रविवार, 14 नवंबर 2010

सूचना का अधिकार (RTI) वर्तमान स्थिति एवं चुनौतियाँ

सरकार, सरकारी योजनाएँ और तमाम सरकारी गतिविधियाँ हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । आम आदमी से जुड़े कई मामले प्रशासन में बैठे भ्रष्ट, लापरवाह या अक्षम कर्मचारियों/अधिकारियों के कारण फलीभूत होने के बजाय कागज का पुलिंदा बनकर रह जाती है । सन्‌ १९४७ में मिली कल्पित आजादी के बाद से अब तक हम मजबूर थे । व्यवस्था को कोसने के सिवाय कुछ नहीं हैं, क्योंकि आज हमारे पास ‘सूचना का अधिकार’ (RTI) नामक औजार है, जिसका प्रयोग करके हम सरकारी विभागों में अपने रूके हुए काम आसानी से करवा सकते हैं । इस हेतु हमें ‘सूचना का अधिकार अधिनियम २००५’ की बारिकियों को ध्यानपूर्वक समझना और समझाना होगा । सामाजिक क्षेत्र में यह कानून ग्राह्य हो, इसके लिए बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, महिलाओं, युवाओं के विशेष रूप से जागरूक किए जाने की आवश्यकता है । भगत सिंह ने क्रांति को जनता के हक में सामाजिक एवं राजनीतिक बदलाव के रूप में देखा था । सूचना का अधिकार (RTI) को हल्के अंदाज में न लेकर एक बड़े आंदोलन के रूप में देखें, सोंचे एवं मूल्यांकन करें तभी वास्तव में इसकी सार्थकता सिद्ध होगी । ६३ साल पूर्व मिली आजादी वास्तव में सत्ता के अदला-बदली की औपचरैकता भर बनकर रह गई । शोषितों का शोषण नहीं रूक बल्कि आम आदमी की परेशानियाँ और बढ गई । आज ज्यादातर लोग प्रशासन/व्यवस्था को मन ही मन गाली देकर अपनी भड़ास निकल लेते हैं, परन्तु क्या इससे कुछ समाधान मिल सकता है । समाधान हेतु व्यक्‍ति को व्यवस्था परिवर्तन का अंग बनकर उस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने हेतु तत्पर होना पड़ेगा । क्या है सूचना का अधिकार अधिनियम २००५? ःइस अधिनियम के तहत आवेदन करके हम किसी भी विभाग से कोई भी जानकारी माँग सकते हैं और अधिकारी/विभाग माँगी गई सूचना को उपलब्ध करवाने के लिए बाध्य है, बशर्ते वह सूचना माँगने के तरीके की शैली में हो । यही बाध्यता/जबाबदेही ना केवल पारदर्शिता की गारंटी है, बल्कि भ्रष्टाचार के उन्मूलन का तथ्य भी निहित है । वास्तव में यह अधिनियम आम आदमी के लिए आशा की किरण नहीं बल्कि आत्मविश्‍वास भी लेकर आया है । इस औजार रुपी अधिनियम का प्रयोग करके हम अपनी आधी-अधूरी आजादी को संपूर्ण आजादी बना सकते हैं । इस संपूर्ण आजादी को पाने के लिए अधिनियम को गहराई से अध्ययन कर ज्यादा से ज्यादा लोगों को जागरूक कर संपूर्ण क्रांति का शंखनाद करना पड़ेगा । सूचना का अधिकार करेगा क्रांति का शंखनाद ःभगत सिंह ने कहा था- हमारी लड़ाई, हमारी कमजोरियों के खिलाफ है । हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्‍वास करते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्‍ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके । क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और विद्रोह तो सिर्फ मालिकों के परिवर्तन द्वारा सड़ाध को ही आगे बढ़ाते हैं । लोगों के परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है । क्रांति एक ऐसा करिश्‍मा है, जिससे प्रकृति भी स्नेह करती है, क्रांति बिना सोची-समझी हत्याओं और आगजनी की दरिन्दगी भरी मुहिम नहीं है और न ही क्रांति मायूसी से पैदा हुआ दर्शन ही है । वास्तव में भगत सिंह के विचारों को जीवन में आत्मसात कर क्रियान्वित किए बिना क्रांति संभव नहीं । वैचारिक क्रांति/आंदोलन को धार देने के साथ-साथ उस हेतु समयबद्ध कार्यक्रम व दूरदर्शी योजना बनानी होगी तभी हम सफल हो सकते हैं और अपने अधिकारों को पा सकते हैं । दूसरे के कंधों पर बंदूक रखकर चलाने के बजाय हमें स्वयं को प्रशिक्षित करना चाहिए । जिंदगी के आम जरूरत की तरह आगे आनेवाले समय में सूचना का अधिकार (RTI) भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता की श्रेणी में आ जाएगी । सामाजिक परिवर्तन सदा ही सुविधा संपन्‍न लोगों के दिलों में खौफ पैदा करता रहा है । आज सूचना का अधिकार धीरे-धीरे ही सही परन्तु लगातार सफलता की ओर बढ़ रहा है । पुरानी व्यवस्था से सुविधाएँ भोगनेवाला तबका भी इस अधिनियम का पैनापन खत्म करने की कोशिश में प्रारम्भ से ही रहा है । कुछ सूचना आयुक्‍तों का रवैए से इस कानून का बंटाधार होने की आशंका भी प्रबल हो गयी है । सूचना का अधिकार से जुड़े हुए कार्यकत्ताओं का उत्पीड़न अभी भी जारी है और केन्द्रीय सूचना आयोग, केन्द्र एवं राज्य सरकार उन कार्यकर्त्ताओं को पूर्णसुरक्षा देने, बेवजह तंग होने से बचाने में असमर्थ है । इस हेतु उनकी कोई नीति/नियमावली ही नहीं है । कई महीनों इंतजार के बाद भी माँगी गई सूचनाएँ नहीं मिलती या फिर अधूरी और भ्रामक मिलती है । उसके बाद भी यदि कोई आवेदक, सूचना आयोग में जाने की हिम्मत भी करता है, तब भी कई आयुक्‍त तो प्रशासन के खिलाफ कोई कार्रावाई नहीं करते । स्थिति ऐसी है कि हम तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी उसी जगह खड़े है, जहाँ कई दशक पहले खड़े थे । क्रांतिकारियों की कुर्बानियाँ बेकार हो रही है जिनके लिए आजाद हिंदुस्तान से आजादी के बाद वाला हिंदुस्तान ज्यादा महत्वपूर्ण था । क्या उन क्रांतिकारियों को दी गई यातनाएँ नहीं झुका पाई? हमारा उत्पीड़न या कोई भी असफलता क्या हमारे इरादों को तोड़ सकती है, यह यक्षप्रश्न आज हमारे समक्ष खड़ा है ? सूचना का अधिकार से जुड़े कार्यकर्त्ताओं को इस अधिकार को और अधिक मजबूती से प्रयोग करने एवं इसके पूर्ण सशक्‍तिकरण गेतु संगठित एवं आंदोलित होना चाहिए । देश हमारा है, सरकार भी हमारी है, इसलिए अपने घर को साफ रखने की जिम्मेवारी भी हम सबकी है । इसलिए हमें अपने अधिकार की रक्षा हेतु अपने कर्तव्यों का पूर्ण पालन करना चाहिए । क्या है (RTI) की कमियाँ?पुरानी कार्य-संस्कृति, पुरानी सोंच, प्रशासनिक उदासीनता एवं बाबूशाही शैली में कार्य करनेवाले लोगों में इस एक्ट को लेकर काफी बेचैनी है, और इस तरह के लोग (RTI) को अंदर ही अंदर को सटे रहते हैं । इसके कारण ७० प्रतिशत आवेदकों को ३० दिनों में कोई सूचना नहीं मिली । यदि मिली भी तो ३० प्रतिशत को ही सूचना मिली और वह भी गलत, अपूर्ण या भ्रामक । आरटीआई में ऐसा कोई मैकेनिज्म ही नहीं बनाया गया जिससे यह पता चल सके कि किस आवेदक को सूचना मिली या नहीं मिली और नाही संबंधित विभाग । सेक्शन माँगी गई सूचना के जबाब की प्रतिलिपि ही आरटीआई सेल में देने की नैतिक जिम्मेदारी ही पूरी करते हैं । आरटीआई सेल में कर्मचारियों की भयंकर कमी है । आरटीआई के तहत आवेदकों का ढेर लगता जा रहा है, परन्तु कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने हेतु प्रशासन का रवैया उदासीन है, जो गंभीर एवं सोचनीय है । आरटीआई के सूखी सीट पर आने के लिए कर्मचारी तैयार ही नही होते और जो कर्मचारी इस सेल में आने के लिए उत्सव भी हैं उन्हें विभिन्‍न कारणों से यहाँ लगाया ही नहीं जाता । जन सूचना अधिकारियों के समक्ष काम का अत्यधिक बोझ है । सूचना अधिकारियों को अपने दैनिक कार्य के साथ-साथ आरटीआई का काम भी देखना पड़ता है और इसी दोहरे बोझ की वजह से आरटीआई का कार्य प्रभावित होता है । ज्यादातर विभागों में आरटीआई सेल में कोई कोऑर्डिनेटर ही नहीं है, जिससे यह सुनिश्‍चित हो सके कि आवेदक को ३० दिनों के भीतर और सही सूचना प्राप्त हुई अथवा नहीं । क्या इस ओर प्रशासन/सरकार की नींद कभी टूटेगी या ऐसी ही चलेगा?
सूचना का अधिकार कानून की विशेषता ः-१. सूचना का अधिकार के तहत जमा किए गए आवेदक का उत्तर ३० दिनों के अंदर देना आवश्यक है अन्यथा प्रतिदिन की देरी के हिसाब से २५० रू० मात्र का जुर्माना देना पड़ सकता है । २. इस कानून के तहत आप सरकारी निर्माण कार्यों का मुआयना भी कर सकते हैं । ३. अब आप सरकारी निर्माण में प्रयोग की गई चीजों का नमूना भी माँग सकते हैं ।४. किस अधिकारी ने फाईल पर क्या लिखा है, कि जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं अर्थात्‌ इस अधिकार का प्रयोग करके आप फाईल नोटिंग्स की प्रतिलिपि भी ले सकते हैं ।
शिकायत भी कम नहीं ः-१. आवेदकों को सूचना का अधिकार के तहत आवेदन जमा करवाने तक के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है ।२. सूचना आयोग में कानून का कड़ाई से पालन नहीं करने से सरकारी अफसर अपनी मनमानी कर रहे हैं । छोटे-मोटे मामलों में तो सूचनाएँ मिल भी जाती है परन्तु नीतिगत मसलों, बड़ी योजनाओं या फिर जहाँ किसी भ्रष्टाचार का अंदेशा हो तो सरकारी अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं । ३. सूचना का अधिकार का प्रचार-प्रसार स्वयंसेवी संस्थाओं या फिर कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा ही किया जा रहा है । सरकार अपनी ओर से इस कानून के प्रचार की कोई जिम्मेवारी नहीं निभा रही है । सरकार इस अधिकार के प्रचार-प्रसार में कोई रूचि नहीं ले रही है । उदाहरणस्वरूप २००६-०७ के दौरान प्रिंट मीडिया को १०९ करोड़ रूपया और इलेक्ट्रानिक मीडिया को १०० करोड़ रूपया का विज्ञापन किया गया परन्तु उनमें से एक भी विज्ञापन सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के लिए नहीं था । ४. इस अधिनियम के तहत तमाम सरकारी विभागों को जनसूचना अधिकारी तो नियुक्‍त करवा दिए परन्तु सूचना अधिकारियों को आवश्यक सुविधाएँ नहीं दी । कई विभागों में तो आरटीआई के बारे में प्रशिक्षण भी नहीं दी गई है । कहीं-कहीं आरटीआई सेल को कमरा भी उपलब्ध कराया गया है । ५. सूचना आयोग में भी अदालतों की तरह केसों का ढेर लगता जा रहा है । किसी केस की सुनवाई जल्दी नहीं हो पा रही है । वास्तव में सूचना आयोगों में भी पर्याप्त संख्या में न तो आयुक्‍त हैं न आवश्यक सुविधाएँ । ६. कई दागदार व्यक्‍तियों को भी सूचना आयुक्‍त/सूचना अधिकारी बना दिया गया है । यदि उन्हें मौका मिला तो इस कानून को तहस-नहस कर देंगे । ७. कई सूचना आयुक्‍त तो न्याय की सामान्य प्रक्रिया तक नहीं जानते । न्याय करने के लिए दोनों पक्षों की सुनवाई आवश्यक है परन्तु आयुक्‍त तो सिर्फ आवेदक को ही बुलाकर कुछ ही मिनटों में सुनवाई पूरी कर देते हैं । कभी-कभी तो आवेदक के खिलाफ भी फैसला कर डालते हैं ।
कैसे करें आरटीआई आवेदन ः-१. सादा कागज पर ही आवेदन करें ।२. नकद, बैंक ड्राफ्ट, बैंकर्स चेक या पोस्टल ऑर्डर से शुल्क जमा करें । जो भी बैक ड्राफ्ट, बैकर्स चेक या पोस्टल बनवाएँ उन पर उस जनसूचना अधिकारी का नाम हो जिससे सूचना माँगी जाय । ३. आवेदन-पत्र संबंधित जन सूचना अधिकारी को स्वयं या डाक द्वारा भेजा जा सकता है । ४. आवेदनकर्ता को सूचना माँगने का कारण बताना जरूरी नहीं है । ५. यदि सूचना माँगने वाला व्यक्‍ति गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहा है तो उसे कोई शुल्क नहीं देना होगा, लेकिन उसे गरीबी रेखा के नीचे रहने का प्रमाणपत्र की छायाप्रति लगानी होगी । ६. कोई भी व्यक्‍ति ग्राम पंचायत से लेकर राष्ट्रपति महोदय तक किसी ही सरकारी कार्यालय से किसी भी अभिलेख, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, आदेश, लॉगबुक, कान्ट्रैक्ट, रिपोर्ट आँकड़े, माजल आदि की सूचना प्राप्त कर सकता है । ७. यदि ३० दिनो के भीतर सूचना नहीं मिलती है तो आपको अप्रील अधिकारी के पास (जो उसी विभाग का वरिष्ठ अधिकारी होगा) प्रथम अपील दाखिल कर सकते हैं । ८. यदि प्रथम अपील करने के ३० दिनों तक भी सूचना नहीं मिले तो संबंधित सूचना आयोग में ९० दिनों के भीतर दूसरी अपील कर सकते हैं ।
कैसे करें शिकायत/ अपील ः-१. यदि आवेदनकर्ता को किसी भी आधार पर कोई सूचना देने से मना किया जाता है या ३० दिनों के भीतर सूचना नहीं मिलती है तो प्रथम अपील अधिकारी के पास शिकायर/अपील की जा सकती है ।२. यदि आवेदनकर्ता प्रथम अपील अधिकारी के निर्णय से भी असंतुष्ट हैं तो आवेदनकर्त्ता राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील कर सकता है । ३. यदि आवेदनकर्ता को सूचना अधिकारी का नाम नहीं बताया जाता है या फिर आवेदन लेने से ही मना किया जाता है तो आवेदक राज्य सूचना आयोग के पास शिकायत कर सकता है । ४. यदि आवेदनकर्त्ता को लगता है कि उससे माँगा गया शुल्क अविश्‍वसनीय या मिथ्या है तो भी सूचना आयोग से शिकायत की जा सकती है । ५. यदि आप साक्षर नहीं है या शारीरिक रूप में अक्षम हैं जो जनसूचना अधिकारी की बाध्यता है कि वह आपकी मदद करे । ६. यदि जन सूचना अधिकारी की लापरवाही की वजह से आपको कोई हानि हुई हो अथवा बार-बार सूचना आयोग के पास जाना पड़ा हो तो आप व्यय-भार की भरपाई की माँग करें । केंन्द्रीय सूचना आयोग ने इसी तरह के कुछ मामलों में आवेदकों को हरजाना दिलवाया है ।
नोट ः ऐसी कोई भी जानकारी देश की संप्रभुता, अखंडता एवं सुरक्षा को प्रभावित करती हो, विधायिका या संसद के विशेषाधिकार का हनन करें या धारा-८ के अंतर्गत आती हो, ऐसी सूचना नहीं दी जा सकती है ।

- गोपाल प्रसाद

सोमवार, 1 नवंबर 2010

आर.टी.आई के अस्त्र से से करें भ्रष्टाचार रुपी रावण का अंत : श्री सनातन धर्म लीला कमेटी


पुरानी दिल्ली स्टेशन के सामने दंगल मैदान में श्री सनातन धर्म लीला कमेटी की ओर से आयोजित रामलीला मंचन के अंतिम दिन भगवान राम का राज्याभिषेक उत्सव (राजतिलक ) के अवसर पर संस्था के कार्यवाहक अध्यक्ष सुरेश खंडेलवाल ने कहा की बुराईपर अच्छाई की जीत का प्रतीक मन जानेवाला त्योहार विजयादशमी भी अब प्रतीकात्मक ही रह गया है .अगर हम अपने चारों तरफ नजर डालें तो भ्रस्ताचार , महंगाई ,लालच , अपराध आदि तमाम बुराईयों के रावण प्रतिदिन सर उठा रहे हैं परन्तु उनका संहार करने कोइ राम नहीं आएगा क्योंकि जिन राजनेताओं पर भरोसा करके हमने उन्हें आदिकार संपन्न बनाया वह तो आज खुद रक्षक से भक्षक बन चुके हैं .हमलोगों को अपने बलबूते पर इससे निपटना होगा .इसके लिए देश के सभी नागरिकों को एकजुट होने की आवश्यकता है . कॉमनवेल्थ खेल के दौरान हुए तमाम भ्रष्टाचार को लीपापोती की आशंका ही ज्यादा है. इस तरह के तमाम समस्याओं को जड़ -मूल से नष्ट करने के लिए जनता को ही आगे आकर मोर्चा संभालना होगा . संस्था के प्रचार मंत्री अनिल कुमार मित्तल ने कहा की रामराज्य में भी आम लोगों को सूचना का अधिकार प्राप्त था. राम के शासनकाल में एक धोबी द्वारा सीता के चरित्र से सम्बंधित प्रश्न पूछने पर राम ने सीता को अग्नि परीक्षा देने को कहा था. आज भष्टाचार रुपी रावण से मुकाबला करने के लिए सूचना का अधिकार (RTI ) नाम का अमोघ अस्त्र है , बशर्ते की उसे सही दिशा में सही तरीके से प्रयोग किया जा सके, इसके लिए आम लोगों को उनके अधिकारों के प्रति पूरी तरह से सचेत करने की आवश्यकता है.

संस्था के मंत्री प्रदीप बजाज ने कहा की अब हमारे पास सूचना का अधिकार के रूप में एक ऐसा हथियार है जो किसी भी सरकारी विभाग की गडबडियों की पोल चुटकियों में खोल सकता है .इस विजयादशमी पर हम सभी न केवल अपने स्टार पर भ्रष्ट आचरण से दूर रहने का संकल्प लें बल्कि मन में यह भी ठानें की हम दूसरों को भी ऐसा करने से रोकेंगे. संस्था के प्रमुख सलाहकार नानक चंद अग्रवाल ,विशिष्ट उप प्रधान रजनीश गोएनका,प्रचार मंत्री के.के. नरेडा आदि पदाधिकारियों ने संकल्प लिया कि अगले बर्ष और अधिक उत्साह एवं उमंग के साथ रामलीला का आयोजन करेंगे जिससे भारतीय संस्कृति कि रक्षा हो सके.

राष्ट्र निर्माण के परिप्रेक्ष्य में १९ वां राष्ट्रमंडल खेल ,२०१०




राष्ट्रीय विचार मंच एवं अनुव्रत महासमिति के संयुक्त तत्वावधान में लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की १३५ वीं जयंती के अवसर पर आयोजित "राष्ट्र निर्माण के परिप्रेक्ष्य में १९ वां राष्ट्रमंडल खेल ,२०१० विषय के संगोष्ठी की अध्यक्षता पदमश्री श्याम सिंह शशि ,विषय प्रवर्तन राष्ट्रीय विचार मंच के संरक्षक एवं विचार दृष्टि पत्रिका के संपादक सिद्धेश्वर जी ने की. संगोष्ठी में मुख्य रूप से गाँधी प्रतिष्ठान के सचिव सुरेन्द्र कुमार ,नगरी लिपि परिषद् के मंत्री डा. परमानंद पंचाल, अनुव्रत महासमिति के संयुक्त मंत्री बी एन पाण्डेय ,लोक सभा सचिवालय के उप सचिव नवीन कुमार झा ,आर.टी. आई एक्टिविस्ट गोपाल प्रसाद ,सामाजिक कार्यकर्ता डा. प्रसून प्रमुख रूप से उपस्थित थे .समारोह का उदघाटन जयपुर के वरिष्ठ साहित्यकार डा. नरेन्द्र शर्मा "कुसुम" ने की. अतिथियों का स्वागत राष्ट्रीय विचार मंच के सचिव प्रो. पी. के. झा "प्रेम" तथा विचार दृष्टि पत्रिका के संपादक उपेन्द्र नाथ ने धन्यवाद ज्ञापन किया. इस अवसर पर विचार दृष्टि पत्रिका के "राष्ट्रमंडल खेल -2010 विशेषांक का लोकार्पण पदमश्री डा . श्याम सिंह द्वारा किया गया. सभी वक्ताओं ने राष्ट्रमदल खेल से सम्बंधित विभिन्न पहलुओं पर अपनी चिंताएं व्यक्त की.
आर.टी.आई एक्टिविस्ट गोपाल प्रसाद ने इस अवसर पर कहा की राष्ट्रमंडल खेल में बिहार पीछे रह गया ,इसका मुझे खेद है. इस खेल में तमाम विज्ञापनों में हिंदी की घोर उपेक्षा की गयी और पाश्चात्य देश की सभ्यता संस्कृति को बढ़ावा दिया गया,जो शर्मनाक है. भारत के खेल बाजार की घोर उपेक्षा कर विदेश से वे सामान भी आयत कर मंगाए गए जो देश में उपलब्ध थे, इसका क्या अर्थ है? देश के खेल एवं खिलाडियों को बढ़ावा देने के लिए क्या किया गया?उन्होंने अपने उद्बोधन में आर.टी. आई में हिंदी का प्रयोग और जन सूचना अधिकारी से हिंदी में जबाब देने के आग्रह का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा की आज समय आ गया है की हम अपनी जिम्मेवारियां समझें तथा आम हित की भावना से राष्ट्रीय मुद्दों एवं ज्वलंत समस्याओं पर आर.टी.आई फाईल करे. आज राष्ट्रमंडल खेल के जांच की मॉनिटरिंग और जिम्मेवार से रकम वापस सरकारी कोष में लाने के लिए वे प्रयासरत हैं.

मंगलवार, 4 मई 2010

नए वर्ष में ले नया संकल्प

अब हम नए वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं । नए दशक में प्रवेश के साथ ही हमें नए संकल्प भी लेने होंगे क्योंकि बगैर संकल्प लिए भारत को महाशक्‍ति बनाने का मंसूबा अधुरा ही रह जाएगा । पिछले वर्षों में हमलोगों ने बहुत सारी समस्याओं पर चिंतन-मनन किया पर नए वर्ष में हमें केवल और केवल समाधान ढूँढकर भी कहा है कि “अगर समस्या है तो उसका समाधान भी है । ” सभी क्षेत्रों में सफल देशों की सूची में भारत का नाम तभी शामिल हो सकता है जब इस देश के नागरिक नई मानसिकता, नई तकनीक, नई ऊर्जा एवं नए दृढ़संकल्प के साथ देश को अग्रणी बनाने में अपना योगदान देंगे । निश्‍चित रूप से यह कठिन है मगर असंभव नहीं । सकारात्मकता के लीक पर चलकर हम इसे निश्‍चित रूप से पूरा कर सकते हैं । राष्ट्र के सर्वागीण विकास हेतु आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है । आर्थिक सुधार एवं विकास का फायदा जनसंख्या के बड़े भाग को मिले, यह हमें सुनिश्‍चित करना होगा । ऐसा देखा गया है कि ज्यादातर योजनाएँ सुविधा संपन्‍न वर्गों के हित में ही होती है जबकि देश के विकास में सभी वर्गों का सम्मान योगदान है । क्या सरकार के खजाने में गरीबों से वसूली गई कर शामिल नहीं है? फिर उनकी उपेक्षा क्यों? गरीबों के खून-पसीने की कमाई रूपी टैक्स का उपयोग नेताओं, अफसरों के नाजायज खर्चों पर ना हो यह कौन सुनिश्‍चित करेगा? यह कैसी मानसिकता है कि एक आम नागरिक से वसूली गई कर रूपी राशि के इस्तेमाल हेतु फैसलों में उनकी कोई भूमिका नहीं होती ।
हमारे देश की अधिकांश विकास परियोजनाएँ लेटलतीफी की शिकार है । वास्तव में उपयुक्‍त सुधार हेतु व्यापक संतुलन और समयसीमा का निर्धारण अतिआवश्यक है । हमें अपनी पुरानी कार्यशैली के स्थान पर “सिंगल विंडो सिस्टम” और हाइटेक तरीके अपनाने पड़ेगे । आगे बढ़ने के लिए सहभागिता, सहकारिता एवं समन्वय को अपनाना ही पड़ेगा इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है संवेदनशील होना क्योंकि “जब-जब संवेदना खत्म होती है, तब-तब युद्ध होता है । जरूरतमंद लोगों के प्रति हमें और अधिक संवेदनशील होने चाहिए सामाजिक उत्तरदायित्व क अनिर्वहन करके ही वास्तविक समृद्धि लाई जा सकती है । वास्तव में राजनैतिक सुधार, सामाजिक सुधार एवं न्यायिक सुधार एक दूसरे से संबद्ध हैं । देरी से मिली न्याय से विद्रोह होना ही है और इस बात को देश के मुख्य न्यायाधीश भी स्वीकार कर चुके हैं । त्वरित सुधार संभव है । हमें समस्या नहीं बल्कि समस्याओं के जड़ों को देखना होगा । जमीनी स्तर पर समस्याओं के निदान के बिना सब कुछ बेकार है । उदाहरण स्वरुप गंगा एवं यमुना नदी को ही लीजिए । इन नदियों को प्रदूषणमुक्‍त करने के नाम पर करोड़ों-अरबों की राशि खर्च कर दी गई, परन्तु समस्या जस की तस है फिर भी मंत्री बयान दे रहे हैं कि गंगा-यमुना को प्रदूषणमुक्‍त कर देंगे । क्या प्रदूषणमुक्‍त करने के लिए अब उनके पास कोई अलादीन का चिराग मिल गया है । गंगा के उद्‌गम स्थल गंगोत्री के पास गंगा को बाधित कर डैम बनाकर गंगा को मृत करने की साजिश से बिजली पैदा हो ना हो राजनेता ठेकादों के जेब निश्‍चित रूप से गर्म होंगे । क्या गंगा केवल नदी है? यह राष्ट्रीय नदी हमारे देश की संस्कृति और हमारी अस्मिता है । जिसे नष्ट करने पर राजनेता, अफसर ठेकेदारों ने कमर कस ली है । देश के बुद्धिजीवियों पर्यावरणविदों, चिंतकों एवं आंदोलनकारियों को गंगा की अविरलधारा को अक्षण्ण बनाने हेतु पुनः एक भागीरथी प्रयास करने होंगे । सरकार की कथनी एवं करनी में एकरूपता नहीं हैं । वास्तव में नीति और नीयत दोनों में खोट होने के कारण ही सारी समस्याएँ बढ़ रही है । जो नदी पनबिजली हेतु उपयुक्‍त नही हैं उसे रोककर पर्यावरण असंतुलित करके अनेक समस्याओं को आमंत्रित कर दिया है । आपको गंगा की सौगंध है कि नए वर्ष में आप गंगा को मुक्‍त करने का प्रण अवश्य लें ।

यामाहा ने भारत में अपनी स्पोर्टी इमेज को और पुख्ता किया

मोटो जीपी वर्ल्ड चैम्पियन वैलेन्टीना रॉसी को पहली बार यामाहा भारत लाई
-इंडिया यामाहा के ब्रांड ऐम्बैसडर जॉन अब्राहम के साथ बातचीत करते हुए वैलेन्टीनो रॉसी ने यामाहा के साथ अपने खास रिश्ते के बारे में बताया -

इंडिया यामाहा मोटर प्रा. लि. ने आज अंतरराष्ट्रीय मोटर स्पोर्ट में अपनी लीडरशिप को मजबूती से जाहिर किया । कंपनी ने इस खेल के सबसे बड़े सितारे वैलेन्टीनो रॉसी को आज पहली बार भारतीय बाइक प्रेमियों से रूबरू कराया । कंपनी ने यह ताजा कदम अपनी वैश्‍विक योजनाओं में भारत के महत्व को रेखांकित करने के लिए उठाया है । इसी दिशा में काम करते हुए इससे पहले यामाहा दुनिया भर में मशहूर अपने मॉडल वीमैक्स (१,६७९सीसी), वाईजैड‍ऐफ-आर१ (९९८सीसी) तथा ऐमटी०१ (१,६७०सीसी) को भारतीय बाजार में लांच कर चुकी है । अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मोटो जीपी वर्ल्ड चैम्पियन वैलेन्टीनो रॉसी ने भारतीय बाइकिंग आइकॉन तथा इंडिया यामाहा के ब्रांड ऐम्बैसडर जॉन अब्राहम के साथ दिलचस्प बातचीत में यामाहा के साथ अपने खास रिश्ते के बारे में बताया । रॉसी ९ जनवरी को ऑटो ऐक्सपो में अपने प्रशंसकों से मिलने आए तथा उन्होंने यामाहा के स्टॉल पर जाकर शानदार मोटरसाइकिल रेंज कर जायजा लिया ।
इस अवसर पर इंडिया यामाहा के सीईओ प्रबंध निदेशक श्री युकिमीने सूजी ने कहा, “इंड़िया यामाहा मोटर के लिए भारत में वैलेन्टीनो रॉसी का स्वागत करना बहुत फख का मौका है । दुनिया भर में हमारे ब्रांड को मोटर स्पोर्टस्‌ के लिए जाना जाता है और हम भारत में भी रेसिंग संस्कृति आरंभ कर चुके हैं । तथा अब हम और बड़े स्तर पर भारत में मोटर स्पोर्टिग की संस्कृति को दोहराने की तैयारी कर रहे हैं । वैलेन्टीनो रॉसी अंतरराष्ट्रीय मोटर स्पोर्ट में एक बड़ा नाम है तथा वे पहली बार भारत आए हैं । यहां आने पर उन्हें जिस प्रकार की जोरदार प्रतिक्रिया मिली है उससे मालूम चलता है की भारत में कितनी बड़ी संख्या में लोग इस खेल के दीवाने हैं । जितना उत्साह हमें यहा देखने को मिला है वह हमारे आब तक के सभी अनुभवों से कहीं बढ़कर है । ”
इंड़िया यामाहा के ब्रांड ऐम्बैसडर जॉन अब्राहम ने कहा, “मैं खुद वैलेन्टीनो रॉसी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ तथा मैं ने उनके रेसिंग कैरियर पर ध्यान रखा है । मुझे याद है जब मैं उनसे बरनो ग्रां प्री में २००५ में मिला था और आज यहां उनसे फिर मिलकर मुझे बहुत खुशी हो रही है । यह मोटर स्पोर्टिग कल्चर और इससे जुड़ा उत्साह ही है जो ब्रांड यामाहा से मेरे रिश्ते को मजबूत बनाता है । मेरे लिए बहुत गर्व की बात है कि मैं भी उसी ब्रांड से जुड़ा हुआ हूं जिसके साथ वैलेन्टीनो रॉसी जैसे मशहूर बाइकर जुड़े हुए हैं । यामाहा के साथ मेरा रिश्ता बहुत खास है तथा मैं इस ब्रांड के साथ और नजदीकी से काम करने की उम्मीद करता हूँ । ” यह वक्‍त यामाहा के लिए बहुत अहम है । कंपनी ने भारत के लिए जो योजनाएं बनाई हैं उन पर वह जोरदार तरीके से अमल कर रही है । यामाहा भारत में बाइकिंग की संस्कृति को अगले स्तर पर ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती और रॉसी का भारत आना इसी दिशा में एक कदम है ।
विश्‍व चैम्पियनशिप में रॉसी की आमद १९९६ में मलेशियन ग्रां प्री के जरिए हुई और उन्होंने अपने पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में एक जीत के साथ नौवां स्थान पाया । १९९७ में उन्होंने १२५सीसी वर्ल्ड चैम्पियनशिप में हिस्सा लिया और इस श्रेणी में सबसे कम उम्र के प्रतियोगी बने, उन्होंने ऐप्रिलिया के साथ ११ रेस जीती ।
२००४ में यामाहा के साथ जुड़कर रॉसी ने इतिहास कायम किया और उन्होंने सीजन-ओपनिंग ग्रां प्री में विजय हासिल की । उन्होंने १६ में से ९ रेस जीतीं और फिलिप आइलैंड में ग्रां प्री में विजय के साथ १२ सालों में पहली बार यामाहा के लिए विश्‍व चैम्पियनशिप का खिताब जीता । २००५ में रॉसी का दबदबा देखने को मिला उन्होंने ११ रेस जीती तथा यामाहा को मैनुफैक्चरर्स व टीम के खिताब जितवाए । २००६ में उन्होंने ५ रेस जीतीं तथा ५ पोल पोजिशन हादिल की, यह कारनामा किसी भी अन्य प्रतियोगी से बढ़ कर था । ९ जीतें, १६ पोडियम (दोनों ब्रेकिंग रिकॉर्डस्‌) और यामाहा वाईजैड‍आर-ऐम१ के साथ वर्ग में उनका छठा तथा कुल ८ वां क्राउन, इन सब के साथ ‘द डॉक्टर’ के नाम से मशहूर रॉसी ने खुद को २००८ में अब तक के सबसे महान मोटोजीपी रेसर के रूप में स्थापित कर दिया । रॉसी ने वर्ष २००९ में ग्रां प्री मोटरसाइकिल रेसिंग के इतिहास में अपना नाम पक्‍का कर दिया, उन्होंने प्रीमियर क्लास में ७वां और यामाहा के लिए चौथा टाइटल जीता जो की किसी भी अन्य निर्माता के मुकाबले ज्यादा बार है ।
१९५५ में जब से यामाहा की स्थापना हुई है तब से रेसिंग इसके दिल में है । यामाहा ने रेसिंग की दुनिया में कई मुकाम हासिल किए हैं, जैसे पहली जापानी कंपनी जिसने ५०० सीसी ग्रां प्री जीती (१९७३ में यारनो सारीनेन के साथ), ५००सीसी विश्‍व खिताब जीतने वाली पहली जापानी कंपनी (१९७५ में जाकमओ अगोस्तीनी के साथ) पहली बार कोई टू-स्ट्रोक मशीन प्रीमियर क्लास में जीती थी । टू-स्ट्रोक रेसरों की एक पीढ़ी की अगुआई करने के बाद अब यामाहा नई पीढ़ी की फोर-स्ट्रोक मशीनों का इस्तेमाल कर रही है, जिस पर सवार होकर स्टीफन ऐवर्टस्‌ वर्ल्ड चैम्पियनशिप मोटोक्रॉस पर दबदबा बनाए हुए हैं और २००१ से २००६ के बीच ६ खिताब जीत चुके हैं ।
इंडिया यामाहा मोटर प्रा. लि. के बारे में
यामाहा ने १९८५ में भारत में अपने कारोबार की शुरूआत की । यामाहा अगस्त २००१ से यामाहा मोटर कंपनी लिमिटेड, जापान ( YMC ) के तहत उसकी १०० प्रतिशत पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी के तौर पर काम कर रही है । २००८ में मितसुई एंड कंपनी लिमिटेड ने वाईऐमसी के साथ एक करार किया और ‘इंडिया यामाहा मोटर प्रा. लि. (IYM) के मोटर साइकिल निर्माण कंपनी में सह निवेशक बन गई ।
इंडिया यामाहा मोटर प्रा. लि. की आधुनिक निर्माण ईकाइयां सूरजपुर (उ.प्र.) एवं फरीदाबाद (हरियाणा) में स्थित हैं । इन फैक्ट्रियों में घरेलू व निर्यात दोनों बाजारों के लिए मोटरसाइकिल उत्पादन किया जाता है । २००० से अधिक कर्मचारियों वाली यह कंपनी अपने ग्राहकों का खास ख्याल रखती है । इसका देश भर में ४०० से ज्यादा डीलरों का नैटवर्क है । वर्तमान में इसके प्रोडक्ट पोर्टफोलियो में शामिल हैं- वीमैक्स (१६७९सीसी), ऐमटी०१ (१६७०सीसी), वाईजैड‍ऐफ-आर१ (९९८सीसी), फेजर (१५३सीसी), ऐफजैड-ऐस (१५३सीसी), ऐफजैड१६ (१५३सीसी), वाईजैड‍ऐफ-आर१५ (१५०सीसी), ग्लैडिएटर टाइप ऐस‍ऐस व आर‍ऐस (१२५सीसी), जी५ (१०६सीसी), अल्बा (१०६सीसी) और क्रक्स (१०६सीसी) ।

मर्सीडीज-बेंज इंडिया ने मल्टी एक्सेल कोच के लॉन्च केसाथ लग्जरी यात्रा को नये मुकाम पर पहुंचाया

* मर्सीडीज- बेंज इंडिया ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ३-एक्सेल लग्जरी कोच पहली बार भारत में लॉन्च की ।
* लग्जरी कोच चेसी की बारीकियों की पेशकश मर्सीडीज-बेंज करेगी जबकि कोच की बॉडी का निर्माण मर्सीडीज-बेंज की विशिष्टताओं और मानकों के अनुरूप सतलज मोटर्स करेगी ।
* नयी ३-एक्सेल कोच के बेजोड़ सुरक्षा एवं सुकून के मानक हैं वातावरण और अर्थ व्यवस्था से मेल खाते हुए ।
नयी दिल्ली - मर्सीडीज-बेंज ने आज अपनी बहुप्रतीक्षित ३एक्सेल लग्जरी कोच को पहली बार भारत में उतारने की घोषणा की । यह कोच मर्सीडीज-बेंज की ओ५०० आरएसडी २४३६ चेसी के साथ आयी है इसकी बॉडी की एसेम्बली भारतीय सहयोगी कम्पनी सतलज लिमिटेड द्वारा की जाएगी ।
डेमलर बसों के प्रमुख श्री हर्तमुट शिक ने कहा, “मर्सीडीज-बेंज कोच में मर्सीडीज ब्रांड की तमाम खूबियां समायी हैं । इनमें सुरक्षा, सुकून और टैक्नोलॉजी के उच्चतम मानकों का पालन सुनिश्‍चित किया गया है । इसके अलावा कोच की मजबूत निर्माण क्वालिटी है और स्वामित्व की लागत को नियंत्रित रखा गया है । मुझे यकीन है कि भारत के ग्राहकों को यह बहुत पसंद आएगी । ”
मर्सीडीज- बेंज इंडिया के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ विल्फ्रेड एल्बर ने मल्टी एक्सेल बसों के बारे में कहा, “भारत में बुनियादी सुविधाओं में तेजी से सुधार होने के साथ-साथ लोगों को सुकून और सुरक्षा देने वाले सामूहिक परिवहन वाहनों की जरूरत बढ़ गयी है । मर्सीडीज-बेंज कोच भारतीय बाजार की इसी मांग को पूरा करने के लिए पेश की गयी है । हमारी २- एक्सेल कोच को पहले ही काफी लोकप्रियता मिली है और नयी मल्टी एक्सेल कोच इस लोकप्रियता को भारतीय उपभोक्‍ताओं के बीच नयी ऊंचाइयों पर ले जाएगी । ”
मर्सीडीज- बेंज ३-एक्सेल बसों में ब्रांड की विश्‍वस्तरीय आकांक्षाएं समायी हैं और इनमें क्वालिटी लागत की कुशलता और सुरक्षा के उच्चतम मानक शमैल किए गए हैं । इसके साथ कंपनी का मजबूत सर्विस नेटवर्क भी है । दूसरे शब्दों में कहें तो यह नयी कोच बस ऑपरेटरों के लिए स्टार साबित होगी । ”
कोच देखने मे मोहक है । इसकी जोरदार और आमंत्रित करने वाली चिंडस्क्रीन है और फ्रंट फेस की लुक बहुत आकर्षण है । विंडस्क्रीन डिजाइन इसकी बॉडी से मेल खाता है और इससे सड़कों को पूरा परिदृश्य देखने को मिलता है । इन खूबियों से यह मर्सीडीज स्टार आकर्षक कोच की श्रेणी में गौरवशाली स्थान की हकदार है ।
यूरो ३ ईजन से लैस मर्सीडीज - बेंज ३ -एक्सेल बसें उच्च प्रदर्शन, शक्‍तिशाली टॉर्क आउटपुट और जबरदस्त ईधन कुशलता देने में सक्षम हैं । छह वर्टिकल सिलंडरों के साथ रियर ईजन टर्बो चार्ज्ड है और १२०० एनएम की टॉर्क १४००-१६०० आरपीएम की न्यूनतम आरपीएम पर देता है । इसका स्मार्ट सस्पेंशन सिस्टम लिफ्ट व्यवस्था के साथ है और शॉफर सड़क की खराब हालत देखकर कोच की ऊंचाई को उठा सकता है ।
तेज गति की स्थिति में भी मर्सीडीज- बेंज बसों को सुरक्षा के उच्चतम मानकों में ढाला गया है । ये बसें एबीएस (एंटी लॉक ब्रेकिंग सिस्टम) के साथ आयी हैं जिससे वाहन की सुरक्षा सम्पूर्ण रूप में बढ़ गयी है । एबीएस वाहन को ब्रेक लगाते समय सभी पहियों की लॉकिंग को प्रभावित करता है भले ही सड़कों की स्थिति कैसी भी हो । बस की बॉडी में इस्तेमाल की गयी सभी सामग्री अग्निरोधी प्रमाणित है ।
मर्सीडीज की सभी बारीकियां इस वाहन में हैं और बसों के डिजाइनरों ने इनकी भीतरी सज्जा पर भी खास ध्यान दिया है । उन्होंने सुनिश्‍चित किया है कि ये बसें स्वरूप से लेकर रंगों और सामग्री तक में उपयोग और भावनात्मक स्तर पर खूबियों से भरपूर हों । नतीजा यह है कि बसों में में ऐसा वातावरण बनता है कि बैठते ही अलग सी सुरक्षा औ सुकून का अहसास होता है । इसमें लम्बी यात्राएं बिना थकावट के की जा सकती हैं । यात्री सीटों को ऊंचाई पर लगाया गया है और ये मशीनी ढंग से एडजस्ट की जा सकती हैं । इन बसों में छत पर लगाए गए एसी से यात्रियों की सुविधा के अनुरूप तापमान कायम रखा जाता है ।
कोच की अन्य खूबियों में दो एलसीडी स्क्रीन शामिल हैं जो यात्रियों के मनोरंजन का सुविधा से ख्याल रखती हैं । इन बसों में सामान रखने के लिए विशाल स्थान फ्रंट और रियर एक्सेल के बीच है ।
टैक्नोलॉजी, डिजाइन, स्टाइल, उपयोग, सुकून, सेवा, रखरखाव और आसान मरम्मत- इन सभी मानकों पर मार्सीडीज- बेंज की बस हर तरह से सर्चश्रेष्ठ हैं ।

फिएट द्वारा दिल्ली ऑटो एक्सपो में नवीनतम स्टाइल एवं तकनीक का प्रदर्शन

* फिएट ५०० बाइ डीजल’द डेनिम थीम शो कार का भारत में पहली बार हंगामीखेज प्रदर्शन
* कंपनी द्वारा लीनिया ड्‌यूएलॉजिक ट्रांसमिशन, ग्रैंड पंटो तथा अन्य दिलकश भविष्यगामी वाहनों की प्रस्तुति
* इन नये वाहनों के प्रदर्शन के माध्यम से फिएट की प्रौद्योगिक, खोजपरक, युवा केन्द्रित एवं पर्यावरणीय प्रतिबद्धता उजागर हुयी ।

भारतीय ऑटो सेक्टर में वर्ष २००९ की अपरिमित सफलता के उपरान्त फिएट ने ऑटो एक्सपो २०१० में आज अपने नये वैरिएंट्‌‍स का शानदार अंदाज में प्रदर्शन किया । ऑटो एक्सपो २००८ में स्थापित उच्च स्तरीय मानदंडों के समान ही फिएट ने इस वर्ष भी अपने प्रशंसकों को निराश नहीं किया और फिएट ५०० बाइ डीजल, लीनिया ड्‌यूएलॉजिक ट्रांसमिशन, लीनिया टी-जेट, ग्रैंड पंटो नेचुरल पावर, ग्रैंड पंटो स्पोर्ट्‌स तथा ग्रैंड पंटो ट्रेंन्ड्‌ज जैसे उम्दा मॉडलों का प्रदर्शन किया ।
पहली बार भारतीय उपभोक्‍ताओं को नवीन फिएट ५०० बाइ डीजल को बेहद नजदीक से देखने का अवसर मिला, यह डेनिम ब्रांड की एक शैलीबद्ध शो कार है । सभी के आकर्षण का केंद्र यह कार उच्च स्तरीय फैशन एवं ठोस परफार्मेस का प्रतीक है । इटली के अग्रणी हॉट-कॉचर डिजाइनर रेन्जो रूसो द्वारा डिजाइनर की गयी फिएट ५०० बाइ डीजल लोगों के आंखों को लुभाती हुयी प्रतीत हो रही है । यह कार अग्रणी यूरोपीय फैशन ब्रांड- ‘डीजल’ से प्रेरित है तथा डीजल ग्रीन, डीजल ब्लैक एवं डीजल ब्रॉन्ज जैसे तीन आकर्षण रंगों में उपलब्ध है । इसके अतिरिक्‍त इस नयनाभिराम कार में १६ इंच के अनूठे डीजल लोगो एलॉय व्हील्स, यलो ब्रेक कैलीपर्स, डीजल साइट मोल्डिंग्स रियर व्यू मिरर्स तथा बेहद आकर्षण फ्रंड ‘व्हिस्कर्स’ की व्यवस्था है ।
इस कार के वाह्‌य लुक के साथ ही इसका आंतरिक लुक भी अत्यंत सुदर्शन है, जो डीजल ब्रांड डेनिम परिधान के गुणों (पीले रंग की सिलाई के साथ) सुसज्जित है । इसके बेसिक स्पोर्ट्‌स वर्जन के डैशबोर्ड तथा गियर लीवर नॉब पर भी एक डीजल लोगो लगा हुआ है । फिएट ५०० बाइ डीजल तीन आकारों में ५- स्पीड अथवा ६ स्पीड मैन्युअल ट्रांसमिशन के साथ उपलब्ध है, ये तीन आकार हैं- १.२ लीटर ६९ एचपी, डीपीएफ के साथ १.३ लीटर मल्टीजेट ७५ एचपी और १.४ लीटर १६ वी १०० एचपी ।
फिएट ५०० बाइ डीजल के साथ फिएट के अन्य संभावित भविष्यगामी मॉडलों को काफी बेहतर प्रतिसाद प्राप्त हो रहा है । भारत का विशालतम ऑटो शो, ऑटो एक्सपो सदैव ही कंपनी के आगामी उत्पादों एवं योजनाओं के प्रदर्शन का शानदार मंच रहा है । इस तथ्य का पूर्ण लाभ उठाते हुए फिएट ने अपने विविध ब्रांडो का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया है तथा उपभोक्‍ताओं की रूचि के अनुरूप कंपनी की भावी योजनाओं को सम्बल प्रदान किया है ।
ऑटो एक्सपो २०१० में विविध प्रकार के वाहनों के प्रदर्शन के उपलक्ष्य में फिएट इंडिया के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री राजीव कपूर ने कहा कि, “फिएट इंडिया ने संख्यात्मक दृष्टि से अपने विविध प्रकार के मॉडलों की अतिशय बिक्री की है और वर्ष २००९ में असाधारण सफलता का स्वाद चखाअ है । अपने नवीन उत्पादों के प्रदर्शन के साथ हम अपने उपभोक्‍ताओं को एक अभिनव अनुभव प्रदान करने का संदेश प्रेषित करना चाहते हैं । हमारे उत्पादों की श्रृंखला के ये नवीनतम वैरिएंट्‌स हमारी तकनीकी निपुणता के प्रतीक के प्रतीक है तथा नवोन्मेषी, युवा एवं पर्यावरणीय मापदंडों पर खरे उतरने की कंपनी की प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हैं । हम इन उत्कृष्ट एवं नवीनतम वैरिएंट्‌स को प्रदर्शित कर बेहद रोमांचित महसूस कर रहे हैं तथा उपभोक्‍ताओं से भी इसी प्रकार के रोमांच और उत्साह की आशा कर रहे हैं । ”
पिछले वर्ष जनवरी में लॉन्च की गयी लीनिया भारतीय ऑटो बाजार में महानतम सफलता का झंडा गाड़ चुकी है । एक वर्ष के अंदर इस क्लासी सेडान की १३,००० से अधिक इकाइयों की बिक्री हो चुकी है तथा इसकी विक्रय संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है । लोकप्रिय मौजूदा मॉडल के साथ अब भारतीय उपभोक्‍ता लीनिया ड्‌यूएलॉजिक ट्रांसमिशन तथा लीनिया टी-जेट भी हासिल कर सकते हैं ।
लीनिया ड्‌यूएलॉजिक ट्रांसमिशन के निर्माण में ट्रांसमिशन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है, जो उपभोक्‍ताओं को ऑटोमेटिक एवं मैन्युअल मोड के बीच सरलता से परिवर्तन करने की सुविधा प्रदान करता है तथा इसमें ऑटोमेटिक और मैन्युअल मोड दोनों के एक साथ प्रयोग का विकल्प भी उपलब्ध है । यह वैरिएंट एक परंपरागत ऑटोमेटिक ट्रांसमिशन की अपेक्षा लगभग १० प्रतिशत अधिक माइलेज का प्रस्ताव करता है तथा मैन्युअल ट्रांसमिशन में लगभग ३-५ प्रतिशत माइलेज के सुधार की गुंजाइश भी पैदा करता है । दूसरी तरफ लीनिया टी-जेट फि‍एट फिएट स्टैबल के पेट्रोल इंजन का नवीनतम स्वरूप है । यह वैरिएंट मौजूदा मॉडल की तुलना में उच्च शक्‍ति से परिपूर्ण है तथा इसमें ११० पीएस टर्बोचार्ज्ड पेट्रोल इंजिन विद्यमान है । इस उच्च शक्‍ति से संपन्‍न लीनिया के गुणों में चार चांद लगाते हुये टी-जेट ‘रेड-पर्पल’ रंग में उपलब्ध होगी, जो निश्‍चित रूप से आगंतुकों को रूकने के लिये विवश कर देगी ।
पिछले वर्ष जून में लॉन्च की गयी ग्रैंड पंटो को भी काफी बेहतर प्रतिसाद प्राप्त हुआ है और यह अपने लॉन्च से अब तक १० हजार से अधिक की संख्या में बिक चुकी है । अब ग्रैंड पंटो तीन भिन्‍न प्रकारों- ग्रैंड पंटो नेचुरल पावर, ग्रैंड पंटो स्पोर्ट्‌स तथा ग्रैंड पंटो ट्रेंड्‌स में उपलब्ध होगी ।
ग्रैंड पंटो नेचुरल पावर के साथ फिएट बिना पर्यावरण को छति पहुंचाये एक विशिष्ट एवं शैलीबद्ध वाहन को पेश कर रहा है, फिएट के नवीन ड्‌यूएल फ्यूल वर्जन ग्रैंड पंटो नेचुरल पावर में बाइ-फ्यूल इंजन (पेट्रोल/सीएनजी) मौजूद है, जो न्यूनतम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करता है । चूंकि परंपरागत ईधन की अपेक्षा सीएनजी का इस्तेमाल काफी सस्ता तथा पर्यावरण के हित में होता है, इसलिए यह कार सही मायनों में धन क अबचत करने वाली साबित होगी । यह फिएट की उत्तम तकनीकी विशेषता है कि एक उपभोक्‍ता बिना ईधन को पुनः भरवाये पंटो नेचुरल पावर के साथ १००० किलोमीटर से अधिक दूरी तय कर सकेगा । फिएट स्टैबल की यह युंगांतकारी तकनीक बेहतर परफार्मेस के साथ-साथ उपभोक्‍ता की सुरक्षा को भी सुनिश्‍चित करती है । इस कार में बूट स्पेस के साथ कोई समझौत नहीं किया गया है, क्योंकि इसमें सीएनजी सिलेंडर को बूट के नीचे एक खोजपरक पैंकेजिंग के साथ स्थापित किया गया है । वर्तमान समय में फिएट वर्ष २००९ में लगभग २,००,००० कारों की बिक्री के साथ यूरोप की सबसे बड़ी सीएनजी कार विक्रेता कंपनी बन गयी है । इस तकनीक के भारत में लॉन्च से उपभोक्‍ता निश्‍चित रूप से बाइ फ्यूल इंजन से आकर्षित होंगे ।
पंटो नेचुरल पावर शुद्ध पर्यावरण की स्थापना के महत्वपूर्ण सरोकार को पेषित करता है, जबकि ग्रैंड पंटो स्पोर्ट्‌स और ग्रैंड पंटो ट्रेंन्ड्‌ज आधुनिक भारतीय युवाओं के लिये एक दिलकश उपहार है ।
मुख्य रूप से युवा पीढ़ी को लक्षित ग्रैंड पंटो स्पोर्ट्‌स निश्‍चित रूप से उपभोक्‍ताओं के बीच चर्चा का विषय होगी । यह वैरिएंट ग्रैंड पंटो रेंज का सर्वोत्तम मॉडल है, जिसमें ९० एचपी पावर आउटपुट के साथ १.३ मल्टीजेट इंजन विद्यमान है । भारतीय युवाओं के बीच इसे और अधिक आकर्षित करने के लिये इसमें एक सुंदर इलेक्ट्रिक सनरूफ, एक रियर स्प्वायलर, स्पोर्ट्‌स रेड डीकाल्स तथा ड्‌युएल इंटीरियर लेदर सीट की व्यवस्था की गयी है । इन अतिरिक्‍त सुविधाओं से उपभोक्‍ता निश्‍चित रूप से उत्साहित महसूस करेंगे और दुनिया को अपने कदमों के नीचे महसूस करेंगे । ग्रैंड पंटो ट्रेन्ड्‌ज एक सीमित संस्करणों वाला वाहन है, जिसमें शक्‍तिशाली १.२ फायर पेट्रोल इंजिन लगाया गया है । इस कार का एक्टिव प्लस विकल्प स्पोर्टी डीकाल्स के साथ चमकदार एवं विविध वाह्‌य रंगों में उपलब्ध है । इस कार की आंतरिक सज्जा प्रभावशाली वाह्‌य सज्जा की पूरक है और इस समायोजन को उत्कृष्टता तथा सौन्दर्य से पूरित करने के लिये इसमें हाइटेक सीडी/एमपी३/एफएम ऑडियो सिस्टम का ट्रेन्डी मिक्स किया गया है ।
फिएट के सभी नये वाहन निकट भविष्य में उपभोक्‍ताओं के लिये उपलब्ध होंगे । कंपनी अपने नये वाहनों को भारतीय बाजार में उतारने के लिये सही समय का इंतजार कर रही है । इन नये वाहनों से फिएट एक टेक्नोलॉजिकल पावर हाऊस के रूप में स्वयं की स्थिति को और सुदृढ़ बना लेगी, इसके साथ ही कंपनी खोजपरक तकनीकी, युवा एवं पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी प्रदर्शित करेगी ।
नये वाहनों का प्रदर्शन फिएट इंडिया की एक वर्ष की मेहनत का नतीजा है । पिछले वर्ष कंपनी ने अपने अग्रणी कारों में से दो द लीनिया एवं ग्रैंड पंटों को भव्य तरीके से लॉन्च किया था । इन कारों के लॉन्च किये जाने के बाद बाजार में फिएट ब्रांड एक अलग मुकाम बना पाने में सफल रहा है, जो उच्च स्तरीय एवं स्टाइलिश है । इसके अतिरिक्‍त देखने में सुंदर तथा उपयोग में आसान इन कारों को न सिर्फ ऑटो विशेषज्ञों का, बल्कि ग्राहकों का भी बेहतर प्रतिसाद प्राप्त हुआ है ।
इन कारों के लॉन्च किये जाने के बाद कंपनी ने फिएट के उपभोक्‍ताओं के लिये ‘फिएट फर्स्ट’- एक समेकित विश्‍व स्तरीय कार्यक्रम लॉन्च किया । ‘फिएट फर्स्ट’ को लॉन्च किये जाने के बाद उपभोक्‍ता कभी भी किसी भी समय सड़क पर वाहन संबंधित समस्याओं के लिये सहायता प्राप्त कर सकते हैं, जिससे उनकी जिन्दगी काफी आसान हो जायेगी । इस कार्यक्रम को लॉन्च करने से उपभोक्‍ता अब सड़कों पर विश्‍व स्तरीय सहायता प्राप्त कर सकेंगे ।
फिएट इंडिया के लिये यह कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही है । इस कार्यक्रम के माध्यम से कंपनी को अपने डीलरों के व्यापक नेटवर्क से भी उपभोक्‍ताओं को रू-ब-रू कराने का अवसर प्राप्त होगा । वर्तमान समय में देश के ७७ शहरों में कंपनी के ९९ डीलर हैं जो १०५ स्थानों पर अपनी सेवायें प्रदान कर रहे हैं ।
बीते वर्ष में फिएट इंडिया ने फिएट डीजल ड्राइव्स इंडिया का आयोजन किया । यह एक वृहद आयोजन था, जिसमें यात्रियों ने १६ राज्यों से गुजरते हुये १०,००० किमी की यात्रा पूरी की । ‘फिएट डीजल ड्राइव्स इंडिया’ की शुरूआत २७ अक्टूबर २००९ को राजनगांव संयंत्र से प्रारंभ हुई थी । इस ड्राइव में ऑटो उद्योग की शीर्ष पत्रिकाओं के पत्रकारों के साथ-साथ समाचार पत्र-पत्रिकाओं के पत्रकार, चैनल एवं ऑनलाइन मीडिया के पत्रकार भी शमैल हुये । इस यात्र अके दौरान यात्रियों ने फिएट के ४ मल्टीजेट डीजल प्रस्तावों- द लीनिया, ग्रैंड पंटो, पालियो और द फिएट ५०० में सवारी का आनंद उठाया । इस यात्रा का आयोजन डीजल तकनीक से सुसज्जित फिएट के समृद्ध इतिहास के विषय में जागरूकता फैलाना तथा देशव्यापी स्तर पर फैले कंपनी के डीलरों के नेटवर्क से अवगत कराना था ।
फिएट इंडिया ने वर्ष २००९ में अपने नये उत्पादों से लोगों को रू-ब-रू कराया । आने वाले समय के लिये कंपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं पर कार्य कर रही है । भारतीय उपभोक्‍ता अब तैयार हो जायें अत्याधुनिक स्टाइल और तकनीकी के स्वागत के लिये !
फिएट इंडिया ऑटोमोबाइल्स लिमिटेड के विषय में
फिएट इंडिया ऑटोमोबाइल्स लिमिटेड (एफ‍आइए‍एल) फिएट ग्रुप ऑटोमोबाइल्स एस. पी. ए. (फिएट) एवं टाटा मोटर्स लिमिटेड (टाटा) के बीच की एक ५०-५० संयुक्‍त औद्योगिक उपक्रम है, जिसकी मौलिक रूप से २ जनवरी १९९७ में स्थापना की गयी थी । कंपनी ने २७७५ ब्लू एंड ह्‌वाइट कॉलर कर्मचारियों की नियुक्‍ति की है और यह महाराष्ट्र के पुणे जिले के रांजनगांव में स्थित है । संयुक्‍त उपक्रम का निश्‍चयात्मक समझौता ११ अक्टूबर २००७ को हस्ताक्षरित हुआ था । इस कंपनी के बोर्द ऑफ डारेक्टर्स में फिएट एवं टाटा में से ५-५ नामितों को शामिल किया गया ।
रांजनगांव की आधुनिकतम सुविधा, जिसका स्वामित्व एफ‍आइए‍एल के पास है और यह एक संयुक्‍त उपक्रम कंपनी है, में ३००,००० पुर्जों एवं एसेसरीज के अलावा २००.००० कारों तथा ३००,००० इंजनों के उत्पादन की क्षमता है । यहाँ पर वर्तमान समय में पलैयो टाइल १.१, १.६ माडल्स, लीनिया एवं अब ग्रैंड पंटो का उत्पादन हो रहा है । यहां पर फिएट के सफल १.३ लीटर मल्टीजेट डीजल इंजन्स एवं १.२ व १.४ लीटर फायर गैसोलीन इंजन का उत्पादन भी किया जाता है । फिएट कारों के अलावा यहां पर ६५० मिलियन यूरो के वृद्धिकारी निवेश के साथ टाटा पेसेंजर एवं नयी पीढ़ी की कारों क औत्पादन किया जायेगा । यह संयंत्र प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से ४००० से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है ।
फिएट समूह के विषय में ः
१८९९ में स्थापित फिएट विश्‍व के महत्वपूर्ण औद्योगिक समूहों में से एक है । १९० देशों में परिचालन के साथ इस समूह के २०३ संयंत्र, ११८ अनुसंधान केंद्र, ६३३ कंपनियां तथा १९८, ००० कर्मचारी कार्यरत हैं । वैश्‍विक ऑटोमोटिव उद्योग के संस्थापकों में से एक फिएट ने अपनी शुरूआत से ही दो प्रकार की विकास रणनीति का पालन किया है विदेशी बाजारों में घुसपैठ तथा खोजपरकता पर फोकस का प्रमआण इसके उत्पादों की तकनीकी गुणवत्ता तथा आधुनिकतम औद्योगिक एवं सांगठनिक प्रणाली की स्वीकृति में दिखाई देता है ।
इस समूह का व्यवसाय अनेक परिचालन क्षेत्रों के माध्यम से संचालित होता हैः फिएट ग्रुप ऑटोमोबाइल्स (फिएट लैंसिया, अल्फा रोमियो एवं अबर्थ ब्रांड्‌स), मासेराती व फेरारी (लक्जरी स्पोर्ट्‌स कार
) सीएनएच (एग्रिकल्चरल एंड कांस्ट्रक्शन इक्विपमेंट), इवेको (ट्रक्स एंड कामर्शियल व्हीकल्स), फिएट पावरट्रेन टेक्नोलॉजीज (इंजन एंड ट्रांसैशन्स), मैग्नैटी मरेली (ऑटोमोटिव कंपोनेंट्‌स), टेक्सिड (इंजन ब्लाक्स, सिलेंडर हेड्‌स एवं अन्य कंपोनेंट्‌स) कोमाऊ (ऑटोमेटेड प्रोडक्शन सिस्टम्स) एवं इटेडी (पब्लिशिंग एंड कम्युनिकेशंस)
टाटा मोटर्स लिमिटेड के विषय में ः
इस संयुक्‍त उपक्रम का अन्य पार्टनर टाटा मोटर्स लिमिटेड भारत की विशालतम आटोमोबाइल कंपनी है, वर्ष २००७-०८ में इसका राजस्व ८.८ बिलियन अमरीकी डॉलर था । अनुषंगिक एवं सहयोगी कंपनी के माध्यम से टाटा मोटर्स यूके, दक्षिण कोरिया, थाइलैंड एवं स्पेन में अपना परिचालन करती है । इसमें जगुआर लैंड रोवर शामिल है, इसके व्यवसाय में दो प्रसिद्ध ब्रांण्ड्‌स सम्मिलित हैं । इसने फिएट के साथ एक रणनीतिक गठबंधन भी कर रखा है । भारत में ४ मिलियन से अधिक टाटा वाहनों के परिचालन के साथ टाटा मोटर्स व्यावसायिक वाहनों के क्षेत्र में मार्केट लीडर है तथा यात्री वाहनों की श्रेणी में शीर्ष तीन निर्माताओं में से एक है । यह विश्‍व में ट्रकों का चौथा विशालतम तथा बसों का दूसरा विशालतम निर्माता है । टाटा की कारों, बसों एवं ट्रकों का यूरोप, अफ्रीका, मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया तथा दक्षिणी अमेरिका में विपणन किया जाता है ।

ऑटो एक्सपो में पहली बार कार और बाइक के ‘रैप्स’

मुंबई स्थित भारत की प्रमुख ऑटोमोबाइल निर्माता कंपनी, क्लासिक स्ट्राइप्स लिमिटेड कारों और बाइकों के लिए ‘स्मार्ट रैप्स’ प्रदर्शित किया । ‘स्मार्ट रैप्स’ क्लासिक स्ट्राइप्स के रिटेल ब्रांड, ऑटोग्रेफिक्स के नाम से बाजार में आ रहे हैं ।
क्लासिक स्ट्राइप्स लिमिटेड के मुख्य संचालन अधिकारी संजय भगत कहते हैं, “बदलते सोच के साथ ही, उपभोक्‍ता भी अपने स्वचालिक वाहनों के लिए ऐसे अनूठे ही स्टाइल देखना पसंद करता है, जिसमें उसकी जेब पर कोई अतिरिक्‍त बोझ न पड़े । उपभोक्‍ताओं की इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए हम ‘स्मार्ट रैप्स’ के रूप में एक ऐसा स्टाइल बाजार में उतारने जा रहे हैं जो पहले कभी नहीं देखा गया ।”
उन्होंने जोर देकर कहा, “छोटा सा बाजार होने के बावजूद, हम मानते हैं कि निश्‍चितरूप से यह हर उपभोक्‍ता की एक अलग स्टाइल की जरूरत को पूरा करेगा । ”
संजय भगत कहते हैं, “ब्रआंड ऑटोमोबाइल से जुड़ी चीजों के एक विविध क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है, जिनमें सबसे ताजा चीजे हैं, डोर विजर्स, स्टोन चिप फिल्मस, वॉल्ट डिस्ने ग्राफिक्स तथा फेशनर्स । ”
क्लासिक स्ट्राइप्स का फुटकर विभाग, ऑटोग्रेफिक्स का बहुत व्यापक और देश भर में फैला नेटवर्क है, जिसमें ऑटोमोटिव एसेसरी स्टोर, कार की नई डीलरशिप तथा तथा डिस्टीब्यूटर्स । ऑटोग्रेफिक्स देश के किसी भी में अपना कोई भी उत्पाद डिलीवरी करने में सक्षम है । यही नहीं वह अपने उपभोक्‍ताओं को बिक्री के बाद की सेवाएं बखूबी उपलब्ध कराता है, चाहे उसका वह अपने उपभोक्‍ताओं को बिक्री के बाद की सेवाएं भी बखूबी उपलब्ध कराता है, चाहे उसका उपभोक्‍ता देश के किसी भी हिस्से में क्यों न हो ।
बाइक और कार के अलावे ऑटो एक्सपो १० में प्रदर्शित किए जाने वाले अन्य उत्पादों में ग्रेफिक्स, लकड़ी की डैशबोर्ड किट्‌स, विन्डो, फिल्म, क्लीयर स्क्रैच प्रोटैक्शन किट्‌स, स्मार्ट रैप्स, पिलर ट्रिम्स तथा संजय भगत कहते हैं, ” ऑटोग्रेफिक्स में, हमारा मूलमंत्र है, अपने सबसे अंतिम ग्राहक तक ऐसे उत्पाद उपलब्ध कराना ताकि वह अपने वाहन, चाहे वह उसकी पहली कार हो, या फिर उसकी सबसे भरोसेमंद बाइक, वह उसे अलग स्टाइल की बना सके और वह भी मुनासिब दामों में ।”
ऑटोग्रेफिक्स ः “अपनी कार को भी उतना ही अलग स्टाइल देकर उसकी अलग पहचान बनाइए, जितने अलग आप स्वयं हैं । ”
वर्ष १९८७ में स्थापित, क्लासिक स्ट्राइप्स लिमिटेड, विश्‍व की ऑटोमोटिव ग्रेफिक्स बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है, जिसकी निर्माण क्षमता, प्रतिवर्ष एक करोड़ से अधिकडेकल सेट है । आज सीएसएल का घरेलू ऑटोमोटिव ओईएम प्रिंटिग इंडस्ट्री ७० प्रतिशत से अधिक बाजार पर कब्जा हैं । सीएसएल ब्रिटेन, अमेरिका तथा मध्य एशिया को ग्रेफिक्स तथा बाहरी हिस्से को चमकाने वाले उत्पाद निर्यात करती है ।
सीएसएल, क्वालिटी और नयेपन के साथ ही उपभोक्‍ताओं के लिए अपने खुद के स्टूडियो द्वारा तैयार नए डिजायनों के प्रति बेहद गंभीर है, जो उसे पिछले कई वर्षों में मिलने वाले पुरस्कारों से साफ जाहिर होता है । सर्वश्रेष्ठ ‘इनहाउस क्यूसी लैब तथा डिजाइन स्टूडियो होने के कारण सीएसएल को नए उत्पादों का विकास करने वाले लीडर के रूप में देखा जाता है ।
“ग्रेट प्लेंस टू वर्क” इंस्टीट्‌यूट (इंडिया) द्वारा बिजनेस वर्ल्ड तथा इकनॉमिक टाइम्स के सहयोग से किए गए एक सर्वेक्षण में सीएसएल की गिनती लगातार पांच वर्षों (२००४-२००८) तक “विश्‍व के श्रेष्ठतम २५ कार्यस्थलों में की जाती रही ।

वोल्वो ट्र्क्स इंडिया ने उतारा उच्च तकनीक वाली शक्‍तिशाली ट्रक

विश्‍व में हैवी ड्‌यूटी ट्रकों के अग्रणी उत्पादक एवं सम्पूर्ण कमर्शियल समाधान देने वाली कम्पनी वोल्वो ट्रक्स ने भारतीय सड़कों के लिए अपना सबसे शक्‍तिशाली और टैक्नोलॉजी की दृष्टि से बेहद उन्‍नत ट्रक एफएच ५२० पावरट्रॉनिक भारत में अब तक का सबसे ताकतवर और टैक्नोलॉजी के लिहाज से सबसे उन्‍नत ट्रक है और यह बेहद भारी परिवहन जरूरतों को पूरा करत है ।
वोल्वो एफएच ५२० पावरट्रॉनिक में वोल्वो पीटी ६०६ गियर बॉक्स है जिसमें पूरी तरह ऑटोमेटिक एवं बिल्ट इन हाइड्रॉलिक टॉर्क कन्वर्टर है । इससे गियर लीवर बटन के जरिये मैनुअल गियर परिवर्तन की सम्भावना सामने आयी है । पीटी ६०६ भारी परिवहन के लिए उपयोगी २६०० एनएम का ईजन टॉर्क देता है । इसमें वोल्वो ट्र्क्स इंडिया ने उतारा उच्च तकनीक वाली शक्‍तिशाली ट्रक गियर आसानी से बदले जा सकते हैं और गियर बदलते समय शक्‍ति और डिलीवरी में कोई परिवर्तन नहीं आता । इससे कठिन परिस्थिति में भी सुरक्षित स्टार्ट मिलती है ।
पीटी ६०६ को ईजन टॉर्क से मेल खाते हुए डिजाइन किया गया है और इससे शानदार पुलिंग पावर और चढ़ाई की क्षमता मिलती है । इसमें बिना लदी हुई हालत में ५९ किलोमीटर प्रति घंटा तथा लदी हुई हालत में ३८ किलोमीटर प्रति घंटा की अधिकतम गियर स्पीड मिलती है । इस तरह एफएच ५२० पावरट्रॉनिक तकनीकी रूप से २०० टन जीसीडब्ल्यू (ग्रॉस कम्बिनेशन वेट) वजन निजी सड़कों पर और भूतल परिवहन मंत्रालय की स्वीकृति से सावर्जनिक सड़कों पर ले जाने में सक्षम है ।
इस ट्रक से प्रीकॉस्ट स्ट्रक्चर, रिएक्टर बॉडी, उ़च्च क्षमता के टरबाइन ट्रांसफॉर्मर तथा विंडमिल टरबाइनें ले जायी जा सकती हैं ।
गौरतलब है कि इस साल के शुरू में वोल्वो ग्रुप ने दुनिया का सबसे शक्‍तिशाली ट्रक एफएच १६ लॉन्च किया गया था । यूरोपीय बाजार के लिए उतारे गए इस ट्रक की क्षमता ७०० एचपी और ३१५० एनएम की टॉर्क थी ।
एफएच ५२० पावरट्रॉनिक क आनावरण करते हुए वोल्वो ट्रक्स इंडिया के अध्यक्ष श्री सोमनाथ भट्‌टाचार्य ने कहा, “पिछले एक दशक से वोल्वो ट्रक्स भारत में हैवी-ड्‌यूटी ट्रकिंग उद्योग का चेहरा बदलने लगे है और वे इस क्षेत्र में अपनी भूमिका को लेकर काफी सतर्क है । पिछले दस सालों में हम टैक्नोलॉजी, क्षमता और सुरक्षा तथ औत्सर्जन मानकों को लेकर भारतीय ट्रकिंग उद्योग को आधुनिक बनाने में जुटे हैं । आज भारत में प्रीमियम यूरोपीय हैवी-ड्‌यूटी बाजार में वोल्वो ट्रक्स के पास ७०% हिस्सेदारी है और एफएच ५२० पावरट्रॉनिक के लॉन्च के साथ ही हमने हैवी कॉलेज वर्ग में विस्तार किया है । उल्लेखनीय है कि इस ट्रक में ऐसी कई अभूतपूर्व खूबियों को जोड़ा गया है जो बेहद भारी और परिवहन की ऊंची मांगों की कसौटियों पर खरा उतरता है । ”
“वोल्वो ट्रक्स हमारे ग्राहकों के लिए स्वामित्व संबंधी कीमतों में सुधार लाने पर मुख्य रूप से ध्यान जमाते हैं और ये लगातार ग्राहकों तथा उद्योग की ओर से उच्च प्रदर्शन की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती से जूझते हैं । इस प्रक्रिया में ग्राहकों को मिलता है अधिक लाभ और साथ ही पर्यावरण पर भी कम से कम प्रभाव पड़ता है । साथ ही, अपने बुनियादी मूल्यों पर टिके रहते हुए हम अपने उत्पादों को गुणवत्ता मानकों, सर्वोच्च सुरक्षा तथा न्यूनतम उत्सर्जन स्तरों के हिसाब से अपने वर्ग में सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं । ”
“फिलहाल भारतीय सड़कों पर करीब ६००० वोल्वो ट्रक दौड़ रहे हैं । भारत में २००९ में वोल्वो ट्रकों की घरेलू बिक्री के मोर्चे पर हमें २०१० में २०-२५% वृद्धि की उम्मीद है । देशभर में विश्‍वस्तरीय आफ्टर-सेल्स नेटवर्क में ९० से ज्यादा सपोर्ट प्वाइंट्‌स, बेहद प्रतिस्पर्धी प्रदर्शन स्तर सुनिश्‍चित करने वाले सॉफ्ट उत्पादों की रेंज और ९०% से ज्यादा ऑफ-द-शैल्फ उत्पादों की उपलब्धता, समर्पित 24x7 ग्राहकोन्मुख सेवा तंत्र की बदौलत वोल्वो ट्रक्स एप्लीकेशन की चुनौतीपूर्ण मांगों को पूरा करने के साथ साथ बेहद भरोसेमंद और कुशल तथा अपनी श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ हैं । ”
वोल्वो ट्रक्स इंडिया के बारे में
वोल्वो ट्रक्स इंडिया दर‍असल, वीई कमर्शियल व्हीकल्स लिमिटेड (वोल्वो ग्रुप तथा आयशर मोटर्स का संयुक्‍त उपक्रम) का व्यावसायिक उपक्रम है । इसकी उत्पाद रेंज में एफएम रेंज में एफएम रेंज के टिपर्स और विशेष एप्लीकेशनों जैसे फायर टेंडर्स, स्काई लिफ्ट, बूम पंप्स, कंकीट मिक्स आदि के लिए रिजिड ट्रक्स, और अलग अलग कंफीग्योरेशन वाले एफएम/एफएच रेंज के ट्रैक्टर्स शामिल हैं । वोल्वो एफएम ट्रैक्टर सीरीज का इस्तेमाल कार्गो, पट्रोलियम तथा रसायन, बल्क कार्गो, निर्माण क्षेत्रों और यहां तक कि विशेष कार्गो क्षेत्रों में किया जाता है । एफएच सीरीज का इस्तेमाल लॉन्ग-हॉलेज ओडीसी (ओवर-डाइमेंशन कार्गो) परिवहन प्रयोजनों के लिए जाता है ।

शिक्षा में हिंदू संस्कृति का विशेष ध्यान रखते हैं आर० पी० मलिक

पूर्वी दिल्ली के ख्यातिप्राप्त लवली पब्लिक स्कूल के निदेशक आर०पी० मलिक बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य के प्रति काफी गंभीर रहते हैं । गोपाल प्रसाद द्वारा लिए गए साक्षात्कार के प्रमुख अंश ः-
हमारा प्रथम प्रयास होता है कि बच्चे ठीक-ठाक आएँ और चले जाँय तथा स्वस्थ हों क्योंकि जब स्वस्थ होंगे तभी पढ़ाई करेंगे । हमलोग योग, प्राणायाम, सूर्य प्रणाम और आध्यात्मिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देते हैं जिससे बच्चे स्वाभाविक रूप से अच्छे होंगे । हम हिंदू संस्कृति पर विशेष जोर देते हैं । बच्चे बोर ना हों, इसके लिए शिक्षा के साथ-साथ मनोरंजन एवं खेल भी आवश्यक है । विद्यालय में आध्यात्मिक संतों एवं योगाचार्यों के संदेश का लाभ सबों को मिले, इस पर भी हमारा झुकाव रहता है । आशाराम बापू एवं सुधांशुजी हमारे यहाँ पधार भी चुके हैं । आज बच्चों को भी संस्कार एवं आस्था चैनल के कार्यक्रमों को देखने चाहिए । आज के बच्चे पहले से काफी जागृत हैं । बच्चों के जागरूक होने के कारण ही वे सुनते सबकीं है परन्तु करते अपने मन की हैं ।
हमारे देश में विद्यालय का वातावरण घर में जाता है जबकि पश्‍चिमी देशों में स्थिति ठीक इसके उलट है । भारतीय संस्कृति एवं मूल्यों को बचाने की आज आवश्यकता है । बच्चों के ऊपर से किताबी बोझ घटाने के लिए हमारे विद्यालय में रैक सिस्टम विकसित की गई है । केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा पाठ्‌यक्रम बदलाव के संदर्भ में वे कहते हैं कि “ग्रेडिंग सिस्टम गलत है । प्राचार्य/निदेशक के स्थान पर संबंधित विषय के शिक्षकों का सुझाव पाठ्‌यक्रम बदलाव के संबंध में लिया जाना चाहिए । ”

पूर्वी दिल्ली के वाहन व्यवसाय पर एक नजर

वाहन व्यवसाय से जुड़े लोगों की जुबानी, ग्राहकों के हित में एक खोज-पड़ताल

पूर्वी दिल्ली में प्रतिष्ठित प्राईम होडा कार शोरूम के प्रबंधक शाहजी जॉर्ज के अनुसार “जापानी कंपनी इतोबो कॉरपोरेशन की सहभागी कंपनी प्राईम होंडा की मुख्य शाखा वैशाली में डाबर के पीछे है तथा दूसरी पटपड़गंज में है । वे बताते हैं कि होंडा कार में सबसे लक्जरी सेगमेंट कहलाता है । पहले हुंडई के उत्पाद ज्यादा बिकते थे परन्तु अब स्थिति बदल चुकी है । पूर्वी दिल्ली के पॉश कॉलनी आई.पी.एक्स., मयूर विहार इलाके में सबसे ज्यादा बिजनेसमैन और एमएनसी में काम करने वाले लोगों की पसंद होंडा सिटी मॉडल है । गाड़ी खरीदने में ग्राहकों का मुख्य रूप से ध्यान हमारी कंपनी के उत्पादों के प्रति ज्यादा इसलिए है क्योंकि इसका फ्यूल एफिसिएंसी १६+ का ऐवरेज देता है । इसका रीसेल वैल्यू अच्छा है । मेंटनेंस कॉस्ट बहुत कम है । वे ग्राहकों से गाड़ी खरीदने के पूर्व “टोटल कॉस्ट ऑफ ऑनरशिप” कितने साल गाड़ी रखेंगे आदि प्रश्न पूछने के बाद अपनी सलाह देते हैं ।
ड्रीजल गाड़ी में मेंटनेस का खर्चा पेट्रोल गाड़ी के बनिस्पत ज्यादा होता है । पेट्रोल गाड़ी का पिक‍अप ज्यादा है । होंडा जैज सबसे छोटी गाड़ी है । जिसकी शोरूम प्राईस ७ लाख ९८ हजार रूपए है । वे कहते हैं कि होंडा के उत्पाद सुरक्षा पर आधारित है । हमें ग्राहकों के रेफरेंस का काफी लाभ मिलता है । हमलोग कॉरपोरेट कल्चर के विकास हेतु प्रतिबद्ध है । इस हेतु हमें सीधे कंपनी से दिशानिर्देश मिलता है । हमारे यहाँ फरीदाबाद, गुड़गॉव से भी लोग आते हैं क्योंकि उन्हें हमारे उपर सौ फीसदी भरोसा है ।
एक ही छत के नीचे सभी गाड़ियों की रिपेयरिंग हेतु “कारनेशन” के कंसेप्ट के बारे में उनका विचार है कि ग्राहक के दृष्टिकोण से यह अच्छा है । मगर होंडा के तकनीशियन की विशेषता की संभावना हम होने से यह पूर्णरूपेण उपयुक्‍त नहीं । यह विदेशी कंसेप्ट है जो भारत में नया है । इसे पनपने में काफी वक्‍त लगेगा । आर्थिक मंदी का असर खत्म हो चुका है । हमारी गाड़ियों की बिक्री में सितंबर २००९ से ही उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है । नई गाड़ियाँ बाजार में आ रही है । छोटी गाड़ियों के प्रति ग्राहकों का रूझान ज्यादा है । यहाँ ४-६ लाख तक की गाड़ियों के खरीददार ज्यादा हैं । इस बार का ऑटो एक्सपो दूसरा सबसे बड़ा ऑटो शो रहा । इसके माध्यम से लोगों को ज्यादा से ज्यादा ज्ञान मिला तथा व्यवसाय में वृद्धि हुई । नैनो के आइडिया को देखकर अन्य कंपनियों में प्रतिस्पर्धा के भावना जगी । सर्वप्रथम हम ग्राहक बनकर सोचते हैं । हम ग्राहकों को गाड़ियों के फीचर्स लाभ और उदाहरण के माध्यम से संतुष्ट करते हैं । “इकॉनोमिक टाईम्स, टाईम्स ऑफ इंडिया का बिजनेस पेज, ऑटो कार पत्रिका पढ़ने वाले शाहजी जॉर्ज ऑटो पत्रिका से अपेक्षा रखते हैं कि नई-नई चीजों की जानकारियाँ तकनीक, कीमत, प्रतिस्पर्धा और छूट, एक ही जगह सभी कुछ मिल जाए । ” ग्राहकों से दोस्ताना संबंध एवं कुशल व्यवहार का फायदा आगे आनेवाले समय में अवश्य मिलता है । थ्योरी जरूरी है पर एक्सपेरियंस बेस्ट है । दोनों में संतुलन परमावश्यक है ।
दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों के ग्राहकों की अलग-अलग पसंद
ऑटो नीड्‌स, पआंडव नगर के प्रबंधक सुमित पॉल हीरो होंडा मोटरसाईकिल का अधिकृत केन्द्र है । वे कहते हैं कि उनका सर्विस सेंटर पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया में है, यहाँ केवल बिक्री होती है । दिल्ली में हीरो होंडा नंबर वन है । उसके बाद ही बजाज का नाम आता है । इनके अनुसार दिल्ली के अलग-अलग पसंद है । मध्य दिल्ली में हेवी मॉडल यथा करिज्मा, सीवीजी, हंक की माँग है । पूर्वी दिल्ली के ग्राहक को ये दो तरह से वगीकृत करते हैं- इंट्री सेगमेंट और डिलक्स सेगमेंट कस्टमर क्लास जो ४०-५० हजार के बाईक खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं । ग्राहकों की जिज्ञासा ऐवरेज, रखरखाव खर्च तथा कीमत को लेकर होत अहै । हीरो होंडा का “पेशन प्रो “मॉडल ज्यादा लोकप्रिय है । बिक्री हमारी प्राथमिकता है । ग्राहक की जो जरूरत है उसे समझकर उसे सलाह देना ही हमारा मुख्य मकसद है । अच्छी सेवा तथा पारिवारिक वातावरण के बदौलत पिछले १५ वर्ष से हम बाजार में अग्रणी है । हमारे बाइकों के मॉडल काफी बदलते रहते हैं । हमारे उत्पाद ऐसे हैं जिसपर ऑख मूँदकर विश्‍वास किया जा सकता है । अन्य कंपनियों में लोकल पार्ट्‌स इस्तेमाल होते हैं पर हमारे कंपनी के बाइकों में अपने ब्रांड के जेनविन पार्ट्‌स द्वारा ही मेंटनेंस होता है । इसलिए हीरो होंडा की लाईफ अन्य के बनिस्पत ज्यादा है । फिल्मस्टार रितिक रोशन रोशन के ब्रांड एम्बेसडर होने का भी हमें लाभ मिला है ।
पूर्वी दिल्ली के ग्राहकों की मानसिकता और पसंद समझने हेतु हिंदी परमावश्यक है । इस इलाके में हिंदी प्रभावी होने के कारण ही हम पर्चे, पोस्टर तथा विज्ञापन हिंदी में ही देते हैं ।

सोमवार, 3 मई 2010

पर्यावरण संरक्षण हेतु जनचेतना का सजीव चित्रण

कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन रोकने की दिशा में समझौता कहा जाने वाला मसौदा कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होने, कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए बगैर लक्ष्य जैसा रहा । आश्‍चर्य की बात यह है कि विकसित देशों ने दो दशक पूर्व ही पर्यावरण असंतुलन को लेकर चिंतित थे परन्तु यह मात्र चिंता ही बनकर रह गई । विकसित देश कार्बन उत्सर्जन में आगे रहते हैं और उसे कम करने में पीछे हो जाते हैं । धीरे-धीरे पर्यावरण के समक्ष चुनौतियाँ कठिन होती जा रही है । विश्‍व के प्रमुख देशों द्वारा पर्यावरण की अनदेखी कर संसाधनों के बेतहाशा दोहन में तो संलग्न हैं ही साथ ही वे हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में पहल भी नहीं कर रहे हैं । विकास के नाम पर पर्यावरण की जान बूझकर उपएक्षा तथा विलासी जीवनशैली की प्रवृत्ति संपूर्ण विश्‍व के लिए घातक है । अंततः जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम सभी को भुगतने पड़ेंगे । हमारा देश भी इस प्रवृत्ति से वंचित नहीं है । हमें सर्वप्रथम पर्यावरण को क्षति पहुँचानेवाले कारणों की समीक्षा तथा जनचेतना की आवश्यकता है । एक तरफ जहाँ हिमालय पर्वत की चोटिओं के बर्फ तेजी से पिघलकर बाढ का तांडव कर सकती है वहीं दूसरी तरफ बढते गर्मी के कारण फसल चक्र भी कुप्रभावित हो सकता हैं । समुद्री जलस्तर की बढ़ोत्तरी से तो मालद्वीप का नामोनिशान मिट जाएगा तथा बांग्लादेश भी बाढ़ में डूब सकता है । ऐसी स्थिति में आने वाले २५ वर्षों में भारतीय उपमहाद्वीप में करोड़ों लोगों को पलायन करना पड़ सकता है । यह पलायन हमारे समाज के समक्ष तो एक चुनौती हैं ही, साथ ही यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी घातक है । भारत को पर्यावरण संरक्षण का कहर समर्थक बनना पड़ेगा । विश्‍वगुरू बनाने का संकल्प दिलाने वालों को सर्वप्रथम देशवासियों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने की परम आवश्यकता है । वर्तमान में मूल समस्या एकमात्र यही है कि देश की अधिकांश जनता पर्यावरण असंतुलन से होनेवाले नुकसान से अवगत ही नहीं है । ठोस उपायों पर अमल किए बिना जलवायु परिवर्तन रोक पाना दिवास्वप्न ही है ।
satyamev jayate prakashan dwara prakashit गर्गऋषि शांतनु द्वारा प्रस्तुत पुस्तक “सावधान- पृथ्वी तप रही है!” पर्यावरण संरक्षण के प्रति लिखित जनजागरण हेतु नाटक विधा को आधार देगी । निश्‍चित रूप से यह पुस्तक सभी पाठकों, में जनचेतना का स्वर देने में सक्षम होगी जिसकी आज परमावश्यकता है । सभी पर्यावरणविदों शिक्षार्थियों, अध्यापकों एवं प्रकृतिप्रेमियों के लिए यह एक अनूठा कृति साबित गोगी, यह हमारा विश्‍वास है ।
- गोपाल प्रसाद (प्रकाशक)

मिथिला राज्य के लिए जंतर मंतर पर धरना

प्रो० उदय शंकर मिश्र, मिथिला राज्य संघर्ष समिति के केन्द्रीय महासचिव ने कहा मिथिला राज्य आन्दोलन की पहली आवाज १९०५ ई० में काशी (उ० प्र०) में म० म० पं० मुरलीधर झा ने उठाया था । उन्होंने बंगाल का बँटवारा कर बिहार राज्य के पुर्नगठन का विरोध किया था उन्होंने मिथिला राज्य के ऐतिहासिकता के आधार पर मिथिला राज्य के पुर्नगठन का विरोध किया था । उन्होंने मिथिला राज्य के एतिहासिकता के आधार पर मिथिला राज्य के पुर्नगठन की माँग की थी । १९५० के दशक में पं० जानकी नन्दन सिंह, डा० लक्ष्मण झा के नेतृत्व में राज्य पुर्नगठन आयोग के समक्ष मैथिली भाषा के आधार की सीमा की चर्चा महाविष्णु पुरआण एवं जार्ज अब्राहम ग्रीयर्सन के आधार पर नेपाल के ९ जिले एवं भारतीय क्षेत्र में दरभंगा प्रमण्डल, तिरहुत, मुँगेर, कोशी, पूर्णियाँ, भागलपुर प्रमण्डल समेत झारखण्ड के दुमका प्रमण्डल को रखा गया है । हमलोग भारतीय संविधान के अन्तर्गत भारतीय क्षेत्र में पड़नेवाले मिथिला के भाग को मिथिला राज्य के पुर्नगठन की माँग करते हैं ।
प्रो मिश्र ने कहा कि सर्वागीण विकास एवं खासकर आर्थिक विकास के लिए मिथिला राज्य के पुनर्गठन की माँग करते हैं । बाढ़ समस्या का सम्पूर्ण समाधान, पनबिजली का निर्माण, बंद चीनी मिल, पेपर मिल, जूट मिल, सूता मिल, आदि को चालू करना एवं नये मिल में आम लिची, केला, मखाना, मछली डयेरी, मधुमक्खी पालन उद्योग आलू के चिप्स एवं चावल, चूरा आदि अन्य नये मिलों को चालू करना वैज्ञानिक ढंग की खेती, एम्स, आई०आई०टी०, आई० आई० एम० , एजूकेशनल हब की स्थापन असमेत रेल कारखाना, रक्षा उद्योग की स्थापना करना ही मिथिला राज्य का लक्ष्य है । मैथिली भाषा को राज-काज की भाषा के रूप में मान्यता संविधान की धारा ३४५, ३४६, ३४७ के मुताबिक करना एवं प्राथमिक शिक्षा से लेकर एम०ए० पी-एचोडी०, डी०लिट० तक पढ़ाई की सुचारू व्यवस्था करना । बिहार एवं केन्द्रीय स्तर पर (सी०बी०एस०ई०) पाठ्‌यक्रम में मैथिली की पढ़ाई एवं शिक्षकों की नियुक्‍ति भारत सरकार एवं बिहार सरकार को तुरंत करना चाहिए । मैथिली आठवीं अनुसूची में मान्यता पा चुकी है, इसलिए इस माँग को तत्काल पूरा करना मिथिला राज्य आंदोलन का लक्ष्य है ।
प्रो० मिश्र ने कहा १३२५ ई० तक मिथिला स्वतंत्र देश था । लगभग ७०० वर्षों से मिथिला गुलाम है । हमलोग यहाँ के विकास के लिए भारतीय क्षेत्र में मिथिला राज्य के पुर्नगठन की माँग तत्काल करते हैं क्योंकि यह माँग बहुत पुराना है, अगर पूरा नहीं किया गया तो यहाँ असंतोष भरकेगा, जिससे क्षेत्र में हिंसक आन्दोलन भी हो सकता है । तेलंगाना राज्य के साथ ही मिथिला राज्य का पुर्नगठन होना चाहिए ।

चुनचुन मिश्र (अध्यक्ष)
उदयशंकर मिश्र (महासचिव)

ग्राहकों को सर्वोत्तम सेवा देना ही मुख्य मकसद

मारूति सुजूकी इंडिया लिमिटेड, सुमितोमो कॉर्पोरेशन एवं मारूति कंट्रीवाईड के संयुक्‍त उपक्रम के रूप में ‘मारूति सर्विस मास्टर्स’ नामक नई कंपनी मारूति गाड़ियों के सर्विसेज में संलग्न है । कंपनी को ऊचाई प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले व कंपनी के थिंक टैंक समझे जाने वाले प्रतिभावान डायरेक्टर एवं सीईओ ए. चौधरी से एक्सपो न्यूज पत्रिका के संपादक गोपाल प्रसाद से बातचीत के प्रमुख अंश ः

मारूति सुजुकी कंपनी को एक नए कंपनी के गठन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
इस कंपनी का मूल उद्देश्य “मॉडल वर्कशाप सेट” स्थापित करना था था, जिसके माध्यम से सेवा से संबंधित मानकों की संस्तुति की जा सके । वास्तव में ग्राहक को सर्वोत्तम सेवा देना ही हमारा मुख्य मकसद है । हमारे डीलरों के वर्कशॉप हेतु यह एक ‘रेफरेंस प्वाइंट’ है । इसे आप मारूति सर्विस की प्रयोगशाला भी समझ सकते हैं । मारूति गाड़ियों का यह रेफरल हॉस्पिटल है । सर्विस, टाइम और एक्यूरेट फीडबैक पर ध्यान देना हमारा कर्त्तव्य है, जिससे हमारे कर्मचारी यथाशीघ्र पालन करते हैं । पहले दिल्ली के नारायणा में डिविजन मात्र था, पर १९९९ में यह कंपनी का रूप ले लिया । ग्राहकों की सुविधा हेतु हमारे कंपनी में सर्विस एवं रिपेयर, बॉडी एवं पेंट्‌स रिपेयर व दुर्घटना बीमा क्लेम, मारूति जेनविन स्पेअर्स व एसेसरीज, मारूति टू वैल्यू तथा मारूति बीमा का अलग-अलग विभाग है ।

नई तकनीक का आपके सर्विसिंग क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ा है?
कार में टेक्नोलॉजी काफी चेंज होती जा रही है । सभी सिस्टम में चेंजिग हो रही है, इसलिए सर्विसिंग में भी चेंजिंग आ रही है । कुछ मामले में सर्विसिंग सिंपलीफाई हो गई है । टूल और यंत्र के कारण डायग्नोसिस अब आसान हो गई है । वर्कशाप में अब एडवांस टूल्स और इंस्टूमेंट आ गए है जिससे फास्ट डायग्नोसिस और फास्ट रिपेयरिंग में आसानी आ गई है । हमारा स्पेअर मैनेजमेंट बहुत मजबूत हैं । देश के छोटे-बड़े सभी इलाकों में हमारे पार्ट्‌स उपलब्ध है । हमारी वितरण प्रणाली सटीक है ।

सुजुकी कंपनी से गठबंधन के बाद कंपनी का ग्रोथ रेट क्या है?
१९९९ में हमारी एकमात्र यूनिट ओखला में थी परन्तु २००९ में तीन यूनिट हो गई, जो ओखला आजादपुर और चेन्‍नई में है ।

कंपनी में आप किन बातों पर ज्यादा ध्यान देते है?
कंपनी में हम लोग कल्चर डेवलपमेंट तथा कस्टमर सर्विस पर विशेष ध्यान देते हैं । संक्षेप में कहा जाए तो हमारी कार्यप्रणाली ग्राहक केंद्रित है । संबंधित विभागों से बात करके समस्या का निराकरण करना ही हमारी प्राथमिकत अहै । हमारे विचार ग्राहक अनभिज्ञ तथा निर्दोष होते है । हम चाहते हैं कि इसकी अहमियत सभी कोई समझे । हमारा मानना है कि सबों की समान सहभागिता कार्यप्रणाली में सुचारू रूप से चले ।

आपकी प्रतिष्ठित कंपनी अन्य कंपनियों से भिन्‍न क्यों है?
हमारा कंप्लेन कम है । हमारे ग्राहक की संतुष्टि ही सर्वोपरि है । ग्राहक की शिकायत मैनेजमेंट तक पहुंच गई तो उसका तुरंत निपटारा होत अहै ।

क्या आपके उत्पाद का वर्तमान में नैनों से कोई टक्‍कर है?
मारूति और नैनो का कोई टक्‍कर नहीं, वह अपना बाजार बन अरहे हैं । कुछ दिनों बाद नैनों के ग्राहक कुछ इंप्लीमेंटेशन के बाद मारूति के ग्राहक बनेंगे । वे विशेष रूप से मोटरसाइकिल को टक्‍कर दे रहे हैं ।

क्या आप कोई प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाते है?
हमारा ध्यान मजबूत क्षेत्र, प्रशिक्षण तथा मानव विकास पर ज्याद है । प्रशिक्षण हेतु हम विशेषज्ञों तथा बाहर के फैकल्टी का भी सहयोग लेते हैं ।

एक्सपो न्यूज के पाठकों हेतु आपका कोई संदेश ?
सबों को नववर्ष की शुभकामनाएं । एक्सपोन्यूज ने ऑटो इंडस्ट्री को केन्द्र में रखकर हिंदी एवं अंग्रेजी में पत्रिका क अजो स्तरीय प्रकाशन प्रारंभ किया, मैं उनके सारे टीम को बधाई देता हूं तथा चाहत हूं कि हमारे सभी लांज पर यह पत्रिका उपलब्ध हो ।

विकास के नाम पर बांघ निर्माण बहुत बड़ा धोखा

क्यों बन रही हैं बांघ परियोजनाएं?

* आज देश के कुल स्थापित ऊर्जा लगभग १,४०,००० मेगावाट है । इसी प्रकार लौहारीनाग-पाला (६०० मैगावाट) तथा पाला-मनेरी (४८० मैगावाट) मिलाकर भी देश की कुल ऊर्जा में एक प्रतिशत भी योगदान नहीं करेगी । जब कि इसकी कीमत देश को गंगा की बलि देकर तथा उससे जुड़े दिव्य पर्यावरण व राष्ट्रीय संस्कृति के भारी विनाश पर चुकानी पड़ेगी । आज ऊर्जा के कई विकल्प आधुनिक विज्ञान हो चुका है और ऊर्जा, पवन ऊर्जा, वायुमास, भुतापी ऊर्जा, समुद्र की लहरों से प्राप्त होने वाली ऊर्जा के साथ ही कई अन्य साधनों पर सफल खोजे हो चुकी है । यह सब जानते है इस दिव्य राष्ट्रीय नदी की उदगम घाटी में इतना बड़ा खिलवाड़ होने दिया जाना बांध परियोजनाओं एवम्‌ इससे जुड़े तंत्र के देश व्यापी भ्रष्टाचार को उजागर करत अहै ।
* चिन्ताजनक दर से गंगौत्री ग्लेशियर का पिघलना क्षेत्र का अति संवेदनशील भूंकप जो ५ में होने के बावजूद भी एक के बाद एक बांध बनाने की तैयारी है, क्योंकि बड़ी-बड़ी लोहे की मशीनें, सीमेंट, कंकीट, सरीया आदि के उद्योगों की खपत सुरंगो, बराज आदि निर्माण में आसानी से होती है तथा इस प्रकार से बांधों द्वारा एक विशेष पूजीपति तथा सरकारी वर्ग को भारी भरकम मुनआफा प्राप्त होता है जो कि स्वच्छ रूप से निर्मित सौर तथा पवन ऊर्जा आदि में प्राप्त नहीं होगा ।
* महानगरों में बहुमंजिली इमरतों की चकाचौध तथा पंजीपति वर्ग की उपभोग प्रधान शैली को जगमगाने में हजारों मेगावाट बिजली का व्यय होता है । नेताओं, नौकरशाहों तथा पूजीपतियों की २४ घंटे जगमगाती कंपनियां तथा लाखों एयरकंडीशनरों के ऐशे आराम की पूर्ति के लिए गंगा की बलि दी जा रही है और इसे नाम दिया जा रहा है - विकास ......... ।
* लोगों की उनकी सभ्यता संस्कृति एवं इसके आधारभूत मानबिदुओं से तथा पृथक कर एक विशिष्ट आद्यौगिक एवं पूंजीपति वर्ग का गुलाम बनाए रखने के विश्‍व व्यापी षड़्यंत्र का ही बांध निर्मआण भी एक स्वरूप तथा अंग है ।
घाटी पर हो रहे बांधों के दुष्परिणाम ः-
(१) मनेरीभाली (१) के कारण निर्मित सुरंग निर्माण से शिरोर आदिस्थानों के प्राकृतिक जल स्त्रोत लुप्त हो गये तथा जामक गांव को भूंकप में भारी जान-मान का नुकसान उठाना पड़ा ।
(२) मनेरी भाली (११) की सुरंग निर्माण से घाटी से जुड़े तथा सुरंग के क्षेत्र में आये गांव दयोली के समस्त जल स्त्रोत सूख गये आज खच्चरों द्वारा गांव में पेय जल की ढुलाई कराई जा रही है कंपनी अपना मुनाफा कमाकर ज अचुकी है, और आज पूरा गांव ही विस्थापन की कगार पर है ।
(३) इसके साथ ही जुड़े गंवाणा, पुजार गांव, हिटाणू तथा सिगंणी के जल स्त्रोत भी सूखे है, तथा सिचाई का प्रमुख साधन “कैड़ी गाड़” भी पूर्णतः सूख चुका है ।
(४) लोहारीनाग-पाला के निर्माण से भी पाला, सैज, हूरी, तिहार, तिहार से जुड़े जल के स्त्रोतों पर भारी दुष्प्रभाव देखने में आया है ।
(५) यह क्षेत्र भूंकप संवेदनशील जोन- ५ में आता है, जहां निर्मित ग्रामीणों के भवनों में परियोजना के दौरान हो रहे विस्फोटो द्वारा दरारें आयी है, इस प्रकार संपूर्ण क्षेत्र में मकान भविष्य के लिए अत्यंत असुरक्षित हो गये है ।
(६) टिहरी समेत इन सभी परियोजनाओं के निर्मांण से अत्यंत दिव्य एवं संवेदनशील पर्यावरण भारी विनाश हुआ है इसमें जंगली जानवरों के स्वतंत्र आवागमन में भी बाधा अयई है और हिंसक होकर इनका दिनदहाड़े ग्रामीणों पर भी हमला करने की घटनायें सामने आयी है ।
(७) भारी पर्यावरण असंतुलन एवम्‌ गंगाजी की लुप्ति के कारण क्षेत्र के मौसम में भी चिंताजनक परिवर्तन देखने को मिल रहे है, जिसका दुष्प्रभाव कृषि पर सीधे तौर से देखा जा सकत अहै ।
(८) गंगा की लुप्ति से वर्ष के अधिकांश समय में होने वाली धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्रिया कलाप, अंतिम संस्कार एवं साधुओं की जल समाधि को भारी अपमान सहना पड़ रहा है । आम जन मानस झील में रूके गंगा जल में सड़ते गलते कचरे, शवों मृत पशुओं आदि को देखकर अत्यंत मर्माहत होता है यह सांस्कृतिक आघात लगातार बढ़ता ही जा रहा है ।
(९) गंगा के इस लगातार व्यापार का दुष्परिणाम सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन संबंधों पर पड़ रहा है, गंगा के तिरस्कार से क्षेत्र की मनोवृत्ति में धन एवं लोभ की प्रधानता के कारण सांस्कृतिक एवं सामाजिक संबंधों की मिठास में लगातार गिरावट आ रही है । विभिन्‍न उत्सव महोत्सवों शादी ब्याहों एवं अन्य परपंराओं में गहरी आत्मीयता एवं संबंधों की कमी स्पष्ट दिख रही है । अतः देवभूमि की संस्कृति, आदर्श एवं मर्यादा विलुप्ति की ओर जा रही है ।
(१०) लगातार भूस्खलन एवं भारी गतिविधियों के चलते पर्यटन पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है, गंगा जी की अविरल धारा की लुप्ति के कारण घाटी की चमक फीकी पड़ने से पर्यटन भी गंभीर रूप से प्रभावित होने जा रहा है ।
क्या यह वास्तविक विकास है ः-
ध्यान रहे कि इन बांधो का निर्माण क्षेत्र के विकास के लिए नहीं बल्कि महानगरों में बढ़ रही बिजली की मांग पूर्ति के लिए हो रहा है कंपनी भी यहां क्षेत्र का विकास करने नहीं बल्कि बिजली बनाने आयी है । जहां कंपनी एवं इससे जुड़ा तंत्र करोड़ों का मुनाफा कमा रहा है तथ कमायेगा यहीं यहीं दूसरी और यह घाटी भारी पर्यावरण के विनाश के साथ ही गंगा की लुप्ति हो जाने पर अपनी चमक एवं पहचान से दूर होई जाएगी ।
साथ ही अपने जंगल, जमीन, जल, जानवरों को गंवाकर हम इन्हें बांध-निर्माण की बलि चढ़ाते जा रहे है, और कंपनी के यहां मजदूर, चपरासी, श्रमिक या ड्राइवर की नौकरी कर रहे है । कभी अपने जंगल-जमीन के हम मालिक थे आज कंपनी के गुलाम होते जा रहे है । क्या यही विकास है?
निर्माणधीन बांधों को हटाये जाने के बाद हमारा संघर्ष तथा मांगे ः-
लोहारीनाग-पाला तथा पाला-मनेरी परियोजनाओं के निरस्तीकरण के तुरंत बाद हमारी निम्न मांगे होगे
ए ः-
(१) ग्रामीणों को उनकी जमीने उसी रूप में जैसे की वह पहले थी वापस लौटाई जायें ।
(२) दरार युक्‍त मकानों को सुरक्षित करवाकर ग्रामीणों को उचित हरजाना दिय अजायें ।
(३) जहां जल, स्त्रोत सूखे है वहआं नजदीकी स्त्रोतों से पर्याप्त जलापूर्ति की जाये ।
(४) बांध परियोजना गतिविधियों से जो भारी पर्यावरण नाश हुआ है उसकी क्षतिपूर्ति जो वृक्ष एवं पूर्व में थे उन्हें के सघन वृक्षारोपण द्वारा की जायें ।
इसके साथ ही क्षेत्र के अनुकूल सांस्कृतिक एवं सामजिक विकास तथा स्वावलंबन से युक्‍त रोजगार के निम्न विकल्पों पर हमार असंघर्ष रहेगा ।

* जड़ी बूटियों एवं विभिन्‍न फूलों के माध्यम से उन्‍नत उद्योगों को रोजगार हेतु बढ़ाव अदेकर स्थापित किया जाये ।
* शिक्षण संस्थान आयुर्वेदिक कालेजों की स्थापना कराई जाये जिसके माध्यम से घाटी के जन पूर्ण प्रशिक्षण प्राप्त करें ।
* फल-फूलों एवं उन्‍नत कृषि के लिए क्षेत्र में किसानों को प्रशिक्षण दिया जाये तथ अविशेष प्रकार की फसलों एवं फलों के संवर्धन पर ध्यान दिया जाये ।
* घाटी के हर गांव में उसकी अपनी बिजली होनी चाहिए जिसकी पूर्ति आसानी से गाड गदेरों पर लघु बिजली संयंत्र लगाकर की जा सकती है ।
* गंगा का उद्‌गम होने के कारण सदियों से यहां विश्‍व भर के लोगों का आना जाना रहा है घाटी की संस्कृति विभिन्‍न मेलो, यात्राओ, त्यौहारों तथा लोक परंपराओं आदि) को बढ़ावा देकर इसका पर्याप्त प्रचार प्रसार सरकारी माध्यमों से हो जिससे पर्यटन उद्योग में वृद्धि हो तथा स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिले इसके लिए सरकार द्वारा संस्कृति एवं पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए अनुकूल व्यवस्थायें बनाई जाये ।
* पहाड़ी नवयुवकों को “साहसिंक पर्यटन” के लिए सुलभ प्रशिक्षण एवं संस्थानों का विकास किया जाये, विभिन्‍न पर्यटन स्थानों को विकसित एवं प्रचार-प्रसरित कर क्षेत्र में अनुकूल रोजगार को बढ़ाया जाये ।
* घाटी के समस्त ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थानों का विकास किया जाये तथा इनके संस्कृति संरक्षण व संवर्धन के पर्याप्त व्यवस्थायें बनाकर इन्हें स्थायी रोजगार से जोड़ा जयए ।
* क्षेत्र की संस्कृति एवं संवेदनशील पर्यायवरण को ध्यान में रखते हुए क्षेत्र के अनुकूल विकास का मॉडल तैयार किया जाये तथा विकास कार्यो से पूर्व स्थानीय जनों का दूरदृष्टि पूर्वक विचार विमर्श विभिन्‍न गोष्ठियों के माध्यम से सुनिश्‍चित हो तथा इस प्रकार क्षेत्र को हम आधुनिकता के युग में एक आदर्श रूप में स्थापित करें ।

मैं गंगा के रूप में घाटी को जो दिव्य वरदान प्राप्त है, उसको सुरक्षित रखकर ही हम उपरोक्‍त समस्त विकास को प्राप्त कर सकते है । अतः समस्त बांध प्रभावितों एवं गंगा- भक्‍तों को यह आह्‌वान है, कि हमारे इस अभियान में अपनी सक्रिय भूमिका के साथ जुड़कर पुण्यलाभ अर्जित करें इसी आशा और अपेक्षा के साथ .............सभी के लिए

- गंगा रक्षा अभियान (योही आदित्यनाथ) / अखाड़ा परिषद
शंकराचार्य निश्‍चलानंद सरस्वती

वैचारिक क्रांति की धारा को गति दे रही है डॉ० मुक्‍ता की रचनाएँ

स्त्रियों पर विचारहीनता का आरोप लगाया जाता है, मगर यह समझने की जरूरत है कि अनुभवों से ही विचार आता है और स्त्री विमर्श में अब वैचारिक लेखन की शुरूआत हो गई है । विचार का वध संभव नही है डॉ० मुक्‍ता ने बड़े साहस के साथ पुरूषसत्ता के औचित्य और शोषण का सटीक चित्रण प्रस्तुत किया है । उनके लेखनी के अकाट्‌य सत्य के अनुभूति और वैचारिक क्रांति की धारा को गति मिले यही हमारी आकांक्षा है । इनके कविताओं के मूल्यांकन पर मैं इतना ही कहूँगा कि “डॉ० मुक्‍ता की लेखनी सच्चाई से रूबरू तो कराती ही है साथ ही साथ समाजिक व्यवस्था के प्रति विद्रोह का जनसंचार करने की पूरी क्षमता है । एक पुरूष होने के बावजूद मैं उनके अन्याय, शोषण, विकृति तथा सांस्कृतिक कुठाराघात के खिलाफ स्वर को प्रणाम करता हूँ । संग ही इस सारगर्भित पुस्तक (अस्मिता) के अतिशीघ्र द्वितीय संस्करण किसी संस्था द्वारा प्रायोजित होने की कामना करता हूँ । जिससे इसके अधिकाधिक प्रतियों का प्रकाशन हो सके और अधिकांश पाठक इनके कविताओं का रसास्वादन ले सकें । ‘अस्मिता’ वास्तव में पाठकों को अपने अस्मिता का मान कराती है । समाज में पनप रही विकृति जो वास्तव में पश्‍चिमी सभ्यता की देन है, को केन्द्रित कर डॉ० मुक्‍ता द्वारा रचित काव्य संकलन शंखनाद सदृश है ।
भारतीय संस्कृति का पतन और मानवीय मूल्यों का हनन का संदेश देकर कवियित्री ने समाज को आगाज किया है कि अभी भी वक्‍त है, सँभल जाओ । संतुलन बिगड़ने पर खतरे बढ़ने की प्रबल संभावना को कवियित्री ने विभिन्‍न कविताओं के रूप में एक शिल्पी के रूप में उभरी हैं । महाभारत एवं रामायण कालीन नारी पात्रों का उदाहरण देकर डॉ० मुक्‍ता ने सिद्ध करने की कोशिश की है कि अपनों द्वारा ही अपनो का शोषण और दंश भोगना पढ़ता है । प्रस्तुत पुस्तक “अस्मिता” में नारी विमर्श का बेबाक चित्रण है । “अस्मिता” के रूप में जीवन का यथार्थ, समाज का कटु सत्य व प्रत्येक नारी की अनुभूतियों को काव्य पुष्प के रूप में बड़े ही सुन्दर ढंग से पिरोया गया है । हमें उम्मीद ही नहीं विश्‍वास है कि इस काव्य पुष्प की खुशबू वातावरण में नई चेतना का नवसंचार अवश्य होगा । संक्षेप में कहें तो प्रस्तुत पुस्तक का निम्न सूर्य में कितनी तपन सारे है अग्नि में कितनी जलन है बता सकते हैं वही लोग जिनकी जिंदगी हवन है । डॉ० मुक्‍ता ने अपने काव्य संकलन में कलियुग के भगवान को भी नहीं बख्शा है । संस्कृति पर हो रहे कुठाराघात का सजीव चित्रण, उन्होंने रामायण व महाभारत कालीन पात्रों को लक्षित संस्कृति की धरोहर, तथागत जो कालन्तर में भगवान बुद्ध के निर्णय को कटघरे में लाकर खड़ा करके निरूत्तरित कर दिया है । गीता के संदेश का सूसरा पहल कवियित्री ने प्रस्तुत किया है । अभिमन्यु शीर्षक में युद्ध के नियमों पर इन्होंने गंभीर और चिंतनीय प्रश्‍न उठाए हैं । इक्‍कीसवीं सदी के रावण का सजीव चित्रन करके इन्होंने जो पर्दाफाश किया है वह वाकई काबिलेतारीफ है । राजनीतिज्ञों को हिरणकश्‍यप का दर्जा देकर एवं प्रहलाद शीर्षक में राक्षसत्व का अंत का संदेश अपने आप में बहुत कुछ बयाँ कर देता है । मूल्यहीनता मिटाने की चुनौती देकर उन्होंने पाठको को ललकारा है, अवश्य ही इसका स्पन्दन सकारात्मक परिवर्त्तन की दिशा में अपनी भूमिका निभाएगा । कलियुग का अंत क्यों किया जाना चाहिए, की प्रस्तुति अंतर्मन को झकमभेड़ देती है । एक स्वपुन शीर्षक कविता में नायिका स्वयं को सीता जैसा बनना स्वीकार है परन्तु नायक को राम के रूप स्वीकार नहीं । कवियित्री की प्रस्तुति राम के व्यक्‍तित्व एवं निर्णय को नायिका के माध्यम से नाजायज करार देती है । समाज के तथाकथित ठेकेदारों एवं पुरूष वर्ग द्वारा निर्मित अग्निपरीक्षा के औचित्य पर, डॉ० मुक्‍ता ने सवाल उठाया है ।
नारी का वजूद शब्दशिल्प की अनुपम मिशाल लगती है । आधुनिक डॉक्टरों द्वारा की जा रही भ्रूणहत्याओं का जिक्र “अजन्मी” शीर्षक में किया गय अहै । नारी सशक्‍तिकरण, मानवाधिकार समानता, स्नेह और सौहार्द, सामंजस्यता व समरसता अदालत की फाइलों एवं कानून की धाराओं में कैद होने का नजरिया “एक प्रश्न” के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है ।

गोपाल प्रसाद
४/१९ ए , साकेत ब्लॉक, मंडावली दिल्ली -९२
संपर्क - 9289723145

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

कम खर्च में ज्यादा लाभ का सुनहरा अवसर

प्रिय महोदय,

भारत की राजधानी दिल्ली में अपने व्यापारिक अनुभवों से आप अवश्य परिचित होंगे । जिन कंपनियों/संस्थाओं के यहाँ कार्यालय या प्रतिनिधि नहीं है, वे दिल्ली से प्राप्त होने वाले व्यापक व्यापारिक संभावनाओं से वंचित हैं । ऐसी कंपनियों/संस्थाओं के लिए हम अपनी सेवाएँ आपके बजट के अनुरूप दे सकते हैं ।
आज हर कंपनियों/संस्थाओं के समक्ष प्रचार-प्रसार एवं समन्वय का संकट है । इसके अभाव में आप प्रतिस्पर्धी कंपनियों को चुनौती एवं अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सकते । इस महत्वपूर्ण सच्चाई को विशेष रूप से ध्यान में रखकर लघु एवं मध्यम श्रेणी के व्यवसायियों के प्रगति हेतु हम मीडिया समन्वयक ( Media Co-ordinator), कार्यक्रम समन्वयक ( Event Co-ordinator), लायजनिंग प्रतिनिधि ( Liaisoning Agent) के रूप में आपके विभिन्‍न समस्याओं का समाधान कर सकते हैं । हम आपके व्यवसाय और बाजार की संभावना के मध्य मजबूत धुरी के रूप में होंगे ।
सत्यमेव जयते जनसंपर्क एजेन्सी, औद्योगिक एवं व्यापरिक इकाइयों को विभिन्‍न प्रकार की सेवाएँ प्रदान करता है तथ अव्यापार की वृद्धि हेतु उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है । क्रेताओं एवं विक्रेताओं को उत्पादों के स्त्रोत, संपर्क एवं समन्वय में यह इजेंसी आपको भरपूर मदद करेगी । इसके माध्यम से आप संपूर्ण देश में व्यापार संवर्धन का अभियान एवं नेटवर्क का निर्माण सुनिश्‍चित कर सकते हैं ।
मीडिया के समन्वय, व्यापार से संबंधित सेमिनारों/संगोष्ठियों/कार्यशालाओं के आयोजन में इस एजेन्सी के सहयोग से आप निश्‍चित रूप से उत्साहित एवं सशक्‍त होंगे ।
आपकी संस्था/कंपनी को व्यापार एवं उद्योग जगत के साथ-साथ भारतीय बाजार की अपेक्षाओं के अनुरूप लाना हमारा कर्तव्य है । हमें आशा ही नहीं बल्कि विश्‍वास है कि आपकी आवश्यकता और हमारा सहयोग एक अलग आयाम प्रस्तुत करेगी ।
आप अपनी आवश्यकताओं के हमें अवश्य बताएं । हमें विश्‍वास है कि आपकी आवश्यकताओं के अनुरूप हम उसके अबिलंब निदान हेतु सक्षम होंगे । हमारे सलाह एवं समन्वय से आपको निश्‍चित रूप से शक्‍ति मिलेगी । आपके सकारात्मक पहल एवं पत्रोत्तर की अपेक्षा रहेगी ।
हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ,

सत्यमेव जयते जनसंपर्क एजेन्सी
४/१९ए साकेत ब्लॉक, मण्डावली दिल्ली - ११००९२
मोबाइल - 09289723145
ईमेल - satyamevjayate1957@gmail.com
gopal.eshakti@gmail.com

SAVDHAN -PRITHAVI TAP RAHI HAI !

ग्लोबल वार्मिंग को लेकर संपूर्ण विश्‍व में दहशत का माहौल है । एक मोटे अनुमान के मुताबिक सन्‌ २०५० तक यदि धरती के तापमान में दो डिग्री की कमी नहीं हुई तो धरती, मानव और अन्य जीवधारियों के जीवन के लिए कष्टकारी हो जाएगी । इस गंभीर चिंतन को लेकर गत दिनों विश्‍व के अनेक देश कोपेनहेगेन में चर्चा हेतु जुटे थे । ग्लोबल वार्मिंग जैसे गंभीर मुद्‌दे को लेकर बुलाया गया यह सम्मेलन दबंग देशों की राजनीति का शिकार हो गया । अनेक देशों ने जिम्मेदार ना होते हुए भी भारत को कठघरे में घेरने का प्रयास किया । हालाँकि विकासशील देशों की अग्रिम पंक्‍ति में खड़े भारत के नेताओं ने विकसित देशों के इस षडयंत्र का मुँहतोड़ जबाब दिया । परिणामस्वरूप कार्बन कटौती को लेकर अन्य देशों को भी उत्तरदायित्व उठाने पर विवश होना पड़ा । संपूर्ण मानवता के लिए बेहद खतरनाक होती जा रही ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे को सभी राजनीतिक पार्टियों को अपने घोषणापत्र में शामिल कर इसका समाधान हेतु सक्रिय होना चाहिए । ग्रीन हाउस गैसों में कटौती और कार्बन कटौती को लक्ष्य बनाकर सभी बुद्धिजीवी, मीडिया को समाचार, विचार एवं ज्ञान के द्वारा अपना भागीदारी अवश्य देना चाहिए । निश्‍चित रूप से यह कदम धरती माता के जख्मों पर मरहम लगाने का काम करेगा, जिन जख्मों के लिए हम आप स्वयं जिम्मेदार हैं । धरती माता के गोद में आश्रय पाने हेतु हमें प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बंदकर पर्यावरण अनुकूल वातावरण तैयार करने होंगे । प्रस्तुत पुस्तक के लेखक ने इस पुस्तक को इसी संदर्भ में नाट्‌य रूप में परिणत कर जनजागरण हेतु शंखनाद किया है जो काबिलेतारीफ है । वर्तमान समय के संदर्भ में हो रहे घटनाक्रम को नाटक के माध्यम से प्रस्तुत करके ही हम भारतीय संस्कृति को भी वास्तव में जीवित रख पाएँगे । इस नाटक के लेखक गर्गऋषि शांतनु इंजीनियर होने के साथ-साथ पर्यावरण चिंतक तथा नाट्‌यकर्मी एवं विशुद्ध साहित्यकार भी हैं । संक्षेप में कहा जाय तो यह पुस्तक पठनीय, सराहनीय एवं आलोकित करनेवाली साबित होगी । “हम अपने मित्रों, शुभचिंतकों, संस्कृतिकर्मियों, पुस्तकालयों एवं विद्यार्थियों को उपहारस्वरूप देकर एक नई चेतना जगाने हेतु सहभागी हो सकते हैं । संपूर्ण मानवता और देश के पर्यावरण तथा जनता के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा की दिशा में यह पुस्तक अनमोल उपहार सिद्ध होगा ।
- गोपाल प्रसाद

स्विस ऑटो ने कहा “ओवर सोल्यूशन ड्राईव यू बेटर”

प्रगति मैदान में आयोजित ऑटो एक्सपो के हॉल नं० १८ में अंतिम दिन उत्साह व धर्म स्विस ऑटो द्वारा लकी ड्रॉ विनर को ससम्मान बाईक की चाभी सौंपी गई । जिसके प्रथम विजेता कंपनी के वरकर्र आर० वी० आटो सेन्टर, पालम डाबड़ी रोड, दिल्ली के मालिक नरेन्द्र कुमार, द्वितीय विजेता चौधरी सेल परचेज, सफीदोन जिला जींद हरियाणा के मालिक मंजीत सिंह तथा तीसरे विजेता सामान्य दर्शक वर्ग से उत्तम नगर, दिल्ली के आईटी कंसलटेंट प्रवीण शर्मा थे । कंपनी द्वारा इस अवसर पर उत्साहपूर्ण, माहौल में मिलन समारोह भी रखा गया था जिसमें कंपनी के ऊपर से नीचे स्तर के संचालनकर्मी मौजूद थे ।
स्विस ऑटो के जेनरल मैनेजर अरूण सूद के अनुसार सभी वाहनों के इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रिक पार्ट्‌स (लून असे लीलंड तक) उनकी कंपनी उत्पादित करती है, जो विस्तृत रेंज में मौजूद है । दो से तीन दिनों के अंदर ही ९०-९५% माल ऑर्डर की आपूर्त्ति भी कर दी जाती है ।
कंपनी की दिल्ली में ३ (राजस्थानी उद्योग नगर, जी० टी० करनाल रोड), तथा हिमाचल प्रदेश (कलाम, जिला सिरमौर) में १ निर्माण इकाई कार्यरत है । विशेष रूप से इनका ध्यान निर्यात पर है । ईबाईक्स की ज्यादातर कंपनियाँ इसी कंपनी की कंपोनेंट इस्तेमाल करती है ।
कंपनी के स्टॉल पर प्रदर्शित स्लोगन खुद सबकुछ बयान कर रहा था -
“चेंज टू विन ए बाईक”
आवर सोल्यूशन ड्राईव यू बेटर”
कंपनी सूत्रों का मानना है कि उनके कंपनी में बाईक के सभी पुर्जे आसानी से उपलब्ध है । युवातुर्क निदेशक रमणदीप सिंह एवं चेयरमैन चशविन्दर सिंह के मार्गदर्शन तथा यशविन्दर सिं, गगनदीप सिंह, पवनदीप सिंह व सुशील कुमार और अरदिल अजीज जनरल मैनेजर पी०सी० सिकरोरिया के अथक परिश्रम से कंपनी नित्य नई ऊँचाईयाँ प्राप्त कर रही है । ऑटो कंपोनेंट के क्षेत्र में प्रतिष्ठित नाम वाली कंपनियों में प्रमुख “स्विस ऑटो” के युवा सी०ई०ओ० रमणदीप सिंह से ऑटो जोन स्पीड के मुख्य प्रतिनिधि गोपाल प्रसाद द्वारा लिए गए साक्षात्कार के मुख्य अंश ः-

प्रश्न ः आपकी कंपनी दूसरे कंपनियों से अलग कैसे है?
उत्तर ः आज मुक्‍त बाजार हैं । नेटवर्क बनाने की आजादी है । वास्तव में हमारा किसी से कंप्टीशन नहीं है ।

प्रश्न ः आपके व्यवसाय विस्तार की क्या योजना है?
उत्तर ः अंतिम उपभोक्‍ता तक उत्पाद पहुँचाना ही हमारा लक्ष्य है । तभी हम अपने कार्य में सफल होंगे ।

प्रश्न ः आपके नजर में प्रतिष्ठित क्लांयट कौन-कौन से हैं?
उत्तर ः हमारे जितने भी क्लांयट हैं हमारे लिए एक बराबर है । दिल्ली में हमारा रिटेल नेटवर्क है, जिसके द्वारा चाहे हजार रूपए के उत्पाद की भी आपूर्त्ति की जाती हो ।

प्रश्न ः क्या आप मानते हैं कि आज बाजार में भारी प्रतिस्पर्धा है?
उत्तर ः सस्ते सामान के उपभोक्‍ता मात्र एक बार के होते हैं परन्तु क्वालिटी वाले सामान के ग्राहक हमेशा रहेंगे ।

प्रश्न ः आपके व्यवसाय का मूलमंत्र क्या है?
उत्तर ः हम भावनात्मक संबंध को वरीयत अदेते हैं जिससे व्यवसाय में वृद्धि होती है । सामूहिक रूप से साथ चलने के कारण ही हम आगे हैं ।

प्रश्न ः आपकी तकनीकी विशेषता एवं ध्यान किस ओर विशेष रूप से रहता है ?
उत्तर ः किसी भी तरह का बाईक हो इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम एक समान रहेग अचाहे वह पेट्रोल, डीजल, हाइड्रोजन, मियेन या पानी से ही क्यों ना चलें ।

प्रश्न ः भविष्य की क्या परियोजनाएँ एवं आकांक्षाएँ हैं?
उत्तर ः गाँव- गाँव तक मोटर साईकिल पहुँचे तभी पार्ट्‌स की माँग बढेगी फिर हम आपूर्ति करेंगे ।

प्रश्न ः माँ बढाने हेतु आप क्या करते हैं?
उत्तर ः हमारे विक्रय प्रतिनिधि देश के कोने-कोने में जाकर बाजार की तलाश करते हैं जो डीलर बन सके । हमारे यहाँ डीलर बनने हेतु शर्त्त यही है कि हमारे क्षेत्र के उत्पाद के रहत हुए दूसरे कंपनी का नहीं बेच सकते ।

प्रश्न ः ऑटो एक्सपो का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर - नई पीढ़ी का जादू बढ़ा है और इसी जादू को मुनाने हेतु हमने लकी ड्रा स्क्रीम आयोजित किए । हमें काफी अच्छा रिस्पांस मिल अहै । २०१२ के एक्जीविशन को हम इससे भी बड़ा करेंगे ।

अलग मिथिला राज्य का गठन क्यों नहीं?

[भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के द्वारा की गई विभिन्‍न भाषाओं के अध्ययन के अंतर्गत मैथिली भाषायों की संख्या (२००१ के अनुसार) भारत में कुल १२,१७९१२२ है । जबकि वास्तविक रूप में यह संख्या कई गुणा अधिक है । ]

“मिशन मिथिला” ने संयोजक गोपाल प्रसाद ने अपने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कहा है कि जब पृथक तेलंगाना राज्य का गठन हो सकता है तो अलग मिथिला राज्य का गठन क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि मिथिलांचल को पूर्ण न्याय अभी तक नहीं मिला है । सभी क्षेत्रों में मिथिलांचल की घोर उपेक्षा हो रही है । केन्द्र सरकार और बिहार सरकार ने अभी तक कोई उद्योग इस क्षेत्र में शुरू किया है, जिससे इस क्षेत्र के लोग पलायन को मजबूर हैं । असमान विकास के चलते देश का पिछड़ा राज्य बिहार में मिथिला अतिपिछड़ा क्षेत्र बनकर रह गया है । बिहार सरकार का पूरा ध्यान मात्र पटना एवं नालंदा को विकसित करना रह गया है ।
मिथिला में पर्यटन एवं खाद्य प्रसंस्करण हेतु भरपूर संभावना के बावजूद इसके साथ नकारात्मक रवैया अपनाया जा रहा है । इस क्षेत्र की भाषा मैथिली एवं मैथिला अकादमी अपने अस्तित्व हेतु संघर्ष कर रही है । बिहार सरकार के ‘युवा महोत्सव’ एवं दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित बिहार पवेलियन में आईआईटीएफ के दौरान आहूत सांस्कृतिक कार्यक्रम में मैथिली की घोर उपेक्षा की गई जिससे सरकार की नीति और नीयत मिथिलावासियों को समझ में आ गया है । इन सारे समस्याओं के निदान का एकमात्र विकल्प अलग मिथिला राज्य ही है । बिहार सरकार प्रवासी बिहारियों की सुरक्षा, रोजगार एवं न्याय दिलाने में पूरी तरह से विफल रही है और इसके ज्यादातर शिकार मिथिला के लोग ही रहे हैं । महाराष्ट्र दिल्ली एवं पंजाब के बाद मध्यप्रदेश के राजनेताओं ने भी बिहारियों के साथ असंवैधानिक रूख अपनाया और बिहार सरकार ने केवल बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लिया । बिहार सरकार का योजना विभाग, केन्द्र सरकार के योजना विभाग में बिहार यस्क फोर्स और बिहार फाउंडेशन के बावजूद मिथिला को बिहार मे पर्याप्त तवज्जो क्यों नहीं मिली? आधारभूत संरचना के विस्तार के बिना मिथिला कटा-कटा सा है ।
मिशन मिथिला के संयोजक गोपाल प्रसाद ने पूर्व लोकसभाध्यक्ष पी०ए० संगमा के बयान का स्वागत किया है जिसमें उन्होंने कह अथा कि “क्षेत्रवाद-नक्सलवाद असमानता की उपज है, जिसे छोटे राज्यों का गठन कर दूर किया जा सकता है । ” मिथिला के लोग बाढ़ झेलें और विकास की धारा अन्य क्षेत्रों में बहे यह नहीं चलेगा । उनका संगठन भारत के समस्त मिथिला मूलवासियों को इस आंदोलन हेतु जागरूक करेगा । डॉ० धनाकर ठाकुर के आह्यान पर अलग मिथिला राज्य के गठन हेतु अंतर्राष्ट्रीय “मैथिली परिषद” द्वारा कानपुर में २३-२४ दिसंबर को मिथिला के बुद्धिजीवियों, स्वैच्छिक संगठनों का सम्मेलन होगा जिसमें अआंदोलन की दशा-दिशा तय की जाएगी । मिथिला के सर्वागीण विकास, मधुरतम भाषा मैथिली को पूर्ण सम्मान एवं मिथिला के सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण-संवर्द्धन हेतु अलग मिथिला राज्य की माँग हेतु समस्त मैथिल समुदाय से अपील है कि वे केन्द्र सरकार पर दबाव बनाएँ कि पृथक तेलंगाना के साथ-साथ पृथक मिथिला राज्य के गठन की भी घोषणा हो । इस संदर्भ में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आदि को ज्ञापन भी भेजा जाएगा ।
सर्वविदित है कि बिहार के पूर्व महाधिवक्‍ता पं० ताराकान्त झा एवं स्व० भोगेन्द्र झा आदि नेताओं ने भी अलग मिथिला राज्य हेतु जनजागरण एवं पदयात्रा कर चुके है । तेंदुलकर रिपोर्ट के नए मापदंड के बाद बिहार में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों का प्रतिशत ४२.५३ से बढ़कर ७५.१४ प्रतिशत हो गय अहै जो अपने आप सब कुछ बयान कर देता है । बिहार के मुख्यमंत्री (राज्य में कितने गरीब हैं, इसकी संख्या केन्द्र ने तय कर दी और उनकी पहचान के लिए राज्य सरकार को कह दिया, यह कैसी व्यवस्था है?”) में केन्द्र व राज्य सरकार के शह-मात का खेल स्पष्ट प्रतीत होता है ।

गोपाल प्रसाद (संयोजक, मिशन मिथिला)
प्रबंध संपादक, मिथिला महान
४/१९ ए, साकेत ब्लॉक, मंडावली, दिल्ली-९२
मोबाइल - 9289723145
Email - missionmithila@gmail.com
Blog - www. missionmithila.blogspot.com

जिनका लक्ष्य है संस्कृत शिक्षा में सुधार लाना

बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष एवं हिंदी के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार सिद्धेश्‍वर से गोपाल प्रसाद द्वारा लिए गए साक्षात्कार के मुख्य अंश ः

प्रश्न ः बिहार संकृत शिक्षा बोर्ड की स्थापना कब हुई तथा इसका उद्देश्य क्या है?
उत्तर ः बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड की स्थापना सन्‌ १९८१ में हुई जिसका उद्देश्य था संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार एवं संस्कृत शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार । संस्कृत भाषा के साथ लोगों ने ऐसा व्यवहार किया कि यह भाषा विलुप्त होने के कगार पर है । इसका मूल कारण उपर से नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त होना है । प्रथमा, मध्यमा के केन्द्र का विक्रय हो रहा था । जितने विद्यालय हैं, वे शिक्षकों के झोले में हैं । संस्कृत शिक्षा की ओट में संस्कृत व्यापार बनकर रह गई । संस्कृत के बहाने मात्र दुकानदारी चलाई जा रही थी ।

प्रश्न ः आपके अध्यक्ष बनने के बाद क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर - १५ सितंबर २००८ को मैं इस बोर्ड का चेयरमैन बना । संस्कृत के विद्वानों से आशा क्षीण होने तथा भ्रष्टाचार के कारण ही हिंदी के साहित्यकार को दायित्व मिला ।

प्रश्न ः हिंदी के साहित्यकार संस्कृत की अनिवार्यता के मुद्दे को लेकर वीरचन्द्र राय नामक व्यक्‍ति की याचिका को पटना उच्च न्यायालय ने याचिका वापस लेने को मजबूर कर दिया, साथ ही ५ हजार रूपए का जुर्माना याचिकाकर्त्ता पर ठोका गया । इस संदर्भ में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के फैसले की पंक्‍ति ध्यान देने योग्य है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “तीन दशक में संस्कृत के विद्वान कोई परिवर्तन नहीं कर पाए जबकि १ वर्ष में हिंदी के विद्वान आए और दशा सुधार दी । एक साल में नक्शा बदलता हुआ दिखाई पड़ा ।

प्रश्न ः आपने इस कठिन कार्य को कैसे संभव किया?
उत्तर ः मेरा पूरा जोर लोगों की मानसिकता बदलने पर केंद्रित था । मैंने संस्कृत को देवभाषा से जनभाषा बनाने की दिशा में पहल की । वास्तव में संस्कृत भाषा बिहार में जाति ही नहीं बल्कि एक परिवार में सिमटकर रह गया था । २००९ की मध्यमा परीक्षा पहली बार इतिहास में पारदर्शी और कदाचार मुक्‍त हुई तथा उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में गड़़बड़ियाँ नहीं हुई । पहले एक केन्द्र तीन लाख में बिकते थे जो इस बार नहीं बिके । शिक्षा माफियाओं ने पैसे लौटाए । साहस, संकल्प और ईच्छाशक्‍ति तथा पूरी ईमानदारी के साथ दायित्व का निर्वहन किया । २८-२९ दिसंबर २००९ को राष्ट्रीय सम्मेलन में सभी विद्वानों ने शिरकत की जिसमें ६००० प्रतिनिधियों ने २ दिनों तक सहभागिता की ।

प्रश्न ः संस्कृत के साथ मूल समस्या तथ आपकी उपलब्धियाँ क्या है?
उत्तर ः मौजूदा परिदृश्य में समाज रूग्ण और बीमार है, जिससे संस्कृति और संस्कार समाप्त हो रहे हैं । यही सारी समस्याओं की जड़ है । संस्कृत के विलुप्त होने से ही संस्कृति और संस्कार विलुप्त हो रही है । संस्कृत का उन्‍नयन नई पीढ़ी द्वारा संभव है । संस्कृत शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाकर तथा इसे रोजगारमूलक बनाने से ही लोगों का रूझान बनेगा । संस्कृत के पाठयक्रम में बदलाव लाने की परम आवश्यकता है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अब इस भाषा के साथ सूचना तकनीक, नैतिक शिक्षा तथा योग का समावेश करने हेतु राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान से नए सिलेबस मॉडल हेतु अनुरोध किया है । २८ दिसंबर २००८ को पटना के तारामंडल सभागार में संस्कृत की गुणवत्ता पर केन्द्रित बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड की ओर से एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई जो १२ घंटे तक चली जिससे देश के ख्यातिप्राप्त संस्कृताचार्य विद्वानों के व्यक्‍त विचारों से सही दिशा और मार्गदर्शन मिला । इसी से प्रेरित होकर २८-२९ दिसंबर २००९ को श्रीकृष्ण स्मारक भवन में संस्कृत शिक्षण को केन्द्र में रखकर दो दिवसीय राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन बोर्ड के तत्वाधान में किया गया । जिसके शैक्षिक सत्रों में संस्कृत साहित्य की समस्याएँ और समाधान, लौकिक संस्कृत साहित्य में बिहार की प्रतिभागिता, भारतीय संस्कृति के संदर्भ में संस्कृत की भूमिका और संस्कृत साहित्य में वैज्ञानिक चिंतन विषयों पर देश के सुपरिचित संस्कृत, पाली एवं हिंदी चिंतकों एवं विचारकों के विचारों का आदान-प्रदान हुआ । बोर्ड को संस्कृत उन्‍नयन के लिए रोशनी मिली । यह राष्ट्रीय सम्मेलन ऐतिहासिक इसलिए कहा जाएगा क्योंकि इस तरह का आयोजन बोर्ड के इतिहास में पहली बार हुआ, जिसमें संस्कृत के रास्ते तलाशने की सार्थक तलाश हुई ।

प्रश्न ः संस्कृत शिक्षा बोर्ड का अगला कदम क्या होगा?
उत्तर ः संस्कृत साहित्य को समृद्ध करने के लिए बोर्ड ने निर्णय लिया है कि बोर्ड के द्वारा “वाग्धारा नामनी” नामक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित की जाएगी, जिसके प्रवेशांक का लोकार्पण फरवरी-मार्च २०१० में सकेगा । इसके द्वारा बोर्ड के स्तर पर भी कार्यकलापों को पारदर्शी और भ्रष्टाचारमुक्‍त करने का प्रयास किया जा रह अहै । प्रवेशपत्र तथा प्रपत्र भरने की प्रक्रिया में शिक्षकों एवं कर्मचारियों के सहयोग से भ्रष्टाचार का नामोनिशान देखने में नहीं आया । उसी प्रकार २००९ की मध्यमा परीक्षा के प्रमाणपत्र एवं अंकपत्र के वितरण में भी पारदर्शिता देखी गई । प्रमाणपत्रों की हेराफेरी ना हो इसके लिए बोर्ड ने पहली बार तस्वीर अनिवार्य कर दी है ।

गंगा- एक लुप्त होती नदी

“उत्तरकाशी से गंगोत्री तक शेष बचे अंतिम प्राचीन सतत प्रवाह का चलता विनाश गंगा आह्यान ः गंगा के नैसर्गिक एवं सांस्कृतिक प्रवाह के लिए एक जन‍आंदोलन

सरकार क्या करने जा रही है?
आजकल सरकार गंगा पर बांधों की श्रृंखला की निर्माण प्रक्रिया में लगी है जो कि प्राचीन हिमालय में इसके स्त्रोत निकट गंगोत्री से प्रारंभ होती है, ये परियोजनाएँ टिहरी बांध एवं हरिद्वार तक के अन्य बांधों को जाकर मिलेंगी ।

इस प्रकार गंगोत्री से हरिद्वार तक गंगा का संपूर्ण बहाव वास्तव में बांधों की श्रुंखला है ।

इन परियोजनाओं में क्या समाहित है?
ये परियोजनाएं सुरंग तथा ऊर्जागृह की निर्माण प्रक्रिया में पहाड़ों में विस्फोटों, खुदाई और पहाड़ी ढलानों को गिराने से हो रहे हिमालय के भारी-विनाश को समाहित करती हैं, इनमें शामिल है, जंगलों का कटना, पेड़ों क अकटना, हमारे पहाड़ों के प्राचीन एवं अनछुए भागों का मलिन होना तथा स्थायी रूप से संपूर्ण घाटी का भयभीत होना, अंततः चूंकि परियोजनाएँ लगातार एक के बाद एक हैं, यह संपूर्ण नदी को बिना किसी विराम के अंधियारी प्रकाशविहीन सुरंगों में डालकर भूमिगत बना रही हैं ।

वर्तमान परियोजनाएँ जिनका तत्काल रूकना आवश्यक है, इस प्रकार हैं ः
१. भैरोंघाटी १- विचाराधीन (गंगोत्री से मात्र ९ किलोमीटर दूरी पर)
२. भैरोंघाटी २. - विचाराधीन (भैरोंघाटी १ के तुरंत बाद)
३. लोहारीनाग - पाला- निर्माण प्रारंभ
४. पाला - मनेरी- निर्माण हेतु तैयार (लोहारीनाग-पाला के तुरंत बाद)

गंगा में क्या बाकी रहेगा?
कुछ नहीं !!! अपनी उद्‌गम घाटी में गंगा पूर्णतः अस्तित्वविहीन हो जायेगी । ये परियोजनाएँ नदी के लगभग संपूर्ण प्रवाह को हिमालय में खुदी सुरंगों के भीतर मोड़ रही हैं । जो शेष बचेगा वह है नदी का सूखा बिछौना, शायद एक छोटी-सी धारा से युक्‍त जो कि टखनों तक के भाग को गीला करने के लिए मुश्किल से पर्याप्त हो । यह मूलतः २-३ क्यूमेक्श जल है जो पर्यावरण प्रभाव आकलन में बतआई गई जल की छोड़ी जानेवाली न्यूनतम मात्रा है । प्रायोगिक रूप में जो दिखता है, वह है एक संकीर्ण, स्थान-स्थान पर शैवालों से युक्‍त छिछली धारा, और यह दयनीय प्रवाह है उस गंगा नदी का जोकि दिव्य, शक्‍तिमान मानी जाती है ।

क्या विकास की इस आंधी में गंगा बचेगी ?
३०.२ किमी लंबा गंगोत्री ग्लेशियर हिमालयी ग्लेशियरों में एक बड़ा ग्लेशियर है और २३ मीटर प्रतिवर्ष की चिन्तित दर से इसका पीछे सरकना दर्ज किया गया है । यह अनुमान लगाया गया है कि २०३० तक ग्लेशियर लुप्त हो सकता है । ग्लेशियर विज्ञानियों के अनुसार पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के स्त्रोत के इतने निकट भारी मशीनरी गतिविधियां केवल ग्लेशियर के पीछे हटने की दर को बढ़ाने जा रही हैं ।

पर्यावरणविद्‌ क्या कहते हैं?
W W F ने दर्ज किया है कि विश्‍व की “१० संकटग्रस्त नदियों” में गंगा एक है तथा पृथ्वी पर १२ मुख्य रूप से संकटग्रस्त स्थानों में हिमालय शामिल है । इन परियोजनाओं के माध्यम से एक मार्ग से हम दोनों का ही विनाश कर रहे हैं ।

स्थानीय रूप से इन परियोजनाओं का क्या मायने है?
यदि कोई सोचता है कि ये परियोजनाएं स्थानीय रूप से भौतिक समृद्धि लाती है तो वह पूर्णत गलती पर है, विस्तृत रूप से जो वहां पाया जाता है वह है-
* जल स्त्रोतों का हास - सारे गांव पीने का जल खो चुके हैं ।
* विस्फोटों से घरों में दरारें ( यह क्षेत्र जोन ५ में है जो कि भारत में भूकंओ की सर्वाधिक संभावना वाला क्षेत्र है।) यह घर इस प्रकार भूकंप क्षेत्र में लोगों के रहने के लिए अत्यंत असुरक्षित हो गये हैं ।
* भूमि का क्षय एवं इस प्रकार जीविका एवं आय का क्षय ।
* चारेयुक्‍त भूमि एवं जंगलों का क्षय जिसपर की पहाड़ीजन भारी रूप से निर्भर हैं ।
* पर्यटन द्वारा चलने वाली जीविका का क्षय- जोकि निश्‍चित ही गंग अके क्षय से, भूस्खलन से और प्राकृतिक सुंदरता के विनाश से गहरे रूप से प्रभावित होने जा रहा है ।
* स्थानीय संस्कृति का क्षय जोकि गंगा के चारों ओर व्याप्त है ।
* बांध कर्मियों के द्वारा शीत में नीचे आने वाले वन्य जीवों का शिकार ।

क्या यह परियोजनाएँ रोजगार उपलब्ध कराती हैं?
परियोजना विवरणों में यह स्पष्ट स्वीकारा गया है कि बहुत रोजगार खुलन अप्रत्याशित नहीं है । वस्तुतः कार्यरत बांध में बहुत कम कर्मचारियों की आवश्यकता है । उदाहरण के लिए पिछले २० वर्षों से कार्यरत मनेरी बांध १ में केवल ७० लोगों की नियुक्‍ति है (जिले की जनसंख्या ३ लाख है) । यहां तक कि निर्माण के अस्थायी रूप से मजदूरी या ठेके पर कार्य कर रहे हैं । अतः यह निश्‍चित रूप से देखा जा सकता है कि लंबे चरण के लिए इन परियोजनाओं ने रोजगार के अवसरों को, स्वतंत्रता को, प्राकृतिक संसाधनों को कम किया है और कुल मिलाकर क्षेत्र को गरीब बनाया है । गरीब और गरीब हुआ है ।

निर्माण कंपनियों की आचार नीति ?
हालांकि धूसरी गाद के खुले रूप में गंगा में डाले जाने का प्रमाण चित्र है, किंतु क्षेत्र में कार्यरत NTPC कंपनी ने सूचनाधिकार द्वारा की गई पूछताछ में बताया कि “गंगा में कोई धूसरी गाद नहीं डाली जा रही है” । वे इस बात से भी साफ इंकार करते हैं कि उनके द्वारा कराये जा रहे विस्फोटों से घरों में दरारें आ रही हैं । यद्यपि घाटी के दोनों ओर के ६ गांवों के लोगों ने घरो के हिलने, दरारें आदि की शिकायतें की हैं, इस प्रकार उन्हें किसी उत्तरदायित्व का आभास नहीं है । इस संबंध में सभी परीक्षण कंपनियों के द्वारा नियुक्‍त एजेंसियों के माध्यम से कराये गये हैं । अतः इन्हें निष्पक्ष कहना कठिन है । उनके द्वारा नियुक्‍त स्थानीय मजदूर स्वतंत्र रूप से ईधन के लिए जंगल से लकड़ी काटने और जंगल नदी आदि को शौच के लिए प्रयोग करने की बात स्वीकारते हैं । यद्यपि उनके लिए यह सब नहीं करने की प्रतिबद्धता है । उत्तरांचल जल विद्युत निगम द्वारा किए गए कार्य के दौरान ५ वर्षों से सीमेंट नदी में डाला गया सीमेंट स्थानीय लोगों के खेतों में भी जम गया और खेत बंजर हो गये ।
कंपनियों ने सूचनाधिकार द्वारा की गई पूछताछ का जबाव नहीं दिया और स्वभावतः वे सूचनाओं की भागीदारी में तत्पर नहीं है । स्थानी लोगों को हिंदी में कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराये गये ।

क्या ये परियोजनायें चलने योग्य हैं?
सूचनाधिकार से की गई पूछताछ में बताया है कि पहले से ही स्थित मनेरी बांध १ पिछले १० वर्षों से ९० मेगावाट क्षमता का मुश्‍किल से ५०% उत्पादन दे रहा है । U.J.V.N द्वारा कारण भागीरथी में सदियों में कम पानी का होना और बरसात में अत्यधिक गाद का होना बताया गया है । ये चार परियोजनाएं जो कि उत्तर काशी में ऊपरी जल धारा पर प्रस्तावित हैं कुल मिलाकर १००० मेगावाट के हैं । तेजी से घटते ग्लेशियर, ग्लोबल वार्मिग आदि के साथ इनका चलना कैसे स्वीकारा जा सकत अहै । ये परियोजनाएं लंबे समय तक स्वयं को कैसे बचाए रख सकती हैं?

एक अद्वितीय नदी?
अपनी स्वतः शुद्धता के गुणों के लिए गंगा प्रसिद्ध है, परंपरागत रूप से यह एक ज्ञात तथ्य है कि बिना किसी क्षय के गंगा जल कितने भी लंबे समय के लिए रखा जा सकता है । जबकि अन्य जल ऐसे रखने पर क्षय हो जाते हैं । वैज्ञानिक अध्ययन भी इस तथ्य को दृढता से प्रमाणित करते हैं । शायद विश्‍व में अपने तरह की यह एकमात्र नदी है ।

क्या अद्वितीय गंगाजल अब भी गंगाजल है?
नहीं, ये परियोजनाएं स्वीकारती हैं कि जल का तापमान बढ़ेगा, प्रवाह दर घटेगी, जलीय जीव एवं वनस्पति नष्ट हो जायेंगे । जल स्वाभाविक रूप से हिमालयी चट्‌टानों से न बहकर सीमेंटी सुरंगों से होकर गुजरता है । पहले से ही कंपनियों द्वारा सीमेंट को नदी में डालने के, धूसरी गाद के एवं अन्य अपशिष्ट पदार्थों के नदी में डालने के प्रमाण है । इस प्रकार गंगाजल की गुणवत्ता ठीक इसके स्त्रोत से ही विनाश के कगार पर है । इस प्रकार संपूर्ण नदी ही विनाश के प्रभाव में आ रही है ।

लगभग १०० वर्ष पूर्व हुए समझौते की अनदेखी की जा रही है?
लगभग शताब्दी पूर्व जब अंग्रेज गंग अके प्रवाह को हरिद्वार में रोकने की योजना बना रहे थे । मदनमोहन मालवीय और कुछ राजा, चारों शंकराचार्य तथा जनत ऐसके विरोध में संगठित हुई । अंग्रेज मंद हो गये, संयुक्‍त प्रांतीय मुख्य सचिव ICS आर. बर्नस्‌ ने २०/४/१९१७ को गंगा के प्रवाह को मुक्‍त बनाए रखने का आदेश (संख्या-१००२) जारी किया । जिन आध्यात्मिक परंपराओं क अएक परदेशी सरकार ने तक सम्मान किया, आज हमारे अपने नेता इन्हें तोड़ रहे हैं ।

एक स्वर्गिक नदी
गीता में अपनी शेष्ठ अभिव्यक्‍तियों के वर्णन में कृष्ण घोषित करते हैं, “समस्त जल स्त्रोतों में मैं गंगा हूँ” स्वामी विवेकानंद ने कहा- ‘गीता और गंगा हिन्दुओं का हिन्दुत्व निर्मित करते हैं.. जन्म से मुत्यु तक करोड़ों जन इसकी जल की बूंदों का आदरभाव से पान करते हैं । यहां तक की विदेशी भूमि से लोग उनकी राख को इसके प्रवाह में प्रवाहित कर स्वयं को धन्य समझते हैं । हमारे अस्तित्व में समाहित गंग अके स्थान से जुड़े निर्विवाद एवं स्वतः प्रमआणित तथ्यों को पूर्णतः अनदेखा किया जा रहा है ।

अंतिम आघात
जब पर्यावरण आकलन रिपोर्ट बताती है कि क्षेत्र में चलने वाली विभिन्‍न परियोजनाओं द्वारा कोई भी ऐतिहासिक, धार्मिक या पुरातात्विक स्मारक प्रभावित नहीं हो रहे हैं, - तो यह कथन सभी प्रतीकों में सर्वशक्‍तिमान, सभी पूजाओं का सार, सबसे प्राचीन, सभी परंपराओं की ऐतिहासिक स्वयं गंगा का आश्‍चर्यजनक रूप से परित्याग करता है । इस प्रकार यह परित्याग एक बड़ी भारी भूल है, समस्त राष्ट्र का भारी अपमान है ।

स्वाभिमान रहित राष्ट्र
गंगा के गुणों और प्रवाह के विनाश के साथ गंग अको लुप्त होने दिया जाना प्रदर्शित करता है एक महान तिरस्कार हमारे प्राचीन भारत का, उन पीढ़ियों का जिन्होंने उसका मां और देवी की तरह पूजन किया, उन वर्तमान भारतीयों का जो करते हैं और भविष्य के भारत का जिसकी राष्ट्रीय और आध्यात्मिक धरोहर के प्रयोग से हम उसे वंचित कर रहे हैं ।

* पृथ्वी पर तथा मानव शरीर में जल का भाग लगभग ७०% है, तथा जल किसी भी प्रकार की जैव-विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा के प्रति अति संवेदनशील है ।
* जल पर व्यक्‍ति के विचारों, भावनाओं, प्रतिक्रियाओं से उत्पन्‍न ऊर्जा का गहरा प्रभाव होता है, प्रार्थना या शुभ विचारों के प्रभाव में लाये गये जल के क्रिस्टल स्वरूप में परमाणुओं एवं अणुओं का एक सुन्दर, सुव्यवस्थित और आकर्षक क्रम दिखता है वहीं अशुभ या दुर्भावनाओं से प्रभावित जल के स्वरूप में अणु-परमाणुओं की व्यवस्था पूर्णतः खंडित एवं कुरूप हो जाती है ।
* इसी प्रकार बहते झरने, नदियों के जल का स्वरूप स्वस्थ, सुन्दर एवं सुव्यवस्थित है, वही बांधों में रूके, स्तब्ध, सड़ते जल का स्वरूप बिगड़ा हुआ, खंडित सा है, जो यह सिद्ध करता हैं, कि शुद्ध, मुक्‍त अविरल प्रवाह से निर्मित जलीय जीवन एवं उसका मूल तत्व, प्रवाह को रोकने उसे बांधने तथ अबलपूर्वक नैसर्गिक प्रवाह को बदल देने से परिवर्तित एवं विक्षिप्त हो जाता है ।
इस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टि से भी सदियों से गंगा के प्रवाह से सम्बद्ध रीति-रिवाज, परम्परायें, करोड़ों जनों की श्रद्धायें, आस्थायें तथा ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहने के कारण गंगा जल के भीतर एक विशिष्ट आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह भी सम्बद्ध है,
हिमालय क्षेत्र की विशेष पारिस्थितिकी, पर्यावरण, एवं तीव्र, डलानदार घाटी की भौगोलिकता से जुड़ा गंगा का नैसर्गिक प्रवाह अद्वितीय भौतिक विशेषतायें प्राप्त करने के साथ ही इस प्रकार एक शुभ विचारों, भावनाओं , मंत्रों, तप, जप के साथ ऋषियों-साधुओं के स्नान एवं आश्रमों के वातावरण से गुजरकर आध्यात्मिकता से अनुप्रआणित हो मैदानी क्षेत्रों में उतरता है, तो वहीं ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयास, काशी, पटना, क्लकत्ता से होकर गंगासागर तक इसके तट पर सैकड़ों तीर्थ, हजारों मंदिर, घाट इत्यादि भावनात्मक एवं वैचारिक रूप से जल को समृद्ध करते है ।

“गंगा के मूलत्त्व, आध्यात्मिकता एवं उसके गंगत्व का हास” ः-
वैज्ञानिकों ने पाया कि अन्य तमाम नदियों की अपेक्षा गंगा जल में २५ गुना अधिक आक्सीजन समाहित होती है, गंगा जल में स्वतः शुद्धता की क्षमता तथा रोगों का नाश करने की क्षमता अन्य नदियों के जल की अपेक्षा सर्वाधिक है, इसीलिए गंगाजल प्रधानतः शक्‍ति का द्योतक है, न कि पदार्थ का ।
सर्पिलाकार प्रवाह, घाटी की चट्टानों से उमड़ती-घुमड़ती धारा का सर्वाधिक संवेग, घाटी के तीव्र डलानयुक्‍त होने कारण उसके प्रवाह से जुड़ी ऐसी तमाम संवेदनशील तथा विशिष्ट भौगोलिक, पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय विशेषतायें हैं, जो कि गंगा जल में दिव्य तथा औषधीय प्रभाव उत्पन्‍न करती हैं । गंगा की उद्‌गम घाटी में ही इसके प्रवाह को रोककर, बांधकर उसे बलपूर्वक भूमिगत बना देना, ठीक ऐसा ही है, जैसे कि एक स्वस्थ, ऊर्जावंत गतिशील व्यक्‍ति को बलपूर्वक बांधकर उसे कालकोठरी में बंद कर अपन अजीवन व्यतीत करने को बाध्य किया जाये, यह प्रयोग निश्‍चय ही व्यक्‍ति के स्वभाव उसके गुणधर्मो को बदलकर व्यक्‍ति को विक्षिप्त कर देगा ।
“ गंगोत्री से लेकर ऋषिकेश तक गंगा झीलों और सुरंगो में कैद की जा रही है, निश्‍चय ही गंगाजल का तत्व जो कि विशिष्ट वैज्ञानिक विशेषतायें समाहित किये हैं उसके नैसर्गिक प्रवाह से जुड़ा है, तथा स्त्रोत से ही गंगा को लुप्त कर झीलों और सुरंगों में कैदकर देना उसके मूल तत्व को ही परिवर्तित कर देगा, ” ।
- प्रो० यू० के० चौधरी (वैज्ञानिक, गंगा अनुसंधान प्रयोगशाला, BHU)

“उठो आज गंगा माता पर संकट के घन छाये हैं,
स्वार्थ लोभ की आंधी में गंगा को लोग भुलाए हैं ॥
आज धर्म धन से हारा है, गंगा का भी दाम लगा,
लोप हुआ स्वाभिमान राष्ट्र क अलिप्सा और अज्ञान जगा ॥
गंगा संस्कृति गंगा है मान, गंगा जो देश की है पहचान ।
चलो बूढ़ों, बच्चों, नौजवान, अब मिलकर करें गंगा-आह्‍वान” ॥

प्रवाह ही जीवन है, गंग अके नैसर्गिक प्रवाह को छिन्‍न-भिन्‍न कर खंडित करना गंगा-जल के गंगत्व में निहित जीवन को कैसे प्रभावित करता है, यह हम हाल ही में जापान में “डॉ० इमोटो एवं उनके दल (Hado Institute, Japan)'' के द्वारा जल के ऊपर चल रहे शोध के माध्यम से जान सकते हैं । डॉ० इमोटो ने उच्च स्तरीय वैज्ञानिक संयंत्रों का प्रयोग कर जल के विभिन्‍न क्रिस्टल संरचनाओं के चित्र लिये, चित्रों के विश्लेषण से निम्न निष्कर्ष प्रमाणित हुए ।
“ इस प्रकार निश्‍चत ही स्त्रोत से ही इसके प्रवाह के साथ निर्ममता से इतनी बड़ी छेड़छाड़ इसके प्रवह से जुड़ी परम्पराओं तथा संस्कृति को समाप्त कर गंगाजल के तव, इसकी आध्यात्मिकत अऔर इस प्रकार गंगा के गंगत्व का हास कर रही है । ”

गंगा की पुकार - “आह्‍वान”

‘मुक्‍त प्रवाहित गंगा मेरे देश, हमारी संस्कृति का एक अविच्छिन्‍न अंग है और हमारी धरोहर है, जल ऊर्जा के उत्पादन अथवा अन्य किसी भी कारण से इसके प्रवाह के विनाश एवं सुरंगों में चले जाने का मैं दृढ़ रूप से विरोध करता हूँ हमें अपने पूर्वजों द्वारा एक स्वच्छ पर्यावरण, समृद्ध प्रवाहमान नदियआं एवं अत्यंत सुंदर संस्कृति मिली है ।
अंतःकरण मांग करत अहै कि हम अपने देश की आनेवाले पीढ़ियों के लिए इसे उसी रूप में बिना किसी हानि के छोड़कर जायें ।
केवल उपभोग ही हमारी विकास प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता ।
इस देश का नागरिक होने के नाते मैं मांग करता हूँ कि गंगा के प्रवाह को गंगोत्री से मैदानी भागों तक मुक्‍त एवं छेड़छाड़ रहित रखा जाये ।