शनिवार, 30 जनवरी 2010

पत्रकार द्वारा दलित पत्रकार का उत्पीडन

उपरोक्त शीर्षक देखकर आपको आश्चर्य लग रहा होगा परन्तु यह सोलहो आने सच है. यह घटना है "स्पीड मीडिया ग्रुप "(६,स्कूल लेन, बाबर रोड ,होटल ललित के सामने , नई दिल्ली-१) के दफ्तर का . २७ जनवरी को मेरे संपादक सुनील सौरभ ने मुझे अपने कार्यालय के अन्दर और बाहर अपने वेतन मांगने पर मेरे ऊपर हाथ छोर दिया तथा मेरे माँ को भी गन्दी गलियां दी .एक अन्य सहकर्मी के बीचबचाव करने पर मुझे अगले दिन यानी २८ जनवरी को ४ बजे दोपहर बुलाया गया. सामंती विचारधारा एवं दूसरों को अपमानित करने की मानसिकता के धनी सुनील सौरभ ने हद की सीमा पर कर देने का अनोखा मिशाल कायम किया. मुझे सर्वप्रथम अपने दफ्तर के केबिन में छित्किनी बंदकर मारा पीटा और कमीने खटीक की हरामी औलाद नामक गन्दी गाली दी साथ ही यह भी कहा की हरिजन सालों को संस्कार कहाँ से आएगा? २७ जवारी की घटना को भी मैंने बर्दास्त किया था परन्तु २८ जनवरी की घटना को मैं जिंदगी भर नहीं भूल पाउँगा. अपने साथ हुए मानसिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीरण से मैं काफी डर गया हूँ .आश्चर्य का विषय यह रहा कि मेरे सहकर्मियों ने भी अपने नौकरी को महत्व दिया औत कोइ प्रतिकार नहीं किया
जिससे इनका मनोबल इतना बढ़ गया की एक दलित पत्रकार को अपने कार्यालय में न केवल मारा पीटा बल्कि जातिसूचक गाली देकर मानवता को शर्मसार कर दिया . मेरा गुनाह बस इतना था की मैं बिना आर. एन .आई नंबर के चल तहे इस प्रकाशन के रिपोर्टिंग एवं मार्केटिंग में अपना योगदान दे रहा था , जिसकी उतनी ही प्रति छापी जाती थी जितना विज्ञापनदाताओं को देना होता था .खैर मेरे साथ हुए इस दुर्घटना का कोइ गवाह बने या न बने मैं अपनी लडाई लड़ना जानता हूँ. मेरे 100 नंबर पर डायल करते ही स्थानीय पुलिस (थाना बाराखम्बा रोड , नई दिल्ली ) ने मेरे को ले तो लिया परन्तु उसे एफ . आई . आर के रूप में दर्ज नहीं किया . मेरे आवेदन के साथ- साथ मेरे मेरे ६ पूर्व सहकर्मियों ने अपने - अपने बांस चेक को लेकर अलग शिकायत दर्ज कराई है. अब उल्टे पुलिस ने २९ जनवरी की शाम को फोनकर यह सूचित किया की आपके संपादक ने आप पर कार्यालय के कागजात की चोरी का इल्जाम लगाया है और आप थाना आईये . क्या यह पूरे पीत पत्रकारिता एवं पुलिस के दोहरे चरित्र को बेमकाब करने के लिए पर्याप्त नहीं है? जब एक दलित अपनी आवाज उठता है तो पत्रकारिता को कलंकित करनेवाले ऐसे तथाकथित पत्रकार एवं पुलिस के बेशर्मी की गठजोर के कदम से कैसे न्याय की उम्मीद की जा सकती है? मुझे परवाह नहीं की मेरा अंजाम क्या होगा परन्तु मैं अन्याय और शोषण बर्दास्त नहीं करूंगा बल्कि इन जैसे तमाम उत्पीडन करनेवाले महारथियों को बेनकाब करने हेतु जी जान लड़ा दूंगा . मैं इस मामले को अनुसूचित जाति आयोग में भी ले जाऊंगा. अपने दलित मंत्री राजकुमार चौहान तथा मादीपुर से विधायक मालाराम गंगवाल तथा जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष उदितराज के साथ- साथ दलित हरिजन संगठनों में इस मामले को अवगत करने जा रहा हूँ .पत्रकार संगठनों को भी सूचित करने का प्रयास कर रहा हूँ. अब यह लडाई मात्र गोपाल प्रसाद जैसे दलित पत्रकार के उत्पीडन का नहीं है बल्कि सुनील सौरभ जैसे उन तमाम ऐसे तत्वों के खिलाफ आन्दोलन का होगा . मै भविष्य में इनसे उत्पीडित एवं ठगी के शिकार तमाम लोगों को गोलबंद करने का प्रयास कर रहा हूँ.
भड़ास पर मैं अपनी भड़ास मात्र इसलिए निकाल रहा हूँ क्योंकि मैं अपने पत्रकारिता के जीवन में भड़ास के आलेखों को बहुत नजदीक से जांचा- परखा है . मीडिया जगत के अन्दर की बात को अगर मीडिया वाले न जाने तब तो इस जैसे लुटेरा कितने को लूट चुका होगा . मुझे विश्वास है की मेरे इस कदम के बाद ठगी के शिकार अन्य लोग भी मेरे आन्दोलन को मजबूत करने में अपनी भूमिका अवश्य निभाएंगे . अंत में मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि " जब - जब संवेदना ख़त्म होती है तब - तब युद्ध होता है.
जय हिंद!
गोपाल प्रसाद
4/19A, गली नंबर -4, साकेत ब्लोंक, मंडावली ,दिल्ली-92
मोबाईल नंबर : 9289723145

ई मेल : gopal.eshakti@gmail.com ,
satyamevjayate1857@gmail.com
ब्लॉग: www.sampoornkranti.blogspot.com
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सोमवार, 11 जनवरी 2010

लाखों की साईकल और फोल्डिंग साईकल

विदेशी साईकिल आयातक कंपनी फायरफौक्स का स्टाल प्रगति मैदान का मुख्य आकर्षण है क्योंकि इनके स्टाल पर लाखों की साईकल और फोल्डिंग साईकल मिलती है | ऑटो ज़ोन स्पीड के मुख्य प्रतिनिधि गोपाल प्रसाद से कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर शिव इंदर सिंह की बातचीत के मुख्य अंश:
*ऐसी क्या खासियत है की आपकी साईकिल इतनी महँगी है?
मुख्य अंतर टेक्नोलोजी का है. आज के जागरूक बच्चे इन्टरनेट पर हर नयी तकनीक का अवलोकन कर रहे होते है. ऐसी स्थिति में वे चाहते है की अत्याधुनिक तकनीक की साईकिल भारत में मिले और हमने उसी कमी को पूरा किया है .इन्टरनेट यूजर बच्चे ही हमारे ग्राहक बनाते हैं. साईकिल इंडस्ट्री में तकनीक का महत्त्व है . प्राईस लेबल पर हमारा मार्केट अलग है हमारा ध्यान इन्ज्वायमेंट, स्वास्थ्य तथा भारतीय तकनीक में सर्वोच्च अंतर्राष्ट्रीय मानकों का ख्याल रखना है .
*आपकी मार्केटिंग रणनीति क्या है?
मार्केट बदल रही है . आम डीलर को फ्रेंचाईजी नहीं देते उनका अपना शोरूम होना चाहिए . मर्सीडीज को एम्बेसडर के शोरूम से नहीं बेच सकते .
*सरकार से साईकिल उद्योग को क्या सहयोग मिल रही है?
सरकार साईकिल इंडस्ट्री के प्रति गंभीर नहीं है. साईकिल लें में खम्बे, रोड ठीक नहीं . गाड़ियों को घटाना हो तो साईकिल को बढ़ाबा देने हेतु बी आर टी को पूरी दिल्ली में फैलाना चाहिए. हमलोग साइकिलिंग चैम्पियनशिप, पुणे तथा दिल्ली में स्पोंसेर्शिप के माध्यम से सहयोग करते रहते हैं. ऑटो पत्रिका, विद्यालय आदि के माध्यम से हम अपनी मार्केट बना रहे हैं. इंडिया में कंपोनेंट नहीं है , हमें विदेश से आयात करना पड़ता है . हमने यह कंपनी २००५ से शुरुआत की है और अपनी उपलब्धि से संतुष्ट हैं.
*अपने बचपन और साईकिल के सम्बन्ध में कुछ बताबें ?
जब हम बच्चे थे , साइकिल नहीं मिलाती थी हम अभिभाबकों से कहेंगे की अपने बच्चों को साईकिल की आदत डालें क्योंकि इसकी आदत बहुत जरूरी है. इससे आजादी, संतुलन , स्वास्थ्य और उत्तरदायित्व की भावना बढ़ती है जिससे जीवन को बैलेंस मिलता है.