गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

निजी क्षेत्र में आरटीआई का प्रावधान क्यों नहीं ?--गोपाल प्रसाद

(नई दिल्ली,14 अप्रैल 2011 ) बाबा साहब डा. भीमराव आंबेडकर के जयन्ती के अवसर पर " आरटीआई एक्टिविस्ट एसोसिएशन ऑफ इण्डिया " द्वारा लक्ष्मी नगर में आयोजित "यदि आज आंबेडकर जीवित होते " बिषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में संस्था के महासचिव गोपाल प्रसाद (आरटीआई एक्टिविस्ट)ने कहा कि यदि आज आंबेडकर जीवित होते तो वे निश्चित रूप से दलितों को सूचना का अधिकार प्रयोग करने ,आरटीआई एक्ट को सशक्त करने तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून में कठोर प्रावधान अवश्य करते. वास्तव में सूचना का अधिकार (RTI) का अधिकाधिक प्रयोग करके ही भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं को उजागर किया जा सकता है. भ्रष्टाचारियों को नकेल डालकर ही कानून का भय बनाया जा सकता है. जब तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनहित हेतु आरटीआई एक्ट को और अधिक शक्ति नहीं दिया जायेगा तब तक कानून तोड़नेवालों के दिल में कानून के प्रति सम्मान कैसे हो सकता है? वास्तव में कानून का सम्मान ही भारतीय संविधान निर्माता डा. भीमराव आंबेडकर का सम्मान है और यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजली होगी. कालाधन वापस लाने एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन का सबसे अधिक फायदा दलितों, शोषितों एवं उपेक्षितों को होगा. हमें जनजागृति लानी होगी की आज हमें सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार ,रोजगार का अधिकार आदि प्राप्त है. चिंता का विषय यह है कि इसके बारे में आम जनता को अभी भी जानकारी प्राप्त नहीं है. हमें सरकार पर निर्भर रहने के बजाय स्वैक्षिक स्तर पर जनजागरण के माध्यम से इस आन्दोलन को तेज करना होगा. जब जनता जागेगी तो बदलाब अवश्य आएगा. आन्दोलन और जनजागृति में अन्योनाश्रय सम्बन्ध है अर्थात ये एक दूसरे के पूरक हैं. सन 1942 के भारत छोडो आन्दोलन अभियान में लगभग 5%लोग ही शामिल थे और उसी के बदौलत हमने ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंका था . आज भी पांच प्रतिशत जनता इस आन्दोलन के सहभागी बन जाएँ तो बदलाव आने में कोई बिलम्ब नहीं होगा. अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल विधेयक लागू करने हेतु आमरण अनशन की सफलता इसका प्रत्यक्ष उदहारण है. हमें मौन रहने के बजाय अन्याय ,शोषण, भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रतिकार करने की क्षमता लानी होगी. जब शोषित समाज आवाज उठाएगी तभी हुक्मरान सही कदम उठाने को मजबूर होगा और इसके लिए हमें दूसरों की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं पहल करना होगा .दलित भागीदारी के बिना कोई आन्दोलन मानवाधिकार आन्दोलन नहीं हो सकता. इसके लिए बौद्धिकता और तर्क को विकसित करना होगा. आज यदि आंबेडकर जीवित होते तो निश्चित रूप से निजी क्षेत्र में आरटीआई का प्रावधान लागू करने एवं कालाधन जमा करने वालों पर सख्त कानून बनाते. क्या निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार नहीं है? भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट नौकरशाह एवं भ्रष्ट उद्योगपतियों कि तिकड़ी ने अपराधियों के बलबूते निर्दोष जनता के हक़ को छीनकर बुनियादी सुविधाओं एवं विकास के मद के सरकारी कोष में हेराफेरी से प्राप्त धन को देश से बाहर एवं देश के अन्दर अन्य नाम से जमा कर रहें हैं . यही कालाधन है. सरकार को इसपर टैक्स लगाने के बजाय बिहार और म.प्र. की तरह पूर्णतः जप्त कर जनहित मद में प्रयोग करने का प्रावधान बनाना चाहिए. अब तक 40 -45 आर्थिक समितियों एवं आयोगों द्वारा किये गए विश्लेषण के बाद भी आज तक कोई भी सरकार इस कालाधन को प्राप्त करने एवं देश की बुनियादी आवश्यकताओं में इसका उपयोग करने कि पहल क्यों नहीं की? हमारे राजनेताओं में इच्छाशक्ति की कमी तथा नीति एवं नीयत में खोट रहने के कारण समस्याएँ घटने के बजाय बढ़ रही है .कालेधन की अर्थव्यवस्था न होती तो आज हम जापान और चीन को पीछे छोड़कर विश्व की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश का गौरव प्राप्त कर पाते. भ्रष्ट देशों की सूची में हमारे देश का नाम ऊँचे पायदान पर नहीं होता. आज आंबेडकर जीवित होते तो निश्चित रूप से संविधान में संसोधन के बजाय समसामयिक समस्याओं के मद्देनजर नया संविधान लिखते. अपनी बातों के समर्थन में होसंगाबाद (म.प्र.) के सजीवन मयंक के गीत "नया विधान लिखें" का अवश्य जिक्र करना चाहूँगा जो काबिलेगौर है :----- हमने अपने संविधान में इतने संशोधन कर डाले . बेहतर हो हम सब मिलजुलकर अपना नया विधान लिखें.. हर कुटिया को मिले उजाला, हर बचपन को प्यार मिले, सबकी जाति हो हिन्दुस्तानी , जन- जन को अधिकार मिले, हर बच्चे को मिले खिलौना सबके घर हो नरम बिछौना. हर मुखड़े पर भारतवासी स्वाभिमान प्रतिमान लिखें. कल की बातें वर्तमान में , अक्सर छल कर जाती है, परिवर्तित बातें जीवन में , सब कुछ हल कर जाती हैं, अपनी भूलें सुधारें खुद ही औरों से क्या लेना है. हर मंदिर हर भाषा में हम सबका भगवान लिखें.. राजनीति का अर्थ देश को , स्वर्ण सबेरा देना है , आजादी को इस आँगन में, अटल बसेरा देना है, यह माटी हम सबकी जननी इसका नव श्रृंगार करें. सभी जाति के लोग नाम के आगे बस 'इन्सान' लिखें.. ........................................................................................ लखनऊ के प्रो. ओमप्रकाश गुप्त 'मधुर' के गीत "कौन श्रेष्ठ कह सकता है?" में हमारे वक्तव्यों की झलक दीख पड़ती है :-- भारत के इस लोकतंत्र को ,कौन श्रेष्ठ कह सकता है . लोक जहाँ पर लोप हुआ ,क्या तंत्र शेष रह सकता है? नेताओं नौकरशाहों में ऐसी हुई जुगलबंदी , व्यापारी दोनों हाथ से लूट रहे कह कर मंदी , आम नागरिक भूखा नंगा, ठोकर ही सह सकता है. लोक जहाँ पर लोप हुआ ,क्या तंत्र शेष रह सकता है? शासन तो दुष्यंत बना ,जनता बन बैठी शकुंतला , भोग लिया फिर भूल गया ,अपने महलों की और चला , जनता की आँखों के बदव में ,सागर दह सकता है . लोक जहाँ पर लोप हुआ ,क्या तंत्र शेष रह सकता है? वोटों के सौदागर देते जाति-पांति के आरक्षण , प्रतिभा को पीलिया हुआ है ,लकवाग्रस्त हुआ है शिक्षण , एक सुनामी और हुई तो ,तंत्र -मंत्र दह सकता है . लोक जहाँ पर लोप हुआ ,क्या तंत्र शेष रह सकता है? ........................................................................................... अजीत शर्मा 'आकाश' (जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी,इलाहबाद) के गजल में आंबेडकर के सूत्रवाक्य नजर आते हैं :--- नाम अत्याचार का जड़ से मिटाएगी जरूर. देख लेना क्रांति की लहर आएगी जरूर .. राख़ में लिपटी हुई ये आग हवा चलते ही, एक न एक दिन शोषकों का घर जलाएगी जरूर, आज तो सूरत प्याला जहर का पी जाएगा, कल मगर उसको ये दुनिया सर नवाएगी जरूर. रख सकोगे कब तलक वंचित ये जनता एक दिन, तय समझ लो अपना हर अधिकार पाएगी जरूर, एक बेंजामिन मरेगा जन्म लेंगे सैकड़ों , उन्हें सरकार फांसी पर चढ़ाएगी जरूर . अब बगावत पर उतर आओ ,सुनो अहले चमन , ये खिजां वर्ना सितम तुमपर भी ढायेगी जरूर. संगठित होकर दिखा दो ,संगठन में शक्ति है , जो विरोधी शक्ति होगी मुंह की खाएगी जरूर, मांगने से यदि न मिल पाए तो बढ़कर छीन लो , हर सफलता खुद-ब-खुद कदमों में आयेगी जरूर, हौसला तूफान से लड़ने का होना चाहिए , सीना-ए-दरिया पे कश्ती डगमगाएगी जरूर.. .......................................................................... नवलगढ़ (राजस्थान) के ओमप्रकाश व्यास की चार पंक्तियाँ हमारे लिए प्रेरक है :-- देश आतंक से घिरा है , अब तो उसपर ध्यान धर, छेड़ मत फिल्मी तराने , देशभक्ति का गान कर,. मिट रही अपनी विरासत , नष्ट हो रही संस्कृति , इन सभी को बचाना ,राष्ट्रीयता का पान कर..

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

कैसे करें भ्रष्टाचार का सामना ? --गोपाल प्रसाद आरटीआई एक्टिविस्ट

भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना हजारे के आमरण अनशन रुपी शंखनाद के बाद दिल्ली के प्रीत विहार इलाके में एक विचार गोष्ठी में "भ्रष्टाचार का सामना कैसे करें" विषय पर चर्चा हुई. "आरटीआई एक्टिविस्ट एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया " के महासचिव गोपाल प्रसाद ने कहा कि यूपीए सरकार अब तक की सबसे भ्रष्टतम सरकार है. वास्तव में सोनिया गाँधी ने संसद, प्रधानमंत्री को हाईजैक कर लिया है . राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NAC ) बनाकर अपनी महत्ता साबित करने तथा मंत्रीमंडल को पंगु करने के सिवा इसका कोई दूसरा काम नहीं है.जनता अब पहले के बनिस्पत जागरूक हो चुकी है. भ्रष्टाचार और कमरतोड़ मंहगाई ने जनता का जीना मुहाल कर रखा है. देश की जनता की पीड़ा अब असहनीय हो चुकी है और उसे अब हर हाल में बदलाव चाहिए . प्रख्यात योग गुरु स्वामी रामदेव के कालाधन को वापस लाने एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण के बाद जनता पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ा है. बाद में भाजपा द्वारा संसद के बाहर एवं संसद के भीतर आन्दोलन चलाने के बाद इस मुहिम ने और रंग पकड़ा. निराश जनता के मन में आशा की किरण प्रस्फुटित हो गई. तीसरे चरण में अन्ना हजारे के आमरण अनशन की घोषणा ने बाकी की कोर कसर पूरी कर दी . सम्पूर्ण देश के प्रायः सभी इलाकों से छात्रों, नौजवानों, युवतियों, बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं एवं विकलांगों ने अपना पूरा समर्थन दिया ,जो स्वतः स्फूर्त था. यह कोई प्रायोजित कार्यक्रम नहीं था ,बल्कि हर वर्ग ,हर धर्म, हर संप्रदाय ,हर क्षेत्र के दिल की भड़ास था . जिसके कारण केंद्र ही नहीं विभिन्न राज्य सरकार की सत्ता भी हिलने लगी थी, तभी तो सभी नेताओं ने इस आमरण अनशन को शीघ्र तुडवाने का आग्रह किया था और सोनिया गांधी एवं प्रधानमंत्री को भी इनके लोकपाल बिल की मांग को स्वीकार करना पड़ा . पिछले महीने भारत के प्रधानमंत्री से हमने लालकिला के प्राचीर से किए गए घोषणाओं एवं उनके क्रियान्वयन के सम्बन्ध में सूचना का अधिकार अधिनियम(RTI ) के तहत जानकारी मांगी थी. प्रधानमंत्री कार्यालय के जबाब के अनुसार प्रधानमंत्री का काम घोषणा करना होता है ,उनका क्रियान्वयन नहीं. हालाँकि योजनाओं के क्रियान्वयन की रिपोर्ट दी गई थी ,परन्तु वह संतोषप्रद नहीं था. इससे यह तो साफ झलक गया कि समन्वय की कितनी कमी है. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने एवं उसकी मॉनीटरिंग हेतु क्या -क्या उपाय प्रधानमंत्री ने किये हैं ,के सम्बन्ध में पूछे जाने पर प्रधानमंत्री द्वारा पिछले बर्षों में दिए गए भाषणों की प्रतिलिपि भेज दी गई , जब प्रधानमंत्री कार्यालय का यह हाल है तो देश के अन्य मंत्रालयों का अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं. योजना आयोग के निदेशक ने तो हमारे आरटीआई प्रश्नों के जबाब में वेबसाईट देखने और किताब पढ़ने की सलाह दे डाली. योजना आयोग के अफसर एसी कार्यालय में रहकर योजना बनाते हैं , उन्हें जमीनी हकीकतों का कितना ख्याल होगा?केंद्र सरकार के ही एक मंत्री ने इसपर योजना आयोग का मखौल उड़ाया था. जन बूझकर भ्रष्टाचार के जाँच हेतु बनी संस्थाओं को सशक्त एवं अधिकार संपन्न नहीं बनाया जाता है क्योकि सरकार की नीति और नियति दोनों में ही खोट है. कालाधन,बोफोर्स घोटाले ,भोपाल गैस कांड के अभियुक्त एंडरसन के प्रत्यर्पण , कॉमनवेल्थ, आदर्श सोसाईटी , टूजी स्पेक्ट्रम आदि मामलों में सरकार के रवैयों की पोल खोल दी है. हमें आशा ही नहीं विश्वास है कि भ्रष्टाचार का मुकाबला करने के लिए अन्ना हजारे द्वारा पेश किए गए बिल के द्वारा ही नकेल कसी जा सकती है, बशर्ते कि इसमें जनता की नुमाइन्दगी करने वाले भ्रष्ट नेताओं के जैसा आचरण न करने लगे. इस बिल के सख्ती से लागू होने के बाद भारत को सशक्त एवं समृद्ध बनने से कोई नहीं रोक सकता है. भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. कलाम के सपनों के भारत की सार्थकता तभी संभव हो सकती है. गैरसरकारी संस्था "अभियान " के अध्यक्ष दीपक गुप्ता ने कहा कि सब लोग कुछ न कुछ अलग -अलग कर रहे थे . मेरा यह प्रयास है कि सर्वप्रथम मैं को हम करें. उड़ान फाउँडेशन के संजय गुप्ता ने पूर्वी दिल्ली की अनेक समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के कारण ही भू माफिया, पार्किंग माफिया एवं शराब माफिया का वर्चश्व बढ़ गया है. काफी लिखने-पढ़ने के बाबजूद भी कारवाई नहीं होती है. उससे भी दुखद बात यह है कि लोग आगे आने के लिए तैयार नहीं होते. पर्सनालिटी डेवलपमेंट विशेषज्ञ निखिल त्यागी ने कहा कि सिस्टम को ठीक करने की चुनौती आज एक यक्ष प्रश्न है. उसके लिए दूरदर्शी सोंच, आगे की कार्ययोजना और वास्तविक उपलब्धि महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी. बिभिन्न स्कूल -कालेजों में सेमिनार, डिबेट आयोजित कर जनजागरूकता को बढ़ावा देना होगा. आज अमेरिका सम्पूर्ण विश्व में अपना दबदबा कैसे बना रहा है ,यह हमें समझाना होगा.वास्तविक विकास हेतु मानसिकता में परिवर्तन आवश्यक है. अतः दकियानूसी मानसिकता पर प्रहार कर उत्कृष्ट मानसिकता लानी होगी ,जो सम्पूर्ण देश के हित में हो. "स्मार्ट डज स्मार्ट" नामक पुस्तक का जिक्र कर उन्होंने कहा की देश के हर जागरूक नागरिक को स्मार्ट पैरेंटिंग का उत्तरदायित्व निभाना होगा. सवर्ण शक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय शर्मा ने कहा कि जड़ अयोग्यता में है . योग्य व्यक्ति आए तभी भ्रष्टाचार रूकेगा. बालाकृष्णन , थॉमस ,दिनकरण आदि को पदस्थापना जातिवाद के कारण ही मिली जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला .इसलिए जिसमें योग्यता है उसे ही आगे लाया जाए. इंजीनियर चंद्रकांत त्यागी ने कहा कि शिव खेडा के आह्वान पर "हम कुछ कर सकें " की भावना के तहत ऐसी सोसाईटी को कॉल किया था ,जो चेंज चाहती थी. शिव खेडा के पार्टी से त्यागपत्र देने के बाद तेजेंद्रपाल त्यागी के नेतृत्व में हम आज भी यह लड़ाई लड़ रहे हैं. विदेशी लोग यहाँ आते हैं ,जिनका सामना यहाँ भ्रष्टाचार से होता है . वास्तव में देश की 80 % जनता इससे प्रभावित है . देश के अधिकाश भाग में आज भी मूलभूत सुविधाएँ नहीं है. हमें समस्याओं पर बातचीत के बजाय ,उनमें से एक समस्या के समाधान पर काम करना चाहिए. शुरुआत एक की करें , तभी कुछ बदलाब हो सकता है. हम ऐसी सिस्टम डेवलप करें जो बता सके कि कौन अयोग्य है. मजदूरों कि समस्याओं (ESI ,PF , तथा प्रॉपर मेडीसिन नहीं मिलना ) पर काम करने की आवश्यकता है. सवर्ण शक्ति पार्टी के महासचिव सुभाष शर्मा ने कहा कि वार्ड पार्षद , विधायक ,संसद बनकर बदलाब लाना पड़ेगा. टी.एन.शेषण के कार्यों की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि सबको कुछ न कुछ बनाना पड़ेगा तभी क्रांति आएगी. बहुजन समाज पार्टी पर चुटकी लेते हुए उन्होंने कहा कि बहनजी को पैसा देकर टिकट प्राप्त करनेवाला क्या जनता से मतलब रखेगा? टूल आने के बाद ही चेंज करने की परिकल्पना साकार हो सकती है. ऐसे कार्यक्रम बनाना पड़ेगा ,जो लोगों के लिए तथा लोगों को समझाने लायक हो. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सत्ता प्राप्त करके ही व्यवस्था परिवर्तन संभव हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट के युवा अधिवक्ता संदीप दुबे ने चाणक्य नीति एवं नन्द वंश के समूल खात्मे के प्रसंग की चर्चा करते हुए कहा कि हमें चन्द्रगुप्त तैयार करना पड़ेगा,छोर पकड़ना पड़ेगा. सबसे उपयुक्त फार्मूले का क्रियान्वयन हो तथा हम दिखें न दिखें मुट्ठी दिखनी चाहिए. भूखे चाणक्य के आग्रह पर बुढ़िया द्वारा परोसे गए गरम खाने के दौरान चाक्य के हाथ जल जाने पर बुढ़िया द्वारा दी गए जबाब " तुम्हें गरम भोजन को ग्रहण करने की विधि भी नहीं मालूम , इसे किनारे से खाना पड़ता है" का उदाहरण अपने आप में एक महत्वपूर्ण सन्देश है. बूढा बगुला का कहानी सुनाते हुए उन्होंने कहा कि धूर्त बूढ़े बगुले ने कुछ दिनों तक मछलियों को नहीं खाया और बाद में एक- एक करके सभी मछलियों को दूसरे तालाब में ले जाने के बहाने खा गया. केकड़ा को इसी प्रकार ले जाने पर केकड़ा ने कहा कि हम तो तुम्हारे गर्दन पर ही जाएँगे. जंगल में मछलियों के ढेर सारे कांटे देखने पर केकड़ा ने बगुला का गर्दन पकड़ लिया. अंत में उन्होंने कहा कि धूर्त बगुला के विलाप में न पड़कर किसी एक को तो केकड़ा बनना ही पड़ेगा. आईये भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने प्रयासों को एकसूत्रित कर भारत को सशक्त करने में अपना योगदान दें.

रविवार, 3 अप्रैल 2011

मेघनाद साहा का पत्र गोपाल प्रसाद आरटीआई एक्टिविस्ट के नाम

नई दिल्ली 14 .02 .2011 . समीपेषु : श्री गोपाल प्रसाद बाबुसाहब, तुम याद तो आते ही हो मगर आज मुझे विवश करते हुए बहुत याद आ रहे हो . इसलिए वार्तालाप से अपारग होकर मैंने लेखनी उठाई है .दरअसल बीते दिन रविवार को टी.वी. पर एक कार्यक्रम देखा और गहन मनोयोग के साथ सुना .हाँ ,दूरदर्शन राष्ट्रीय प्रसारण के कार्यक्रम "जानने का हक " दोपहर के तीन बजे से देख रहे थे . अधीर आग्रह के साथ साँस रोककर हमलोग इंतिजार कर रहे थे. अंततः जो सूचना मिली थी ,उसकी सच्चाई भरी इंटरव्यू के जरिए पाए. जो खबरें अंगरेजी और हिंदी समाचारपत्रों में आई थी वह सब पढ़कर हमलोग अत्यंत दुखी हुए थे -"अशोक विहार के सत्यवती कॉलेज के हाते में जघन्य रूप से हरे - भरे जीवंत पेड़ों को काटा गया." एक शैक्षिक प्रतिष्ठान के अधिकारी ऐसा कैसे कर सकते हैं-सोचना हमारे लिए संभव नहीं हो पा रहा था . मगर जान लो ,सुन लो -हम खुश थे ,क्योंकि तुम परमेश्वर की असीम अनुकम्पा से कुछ आक्रमणकारियों के हाथों से बच पाए. हम देशवासी वाकई खुश हुए थे , इसके लिए और उस साहसी महिमामयी नारी के लिए भी जो उस दिन उसी समय उन दुष्कर्मियों के हाथों हत्या होते होते बच गयी थी और तुम दोनों के जीवनहानि होते-होते बच जाने से तुम्हारे निकटजनों को ,परिचित -अपरिचितों को अत्यंत आनंद मिला ही होगा . फरवरी के तीन तारीख को समाचारपत्रों में अधूरे खबर पढ़कर ही सब के दिल धंस गए थे -आज तो सोंचते हुए भी रोंगटे खरे हो जा रहें हैं. गतकाल भारत सरकारके दूरदर्शन चैनल पर गोपाल प्रसाद तुम्हारे और श्रीमती नंदा सावंत के साक्षात्कार प्रत्यक्ष कर हम बहुत कुछ जान पाए . मैं निश्चित हूँ की मेरी तरह सब के हृदयों में यह तांडव घृणा के रूप में तिरस्कृत हुए होंगे . फिर दूरदर्शन के कर्त्पक्षों के प्रदर्शन से साफ-साफ पता चला है कि तुम्हारा और श्रीमती नंदा सावंत के यह दु:साहसिक विरिध प्रदर्शन उन्हें गर्वित किया है. अतः सरकार भी आपके ऐसे पुण्यकर्मों से प्रभावित होकर आपके साथ है -इसमें कोइ संदेह नहीं . कम से कम यह तो संभव हो सका कि सरकारी उद्यम "सूचना तथा प्रसारण विभाग " तुम दोनों पर हमला करने वालों की निंदा की .मगर यथार्थ रूप से सब कुछ सूचित नहीं हुआ .हम ,आप को करीब से जानने वाले तो आप से पूछकर जान पाएँगे ,बांकी कुछ और लोग भी हमसे सूचना प्राप्त करेंगे -किन्तु जनसमुदाय नहीं जान पाएँगे. यह ठीक बात नहीं है क्योंकि जब तुमलोग इस तरह से जान हथेली पर लिए सरे देश में फैले अंधकार दूर हटाने का शपथ लिए हो -तब देश के हर कोने से दल के दल नौजवानों को ,नवयुवतियों को ऐसे महान कर्मों में अवश्य ही साथ देना चाहिए .दिल के हर अंश में डंके की चोट पा रहा हूँ -क्योंकि सोंच कर भी समझ में नहीं आता कि कैसे उस कॉलेज के विद्यार्थियों पर उन पेड़ों को कटवाने का प्रभाव ही नहीं पड़ा?....ऐसी शीतलता ! हाय परमेश्वर ...ओ परवरदीगार !! उनका स्मरण तथा ध्यान करते हुए सत्य कथा कह रहा हूँ कि ,'बाबू गोपाल तुम्हारे लिए तो सावित्री मिल जाती मगर उस नारी के चलते क्या होता? प्रलय नृत्य शुरू कर देता एक ' राजा '-चाहे भाग्यवती या गुणवती महाविद्यालय का प्रांगण क्यों न हो !सरे विद्यार्थीगण भी समवेत होकर ' नटनृत्य -प्रलय नर्तन 'आरम्भ कर देते .फिर ?...मार गंडासा ,मार त्रिशूल ...जैसे प्रहार वज्र से ,उन्मूलन पवन देव से ! हाँ ,तुम दोनों बचे ,तो बच गयी यहाँ की सामाजिक स्थिति -अन्यथा कुछ भयंकर घटना घट जाती तो यहाँ की धरती पर मातम छा जाता .सारे राजस्थान के वासी यहाँ आ जुटते ....सारे उत्तरप्रदेशी उमर -घुमड़ कर आ जाते ...और?सारे बिहारी बाबु यहाँ आकर आंधी उठाते !हर तरफ गूंजती दलितों के विक्रम की भाषा पर्यावरण की रक्षा के लिए -'पेड़ों को बचाओ -प्रकृति बचाओ !'-नारे. अतः कहता हूँ :"संवेदनशील व्यक्ति या गोष्ठी ,स्वभावतः केवल मात्र मानवाधिकार रक्षा के लिए ,दुखियारों पर हो रहे अत्याचारों को बंद करने के लिए -तथा भ्रष्टाचार जड़ से उखाड़ाने के लिए तत्पर नहीं होते ;वरन चरित्र अनुयायी बन जाते हैं स्वयं शोषित ...दलित भी .रहा नहीं जाता उन लोगों से -लुगाइयों से और स्वेच्क्षा से बन जाते हैं सुधारक .दृढ -कर्मठ -क्रांतिकारी -निडर युवक-युवती !" हाँ ऐसा ही है . फिर हो रहे दुष्कर्मों की खबरें उन्हें मिल ही जाती है ,और गहन जानकारी के लिए निकल पड़ते हैं दुष्कृतियों के आलयों पर दृढ़ता के साथ आहटें देने के लिए . फिर यह भी गर्व की बात है कि सरकार की ओर से ' जानने का अधिकार ' सब को है. अतः वर्तमान काल के समाज से फिर अनुरोध करता हूँ :'सावधान दलित -दुखियारों को और ण तड़पाओ !!'आप कहेंगे :'कहाँ,कोइ किसी को तड़पा रहा है ?...कटे तो हैं सिर्फ चंद पेड़ों को !बस इसके लिए नानी मारी ?' शाबाश दुष्कर्म -जगत के आधुनिक रावणों ! नए आकार में आज भी हो !! महातीखी गली न देते हुए कह रहा हूँ कि : 'अबे ! उफ तक नहीं करते इसलिए पेड़ -पौधों को काटकर प्रकृति का विनाश करोगे ?...सावधान पृथ्वी तप रही है !पेड़-पौधों को ण काटो !! बहुत हो गया ,अब दिन आ रहें हैं जब एक काटोगे तो तो अपना गर्दन खोओगे . गजब है , जो ऐसा करने के लिए मन करने जाती /जाता है उनकी हत्या करने हावी होते हो !...सावधान ,महान अनिष्ट की संभावना है ...सावधान पृथ्वी तप रही है !' और श्री गोपाल प्रसाद ,आप से निवेदन है कि जो कुछ भी हुआ उसके कारण उदास न होना . हरप्रभ होने का प्रयोजन ही नहीं -सारा जमाना तुम्हारा तथा श्रीमती नंदा सावंत के साथ है. भविष्य में और करीब होंगे . ऐसे में तो तुम्हे असीम खुशी हासिल होनी चाहिए क्योंकि हम जनगण को पता चल गया है कि गत 3 फरवरी के दोपहर को सूचना मिलते ही सरकार के प्रशासन - कर्माधिकारीगण किस तरह से तत्पर हुए थे और कुछ ही अन्तराल में घटनास्थल पर जा पहुंचे थे . परमाराध्य देव- देवियों से नियत प्रार्थनारत रहूँगा कि सेवारत कनिष्ठ तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी महोदयों का सम्पूर्ण सहारा सर्वदा आप पर रहे ...आप जैसे नौजवानों ,नवयुवतियों पर रहे . सारे भारत में तमाम सेवानिवृत प्रशासनिक तथा अन्यान्य वरिष्ठ अधिकारीगण से निवेदन करता हूँ कि इस दिशा में उनके ह्रदय और संवेदनशील बनें , और वे सम्मिलित होकर वीरदर्प के साथ , प्रत्यक्ष रूप से आप जैसे समाज सेवियों के साथ रहें, सहारा दें. इसलिए ,सुनो श्री गोपाल श्रीमती नंदा : 'दुखी न होकर प्रकृति विनाश्कारियों से और गहरा सम्बन्ध स्थापित करना होगा . उन्हें यथार्थ रूप से प्रकृतिप्रेमी बनाना होगा अन्यथा हानि करने कि आदत वे नहीं छोड़ेंगे. सब को पूर्ण विश्वास है कि वह दिन दूर नहीं जब वे लोग तुम्हारे प्रयासों को समझ पाएँगे और सहयोगी बन जाएँगे! उदहारणस्वरुप सैवात्र सूचना देनी होगी कि निर्माणस्थलों में वृक्षों को काटना ही पड़ेगा ,ऐसी बात नहीं है . सब की रक्षा करते हुए अनायास निर्माणकार्य चलाया जा सकता है . अनुरोध करता हूँ कि नई दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के समीप निर्माणाधीन कार्यक्षेत्र पर एक बार आओ और यथार्थ रूप से जांचो किस मानवदरदी भावना के साथ उपवन बगैर विनष्ट किए वहां भवन बनाया जा रहा है . आशा है इसे और ऐसे कार्यस्थलों को जाँचकर तुमलोग जनगण को यथोचित सन्देश दोगे . परियोजना , प्रकृति विनाश के लिए नहीं है!! अंत में एक वक्तव्य रखना चाहता हूँ , : ' पर्यावरण तथा प्रकृति का आँचल की रक्षा करने के लिए अवश्य ही जनजागृति की जरूरत है -और इस दिशा में जनता की छह दृश्य -मन से होनी चाहिए..' जनचेतना जगाने के लिए मैं श्री गोपाल प्रसाद से अनुरोध करता हूँ कि मत भूलें , :' सावधान पृथ्वी तप रही है !' हाँ, आप ही द्वारा प्रकाशित यथार्थवादी नाट्य-साहित्य जनित यह पुस्तक 'सावधान पृथ्वी तप रही है !' के बारे में कह रहा हूँ , अनुरोध करता हूँ श्रीमती नंदा सावंत को और श्री राजा को कि इस नाटक को मंचन करें ! जनचेतना बढाएँ क्योंकि नाट्यकला -गीत नृत्य -धर्म दृश्यकला के आप पुजारी हैं .श्री गोपाल से भी मिन्नत कर रहा हूँ कि ,:'उनका प्रयास इस तरह से नाट्यमंच के माध्यम से और सशक्त होकर करवाएं , सहारा दें ..इस संकल्प में सफल होने के लिए यथार्थ सरकारी विभागों में दरबार करें !!" आशा तो है ही -निश्चित हूँ तुमलोग सफलता प्राप्त करोगे . ईश्वर मंगलमय हैं ...सदा निहारते हैं साईं ...आशीर्वाद देते हैं हरि-हर !... बख्शते हैं परवरदीगार !! इति :-- अनेक शुभकामनाओं के साथ , मेघनाद राजा