया, वहाँ २८० मन्दिर भी तोड़े और दैनिक जीवन पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये । जैसे हिन्दू रीति-रिवाजों के तहत विवाह व नामकरण संस्कार न करने देना, यज्ञोपवीत न होने देना, चोटी न रखने देना, घर के आँगन में तुलसी का पौधा न लगाने देना आदि । जिन हिन्दू स्त्रियों ने अपने साथ बलात्कार का विरोध किया, उन्हें जेलों में डालकर अपनी कामवासना की पूर्ति के बाद उन्हें हेरेटिक्स यानी ईसाई अन्धविश्‍वासी कहकर जिन्दा जलाने का आदेश दे दिया ।
२ * जब मदर टेरेसा से पूछा गया कि आप वहां के गरीबों को बिना ईसाई बनाये सहायता क्यों नहीं करतीं तो उन्होंने उत्तर दिया “बाइबिल में लिखा है कि जो ईसाई बनकर बयतिस्मा लेंगे, वे बचाये जायेंगे, शेष नष्ट कर दिये जायेंगे ।” इसी मदर टेरेसा को नवम्बर १९९४ में बी.बी.सी फिल्म में ‘नरक की परी’ कहा था ।
३ * हिन्दूओं को धोखे से ईसाई बनाने के लिये उत्तरांचल के गढ़वाल क्षेत्र के पर्वतीय नगर में योग आश्रम तथा अहमदाबाद से १२० किमी. दूर सच्चिदानन्द आश्रम के नाम से दो रोमन कैथोलिक चर्च चल रहे हैं । यहाँ की रूप रेखा व रहने वाले लोगों के नाम तथा मन्दिर जैसा रूप देखकर कोई भी हिन्दू धोखा खा सकता है । दोनों स्थानों पर ईसा मसीह को भगवान बनाकर कमल में बिठाया हुआ है ।
४ * संविधान के अनुच्छेद १४ के अनुसार कोई भी व्यक्‍ति अनुसूचित जाति से ईसाई बनने पर पहले की भांति सुविधायें प्राप्त नहीं कर सकता । इसके साथ ही ६ जून १९३६ को भारतीय गजट के अनुसार संविधान के अनुच्छेद ३६६ और ३९१ के अन्तर्गत स्पष्ट है कि कोई भी दलित ईसाई अनुसूचित जाति में नहीं आता ।
अब भारत के लोग जागें और दलित ईसाइयों के आरक्षण का डटकर विरोध करें । दलितों को सावधान करते हुये हम कहना चाहते हैं कि वे इस लोभ में पड़कर ईसाई न बनें कि वे बहुत ऊँचे समझे जायेंगे क्योंकि “फ्रंटलाइन” २९ दिसम्बर १९९५ में श्रीमान्‌ जफेता मसीह का स्पष्ट बयान है- “ईसाई बनने पर भी हम दलितों को उच्च जाति में नहीं मिलाया जाता । चर्च में हमें कहीं और बैठने की इजाजत न होकर केवल बाँये हाथ बैठना होता है । हम उच्च ईसाइयों के घरों में नहीं जा सकते, हम उनकी दुकानों पर हजामत नहीं बनवा सकते । हमारे पहले पानी पी लेने पर वे उन नलों को अछूत समझकर धोते हैं फिर पानी पीते हैं ।
(झारखण्ड वनांचल टाइम्स, अंक 13, 2008 से साभार)
- डॉ. ए. कीर्तिवर्द्धन

हिन्दुस्तान में मानव का अधिकार

सृष्टि का सबसे उन्‍नत जीव मानव है, जिसने प्राकृतिक संसाधनों को अपने श्रम, से नये रूप में ढालकर नई दुनिया की रचना कर डाली । आज उसी मानव के अधिकार की बात हो रही है । विकास के साधन के साथ-साथ मानव ने प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग किया, प्रकृति की सीमा रेखा का उल्लंघन भी किया । पृथ्वी की हरियाली का विनाश किया जो सभ्यता को स्थायित्व प्रदान करती है । पशुओं से उनका घर, आश्रम पर मानव कब्जा जमाते जा रहा है । यहां तक कि मानव अपने स्वार्थ में अनेकों पशुओं, जलचरों का शिकार कर रहा है, जिससे अनेक प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं । यहाँ तक कि मानव ने ही मानव पर अपने स्वार्थ के लिए उनका दमन शुरू कर दिया है ।
मानवाधिकार की परिभाषा क्या है? प्रकृति ने हर मानव को उसके परिवेश, स्थान के अनुसार इस पृथ्वी के नैसर्गिक अधिकार प्रदान किये हैं । किसी भी सामाजिक या राजनीतिक कारण से उनका ये अधिकार कोई मानव संगठन या सरकार हनन नहीं कर सकती । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और स्वस्थ समाज अपने बनाये हुए आदर्श आचारसंहिता के आधार पर ही चलता है, चूंकि हम मानव हैं । पशुओं के साथ में प्रकृति प्रदत्त आचारसंहिता है जिसका उल्लंघन पशु समाज भी नहीं कर सकता है ।
ईश्‍वर की सबसे उत्तम रचना मानव है, परन्तु इस कलयुग में किसी तरह दूसरे के अधिकार कर्म के प्रतिफल पर अपना कब्जा जमाना ही सामाजिक असमानता पैदा कर रहा है, जिसमें पूरा विश्‍व त्रस्त है । यहाँ तक कि मानव के कुकर्म से पूरा विश्‍व खतरे के ढर्रे पर खड़ा है । मानवजाति में दो प्रवृत्ति के लोग होते हैं । जैसे सदाचारी, दुराचारी, देवता-राक्षस । प्रकृति के नियम अनुसार किसी एक में मानवजाति की राक्षसी वृत्ति का उत्थान का है । उत्थान है तो पतन भी निश्‍चित है । आज हम मानवाधिकार की बातें उठाते हैं । वह सामाजिक विकास, समानता, प्रेम के लिए जरूरी है ।
अब सभ्यता की पुकार है कि मानव मानव पर अत्याचार बन्द करो । हमारे देश में आम आदमी के मानवाधिकार की रक्षा के लिए पुलिस है, परन्तु पुलिस तो स्वयं ही मानवभक्षी जीव के रूप में बैठी है । भारत के हर हफ्ते थाने में दिन रात नागरिक अधिकार और नागरिक सम्मान के अधिकार का बलात्कार होता है । इस विभाग में सामाजिक प्राणी, सामाजिक आचार भी सिखाया जाना चाहिए । आज हमारे देश में मानवाधिकार की बात होती है, परन्तु हमारे कानून आज भी वही हैं जो अंग्रेजों ने गुलाम भारत की जनता के लिए बनाये थे । मानवाधिकार की दुहाई देने वालों पहले मानवाधिकार के शत्रु पुलिस तंत्र को, कानून को ठीक करो । आजादी के ६२ साल बाद भी वही स्थिति है । हमारे देश के सत्ताधारियों, आलसियों, निकम्मों देश के नागरिकों को उनका अधिकार देने में इतने साल क्यों लग रहे हैं? शायद हमारी सरकार, ईश्‍वर अवतरण का इंतजार कर रही है । कपटी लोगों, नाटक बन्द करो । सत्ताधारियों देश के नागरिक के अधिकार की रक्षा करो मानवाधिकार स्वयं प्राप्त हो जायेगा । मानवाधिकार के लुटेरों पर अंकुश लगाओ । अंग्रेजों के काले कानून को बन्द करो । मानव रूप पुलिसवालों के दानवी मानवाधिकार हनन कानून ठीक करो । ९० दिनों के अन्दर नया कानून बनाओ । आजादी का कानून, स्वतन्त्रता का कानून, मानव के अधिकार का कानून ।
शिक्षा व्यवस्था आज भी हमारे देश में वही चल रही है जो अंग्रेजों ने बनाया यानि हम गुलामों वाली शिक्षा पद्धति पर चल रहे हैं । मानवाधिकार की बात और शिक्षानीति वही, जो मैकाले ने गुलाम भारत के नागरिकों के लिए बनायी थी । अभी तक सत्ताधारियों ने स्वतन्त्र भारत की शिक्षा नीति का निर्धारण करने की जहमत नहीं उठायी है । जब शिक्षा का आधार ही गुलाम भारत है तो मानवाधिकार का ज्ञान हमारे समाज में कहाँ से आयेगा?
- रवि के. पटवा (मुंबई)

धर्म, प्रेम और संवेदना का महत्व

जिन नियमों के आचरण एवं अनुष्ठान से इस लोक और परलोक में अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वही धर्म है । देवताओं के पूजन-अर्चन में मन की पवित्रता का भी विशेष महत्व है । कर्मपुराण में स्नान के बारे में कहा गया है कि यह दृष्ट और अदृष्ट फल प्रदान करनेवाला है । प्रातः स्नान करने से निःसंदेह अलक्ष्मी, बुरे स्वप्न और बुरे विचार तथा अन्य पाप नष्ट हो जाते हैं । सत्संग का मतलब है सत्य की संगति । सत्य की संगति परमात्मा के नाम और उनकी कथा के कहने और सुनने में होती है । सत्संग में भगवान की कथा कहने और सुनने वालों का मन एवं शरीर दिव्य तेज से प्रकाशित हो उठता है । कथा श्रवण से प्रभु की कृपा सहज सुलभ हो जाती है । श्रीमद्‌भागवत में कहा गया है कि नियमित सत्संग और कथा श्रवण करने से भगवान अपने भक्‍तों के हदय में समा जाते हैं । धर्मशास्त्रों में भगवद कथाओं को आधिभौतिक, आधिदैविक और आधिदैहिक तापों को नष्ट करनेवाली कहा गया है । इन कथाओं का पुण्य फल मृत्यु के बाद ही नहीं बल्कि अगले जीवन में भी मिलता है । कथा श्रवण से निराश जीवन में भी आशा का संचार होता है ।
प्रख्यात आध्यात्मिक गुरू श्री रविशंकर कहते हैं- “जो संवेदनशील होते हैं, प्रायः वे कमजोर होते हैं । जो स्वयं को सबल समझते हैं वे प्रायः असंवेदनशील होते हैं । कुछ व्यक्‍ति स्वयं के प्रगति संवेदनशील होते हैं, पर औरों के प्रति नहीं । वहीं दूसरी ओर कुछ लोग दूसरों के प्रति संवेदनशील होते हैं, वे प्रायः दूसरों को दोष देते हैं । जो केवल अपने प्रति संवेदनशील होते हैं, वे स्वयं को असहाय और दीन समझते हैं । कुछ व्यक्‍ति इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि संवेदनशील होना ही नहीं चाहिए क्योंकि संवेदनशीलता पीड़ा लाती है । वे अपने आपको औरों से दूर रखने लगते हैं, परन्तु यदि तुम संवेदनशील नहीं हो तो तुम जीवन के अनेक सूक्ष्म अनुभवों को खो दोगे, जैसे अंतर्ज्ञान, सौन्दर्य और प्रेम का उल्लास । यह पथ और यह ज्ञान तुम्हें सबल और संवेदनशील बनाता है । असंवेदनशील व्यक्‍ति प्रायः अपनी कमजोरियों को नहीं पहचानते । दूसरी ओर जो संवेदनशील हैं, वे अपनी ताकत को नहीं पहचानते । उनकी संवेदनशीलता ही उनकी ताकत है । संवेदनशीलता अंतर्ज्ञान है, अनुकंपा है, प्रेम है । ”
रैलन कीलर के अनुसार- “प्रेम एक सुंदर और खुशबूदार फूल की तरह है जिसे हम ना छुएँ, तो भी उसकी खुशबू सारे वातावरण को सुंगधित बना देती है । ” किसी भी धर्म में हिंसा का स्थान नहीं है । आज सभी को संयुक्‍त प्रयास कर जीवन में समरसता, समृद्धि तथा भाईचारा बढ़ाने का बीड़ा उठाना चाहिए । आज हर व्यक्‍ति सुख चाहता है फिर भी उसे सुख शांति नहीं मिलती । एक आमधारणा है कि अच्छे काम क्यों करें? ईमानदारी से धन नहीं मिल सकता । हम चाहते हैं कि समाज में इस धारणा को बदला जाय तथा लोगों में यह जागृति फैले कि ईमानदारी से भी पैसा कमाया जा सकता है और सुख की प्राप्ति हो सकती है । हमारा हर व्यक्‍ति से भावनात्मक जुड़ाव हो तथा लोग समाज की प्रगति और आर्थिक उत्थान में काम करें । आपमें विश्‍वास हो और अच्छा सोचें तो आपसी रिश्ते खुद ब खुद सुधर जाएंगे । ईमानदार होने का एक फायदा यह भी है कि इससे व्यक्‍ति दुखी नहीं होता । ऐसी धारणा है कि अक्सर ईमानदार व्यक्‍ति दुखी और गरीब देखे जाते हैं और बेईमानी सुखी और धनवान । हमें इस धारणा को बदलना है और समाज में संदेश फैलाना है कि हमेशा सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने वालोंको ही सुख मिलता है ।
विश्‍व इतिहास में सबसे भयानक आर्थिक संकट के बाद इंटरनेशनल असोसिएशन फॉर ह्‍यूमैन वैल्यूज ने ‘बिजनेस में नैतिकता’ और मूल्यों की प्रासंगिकता पर विचार किया, जिसमें वर्ल्ड बैंक, माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन, आध्यात्मिक नेता और दुनिया के शीर्षस्थ विद्वानों ने शिरकत की । श्री श्री रविशंकर जोर देते रहे हैं कि विकास के केन्द्र में मानवीय मूल्यों और नैतिकता को रखने की जरूरत है । हमने कम्युनिज्म की कमियाँ देख लीं, हम बेलगाम कैपिटलिज्म की नाकामी देख चुके हैं । अब समय एक नए इज्म- ह्‍यूमनिज्म या मानवतावाद का है । इस कॉन्फ्रैंस के जरिए दुनिया के युवाओं को स्थायित्व मुहैया कराने के बारे में अपना नजरिया बनाने का मौका मिला । खबर है कि सम्मेलन में १० देशों के २५ युवाओं ने हिस्सा लिया था । सम्मेलन को कॉरपोरेट में आध्यामिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का भाव भरने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है । ऐसे आयोजन देश के हर कोने में होने की परम आवश्यकता है ।
- गोपाल प्रसाद

भारतीय नववर्ष तथा कालगणना

प्राचीन काल में मुर्गे की बाँग, पक्षियों की उड़ान आकाश में चाँद, तारों व सूर्य की स्थिति, सूर्य की किरणों के कारण वृक्ष, पहाड़ आदि की छाया से लोग समय व कालखंड का अनुमान लगाते थे । इस कालखंड को मापने के लिये मानव ने जिस विधा या यंत्र का आविष्कार किया, उसे हम काल निर्णय, कालनिर्देशिका व कैलेन्डर कहते हैं । दुनिया का सबसे प्राचीनतम कैलेण्डर भारतीय है । इसे सृष्टि संवत कहते हैं । भारतीय कालगणना का आरम्भ सृष्टि के प्रथम दिवस से माना जाता है । इसलिये इसे सृष्टि संवत कहते हैं । यह संवत 1975949109 एक अरब सत्तानबे करोड़, उनतीस लाख, उनचास हजार, एक सौ नौ वर्ष पुराना है ।
कैलेण्डर के निर्माण में अनेक अवधारणायें उपलब्ध हैं । वैदिक काल में साहित्य में ऋतुओं के आधार पर कालखंड के विभाजन द्वारा कैलेण्डर के निर्माण का उल्लेख मिलता है । बाद में नक्षत्रों की चाल, स्थिति, दशा और दिशा से वातावरण व मानव स्वभाव पर पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन के आधार पर भी कैलेण्डर का निर्माण किया गया । हमारे खगोलशास्त्रियों ने ३६० अंश के पूरे ब्रह्याण्ड को २७ बराबर भागों में बांटा । इन्हें नक्षत्र कहते हैं । इन नक्षत्रों के नाम क्रमशः अश्‍विनी, भरिणी, कृतिका, रोहिणी, मृगसिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पू.फा., उ.फा., हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, गूला, पूषा, उषा, श्रवण, घनिष्टा, शततार, पू.भा, उ.भा तथा रेवती रखे गये । इसमें से बारह नक्षत्रों में चन्द्रमा की स्थिति के आधार पर बारह महीनों के नाम रखे गये । एक, तीन, पाँच, आठ, दस, बारह, चौदह, अठारह, बीस, बाईस व पच्चीसवें नक्षत्र के आधार पर भारतीय महीनों के नाम - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, अश्‍विन, कार्तिक, मृगशिरा, पौष, माघ व फाल्गुन रखे गये ।
प्रश्न यह है कि भारतीय नववर्ष का प्रारम्भ चैत्र मास से ही क्यों? वृहद नारदीय पुराण में वर्णन है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि का सृजन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारम्भ किया था । वहां लिखा है-
“चैत्र मासि जगत ब्रह्यससजप्रिथमेऽइति । ”
इसलिये ही-भारतीय नववर्ष का प्रारम्भ आद्‌याशक्‍ति भगवती दुर्गा की पूजा-उपासना के साथ चैत्र मास से शुरू करते हैं । प्रत्येक माह में कितने दिन होंगे, इसे समझने से पहले आपको दिनों के नाम व सप्ताह के बारे में बताते हैं-
हमारे ऋषि-मुनियों ने वैज्ञानिक गणना तथा सूर्य के महत्व को समझते हुये रविवार को ही सप्ताह का पहला दिन माना । उन्होंने यह भी आविष्कार किया कि सूर्य, शुक्र, बुधश्‍च, चन्द्र, शनि, गुरू तथा मंगल नामक सात ग्रह हैं । जो निरन्तर पृथ्वी की परिक्रमा करते रहते हैं और निश्‍चित अवधि पर सात दिन में प्रत्येक ग्रह एक निश्‍चित स्थान पर आता है । अतः इन ग्रहों के आधार पर ही सात दिनों के नाम रखे गये । सात दिनों के इस अन्तराल को सप्ताह कहा गया । इसमें दिन-रात शामिल हैं । ज्योतिषीय गणित की भाषा में दिन-रात को महोरात्र कहते हैं । यह चौबीस घंटे का होता है । एक घंटे की एक घेरा होती है । इसी ‘घेरा’ शब्द से अंग्रेजी का “ऑवर” शब्द बना है । प्रत्येक घेरा का स्वामी कोई ग्रह होता है । जैसा कि हमने ऊपर बताया है कि स्थूल ग्रह सात होते हैं और उन्हीं के नाम पर सात दिवस माने जाते हैं । सूर्योदय के समय जिस ग्रह की प्रथम घेरा होती हैं उसी के आधार पर उस दिन का नाम रखा गया है । इस प्रकार हमारा प्रथम दिवस रविवार से प्रारम्भ होकर सोमवार, मंगलवार, बुधवार, वृहस्परिवार, शुक्रवार तथा अन्तिम दिन शनिवार पर खत्म होता है ।
भारतीय ऋषि-मुनियों ने कालगणना का सूक्ष्मतम तक अध्ययन किया । इसके अनुसार दिन-रात के चौबीस घंटों को सात भागों में बांटा गया और एक भाग का नाम रखा ‘घटी” । इस प्रकार एक घटी हुई चौबीस मिनट के बराबर और एक घंटे में हुई ढाई घटी । इससे आगे बढ़ें तो एक घटी में साठ पल, एक पल में साठ विपल, एक विपल में साठ प्रतिफल ।
२४ घंटे = साठ घटी
१ घटी = साठ पल
१ पल = साठ विपल
१ विपल = साठ प्रतिपल
अगर हम कालगणना की बड़ी ईकाई का अध्ययन करें तो देखें-
२४ घंटे = एक दिन
३० दिन = एक माह
१२ माह = एक वर्ष
१० वर्ष = एक दशक
१० दशक = एक शताब्दी
१० शताब्दी = एक सहस्त्राब्दी
हजारों सालों को मिलाकर बनता है एक युग । युग चार होते हैं- जिनमें-
कलयुग = चार लाख बत्तीस हजार वर्ष ४३२००० वर्ष
द्वापर युग = आठ लाख चौंसठ हजार वर्ष ८६४०००
त्रेतायुग = बारह लाख छियानवे हजार वर्ष १२९६०००
सतयुग = सत्रह लाख अट्ठाईस हजार वर्ष १७२८०००
एक महायुग चारों युगों का योग = ४३२०.००० वर्ष
१००० महायुग = एक कल्प
एक कल्प को ब्रह्मा जी का एक दिन या एक रात मानते हैं । अर्थात ब्रह्मा जी का एक दिन व एक रात २००० महायुग के बराबर हुआ । हमारे शास्त्रों में ब्रह्मा जी की आयु १०० वर्ष मानी गयी है । इस प्रकार ब्रह्मा जी की आयु हमारे वर्ष के अनुसार ५१ नील, १० खरब, ४० अरब वर्ष होगी । वर्त्तमान में ब्रह्मा जी की आयु के ५१ वर्ष. एक माह, एक पक्ष के पहले दिन की कुछ घटिकायें व पल व्यतीत हो चुके हैं ।
समय की ईकाई का एक अन्य वर्णन भी हमारे ग्रन्थों में पाया जाता है-
१ निमेष = पलक झपकने का समय (न्यूनतम ईकाई)
२५ निमेष = एक काष्ठा
३० काष्ठा = एक कला
३० कला = एक मूहर्त
३० मूहर्त = एक अहोशत्र (रात व दिन मिलाकर)
१५ दिन व रात = पखवाड़ा या एक पक्ष
२ पक्ष = एक माह (कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष)
६ माह = एक अयन
२ अयन = एक वर्ष (दक्षिणायन व उत्तरायण)
४३ लाख बीस हजार वर्ष = एक पर्याय (कलयुग, द्वापर, त्रेता व सतयुग का योग)
७१ पर्याय = एक मन्वन्तर
१४ मन्वन्तर = एक कल्प
वर्तमान भारतीय मान्य गणना के अनुसार वर्ष में ३६५ दिन १५ घटी, २२ पल व ५३.८५०७२ विपल होते हैं । तथा चन्द्रगणना के आधार पर भारतीय महीना २९ दिन, १२ घंटे, ४४ मिनट व २७ सैकेन्ड का होता है । सौर गणना के अन्तर को बांटने के लिये अधिक तिथि और अधिक मास तथा विशेष स्थिति में क्षय की भी व्यवस्था की गई है । प्रत्येक तीसरे वर्ष अधिक मास का आवर्तन होता है । वास्तव में भारतीय गणना अतिसूक्ष्म है । उपरोक्‍त गणनाओं के अनुसार अभी सृष्टि के खत्म होने में ४ लाख २६ हजार ८६६ वर्ष, कुछ महीने, कुछ पक्ष कुछ सप्ताह, कुछ दिन, कुछ प्रहर, कुछ घटिकायें, कुछ पल व विपल बाकी हैं ।
हमारे ग्रन्थों की रचना करते समय भी ऋषि-मुनियों ने कालगणना के अनूठे गणित को गुप्त सूत्रों में पिरोने का प्रयास किया । शतपथ ब्राह्मण (१०/४२/२२/२५) के अनुसार ऋग्वेद में कुल ४३२०००० अक्षर हैं, जिनका योग महायुग के वर्ष के बराबर है । इनसे १२००० वृहदी छंद बनाये गये हैं । प्रत्येक छंद में ३६० अक्षर हैं ।
यजुर्वेद में ८००० तथा सामवेद में ४००० वृहदी छंदों का वर्णन है । इनका योग भी १२०० वृहती छंद तथा अक्षर ४३२०००० है । जब पंक्‍ति छंद ४० अक्षर का बनाते हैं तब छंद संख्या १०८०० होती है । एक वर्ष में ३६० दिन और एक दिन में ३० मुहुर्त होने से भी वर्ष में १०८०० मूहर्त बनते हैं ।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारतीय कैलेण्डर एवं कालगणना विश्‍व में सबसे प्राचीन एवं सूक्ष्मतम है ।
आभार-इस आलेख के लिये ब्रह्मा-पुराण, वैदिक सम्पत्ति (पं. रधुनन्दन शर्मा), कार्त्तवीर्यार्जुन पुराण, समयोपाख्यान (विलास गुप्ता) विरासत (डा. रवि शर्मा ) तथा शतपथ ब्राह्माण से तथ्यों का उल्लेख किया गया है ।
- डॉ. ए. कीर्तिवर्द्धन

बाल अधिकार एवं बाल साहित्य

अगर राष्ट्र को सशक्‍त बनाना चाहते हैं तो बच्चों को शिक्षित एवं चरित्रवान्‌ बनायें । शिक्षा एवं स्वास्थ्य बच्चों का मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय दायित्व हो । शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में शिथिलता एवं भ्रष्टाचार राष्ट्रीय अपराध घोषित हों । बच्चे राष्ट्र निर्माण में नींव का पत्थर तथा माँ व शिक्षक दोनों शिल्पकार होते हैं जो बच्चों को शिक्षित एवं उनके चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं । भारतीय संस्कृति में सदैव ही इस तथ्य के महत्व को स्वीकारा गया । हमारे पौराणिक ग्रन्थ इस बात के साक्षी हैं कि सदैव ही बाल शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर राज कृपा रही और ऋषि, मुनियों, व गुरूजनों ने सबको शिक्षा देने का कार्य किया । कालान्तर में, समय विशेष के दौरान भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में न केवल रूकावटें आयीं अपितु उसका क्षरण भी हुआ । परिणामतः हमारी सोच गुलामी की ओर अग्रसर हुई और शिक्षा एक गौण विषय बन गयी । यद्यपि समय-समय पर बाल शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने पर आवाजें उठती रहीं, तथापि आजादी के ५० वर्ष बाद तक भी इसमें पूर्ण सफलता नहीं मिल सकी थी । सन्‌ १९९० में थाईलैन्ड के नगर जोमेनियन में विश्‍व शिक्षा सम्मेलन का आयोजन किया गया और ६ से १४ वर्ष तक थी आयु के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा पर जोर दिया गया । इसके दस वर्ष पश्‍चात सन २००० में सेनेगल के शहर डकार में पुनः विश्‍व शिक्षा सम्मेलन आयोजित हुआ और २०१५ तक सम्पूर्ण विश्‍व के बच्चों को शिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया । भारत के सन्दर्भ में इसका लक्ष्य सन २०१० निर्धारित किया गया और लक्ष्य पूर्ति के लिये सम्पूर्ण देश में सर्वशिक्षा अभियान चलाया गया । इसके अन्तर्गत ६ से १४ वर्ष की आयु के बच्चों को बाधारहित (अर्थात फीस, किताबें, ड्रेस, खाना सब राज्य दायित्व) शिक्षा दिलाना राज्य का कर्तव्य तथा बच्चों का मौलिक अधिकार घोषित किया गया । इस सम्मेलन में बच्चों के स्वतंत्र व्यक्‍तित्व को स्वीकारते हुये २१ वीं सदी को बच्चों की सदी घोषित किया गया ।
बच्चों के समग्र विकास में बाल साहित्य की सदैव प्रमुख भूमिका रही है । बाल साहित्य बच्चों से सीधे संवाद करने की प्रक्रिया है चाहे वह वाचक शैली में हो, लिखित हो, चित्रों द्वारा व्यक्‍त हो अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हो । इसकी विषय वस्तु स्वयं बालक भी हो सकता है, उसका परिवेश हो सकता है जिसमें बाल जीवन विकसित होता है अथवा काल्पनिक हो सकता है । बाल साहित्य में मनोरंजन, बाल मनोविज्ञान, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, संस्कारों, जीवन-मूल्यों, आचार-विचार और व्यवहार का समायोजन होना आवश्यक है । बाल साहित्य की भाषा सरल, रोचक, मनोरंजक, एवं उत्सुकता पूर्ण होनी चाहिये । और यह तभी संभव है जब बाल साहित्यकार स्वयं को बालमन के अनुसार ढालने में सक्षम हो । यह सत्य है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आगमन से बच्चों की सोच में व्यापक परिवर्तन हुये हैं परन्तु वाचक और लिखित परम्परा के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता । हेरी पॉटर पात्र को केन्द्र में रख लिखी गई पुस्तक ने रिकार्ड बिक्री की, जो बच्चों में पुस्तकों की वर्तमान लोकप्रियता का सूचक है । आज आवश्यकता यह जानने और समझने की है बच्चों को कल साहित्य से कैसे जोड़ा जाये? इस विषय की गहराई तक जाने के लिये हमारे नीति-निर्धारकों एवं शिक्षा शास्त्रियों को पश्‍चिम जगत की शिक्षा-नीति का अन्धानुकरण बन्द करना होगा । अपने कार्यालयों के वातानुकुलित कमरों से बाहर आकर भारतीय परिवेश में आधुनिकता का समायोजन कर नीति बनानी होगी । पश्‍चिम जगत की खोखली, दूषित शिक्षा प्रणाली के कारण असमय ही बच्चे तनाव ग्रस्त एवं प्रौढ़ लगने लगते हैं । कुंठा, हिंसा एवं उन्मुक्‍त यौन जीवन पश्‍चिम की दूषित तथा बच्चों पर मात्र बोझ बनने वाली शिक्षा प्रणाली से बचाना होगा । बाल साहित्य में पारम्पारिक गीत, कहानी, हितोपदेश, जातक कथायें, रामायण, महाभारत जैसे ग्रन्थों के बालोपयोगी प्रसंग, देशभक्‍ति, विज्ञान, हास्य, चुटकले, पहेली, बच्चों की स्वयं की कवितायें, पशु, पक्षी, जानवर, पेड़-पौधे, धरती, आसमान आदि सभी विषयों को शामिल करना होगा ।
दादा-दादी, नाना-नानी, माँ-बुआ द्वारा जारी वाचक परम्परा को पुनः जीवित करना होगा । यात्रा के रोचक प्रसंगों द्वारा बच्चों को शब्दों में विश्‍व भ्रमण पर ध्यान देना होगा । यदि हम ऐसा कर पाये तो निश्‍चित रूप से आने वाली सदी भारतीय बच्चों की होगी और सम्पूर्ण विश्‍व पर भारतीय संस्कृति का विजय ध्वज फहरायेगा ।
- डॉ ए. कीर्तिवर्द्धन

बच्चों की पसंदीदा हीरो:गणेश,हनुमान और कृष्ण

भारत में बनने वाली कार्टून फ़िल्मों में पिछले कुछ समय से पौराणिक पात्रों पर आधारित फ़िल्मों में बढ़ोत्तरी हु‌ई है.

इनकी लोकप्रियता बाल गणेश, मा‌ई फ्रेंड गणेश, हनुमान, रिटर्न ऑफ हनुमान जैसी फ़िल्मों की सफलता से साफ़ झलकती है.

पौराणिक कथा‌एं और उनके किरदार, उनके हाव-भाव, उनकी शक्तियां, बहुत ही दिलचस्प हैं. एनिमेशन और स्पेशल इफेक्ट्स के माध्यम से ये सब अनोखे तरीके से प्रस्तुत कि‌ए जा सकते हैं.

कृष्णा देसा‌ई, डायरेक्टर, टर्नर इंटरनेशल इंडिया

तो आख़िर क्या वजह है बच्चों में इन फ़िल्मों की बढ़ती लोकप्रियता की, एनिमेशन सिरीज़ लिटिल कृष्णा बनाने वाली बिग एनिमेशन्स के सी‌ई‌ओ आशीष कुलकर्णी का कहना है कि हिन्दुस्तानी एनिमेशन इंडस्ट्री फ़िलहाल शुरु‌आती चरण में है और एनिमेशन किरदारों को बनाने और स्थापित करने में काफ़ी समय, मेहनत और ख़र्चा लगता है.

आशीष कुलकर्णी कहते हैं,” पौराणिक कथा‌ओं के पात्रों पर इसलि‌ए एनिमेशन फ़िल्म बन रही हैं क्योंकि वो किरदार और उनकी कहानियां बच्चों की जानी-पहचानी है. इसलि‌ए उन किरदारों को स्थापित करने में, उनका ब्रांड बनाने में सुविधा हो जाती है और ज़्यादा से ज़्यादा पैसा प्रोड्क्शन में लगाया जा सकता है. साथ ही माता-पिता भी चाहते हैं कि बच्चे अपनी संस्कृति के बारे में जाने.”
पौराणिक कथा‌एँ

टर्नर इंटरनेशनल इंडिया के डायरेक्टर, प्रोग्रामिंग, कृष्णा देसा‌ई ने बीबीसी को बताया, ” पौराणिक कथा‌एं और उनके किरदार, उनके हाव भाव, उनकी शक्तियां, बहुत ही दिलचस्प हैं. एनिमेशन और स्पेशल इफेक्ट्स के माध्यम से ये सब अनोखे तरीके से प्रस्तुत कि‌ए जा सकते हैं. हम जब भी पौराणिक कथा‌ओं पर आधारित एनिमेशन फ़िल्म या सीरियल दिखाते हैं तो उस स्लॉट की रेटिंग्स सबसे ज़्यादा होती है.”

एनिमेशन फ़िल्में—बाल गणेश और बाल गणेश टू के निर्देशक पंकज शर्मा की माने तो इन फ़िल्मों की व्यवसायिक सफलता या असफलता भी एक वजह है कि प्रोड्यूसर फ़िलहाल पौराणिक किरदारों पर ही आधारित फ़िल्में ज़्यादा बना रहे हैं.

पंकज शर्मा ने बीबीसी को बताया, ” भारत में ऐसी फ़िल्मों के लि‌ए बजट भी कम होता है इसलि‌ए बहुत ज़्यादा ख़र्चा करके रिकवरी नहीं हो पाती है. ऐसे में नये किरदारों पर आधारित एनिमेशन फ़िल्म बनाने में पाश्चात्य एनिमेशन फ़िल्म्स के साथ तुलना हो जाती है."

पौराणिक किरदारों पर बनी कार्टून फ़िल्में और सीरfयल भले ही बच्चों को पसंद आ रहे हैं और सफल भी हो रहे हैं लेकिन आशीष कुलकर्णी कहते हैं कि इन किरदारों को प्रस्तुत करना इतना आसान नहीं है.

आशीष कुलकर्णी कहते हैं, ” लोगों को इनके बारे में पहले से पता होता है इसलि‌ए ग़लती की गुंजा‌इश नहीं होती. कहानी और किरदार के बारे में पूरी जानकारी के बाद ही स्क्रिप्ट बना‌ई जा सकती है जो सबसे बड़ी चुनौती है. साथ ही मुक़ाबला भी बहुत है क्योंकि और लोग भी इन कथा‌ओं पर एनिमेशन फ़िल्म बना‌एंगे. तो आपका ट्रीटमेंट इतना अलग होना चाहि‌ए कि वो बाकी से बेहतर हो.”

वैसे ‘जम्बो’ और ‘रोडसा‌इड रोमियो’ जैसे काल्पनिक किरदारों पर आधारित एनिमेशन फ़िल्में पिछले कुछ समय में बनी हैं लेकिन वो बॉक्स ऑफ़िस पर बहुत सफल नहीं रहीं. लेकिन कृष्णा देसा‌ई कहते हैं कि अब पौराणिक कथा‌ओं के बाहर भी कहानियां बन रही हैं.

कृष्णा देसा‌ई ने बीबीसी को बताया, ” टर्नर का एनिमेशन सीरियल ‘छोटा भीम’ पूरी तरह पौराणिक कथा नहीं है. केवल किरदार का नाम और उसकी शक्तियां पौराणिक किरदार के नाम से प्रेरित है लेकिन सारी कहानियां पूर्णत: मौलिक हैं. इसके बावजूद वो काफ़ी लोकप्रिय है. अब धीरे-धीरे एनिमेशन फ़िल्मों में पौराणिक कहानियां तो कम होंगी लेकिन उनमें इन कहानियों का कुछ न कुछ पुट तो फिर भी रहेगा.”

बच्चों में पर्यावरण चेतना जगाती है यह

एक कहावत है जिसका अर्थ है- मूर्ति देखने में छोटी तो होती है किन्तु मान्यता या प्रभविष्णुता में विराट । कमोवेश यही बात समीक्ष्य पुस्तिका “सुबह सवेरे” के लिए सुसंगत है । बहुश्रुत एवं बहुपठित लेखनधर्मी डॉ. ए. कीर्तिवर्द्धन की यह चौथी कृति है किन्तु बालोपयोगी होने के कारण पूर्व कृतियों से भिन्‍न है ।
अल्पवयी पाठकों को सम्बोधित करते हुये कृतिकार चिड़ियों की सामान्य प्रसन्‍नता का कारण यह बताते हैं कि वह हमेशा गाया करती हैं । बच्चों को प्रसन्‍न देखते रहने के लिये ही उनकी सलाह है कि सुबह-सवेरे की कवितायें वह गायें और चिडियों की तरह ही प्रसन्‍न रहा करें- ऐसा करने से वह स्वस्थ भी रहेंगे, जीवन में यशार्जन भी करेंगे ।
सोलह पृष्ठों में बड़े अक्षरों में सुमुद्रित कृति बच्चों ही नहीं, सभी आयुवर्ग के पाठकों के लिये पठनीय है । सुबह-सवेरे शीर्षक वाली एक लम्बी रचना विशेषकर बच्चों को सूर्योदय से पूर्व जागकर अपने माता-पिता के चरण स्पर्श करने के उपरान्त समस्त रोजमर्रा की प्राकृतिक जरूरतों से निपटने स्नान-ध्यान के अलावा पक्षियों का कलरव सुनने, साफ-सुथरी हवा में विचरण करने, अपना-अपना भविष्य उत्कर्षमय बनाने के लिए उपवन में खिलखिला रहे फूल, तितलियाँ और भँवरे तथा पूर्व दिशा में उगते बालारूण को देखकर आनंदित होने की सलाह करते हैं । एक अन्य कविता भी इस कृति में सुलभ है जिसमें बच्चे ज्ञान की देवी माँ वीणापाणि से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें सुशिक्षित बनावें, परोपकारी और बालक श्रवण कुमार की तरह ही मातृ-पितृ भक्‍त भी । वह आपसी ईर्ष्या-द्वेष शून्य, शान्तिप्रिय तथा शक्‍तिमान भी बनाने और महाराणा प्रपात, शिवाजी, गौतम बुद्ध तथा महावीर के बताये मार्ग पर गतिशील रहने की विनती भी करते हैं ।
प्रत्येक पृष्ठ पर बड़े ही आकर्षक रेखाचित्र इस कृति की जान हैं । कवितायें और ये चित्र समवेत रूप से सोना और सुहागा की भूमिका अदा करते हैं । कृति की दोनों ही रचनायें सर्वथा सरल तथा सुग्राह्य भाषा में होने के कारण उनका संदेश पाठकों तक जाता है । बालोपयोगी रचनाओं की इस पुस्तिका के लिए रचनाकार के अलावा प्रकाशक, वितरक तथा रेखा चित्रकार समान रूप से साधुवाद के पात्र हैं ।

पुस्तक-“सुबह सवेरे"
रचनाकार- डॉ. ए. कीर्तिवर्द्धन डॉ. कौशलेन्द्र पाण्डेय(लखनऊ)

आतंकवाद के खात्में के लिए महारूद्राभिशेक

विश्‍व की सबसे बड़ी समस्या बनते जा रहे आतंकवाद से निपटने के लिए अब धार्मिक क्षेत्रों से भी पहल होने लगी है । पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में उज्जैन के विश्‍व प्रसिद्ध महाकालेश्‍वर मंदिर के मुख्य पुजारी रमण गुरू ने यही अनूठा प्रयोग किया । बिड़ला मंदिर में आयोजित इस रूद्राभिशेक कार्यक्रम में धर्म, अध्यात्म के जरिये आतंकवाद की समूल नष्ट करने के लिए भव्य आयोजन हुआ । जिसमें देश भर से आये ४०० लोगों ने एक स्वर से धर्म के मूल तत्वों को अपनाने, मानवता को मजबूत करने के लिए महारूद्राभिशेक में शिरकत की । इस अनूठे आयोजन में प्रथमतः महालेश्‍वर मंदिर के मुख्य पुजारी रमण गुरू ने देश भर में आतंक के खात्में के लिए आये ४०० लोगों के बीच शिवालिंग-रूद्राभिशेक किया । तत्पश्‍चात्‌ लोगों को शपथ दिलायी कि - “हम देशहित, समाजहित में आतंकी खात्मे के लिए प्राणपण से जुटेंगे ” । मुख्य पुजारी रमण गुरू ने तत्पश्‍चात लोगों के महाकालेश्‍वर के उद्‌घोष “जय महाकाल” के जरिये आत्म विभोर कर दिया । समाज हित के लिए दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी एवं सरहदी गांधी की तर्ज पर इस आयोजन को आगे बढ़ाने के लिए जन सहयोग की अपील की । उपस्थित भक्‍तों, बुद्धिजीवियों एवं राजनीतिज्ञों ने आतंकवाद के खात्मे के लिए मुख्य पुजारी रमण गुरू को शपथ दिलाकर धार्मिक मूल्यों को बढ़ाने की सहमति जतायी । इस अनूठे कार्यक्रमों को सम्पन्‍न कराने में क्षेत्रीय एस०डी०एम० भूपिन्दर सिंह, ज्योतिषाचार्य शिवहर्ष मिश्र एवं डॉ० जयशंकर पाण्डेय का सराहनीय योगदान रहा ।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

अनुभूति की काव्य श्रुंखला से श्रोतागण मुग्ध


साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान २ दिसंबर को रविन्द्र भवन प्रांगण में कवियों ने कविताओं की बारिश की . इस काव्यपाठ में गगन गिल(हिन्दी), अनुभूति चतुर्वेदी (हिन्दी), शाहीना खान (अंग्रेजी),नुसरत जहीर(उर्दू) ने भाग लिया .गगनजी की "थोडी सी उम्मीद चाहिये" ,शाहीना खान की मानवाधिकार पर अंग्रेजी कविता तथा नुसरत जहीद की गजल और नज्म "शाखों पर दरख्तों को कुर्बान नहीं करते" , "ख्वाबों में ही कुछ शक्ल आए तो आ जाए", " "मोहब्बत अब नही होगी"को सराहना मिली .
सबसे अंत में हिन्दी कवियित्री अनुभूति चतुर्वेदी की कविताओं ने ऐसा शमाँ बाँधा कि श्रोतागण भावविभोर हो गए .अनुभूति ने कहा कि मैं ऐसी कविता सुनाउँगी जो गरमी पैदा कर दे .उनकी कविता " वर्तमान राजनीति के संदर्भ में"-
"बरगद उग आए हैं /पूरे शहर को ढक लिया है/बर्षों से जी रहे हैं /फिर भी जीना चहते हैं और /जडें पाताल तक पहुँच गई हैं /डालें लटक गई हैं झुककर /पत्ते झड गए हैं /पीली पडती टहनियाँ /उनकी बीमारियों का खुला दस्तावेज है /न जाने कितनों ने अभी तक ,गिद्ध और चीलें पाली हुई हैं / अपनी हवस से यह ताजे उगते हरे पेडों को भी /मुरझा देना चाहते हैं / इन्हें हरी नरम पत्तियाँ /बहुत पसंद हैं/ खास तौर पर एकदम मुलायम/अभी -अभी खिली कलियाँ /कलियाँ तो क्या / पूरे शहर को ही लील जाना चाहते हैं /भूखे भेडिए.
संबंध पर यथार्थ चित्रण " पिता और उनके मित्र" कविता में ----
घर फोन किया था -पिता के स्वास्थ्य के लिए / भाभी ने बताया /थीक तो हैं लेकिन अभी भी कुछ -कुछ भूल जाते हैं / माँ भी अस्वस्थ रहती हैं -मैने पूछा/ क्या फोन आते हैं? /भाभी ने कहा ,थोडे-बहुत/ यों भी हमने फ़ोन कमरे से हटा दिया है/अच्छा किया ? / और ये फोन कम कैसे हो गए- मैंने पूछा/ भाभी बोली..../सभी ने पापा से अपने काम निकाल लिए / सारे रहस्य जान लिए मित्र बनकर/ अब उनको क्या लेना देना उनके स्वास्थ्य से / बात कितनी सही कही भाभी ने / सच है कि स्वार्थ का ही दूसरा रूप / रह गए हैं संबंध।
नए युग का विद्रूप चेहरा कुछ इस तरह प्रस्तुत किया अनुभूति ने-
दस्तक:इक्कीसवीं सदी
इक्कीसवी सदी की घोषणा /किसी बिगुल से नहीं /किसी नगाडे की थाप से नहीं /केवल जलती हुइ आग / बिषैला एटमी धुआँ /बिलखते भूखंड /स्वागत करते हुए उपस्थित हुए / एक कारवाँ इंटरनेट और/ परमाणुओं का / जाल की तरह बिछ गया / युद्ध के मौके का फायदा ले / किए दनादन वार/ खत्म हुए नगर के नगर / हरी -भरी बस्तियाँ ,जंगल/ कब्रिस्तान में बदल गए / किस्मत से एक बूढा बच गया / अचरज से देखने लगा / यह सभी दृश्य / और सहसा बोल उठा ../सचमुच मैं नरक में हूँ।
अनुभूति ने विदूषक को काव्य रूप में इस तरह प्रस्तुत किया--
तेवर क्यों बदल रहे हो ?/ क्यों अपने आप को मथ रहे हो?/मथ लो तब तक / जब तक कि जड ना हो जाओ/ एक बिदूषक से लग रहे हो / इन बदलती मुद्राओं में/ अब तो मैं सभी नाटकीय मुद्राओं का / आनंद लेती हूँ ।
अपनी कविता के माध्यम से सूर्य को आगाज किया अनुभूति ने-
यह भीगी हुई चादर हटाकर /अपनी प्रचंड उष्मा के साथ सामने आओ/ हे सूर्य! /और मुझे आलिंगनबद्ध कर लो /विश्व ने कब गर्भ दिया है / किसी वसुन्धरा को / सिर्फ छला है , बाँटा है ,रौंदा है/बीघा-बीघा मूल्य ,बीघा- बीघा स्वामित्व/ ये व्यापारी , ये ग्राहक क्या मुझे प्रेम देंगे? / हे सूर्य, बाहर निकलो इन श्रावणी परदों से / और अपने प्रचंड प्रकाश में / मुझे रोम - रोम नहला दो / छुओ मुझे अपनी प्रेम उष्मा से /और पूरे विश्व के सामने /अंकुरित करो मेरे स्वप्न शिशु।
अनुभूति की कविता " बेटे के लिए "
बेटा बोलने लगा है / बात करता है इस नए संसार की / जिसे वह धीरे -धीरे समझ रहा है/ पूछता है सवाल / फ़ुटबॉल, कुश्ती, समाज, कंप्यूटर/और आतंकवाद के संबंध में / इतनी कम उम्र में वयस्कों सी बुद्धि/ क्या वह उम्र से बहुत पहले ही , सब कुछ परखना चाहता है? / उसको जबाब न देने पर / और अपनी व्यस्तताओं में / मैं भूल जाती हूँ कि वह गुस्से में तोड फोड कर / फर्श को तोड- मरोड देगा/ फौलादी बन रहा है बेटा !
अनुभूति ने "सृजन" शक्ति को अनोखे रूप में प्रस्तुत कर वाहवाही बटोरी-
हजारों खून के कतरे गिरकर/ बनते हैं शब्द/और एक खूनी नदी में / मथकर / डूबकर / होता है सृजन।
संक्षेप में कहा जाय तो " अनुभूति ने अपनी कव्य प्रतिभा से सबों को प्रभावित किया क्योंकि उन्होने समसामयिक विषयों को बखूबी रूप में प्रस्तुत किया । अनुभूति चतुर्वेदी का सीधा सरोकार साहित्य और संस्कृति से रहा है । वह हिन्दी के विख्यात कवि , लेखक पद्मश्री जगदीश चतुर्वेदी की सुपुत्री हैं। अनुभूति साहित्य जगत में विगत ३० बर्षों से लिख रही हैं । उनके चार कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह , एक उपन्यास हैं । उनकी कृतियों पर कई राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं ।अपनी संसथा पल्लवी आर्ट्र्स के द्वारा अनेक कवि , लेखक ,पत्रकार , चित्रकार, नर्तक, गायक , मूर्तिकार के कई पीढियों को जोडने का काम कर रही हैं । इसके अतिरिक्त ओडिसी में पिछले २२ बर्षों से वह साधनारत हैं । अपने नृत्य का उन्होने देश- विदेशों में सफल प्रदर्शन किया है । इराक के बेबिलोन सम्मेलन में चित्रकार ,कवियों को लेकर वह भरत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं । लंदन में दो बार भारत के साहित्य , संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया है ।

गोपाल प्रसाद
संपादक, समय दर्पण
gopal.eshakti@gmail.com
mob:9289723145