बुधवार, 28 अप्रैल 2010

कम खर्च में ज्यादा लाभ का सुनहरा अवसर

प्रिय महोदय,

भारत की राजधानी दिल्ली में अपने व्यापारिक अनुभवों से आप अवश्य परिचित होंगे । जिन कंपनियों/संस्थाओं के यहाँ कार्यालय या प्रतिनिधि नहीं है, वे दिल्ली से प्राप्त होने वाले व्यापक व्यापारिक संभावनाओं से वंचित हैं । ऐसी कंपनियों/संस्थाओं के लिए हम अपनी सेवाएँ आपके बजट के अनुरूप दे सकते हैं ।
आज हर कंपनियों/संस्थाओं के समक्ष प्रचार-प्रसार एवं समन्वय का संकट है । इसके अभाव में आप प्रतिस्पर्धी कंपनियों को चुनौती एवं अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सकते । इस महत्वपूर्ण सच्चाई को विशेष रूप से ध्यान में रखकर लघु एवं मध्यम श्रेणी के व्यवसायियों के प्रगति हेतु हम मीडिया समन्वयक ( Media Co-ordinator), कार्यक्रम समन्वयक ( Event Co-ordinator), लायजनिंग प्रतिनिधि ( Liaisoning Agent) के रूप में आपके विभिन्‍न समस्याओं का समाधान कर सकते हैं । हम आपके व्यवसाय और बाजार की संभावना के मध्य मजबूत धुरी के रूप में होंगे ।
सत्यमेव जयते जनसंपर्क एजेन्सी, औद्योगिक एवं व्यापरिक इकाइयों को विभिन्‍न प्रकार की सेवाएँ प्रदान करता है तथ अव्यापार की वृद्धि हेतु उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है । क्रेताओं एवं विक्रेताओं को उत्पादों के स्त्रोत, संपर्क एवं समन्वय में यह इजेंसी आपको भरपूर मदद करेगी । इसके माध्यम से आप संपूर्ण देश में व्यापार संवर्धन का अभियान एवं नेटवर्क का निर्माण सुनिश्‍चित कर सकते हैं ।
मीडिया के समन्वय, व्यापार से संबंधित सेमिनारों/संगोष्ठियों/कार्यशालाओं के आयोजन में इस एजेन्सी के सहयोग से आप निश्‍चित रूप से उत्साहित एवं सशक्‍त होंगे ।
आपकी संस्था/कंपनी को व्यापार एवं उद्योग जगत के साथ-साथ भारतीय बाजार की अपेक्षाओं के अनुरूप लाना हमारा कर्तव्य है । हमें आशा ही नहीं बल्कि विश्‍वास है कि आपकी आवश्यकता और हमारा सहयोग एक अलग आयाम प्रस्तुत करेगी ।
आप अपनी आवश्यकताओं के हमें अवश्य बताएं । हमें विश्‍वास है कि आपकी आवश्यकताओं के अनुरूप हम उसके अबिलंब निदान हेतु सक्षम होंगे । हमारे सलाह एवं समन्वय से आपको निश्‍चित रूप से शक्‍ति मिलेगी । आपके सकारात्मक पहल एवं पत्रोत्तर की अपेक्षा रहेगी ।
हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ,

सत्यमेव जयते जनसंपर्क एजेन्सी
४/१९ए साकेत ब्लॉक, मण्डावली दिल्ली - ११००९२
मोबाइल - 09289723145
ईमेल - satyamevjayate1957@gmail.com
gopal.eshakti@gmail.com

SAVDHAN -PRITHAVI TAP RAHI HAI !

ग्लोबल वार्मिंग को लेकर संपूर्ण विश्‍व में दहशत का माहौल है । एक मोटे अनुमान के मुताबिक सन्‌ २०५० तक यदि धरती के तापमान में दो डिग्री की कमी नहीं हुई तो धरती, मानव और अन्य जीवधारियों के जीवन के लिए कष्टकारी हो जाएगी । इस गंभीर चिंतन को लेकर गत दिनों विश्‍व के अनेक देश कोपेनहेगेन में चर्चा हेतु जुटे थे । ग्लोबल वार्मिंग जैसे गंभीर मुद्‌दे को लेकर बुलाया गया यह सम्मेलन दबंग देशों की राजनीति का शिकार हो गया । अनेक देशों ने जिम्मेदार ना होते हुए भी भारत को कठघरे में घेरने का प्रयास किया । हालाँकि विकासशील देशों की अग्रिम पंक्‍ति में खड़े भारत के नेताओं ने विकसित देशों के इस षडयंत्र का मुँहतोड़ जबाब दिया । परिणामस्वरूप कार्बन कटौती को लेकर अन्य देशों को भी उत्तरदायित्व उठाने पर विवश होना पड़ा । संपूर्ण मानवता के लिए बेहद खतरनाक होती जा रही ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे को सभी राजनीतिक पार्टियों को अपने घोषणापत्र में शामिल कर इसका समाधान हेतु सक्रिय होना चाहिए । ग्रीन हाउस गैसों में कटौती और कार्बन कटौती को लक्ष्य बनाकर सभी बुद्धिजीवी, मीडिया को समाचार, विचार एवं ज्ञान के द्वारा अपना भागीदारी अवश्य देना चाहिए । निश्‍चित रूप से यह कदम धरती माता के जख्मों पर मरहम लगाने का काम करेगा, जिन जख्मों के लिए हम आप स्वयं जिम्मेदार हैं । धरती माता के गोद में आश्रय पाने हेतु हमें प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बंदकर पर्यावरण अनुकूल वातावरण तैयार करने होंगे । प्रस्तुत पुस्तक के लेखक ने इस पुस्तक को इसी संदर्भ में नाट्‌य रूप में परिणत कर जनजागरण हेतु शंखनाद किया है जो काबिलेतारीफ है । वर्तमान समय के संदर्भ में हो रहे घटनाक्रम को नाटक के माध्यम से प्रस्तुत करके ही हम भारतीय संस्कृति को भी वास्तव में जीवित रख पाएँगे । इस नाटक के लेखक गर्गऋषि शांतनु इंजीनियर होने के साथ-साथ पर्यावरण चिंतक तथा नाट्‌यकर्मी एवं विशुद्ध साहित्यकार भी हैं । संक्षेप में कहा जाय तो यह पुस्तक पठनीय, सराहनीय एवं आलोकित करनेवाली साबित होगी । “हम अपने मित्रों, शुभचिंतकों, संस्कृतिकर्मियों, पुस्तकालयों एवं विद्यार्थियों को उपहारस्वरूप देकर एक नई चेतना जगाने हेतु सहभागी हो सकते हैं । संपूर्ण मानवता और देश के पर्यावरण तथा जनता के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा की दिशा में यह पुस्तक अनमोल उपहार सिद्ध होगा ।
- गोपाल प्रसाद

स्विस ऑटो ने कहा “ओवर सोल्यूशन ड्राईव यू बेटर”

प्रगति मैदान में आयोजित ऑटो एक्सपो के हॉल नं० १८ में अंतिम दिन उत्साह व धर्म स्विस ऑटो द्वारा लकी ड्रॉ विनर को ससम्मान बाईक की चाभी सौंपी गई । जिसके प्रथम विजेता कंपनी के वरकर्र आर० वी० आटो सेन्टर, पालम डाबड़ी रोड, दिल्ली के मालिक नरेन्द्र कुमार, द्वितीय विजेता चौधरी सेल परचेज, सफीदोन जिला जींद हरियाणा के मालिक मंजीत सिंह तथा तीसरे विजेता सामान्य दर्शक वर्ग से उत्तम नगर, दिल्ली के आईटी कंसलटेंट प्रवीण शर्मा थे । कंपनी द्वारा इस अवसर पर उत्साहपूर्ण, माहौल में मिलन समारोह भी रखा गया था जिसमें कंपनी के ऊपर से नीचे स्तर के संचालनकर्मी मौजूद थे ।
स्विस ऑटो के जेनरल मैनेजर अरूण सूद के अनुसार सभी वाहनों के इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रिक पार्ट्‌स (लून असे लीलंड तक) उनकी कंपनी उत्पादित करती है, जो विस्तृत रेंज में मौजूद है । दो से तीन दिनों के अंदर ही ९०-९५% माल ऑर्डर की आपूर्त्ति भी कर दी जाती है ।
कंपनी की दिल्ली में ३ (राजस्थानी उद्योग नगर, जी० टी० करनाल रोड), तथा हिमाचल प्रदेश (कलाम, जिला सिरमौर) में १ निर्माण इकाई कार्यरत है । विशेष रूप से इनका ध्यान निर्यात पर है । ईबाईक्स की ज्यादातर कंपनियाँ इसी कंपनी की कंपोनेंट इस्तेमाल करती है ।
कंपनी के स्टॉल पर प्रदर्शित स्लोगन खुद सबकुछ बयान कर रहा था -
“चेंज टू विन ए बाईक”
आवर सोल्यूशन ड्राईव यू बेटर”
कंपनी सूत्रों का मानना है कि उनके कंपनी में बाईक के सभी पुर्जे आसानी से उपलब्ध है । युवातुर्क निदेशक रमणदीप सिंह एवं चेयरमैन चशविन्दर सिंह के मार्गदर्शन तथा यशविन्दर सिं, गगनदीप सिंह, पवनदीप सिंह व सुशील कुमार और अरदिल अजीज जनरल मैनेजर पी०सी० सिकरोरिया के अथक परिश्रम से कंपनी नित्य नई ऊँचाईयाँ प्राप्त कर रही है । ऑटो कंपोनेंट के क्षेत्र में प्रतिष्ठित नाम वाली कंपनियों में प्रमुख “स्विस ऑटो” के युवा सी०ई०ओ० रमणदीप सिंह से ऑटो जोन स्पीड के मुख्य प्रतिनिधि गोपाल प्रसाद द्वारा लिए गए साक्षात्कार के मुख्य अंश ः-

प्रश्न ः आपकी कंपनी दूसरे कंपनियों से अलग कैसे है?
उत्तर ः आज मुक्‍त बाजार हैं । नेटवर्क बनाने की आजादी है । वास्तव में हमारा किसी से कंप्टीशन नहीं है ।

प्रश्न ः आपके व्यवसाय विस्तार की क्या योजना है?
उत्तर ः अंतिम उपभोक्‍ता तक उत्पाद पहुँचाना ही हमारा लक्ष्य है । तभी हम अपने कार्य में सफल होंगे ।

प्रश्न ः आपके नजर में प्रतिष्ठित क्लांयट कौन-कौन से हैं?
उत्तर ः हमारे जितने भी क्लांयट हैं हमारे लिए एक बराबर है । दिल्ली में हमारा रिटेल नेटवर्क है, जिसके द्वारा चाहे हजार रूपए के उत्पाद की भी आपूर्त्ति की जाती हो ।

प्रश्न ः क्या आप मानते हैं कि आज बाजार में भारी प्रतिस्पर्धा है?
उत्तर ः सस्ते सामान के उपभोक्‍ता मात्र एक बार के होते हैं परन्तु क्वालिटी वाले सामान के ग्राहक हमेशा रहेंगे ।

प्रश्न ः आपके व्यवसाय का मूलमंत्र क्या है?
उत्तर ः हम भावनात्मक संबंध को वरीयत अदेते हैं जिससे व्यवसाय में वृद्धि होती है । सामूहिक रूप से साथ चलने के कारण ही हम आगे हैं ।

प्रश्न ः आपकी तकनीकी विशेषता एवं ध्यान किस ओर विशेष रूप से रहता है ?
उत्तर ः किसी भी तरह का बाईक हो इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम एक समान रहेग अचाहे वह पेट्रोल, डीजल, हाइड्रोजन, मियेन या पानी से ही क्यों ना चलें ।

प्रश्न ः भविष्य की क्या परियोजनाएँ एवं आकांक्षाएँ हैं?
उत्तर ः गाँव- गाँव तक मोटर साईकिल पहुँचे तभी पार्ट्‌स की माँग बढेगी फिर हम आपूर्ति करेंगे ।

प्रश्न ः माँ बढाने हेतु आप क्या करते हैं?
उत्तर ः हमारे विक्रय प्रतिनिधि देश के कोने-कोने में जाकर बाजार की तलाश करते हैं जो डीलर बन सके । हमारे यहाँ डीलर बनने हेतु शर्त्त यही है कि हमारे क्षेत्र के उत्पाद के रहत हुए दूसरे कंपनी का नहीं बेच सकते ।

प्रश्न ः ऑटो एक्सपो का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर - नई पीढ़ी का जादू बढ़ा है और इसी जादू को मुनाने हेतु हमने लकी ड्रा स्क्रीम आयोजित किए । हमें काफी अच्छा रिस्पांस मिल अहै । २०१२ के एक्जीविशन को हम इससे भी बड़ा करेंगे ।

अलग मिथिला राज्य का गठन क्यों नहीं?

[भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के द्वारा की गई विभिन्‍न भाषाओं के अध्ययन के अंतर्गत मैथिली भाषायों की संख्या (२००१ के अनुसार) भारत में कुल १२,१७९१२२ है । जबकि वास्तविक रूप में यह संख्या कई गुणा अधिक है । ]

“मिशन मिथिला” ने संयोजक गोपाल प्रसाद ने अपने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कहा है कि जब पृथक तेलंगाना राज्य का गठन हो सकता है तो अलग मिथिला राज्य का गठन क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि मिथिलांचल को पूर्ण न्याय अभी तक नहीं मिला है । सभी क्षेत्रों में मिथिलांचल की घोर उपेक्षा हो रही है । केन्द्र सरकार और बिहार सरकार ने अभी तक कोई उद्योग इस क्षेत्र में शुरू किया है, जिससे इस क्षेत्र के लोग पलायन को मजबूर हैं । असमान विकास के चलते देश का पिछड़ा राज्य बिहार में मिथिला अतिपिछड़ा क्षेत्र बनकर रह गया है । बिहार सरकार का पूरा ध्यान मात्र पटना एवं नालंदा को विकसित करना रह गया है ।
मिथिला में पर्यटन एवं खाद्य प्रसंस्करण हेतु भरपूर संभावना के बावजूद इसके साथ नकारात्मक रवैया अपनाया जा रहा है । इस क्षेत्र की भाषा मैथिली एवं मैथिला अकादमी अपने अस्तित्व हेतु संघर्ष कर रही है । बिहार सरकार के ‘युवा महोत्सव’ एवं दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित बिहार पवेलियन में आईआईटीएफ के दौरान आहूत सांस्कृतिक कार्यक्रम में मैथिली की घोर उपेक्षा की गई जिससे सरकार की नीति और नीयत मिथिलावासियों को समझ में आ गया है । इन सारे समस्याओं के निदान का एकमात्र विकल्प अलग मिथिला राज्य ही है । बिहार सरकार प्रवासी बिहारियों की सुरक्षा, रोजगार एवं न्याय दिलाने में पूरी तरह से विफल रही है और इसके ज्यादातर शिकार मिथिला के लोग ही रहे हैं । महाराष्ट्र दिल्ली एवं पंजाब के बाद मध्यप्रदेश के राजनेताओं ने भी बिहारियों के साथ असंवैधानिक रूख अपनाया और बिहार सरकार ने केवल बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लिया । बिहार सरकार का योजना विभाग, केन्द्र सरकार के योजना विभाग में बिहार यस्क फोर्स और बिहार फाउंडेशन के बावजूद मिथिला को बिहार मे पर्याप्त तवज्जो क्यों नहीं मिली? आधारभूत संरचना के विस्तार के बिना मिथिला कटा-कटा सा है ।
मिशन मिथिला के संयोजक गोपाल प्रसाद ने पूर्व लोकसभाध्यक्ष पी०ए० संगमा के बयान का स्वागत किया है जिसमें उन्होंने कह अथा कि “क्षेत्रवाद-नक्सलवाद असमानता की उपज है, जिसे छोटे राज्यों का गठन कर दूर किया जा सकता है । ” मिथिला के लोग बाढ़ झेलें और विकास की धारा अन्य क्षेत्रों में बहे यह नहीं चलेगा । उनका संगठन भारत के समस्त मिथिला मूलवासियों को इस आंदोलन हेतु जागरूक करेगा । डॉ० धनाकर ठाकुर के आह्यान पर अलग मिथिला राज्य के गठन हेतु अंतर्राष्ट्रीय “मैथिली परिषद” द्वारा कानपुर में २३-२४ दिसंबर को मिथिला के बुद्धिजीवियों, स्वैच्छिक संगठनों का सम्मेलन होगा जिसमें अआंदोलन की दशा-दिशा तय की जाएगी । मिथिला के सर्वागीण विकास, मधुरतम भाषा मैथिली को पूर्ण सम्मान एवं मिथिला के सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण-संवर्द्धन हेतु अलग मिथिला राज्य की माँग हेतु समस्त मैथिल समुदाय से अपील है कि वे केन्द्र सरकार पर दबाव बनाएँ कि पृथक तेलंगाना के साथ-साथ पृथक मिथिला राज्य के गठन की भी घोषणा हो । इस संदर्भ में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आदि को ज्ञापन भी भेजा जाएगा ।
सर्वविदित है कि बिहार के पूर्व महाधिवक्‍ता पं० ताराकान्त झा एवं स्व० भोगेन्द्र झा आदि नेताओं ने भी अलग मिथिला राज्य हेतु जनजागरण एवं पदयात्रा कर चुके है । तेंदुलकर रिपोर्ट के नए मापदंड के बाद बिहार में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों का प्रतिशत ४२.५३ से बढ़कर ७५.१४ प्रतिशत हो गय अहै जो अपने आप सब कुछ बयान कर देता है । बिहार के मुख्यमंत्री (राज्य में कितने गरीब हैं, इसकी संख्या केन्द्र ने तय कर दी और उनकी पहचान के लिए राज्य सरकार को कह दिया, यह कैसी व्यवस्था है?”) में केन्द्र व राज्य सरकार के शह-मात का खेल स्पष्ट प्रतीत होता है ।

गोपाल प्रसाद (संयोजक, मिशन मिथिला)
प्रबंध संपादक, मिथिला महान
४/१९ ए, साकेत ब्लॉक, मंडावली, दिल्ली-९२
मोबाइल - 9289723145
Email - missionmithila@gmail.com
Blog - www. missionmithila.blogspot.com

जिनका लक्ष्य है संस्कृत शिक्षा में सुधार लाना

बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष एवं हिंदी के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार सिद्धेश्‍वर से गोपाल प्रसाद द्वारा लिए गए साक्षात्कार के मुख्य अंश ः

प्रश्न ः बिहार संकृत शिक्षा बोर्ड की स्थापना कब हुई तथा इसका उद्देश्य क्या है?
उत्तर ः बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड की स्थापना सन्‌ १९८१ में हुई जिसका उद्देश्य था संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार एवं संस्कृत शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार । संस्कृत भाषा के साथ लोगों ने ऐसा व्यवहार किया कि यह भाषा विलुप्त होने के कगार पर है । इसका मूल कारण उपर से नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त होना है । प्रथमा, मध्यमा के केन्द्र का विक्रय हो रहा था । जितने विद्यालय हैं, वे शिक्षकों के झोले में हैं । संस्कृत शिक्षा की ओट में संस्कृत व्यापार बनकर रह गई । संस्कृत के बहाने मात्र दुकानदारी चलाई जा रही थी ।

प्रश्न ः आपके अध्यक्ष बनने के बाद क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर - १५ सितंबर २००८ को मैं इस बोर्ड का चेयरमैन बना । संस्कृत के विद्वानों से आशा क्षीण होने तथा भ्रष्टाचार के कारण ही हिंदी के साहित्यकार को दायित्व मिला ।

प्रश्न ः हिंदी के साहित्यकार संस्कृत की अनिवार्यता के मुद्दे को लेकर वीरचन्द्र राय नामक व्यक्‍ति की याचिका को पटना उच्च न्यायालय ने याचिका वापस लेने को मजबूर कर दिया, साथ ही ५ हजार रूपए का जुर्माना याचिकाकर्त्ता पर ठोका गया । इस संदर्भ में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के फैसले की पंक्‍ति ध्यान देने योग्य है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “तीन दशक में संस्कृत के विद्वान कोई परिवर्तन नहीं कर पाए जबकि १ वर्ष में हिंदी के विद्वान आए और दशा सुधार दी । एक साल में नक्शा बदलता हुआ दिखाई पड़ा ।

प्रश्न ः आपने इस कठिन कार्य को कैसे संभव किया?
उत्तर ः मेरा पूरा जोर लोगों की मानसिकता बदलने पर केंद्रित था । मैंने संस्कृत को देवभाषा से जनभाषा बनाने की दिशा में पहल की । वास्तव में संस्कृत भाषा बिहार में जाति ही नहीं बल्कि एक परिवार में सिमटकर रह गया था । २००९ की मध्यमा परीक्षा पहली बार इतिहास में पारदर्शी और कदाचार मुक्‍त हुई तथा उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में गड़़बड़ियाँ नहीं हुई । पहले एक केन्द्र तीन लाख में बिकते थे जो इस बार नहीं बिके । शिक्षा माफियाओं ने पैसे लौटाए । साहस, संकल्प और ईच्छाशक्‍ति तथा पूरी ईमानदारी के साथ दायित्व का निर्वहन किया । २८-२९ दिसंबर २००९ को राष्ट्रीय सम्मेलन में सभी विद्वानों ने शिरकत की जिसमें ६००० प्रतिनिधियों ने २ दिनों तक सहभागिता की ।

प्रश्न ः संस्कृत के साथ मूल समस्या तथ आपकी उपलब्धियाँ क्या है?
उत्तर ः मौजूदा परिदृश्य में समाज रूग्ण और बीमार है, जिससे संस्कृति और संस्कार समाप्त हो रहे हैं । यही सारी समस्याओं की जड़ है । संस्कृत के विलुप्त होने से ही संस्कृति और संस्कार विलुप्त हो रही है । संस्कृत का उन्‍नयन नई पीढ़ी द्वारा संभव है । संस्कृत शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाकर तथा इसे रोजगारमूलक बनाने से ही लोगों का रूझान बनेगा । संस्कृत के पाठयक्रम में बदलाव लाने की परम आवश्यकता है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अब इस भाषा के साथ सूचना तकनीक, नैतिक शिक्षा तथा योग का समावेश करने हेतु राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान से नए सिलेबस मॉडल हेतु अनुरोध किया है । २८ दिसंबर २००८ को पटना के तारामंडल सभागार में संस्कृत की गुणवत्ता पर केन्द्रित बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड की ओर से एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई जो १२ घंटे तक चली जिससे देश के ख्यातिप्राप्त संस्कृताचार्य विद्वानों के व्यक्‍त विचारों से सही दिशा और मार्गदर्शन मिला । इसी से प्रेरित होकर २८-२९ दिसंबर २००९ को श्रीकृष्ण स्मारक भवन में संस्कृत शिक्षण को केन्द्र में रखकर दो दिवसीय राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन बोर्ड के तत्वाधान में किया गया । जिसके शैक्षिक सत्रों में संस्कृत साहित्य की समस्याएँ और समाधान, लौकिक संस्कृत साहित्य में बिहार की प्रतिभागिता, भारतीय संस्कृति के संदर्भ में संस्कृत की भूमिका और संस्कृत साहित्य में वैज्ञानिक चिंतन विषयों पर देश के सुपरिचित संस्कृत, पाली एवं हिंदी चिंतकों एवं विचारकों के विचारों का आदान-प्रदान हुआ । बोर्ड को संस्कृत उन्‍नयन के लिए रोशनी मिली । यह राष्ट्रीय सम्मेलन ऐतिहासिक इसलिए कहा जाएगा क्योंकि इस तरह का आयोजन बोर्ड के इतिहास में पहली बार हुआ, जिसमें संस्कृत के रास्ते तलाशने की सार्थक तलाश हुई ।

प्रश्न ः संस्कृत शिक्षा बोर्ड का अगला कदम क्या होगा?
उत्तर ः संस्कृत साहित्य को समृद्ध करने के लिए बोर्ड ने निर्णय लिया है कि बोर्ड के द्वारा “वाग्धारा नामनी” नामक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित की जाएगी, जिसके प्रवेशांक का लोकार्पण फरवरी-मार्च २०१० में सकेगा । इसके द्वारा बोर्ड के स्तर पर भी कार्यकलापों को पारदर्शी और भ्रष्टाचारमुक्‍त करने का प्रयास किया जा रह अहै । प्रवेशपत्र तथा प्रपत्र भरने की प्रक्रिया में शिक्षकों एवं कर्मचारियों के सहयोग से भ्रष्टाचार का नामोनिशान देखने में नहीं आया । उसी प्रकार २००९ की मध्यमा परीक्षा के प्रमाणपत्र एवं अंकपत्र के वितरण में भी पारदर्शिता देखी गई । प्रमाणपत्रों की हेराफेरी ना हो इसके लिए बोर्ड ने पहली बार तस्वीर अनिवार्य कर दी है ।

गंगा- एक लुप्त होती नदी

“उत्तरकाशी से गंगोत्री तक शेष बचे अंतिम प्राचीन सतत प्रवाह का चलता विनाश गंगा आह्यान ः गंगा के नैसर्गिक एवं सांस्कृतिक प्रवाह के लिए एक जन‍आंदोलन

सरकार क्या करने जा रही है?
आजकल सरकार गंगा पर बांधों की श्रृंखला की निर्माण प्रक्रिया में लगी है जो कि प्राचीन हिमालय में इसके स्त्रोत निकट गंगोत्री से प्रारंभ होती है, ये परियोजनाएँ टिहरी बांध एवं हरिद्वार तक के अन्य बांधों को जाकर मिलेंगी ।

इस प्रकार गंगोत्री से हरिद्वार तक गंगा का संपूर्ण बहाव वास्तव में बांधों की श्रुंखला है ।

इन परियोजनाओं में क्या समाहित है?
ये परियोजनाएं सुरंग तथा ऊर्जागृह की निर्माण प्रक्रिया में पहाड़ों में विस्फोटों, खुदाई और पहाड़ी ढलानों को गिराने से हो रहे हिमालय के भारी-विनाश को समाहित करती हैं, इनमें शामिल है, जंगलों का कटना, पेड़ों क अकटना, हमारे पहाड़ों के प्राचीन एवं अनछुए भागों का मलिन होना तथा स्थायी रूप से संपूर्ण घाटी का भयभीत होना, अंततः चूंकि परियोजनाएँ लगातार एक के बाद एक हैं, यह संपूर्ण नदी को बिना किसी विराम के अंधियारी प्रकाशविहीन सुरंगों में डालकर भूमिगत बना रही हैं ।

वर्तमान परियोजनाएँ जिनका तत्काल रूकना आवश्यक है, इस प्रकार हैं ः
१. भैरोंघाटी १- विचाराधीन (गंगोत्री से मात्र ९ किलोमीटर दूरी पर)
२. भैरोंघाटी २. - विचाराधीन (भैरोंघाटी १ के तुरंत बाद)
३. लोहारीनाग - पाला- निर्माण प्रारंभ
४. पाला - मनेरी- निर्माण हेतु तैयार (लोहारीनाग-पाला के तुरंत बाद)

गंगा में क्या बाकी रहेगा?
कुछ नहीं !!! अपनी उद्‌गम घाटी में गंगा पूर्णतः अस्तित्वविहीन हो जायेगी । ये परियोजनाएँ नदी के लगभग संपूर्ण प्रवाह को हिमालय में खुदी सुरंगों के भीतर मोड़ रही हैं । जो शेष बचेगा वह है नदी का सूखा बिछौना, शायद एक छोटी-सी धारा से युक्‍त जो कि टखनों तक के भाग को गीला करने के लिए मुश्किल से पर्याप्त हो । यह मूलतः २-३ क्यूमेक्श जल है जो पर्यावरण प्रभाव आकलन में बतआई गई जल की छोड़ी जानेवाली न्यूनतम मात्रा है । प्रायोगिक रूप में जो दिखता है, वह है एक संकीर्ण, स्थान-स्थान पर शैवालों से युक्‍त छिछली धारा, और यह दयनीय प्रवाह है उस गंगा नदी का जोकि दिव्य, शक्‍तिमान मानी जाती है ।

क्या विकास की इस आंधी में गंगा बचेगी ?
३०.२ किमी लंबा गंगोत्री ग्लेशियर हिमालयी ग्लेशियरों में एक बड़ा ग्लेशियर है और २३ मीटर प्रतिवर्ष की चिन्तित दर से इसका पीछे सरकना दर्ज किया गया है । यह अनुमान लगाया गया है कि २०३० तक ग्लेशियर लुप्त हो सकता है । ग्लेशियर विज्ञानियों के अनुसार पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के स्त्रोत के इतने निकट भारी मशीनरी गतिविधियां केवल ग्लेशियर के पीछे हटने की दर को बढ़ाने जा रही हैं ।

पर्यावरणविद्‌ क्या कहते हैं?
W W F ने दर्ज किया है कि विश्‍व की “१० संकटग्रस्त नदियों” में गंगा एक है तथा पृथ्वी पर १२ मुख्य रूप से संकटग्रस्त स्थानों में हिमालय शामिल है । इन परियोजनाओं के माध्यम से एक मार्ग से हम दोनों का ही विनाश कर रहे हैं ।

स्थानीय रूप से इन परियोजनाओं का क्या मायने है?
यदि कोई सोचता है कि ये परियोजनाएं स्थानीय रूप से भौतिक समृद्धि लाती है तो वह पूर्णत गलती पर है, विस्तृत रूप से जो वहां पाया जाता है वह है-
* जल स्त्रोतों का हास - सारे गांव पीने का जल खो चुके हैं ।
* विस्फोटों से घरों में दरारें ( यह क्षेत्र जोन ५ में है जो कि भारत में भूकंओ की सर्वाधिक संभावना वाला क्षेत्र है।) यह घर इस प्रकार भूकंप क्षेत्र में लोगों के रहने के लिए अत्यंत असुरक्षित हो गये हैं ।
* भूमि का क्षय एवं इस प्रकार जीविका एवं आय का क्षय ।
* चारेयुक्‍त भूमि एवं जंगलों का क्षय जिसपर की पहाड़ीजन भारी रूप से निर्भर हैं ।
* पर्यटन द्वारा चलने वाली जीविका का क्षय- जोकि निश्‍चित ही गंग अके क्षय से, भूस्खलन से और प्राकृतिक सुंदरता के विनाश से गहरे रूप से प्रभावित होने जा रहा है ।
* स्थानीय संस्कृति का क्षय जोकि गंगा के चारों ओर व्याप्त है ।
* बांध कर्मियों के द्वारा शीत में नीचे आने वाले वन्य जीवों का शिकार ।

क्या यह परियोजनाएँ रोजगार उपलब्ध कराती हैं?
परियोजना विवरणों में यह स्पष्ट स्वीकारा गया है कि बहुत रोजगार खुलन अप्रत्याशित नहीं है । वस्तुतः कार्यरत बांध में बहुत कम कर्मचारियों की आवश्यकता है । उदाहरण के लिए पिछले २० वर्षों से कार्यरत मनेरी बांध १ में केवल ७० लोगों की नियुक्‍ति है (जिले की जनसंख्या ३ लाख है) । यहां तक कि निर्माण के अस्थायी रूप से मजदूरी या ठेके पर कार्य कर रहे हैं । अतः यह निश्‍चित रूप से देखा जा सकता है कि लंबे चरण के लिए इन परियोजनाओं ने रोजगार के अवसरों को, स्वतंत्रता को, प्राकृतिक संसाधनों को कम किया है और कुल मिलाकर क्षेत्र को गरीब बनाया है । गरीब और गरीब हुआ है ।

निर्माण कंपनियों की आचार नीति ?
हालांकि धूसरी गाद के खुले रूप में गंगा में डाले जाने का प्रमाण चित्र है, किंतु क्षेत्र में कार्यरत NTPC कंपनी ने सूचनाधिकार द्वारा की गई पूछताछ में बताया कि “गंगा में कोई धूसरी गाद नहीं डाली जा रही है” । वे इस बात से भी साफ इंकार करते हैं कि उनके द्वारा कराये जा रहे विस्फोटों से घरों में दरारें आ रही हैं । यद्यपि घाटी के दोनों ओर के ६ गांवों के लोगों ने घरो के हिलने, दरारें आदि की शिकायतें की हैं, इस प्रकार उन्हें किसी उत्तरदायित्व का आभास नहीं है । इस संबंध में सभी परीक्षण कंपनियों के द्वारा नियुक्‍त एजेंसियों के माध्यम से कराये गये हैं । अतः इन्हें निष्पक्ष कहना कठिन है । उनके द्वारा नियुक्‍त स्थानीय मजदूर स्वतंत्र रूप से ईधन के लिए जंगल से लकड़ी काटने और जंगल नदी आदि को शौच के लिए प्रयोग करने की बात स्वीकारते हैं । यद्यपि उनके लिए यह सब नहीं करने की प्रतिबद्धता है । उत्तरांचल जल विद्युत निगम द्वारा किए गए कार्य के दौरान ५ वर्षों से सीमेंट नदी में डाला गया सीमेंट स्थानीय लोगों के खेतों में भी जम गया और खेत बंजर हो गये ।
कंपनियों ने सूचनाधिकार द्वारा की गई पूछताछ का जबाव नहीं दिया और स्वभावतः वे सूचनाओं की भागीदारी में तत्पर नहीं है । स्थानी लोगों को हिंदी में कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराये गये ।

क्या ये परियोजनायें चलने योग्य हैं?
सूचनाधिकार से की गई पूछताछ में बताया है कि पहले से ही स्थित मनेरी बांध १ पिछले १० वर्षों से ९० मेगावाट क्षमता का मुश्‍किल से ५०% उत्पादन दे रहा है । U.J.V.N द्वारा कारण भागीरथी में सदियों में कम पानी का होना और बरसात में अत्यधिक गाद का होना बताया गया है । ये चार परियोजनाएं जो कि उत्तर काशी में ऊपरी जल धारा पर प्रस्तावित हैं कुल मिलाकर १००० मेगावाट के हैं । तेजी से घटते ग्लेशियर, ग्लोबल वार्मिग आदि के साथ इनका चलना कैसे स्वीकारा जा सकत अहै । ये परियोजनाएं लंबे समय तक स्वयं को कैसे बचाए रख सकती हैं?

एक अद्वितीय नदी?
अपनी स्वतः शुद्धता के गुणों के लिए गंगा प्रसिद्ध है, परंपरागत रूप से यह एक ज्ञात तथ्य है कि बिना किसी क्षय के गंगा जल कितने भी लंबे समय के लिए रखा जा सकता है । जबकि अन्य जल ऐसे रखने पर क्षय हो जाते हैं । वैज्ञानिक अध्ययन भी इस तथ्य को दृढता से प्रमाणित करते हैं । शायद विश्‍व में अपने तरह की यह एकमात्र नदी है ।

क्या अद्वितीय गंगाजल अब भी गंगाजल है?
नहीं, ये परियोजनाएं स्वीकारती हैं कि जल का तापमान बढ़ेगा, प्रवाह दर घटेगी, जलीय जीव एवं वनस्पति नष्ट हो जायेंगे । जल स्वाभाविक रूप से हिमालयी चट्‌टानों से न बहकर सीमेंटी सुरंगों से होकर गुजरता है । पहले से ही कंपनियों द्वारा सीमेंट को नदी में डालने के, धूसरी गाद के एवं अन्य अपशिष्ट पदार्थों के नदी में डालने के प्रमाण है । इस प्रकार गंगाजल की गुणवत्ता ठीक इसके स्त्रोत से ही विनाश के कगार पर है । इस प्रकार संपूर्ण नदी ही विनाश के प्रभाव में आ रही है ।

लगभग १०० वर्ष पूर्व हुए समझौते की अनदेखी की जा रही है?
लगभग शताब्दी पूर्व जब अंग्रेज गंग अके प्रवाह को हरिद्वार में रोकने की योजना बना रहे थे । मदनमोहन मालवीय और कुछ राजा, चारों शंकराचार्य तथा जनत ऐसके विरोध में संगठित हुई । अंग्रेज मंद हो गये, संयुक्‍त प्रांतीय मुख्य सचिव ICS आर. बर्नस्‌ ने २०/४/१९१७ को गंगा के प्रवाह को मुक्‍त बनाए रखने का आदेश (संख्या-१००२) जारी किया । जिन आध्यात्मिक परंपराओं क अएक परदेशी सरकार ने तक सम्मान किया, आज हमारे अपने नेता इन्हें तोड़ रहे हैं ।

एक स्वर्गिक नदी
गीता में अपनी शेष्ठ अभिव्यक्‍तियों के वर्णन में कृष्ण घोषित करते हैं, “समस्त जल स्त्रोतों में मैं गंगा हूँ” स्वामी विवेकानंद ने कहा- ‘गीता और गंगा हिन्दुओं का हिन्दुत्व निर्मित करते हैं.. जन्म से मुत्यु तक करोड़ों जन इसकी जल की बूंदों का आदरभाव से पान करते हैं । यहां तक की विदेशी भूमि से लोग उनकी राख को इसके प्रवाह में प्रवाहित कर स्वयं को धन्य समझते हैं । हमारे अस्तित्व में समाहित गंग अके स्थान से जुड़े निर्विवाद एवं स्वतः प्रमआणित तथ्यों को पूर्णतः अनदेखा किया जा रहा है ।

अंतिम आघात
जब पर्यावरण आकलन रिपोर्ट बताती है कि क्षेत्र में चलने वाली विभिन्‍न परियोजनाओं द्वारा कोई भी ऐतिहासिक, धार्मिक या पुरातात्विक स्मारक प्रभावित नहीं हो रहे हैं, - तो यह कथन सभी प्रतीकों में सर्वशक्‍तिमान, सभी पूजाओं का सार, सबसे प्राचीन, सभी परंपराओं की ऐतिहासिक स्वयं गंगा का आश्‍चर्यजनक रूप से परित्याग करता है । इस प्रकार यह परित्याग एक बड़ी भारी भूल है, समस्त राष्ट्र का भारी अपमान है ।

स्वाभिमान रहित राष्ट्र
गंगा के गुणों और प्रवाह के विनाश के साथ गंग अको लुप्त होने दिया जाना प्रदर्शित करता है एक महान तिरस्कार हमारे प्राचीन भारत का, उन पीढ़ियों का जिन्होंने उसका मां और देवी की तरह पूजन किया, उन वर्तमान भारतीयों का जो करते हैं और भविष्य के भारत का जिसकी राष्ट्रीय और आध्यात्मिक धरोहर के प्रयोग से हम उसे वंचित कर रहे हैं ।

* पृथ्वी पर तथा मानव शरीर में जल का भाग लगभग ७०% है, तथा जल किसी भी प्रकार की जैव-विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा के प्रति अति संवेदनशील है ।
* जल पर व्यक्‍ति के विचारों, भावनाओं, प्रतिक्रियाओं से उत्पन्‍न ऊर्जा का गहरा प्रभाव होता है, प्रार्थना या शुभ विचारों के प्रभाव में लाये गये जल के क्रिस्टल स्वरूप में परमाणुओं एवं अणुओं का एक सुन्दर, सुव्यवस्थित और आकर्षक क्रम दिखता है वहीं अशुभ या दुर्भावनाओं से प्रभावित जल के स्वरूप में अणु-परमाणुओं की व्यवस्था पूर्णतः खंडित एवं कुरूप हो जाती है ।
* इसी प्रकार बहते झरने, नदियों के जल का स्वरूप स्वस्थ, सुन्दर एवं सुव्यवस्थित है, वही बांधों में रूके, स्तब्ध, सड़ते जल का स्वरूप बिगड़ा हुआ, खंडित सा है, जो यह सिद्ध करता हैं, कि शुद्ध, मुक्‍त अविरल प्रवाह से निर्मित जलीय जीवन एवं उसका मूल तत्व, प्रवाह को रोकने उसे बांधने तथ अबलपूर्वक नैसर्गिक प्रवाह को बदल देने से परिवर्तित एवं विक्षिप्त हो जाता है ।
इस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टि से भी सदियों से गंगा के प्रवाह से सम्बद्ध रीति-रिवाज, परम्परायें, करोड़ों जनों की श्रद्धायें, आस्थायें तथा ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहने के कारण गंगा जल के भीतर एक विशिष्ट आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह भी सम्बद्ध है,
हिमालय क्षेत्र की विशेष पारिस्थितिकी, पर्यावरण, एवं तीव्र, डलानदार घाटी की भौगोलिकता से जुड़ा गंगा का नैसर्गिक प्रवाह अद्वितीय भौतिक विशेषतायें प्राप्त करने के साथ ही इस प्रकार एक शुभ विचारों, भावनाओं , मंत्रों, तप, जप के साथ ऋषियों-साधुओं के स्नान एवं आश्रमों के वातावरण से गुजरकर आध्यात्मिकता से अनुप्रआणित हो मैदानी क्षेत्रों में उतरता है, तो वहीं ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयास, काशी, पटना, क्लकत्ता से होकर गंगासागर तक इसके तट पर सैकड़ों तीर्थ, हजारों मंदिर, घाट इत्यादि भावनात्मक एवं वैचारिक रूप से जल को समृद्ध करते है ।

“गंगा के मूलत्त्व, आध्यात्मिकता एवं उसके गंगत्व का हास” ः-
वैज्ञानिकों ने पाया कि अन्य तमाम नदियों की अपेक्षा गंगा जल में २५ गुना अधिक आक्सीजन समाहित होती है, गंगा जल में स्वतः शुद्धता की क्षमता तथा रोगों का नाश करने की क्षमता अन्य नदियों के जल की अपेक्षा सर्वाधिक है, इसीलिए गंगाजल प्रधानतः शक्‍ति का द्योतक है, न कि पदार्थ का ।
सर्पिलाकार प्रवाह, घाटी की चट्टानों से उमड़ती-घुमड़ती धारा का सर्वाधिक संवेग, घाटी के तीव्र डलानयुक्‍त होने कारण उसके प्रवाह से जुड़ी ऐसी तमाम संवेदनशील तथा विशिष्ट भौगोलिक, पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय विशेषतायें हैं, जो कि गंगा जल में दिव्य तथा औषधीय प्रभाव उत्पन्‍न करती हैं । गंगा की उद्‌गम घाटी में ही इसके प्रवाह को रोककर, बांधकर उसे बलपूर्वक भूमिगत बना देना, ठीक ऐसा ही है, जैसे कि एक स्वस्थ, ऊर्जावंत गतिशील व्यक्‍ति को बलपूर्वक बांधकर उसे कालकोठरी में बंद कर अपन अजीवन व्यतीत करने को बाध्य किया जाये, यह प्रयोग निश्‍चय ही व्यक्‍ति के स्वभाव उसके गुणधर्मो को बदलकर व्यक्‍ति को विक्षिप्त कर देगा ।
“ गंगोत्री से लेकर ऋषिकेश तक गंगा झीलों और सुरंगो में कैद की जा रही है, निश्‍चय ही गंगाजल का तत्व जो कि विशिष्ट वैज्ञानिक विशेषतायें समाहित किये हैं उसके नैसर्गिक प्रवाह से जुड़ा है, तथा स्त्रोत से ही गंगा को लुप्त कर झीलों और सुरंगों में कैदकर देना उसके मूल तत्व को ही परिवर्तित कर देगा, ” ।
- प्रो० यू० के० चौधरी (वैज्ञानिक, गंगा अनुसंधान प्रयोगशाला, BHU)

“उठो आज गंगा माता पर संकट के घन छाये हैं,
स्वार्थ लोभ की आंधी में गंगा को लोग भुलाए हैं ॥
आज धर्म धन से हारा है, गंगा का भी दाम लगा,
लोप हुआ स्वाभिमान राष्ट्र क अलिप्सा और अज्ञान जगा ॥
गंगा संस्कृति गंगा है मान, गंगा जो देश की है पहचान ।
चलो बूढ़ों, बच्चों, नौजवान, अब मिलकर करें गंगा-आह्‍वान” ॥

प्रवाह ही जीवन है, गंग अके नैसर्गिक प्रवाह को छिन्‍न-भिन्‍न कर खंडित करना गंगा-जल के गंगत्व में निहित जीवन को कैसे प्रभावित करता है, यह हम हाल ही में जापान में “डॉ० इमोटो एवं उनके दल (Hado Institute, Japan)'' के द्वारा जल के ऊपर चल रहे शोध के माध्यम से जान सकते हैं । डॉ० इमोटो ने उच्च स्तरीय वैज्ञानिक संयंत्रों का प्रयोग कर जल के विभिन्‍न क्रिस्टल संरचनाओं के चित्र लिये, चित्रों के विश्लेषण से निम्न निष्कर्ष प्रमाणित हुए ।
“ इस प्रकार निश्‍चत ही स्त्रोत से ही इसके प्रवाह के साथ निर्ममता से इतनी बड़ी छेड़छाड़ इसके प्रवह से जुड़ी परम्पराओं तथा संस्कृति को समाप्त कर गंगाजल के तव, इसकी आध्यात्मिकत अऔर इस प्रकार गंगा के गंगत्व का हास कर रही है । ”

गंगा की पुकार - “आह्‍वान”

‘मुक्‍त प्रवाहित गंगा मेरे देश, हमारी संस्कृति का एक अविच्छिन्‍न अंग है और हमारी धरोहर है, जल ऊर्जा के उत्पादन अथवा अन्य किसी भी कारण से इसके प्रवाह के विनाश एवं सुरंगों में चले जाने का मैं दृढ़ रूप से विरोध करता हूँ हमें अपने पूर्वजों द्वारा एक स्वच्छ पर्यावरण, समृद्ध प्रवाहमान नदियआं एवं अत्यंत सुंदर संस्कृति मिली है ।
अंतःकरण मांग करत अहै कि हम अपने देश की आनेवाले पीढ़ियों के लिए इसे उसी रूप में बिना किसी हानि के छोड़कर जायें ।
केवल उपभोग ही हमारी विकास प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता ।
इस देश का नागरिक होने के नाते मैं मांग करता हूँ कि गंगा के प्रवाह को गंगोत्री से मैदानी भागों तक मुक्‍त एवं छेड़छाड़ रहित रखा जाये ।

अलग मिथिला राज्य आंदोलन पर एक पैनी दृष्टि

अलग मिथिला राज्य की माँग वर्षों पुरानी है । इसके लिए कई बार धरना प्रदर्शन सभी, गोष्ठियाँ तथा माँगपत्र दिए जा चुके हैं । ३ अगस्त २००४ में बिहार से अलग करके झारखंड राज्य का गठन किया गया । ४ अगस्त २००४ को एक प्रेस कांफ्रेंस में बिहार के पूर्व महाधिवक्‍ता एवं भाजपा नेता पं० ताराकांत झा ने अलग मिथिला राज्य हेतु आंदोलन की घोषणा की । वे चंदा झा के रामायण तथा महाविष्णुपुराण के अनुसार मिथिला के गठन के पैरोकार रहे । भाजपा से निष्काशित होने पर वे मिथिला आंदोलन को हवा देते रहे परन्तु विधान परिषद सदस्य बनते ही अआंदोलन को ढंढे बस्ते में डाल दिया ।
वर्तमान में अलग मिथिला राज्य हेतु सर्वाधिक सक्रिय संस्था “अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद” की बागडोर मुख्यतः डॉ० धनाकर ठाकुर एवं डॉ० कमलाकान्त झा ने संभाल रखी है । अधिकांश राज्यों में संस्था ने अपनी प्रदेश शाखाओं का विस्तार एवं जनसंगठन तैयार किया है । संस्था द्वारा दिसंबर में कानपुर में राष्ट्रीय अधिवेशन एवं जंतर-मंतर पर धरने का आयोजन किया गया जिसमें आंदोलन से जुड़े जमीनी कार्यकर्त्ताओं की सहभागिता रही । उधर विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव वैद्यनाथ चौधरी बैजू “अंतर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन” का छठा अधिवेशन २१-२२ दिसंबर २००९ को तिरूपति बालाजी में आयोजित की । मुख्य रूप से इनका मकसद मैथिली आंदोलन की आड़ में धनसंग्रह व अपने हित हेतु चंद लोगों को उपकृत करना व एक कॉकस निर्माण का रहा । साहित्य अकादमी जैसी सरकारी संस्था को भी धूल झोंकने में सफल रहे । परिवारवाद को प्रश्रय देने तथा मैथिली को वर्गविशेष की भाषा के रूप में जानने का श्रेय इनको अवश्य दिया जा सकता है । बैजू एवं अमर के गठबंधन की गाथा से मिथिला के हर जागरूक नागरिक अवगत हैं । इन्होंने मैथिली को जनभाषा तो नहीं ही बनने दिया बल्कि मैथिली के नाम पर एक जागीर खड़ी की । पुरस्कार, अनुदान एवं विभिन्‍न संस्थाओं की योजनाओं पर इनकी गिद्धदृष्टि रहती है । इनके सद्‌प्रयासों से मिथिला के दलित, सर्वहारा मजदूरवर्ग एवं मुस्लिम जमात का समर्थन मिथिला आंदोलन को नहीं मिल पाया ।
स्व० जयकांत मिश्र ने मैथिली की सर्वाधिक सेवा तो की ही, साथ ही मिथिला आंदोलन को खड़ा करने के लिए “मिथिला राज्य संघर्ष समिति” का गठन किया था । वर्तमान में चुनचुन मिश्र इसके अध्यक्ष एवं उदयशंकर मिश्र इस संस्था के महासचिव हैं ।
अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद के डॉ० कमलाकान्त झा कहते हैं कि “मिथिला राज्य हड़प लिया गया है, वह हमको वापस चाहिए । वैशाख शुक्ल नवमी (सीताजी का जन्म दिवस) को जगत जननी जानकी नवमी के रूप में स्थापित कर राष्ट्रीय नारी दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिये । गुरू गोविन्द सिंह की जयंती की तरह सीताजी की जयंती मनाने से नारी, मैथिली और मिथिला तीनों को सम्मान मिलेगा । शासन- प्रशासन की सुविधा के हिसाब से यूनिट छोटा हो गया है । जिला, अनुमंडल, पंचायत, प्रखंड छोटा हो गया है तो राज्य क्यों नहीं ? द्रुत विकास, आर्थिक विकास, प्रशासनिक सुविधा हेतु भारतीय संविधान के अनुसार अलग मिथिला राज्य का जल्द से जल्द गठन होना चाहिये । इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय सुगौली संधि की पुर्नसमीक्षा की जानी चाहिए ।
दिल्ली में प्रवासी मैथिलों को जोड़ने में “अखिल भारतीय मिथिला संघ” के अध्यक्ष पूर्वसांसद राजेन्द्र प्रसाद यादव की अस्वस्थता एवं महासचिव विजय चंद झा की कम सक्रियता की वजह से दिल्ली में मिथिला आंदोलन फिलहाल शांत है परन्तु यूथ ऑफ मिथिला (अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद की दिल्ली इकाई) के भवेश नंदन जमीनी कार्यकर्त्ताओं, युवाओं एवं बुद्धिजीवियों को जोड़ने में जुटे हैं । उनका मानना है कि देर सबेर ही सही उनका प्रयास रंग लाएगा । मिथिला आंदोलन के संदर्भ में मुंबई के चक्रधर झा की कुछ अलग सी राय है । वे मानते हैं कि “मिथिला के बुद्धिजीवी वर्ग धीरे-धीरे आक्रोशित हो रहा है । दलित मैथिल के हाथ में नेतृत्व दिए जाने से आंदोलन प्रखर होगा ।
मैथिली नाटक के माध्यम से अलख जगाने में दिल्ली की सुप्रसिद्ध संस्था ‘मिथिलांगन” एवं “मैलोरंग” न केवल नाट्‌य विधा बल्कि मैथिली साहित्य के प्रकाशक के आधारभूत स्तंभ है । जहाँ मिथिलांगन में अभयलाल दास संजय चौधरी, सुंदरम एवं कुमार शैलेन्द्र की टीम तेजी से सक्रिय है वहीं दूसरे तरफ राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय की पत्रिका रंगप्रसंग के उपसंपादक एवं मैलोरंग के महासचिव प्रकाश झा सुविख्यात नाट्‌यकर्मी महेन्द्र मलंगिया के संरक्षण व निर्देशन में युवाओं को मैथिली रंगमंच से जोड़कर आंदोलन का प्लेटफॉर्म तैयार कर रहे हैं ।
संक्षेप में कहा जाय तो भले ही मिथिला आंदोलन शांत दिखता हो परन्तु अंदर की ज्वालामुखी कभी भी फट सकती है । यह शांति आंदोलन की आंधी के आगाज जैसा ही है ।