गुरुवार, 8 सितंबर 2011

समर्थ एवं सशक्त जन लोकपाल के कार्यकलाप संबंधी कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव

सरकारी मशीनरी सरकारी धन के दुरुपयोग रोकने में सक्षम नहीं है , इसलिए जन लोकपाल के माध्यम से सरकारी धन के दुरुपयोग रोकने के उपाय किए जांय और इस हेतु एक मॉनीटरिंग प्रणाली विकसित करे . हर व्यक्ति जो सरकार से वेतन पाता है , की जिम्मेदारी तय हो . आय से अधिक संपत्ति पाए जाने पर उसके विरुद्ध समयसीमा के अंतर्गत कानूनी कारवाई की जाए और उस संपत्ति को सरकारी संपत्ति घोषित की जाए. इस सम्बन्ध में बिहार सरकार के मॉडल को पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए.

जन लोकपाल द्वारा इंडियन सिविल सर्विस के सभी कैडरों (IAS /IPS /IRS /IFS आदि) पर विशेष निगरानी रखी जाए. इनसे सम्बंधित शिकायतों की अबिलम्ब जाँच की जाए तथा उस पर त्वरित करवाई हो , साथ ही जाँच होने तक उन अधिकारीयों को संवेदनशील पदों से मुक्त किया जाना चाहिए. ये जनता के सेवक हैं न की देश को लूटने के लिए नियुक्त किए गए हैं.

सभी राजनैतिक घराने /वंश, जिनके पास आजादी के बाद अकूत संपत्ति आई है और वास्तव में जो देश का पैसा है , उसे सरकारी खजाने में लाया जाए तथा उसका उपयोग देश के बुनियादी आवश्यकताओं/ समस्याओं, आधारभूत संरचनाओं एवं सुविधाओं के विकास पर खर्च हो , जैसे -मधु कोड़ा, लालू यादव, रामविलास पासवान, जयललिता, मायावती, मुलायम सिंह यादव , अमर सिंह, प्रकाश सिंह बादल, चौटाला परिवार, करूणानिधि परिवार , देवगौड़ा/कुमारस्वामी परिवार ,कर्णाटक के रेड्डी बंधु, आन्ध्र प्रदेश के जगन रेड्डी आदि. जन लोकपाल के माध्यम से एक बड़े परिदृश्य में इस विन्दु पर जाँच की जाए एवं उस पर कड़ी से कड़ी करवाई हो.

जन लोकपाल द्वारा फेरा कानून के उल्लंघन करनेवाले, अवैध मनी लौन्डरिंग, हवाला एवं आतंकवादी गतिविधियों हेतु फंडिंग करनेवाले तत्वों उससे सम्बंधित पूरे नेटवर्क और उसके सरगनाओं को कानून के सीखचों में लाने की प्रक्रिया सुनिश्चित की जानी चाहिए . सरकारी ढिलाई एवं कानूनी खामियों का फायदा उठाकर ऐसे तत्व देश के नीव को खोखला करने में संलग्न हैं. दाउद अब्राहिम ,छोटा शकील , छोटा राजन , हसन अली , हवाला केस में अभियुक्त जैन बंधु एवं हर्षद मेहता , चंद्रास्वामी जैसे बड़ी हस्तियों को शिकंजे में कसने की एकसूत्रित कारवाई हो.

जन लोकपाल द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठानेवाले व्हिसल ब्लोअर एवं आरटीआई एक्टिविस्टों की हत्या होने पर शहीद का दर्जा दिया जाए एवं उन्हें शहीदों को मिलनेवाली सभी सुविधाएँ प्राप्त हो सके , जिससे देश के सजग प्रहरियों के परिवार को आर्थिक, सामाजिक सुरक्षा तथा सरकारी सहायता राशि के साथ- साथ सम्मान भी दिया जाना सुनिश्चित करने की योजना पर अमल करवाने की जिम्मेवारी हो.

जन लोकपाल द्वारा प्रशासनिक सुधार हेतु जिम्मेदार विभाग (DOPT)के सभी विभागीय आदेश/ नीति/ नियमावली के समीक्षा की जिम्मेदारी भी हो ताकि मात्र सर्कुलर जरी कर निश्चिन्त हो जाने एवं उसपर पूर्णतः अमल नहीं होने की शिकायत दूर की जा सके. सीबीआई को आरटीआई एक्ट के दायरे से अलग करने संबंधी सर्कुलर (जो कैबिनेट में पास नहीं हुआ है और जिसका जिक्र सरकारी गजट में भी नहीं है ) को रोकना तथा आरटीआई एक्ट के धारा -4 (जो बर्ष 2006 तक में सभी विभागों में पालन हो जाना था)का पालन अब तक सभी मंत्रालयों में लागू नहीं होने पर सरकार से प्रश्न पूछने एवं कारवाई करवाने की जिम्मेवारी भी हो.

जन लोकपाल द्वारा मॉनीटरिंग हेतु देश के सक्रिय आरटीआई एक्टिविस्टों की सहायता, सलाह/ सुझाव लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए , क्योंकि एक सक्रिय आरटीआई कार्यकर्ता को किसी भी विभाग के विजिलेंस विभाग से ज्यादा और वास्तविक जानकारी होती है. अतः सभी मंत्रालयों के सलाहकार समिति में आरटीआई एक्टिविस्टों की सेवाएँ सुनिश्चित की जानी चाहिए.

देश की वैसी जाँच एजेंसियां , जो कानूनी रूप से तो स्वायत्त है परन्तु वास्तव में सत्ताधारी दलों के दिशानिर्देश के अनुसार कार्य कर रहे हैं , की मॉनीटरिंग रखें तथा सरकार को उनके जाँच में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से मना करे. इसके सन्दर्भ में त्वरित एवं पारदर्शी प्रक्रिया अपनाया जाना अनिवार्य होना जन लोकपाल सुनिश्चित करे.

कैश फॉर वोट मामले में अमर सिंह को मोहरा के रूप में इस्तेमाल करने वाले ताकतवर चेहरों को बेनकाब नहीं किया जा रहा है. बोफोर्स कांड, जैन हवाला कांड , चारा घोटाला कांड जैसे अनेको कांडों में सीबीआई की असफलता के साथ -साथ उसके द्वारा अधिकाधिक मामलों में क्लोजर रिपोर्ट लगाने से उसका नकारापन प्रतीत हो रहा है. सीबीआई एवं अन्य जाँच एजेंसियों के प्रति आम जनों में विश्वसनीयता में कमी आईहै . इन महत्वपूर्ण विन्दुओं पर गंभीरता पूर्वक मंथन कर ठोस कार्य योजना का खाका जन लोकपाल द्वारा बनाया जाना चाहिए, ताकि घोटाले की रकम सरकारी खजाने में आ सके . आज तक कितने घोटालेबाजों को सजा मिली है और कितनों से रकम की वापसी हुई है , यह जानने और पूछने का पूरा अधिकार जन लोकपाल को हो.

सीबीआई व अन्य जाँच एजेंसियों सहित आयकर व संपत्तिकर विभाग द्वारा सरकारी स्तर पर बदले की भावना से कारवाई की जा रही है. स्वामी रामदेव , आचार्य बालकृष्ण ,अन्ना हजारे, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, अरविन्द केजरीवाल के मामलों से तो फिलहाल ऐसा ही प्रतीत होता है. यदि सरकारी तंत्र के नीयत में खोट नहीं था ,तो सरकार उतने दिन से क्यों सो रही थी?इन विभागों का सरकारी इस्तेमाल/ राजनैतिक इस्तेमाल होने से लोकतंत्र की चूलें हिल सकती हैं . जन लोकपाल को पुलिस , सीबीआई अथवा किसी भी जाँच एजेंसियों से अनसुलझे मामलों एवं केस को बंद किए जाने के मामलों में हस्तक्षेप का पूरा अधिकार प्राप्त हो क्योकि इसकी आड़ में एक बड़ा घोटाला किया जा रहा है ,जिससे पीड़ित पक्ष को न्याय नहीं मिल पाता है.

(प्रस्तुत सुझाव आरटीआई कार्यकर्त्ता गोपाल प्रसाद के निजी विचार हैं.)

GOPAL PRASAD ( RTI Activist)
House No.-210, St. No.-3, Pal Mohalla
Near Mohanbaba Mandir,Mandawali, Delhi-110092
Mobile:9540650860,9289723144,
Email:gopal.eshakti@gmail.com

सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता

मजदूरों के हकों एवं हितों के लिए उन्हें सशक्त किए बिना भारत की आज़ादी का कोई मतलब नहीं है. आज देश में नीति एवं नियम के बजाय साफ नीयत की जरूरत है और इसके लिए हमें जागरूक और संगठित होना पड़ेगा. सरकारों की नीतियों में दूरदर्शिता एवं क्रियान्वयन का अभाव रहता है . आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में सरकारों की भूमिकाएँ बदल चुकीं हैं . राज्य-व्यवस्था अपनी जिम्मेदारियों से कतराती नजर आ रही हैं. सरकारें निजी कंपनी की तरह हो गेई हैं और वह लाभ देनेवाली एक एजेंसी के तौर पर कम कर रही है. वह सामान्य जन के लिए कल्याणकारी न रहकर कई मायनों में विनाशकारी भूमिका निभा रही है . वर्तमान दौर में सभी दलों की अर्थनीति एक जैसी हो गयी है. प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों के सुझावों की और प्रधानमंत्री कार्यालय ने बहुत सरे मामलों की अनदेखी की है. विश्वसनीय आंकड़ों के अनुसार पिछले बीस बर्षों में नगरों की जनसँख्या में डेढ़ गुना से ज्यादा वृद्धि हुई है . देश में बीस बर्ष पहले मात्र एक अरबपति था , आज लगभग पचास हैं. भारतीय संविधान और लोकतंत्र इन्हीं कारणों से कमजोर हुआ है.
दुनियां के पैमाने पर मजदूरों और कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से भारत बहुत नीचे है. कई अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों में यहाँ के व्यवस्था की बहुत ही निरासजनक तस्वीर प्रस्तुत की है . वैश्विक सामाजिक सुरक्षा पर जरी रिपोर्ट के अनुसार "भारत में 37 करोड़ लोगों को सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पा रही है . अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा बेहतर विश्व के लिए सामाजिक सुरक्षा की रिपोर्ट में सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से दुनियां के 90 देशों में भारत का 74 वन स्थान बताया गया है. आर्थिक , सामाजिक सुरक्षा का यह आकलन श्रमिकों और कर्मचारियों की आमदनी , उनके कार्य , रोजगार , रोजगार सुरक्षा तथा श्रम बाजार के आधार पर किया गया है . भारत में 90 % श्रमिक वर्ग को आर्थिक सामाजिक सुरक्षा की कोई छतरी नसीब ही नहीं है, जिसके कारन इस वर्ग के लोग बीमारी लाभ , छुट्टी लाभ , बोनस, प्रौविडेंड फंड , पेंशन , बेरोजगारी भत्ता आदि से पूरी तरह वंचित हैं . वैश्विक मंदी के दौर में दुनियां के विकसित देशों में भारत की तुलना में नौकरियां तेजी से ख़त्म हुई है परन्तु वहां कर्मचारियों , कामगारों को सामाजिक सुरक्षा के लाभ तथा बेहतर और प्रभावशाली राष्ट्रीय स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधा आसानी से प्राप्त है , जिसके कारण विकसित देश के श्रमिकों एवं कर्मचारियों को कम समस्या का सामना करना पड़ता है. आजादी के बाद सरकार ने अब तक कई कानूनों और कल्याण कोष के माध्यम से श्रमिकों को राहत देने के बाबजूद भी इस वर्ग को कोई लाभ नहीं मिल पाया . असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के मद्देनजर 1995 में सरकार ने राष्ट्रीय परिवार योजना और राष्ट्रीय मातृत्व योजना की घोषणा की थी. 1996 -97 में ग्रामीण फसल बीमा योजना और निजी दुर्घटना बीमा सामाजिक सुरक्षा योजना की घोषणा हुई . बर्ष 2000 में अति निर्धन लोगों के लिए सामाजिक बीमा योजना और 2002 में समग्र सुरक्षा योजना की घोषणा हुई . सरकार ने नई औद्योगिक -व्यावसायिक जरूरतों एवं श्रमिकों को संरक्षण प्रदान करने संबंधी कानून बनाने के लिए दो श्रम आयोग बना चुकी है परन्तु दोनों श्रम आयोग की सिफारिशों से सामाजिक सुरक्षा के कार्य में कोई गति नहीं आ सकी है . असंगठित क्षेत्र के उद्योगों के श्रमिकों की आर्थिक सामाजिक सुरक्षा के लिए अर्जुन सेन गुप्ता की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट की सिफारिश पर असंगठित क्षेत्र के 6500 रूपए प्रतिमाह से कम आय वाले 30 करोड़ मजदूरों को लाभ देने के लिए सामाजिक सुरक्षा विधेयक पारित किया गया परन्तु किसी भी तरह से यह विधेयक अपने उद्येश्य पर खड़ा नहीं उतर सका है . बर्ष 2009 के पहली मई को मजदूर दिवस के अवसर पर केंद्र सरकार ने देश के सभी नागरिकों के लिए नई पेंशन योजना (एन पी एस ) की घोषणा की है, जिससे देशवाशियों को सामाजिक सुरक्षा के लाभ मिल सके . हालाँकि यह पेंशन योजना 2004 के बाद नौकरी में आए सरकारी कर्मचारियों के लिए पहले से ही लागू थी, लेकिन अब इसके दरवाजे देश के असंगठित क्षेत्रों के सभी उद्यमियों ,अधिकारियों, कर्मचारियों तथा श्रमिकों के लिए भी खोल दी गए हैं, के बाबजूद भी इस पेंशन योजना में कई पेचीदगियां हैं . इसमें सेवानिवृति के बाद उतनी ही धनराशि मिलेगी जितनी जमा कराई गयी थी . इस राशि पर चुने गए निवेश विकल्प के अंतर्गत प्राप्त हुआ रिटर्न अवश्य मिलेगा . देश के सरकारी , अर्धसरकारी या दूसरे केंद्रीय संगठनों के कर्मचारियों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के तहत पेंशन फंड में निवेश का एक हिस्सा इन संगठनों की ओर से दिया जाता है .इस पेंशन योजना में भी निवेशक के अंशदान के साथ सरकार से कुछ अंशदान की अपेक्षा की जा रही है . यह भी विचारणीय है की पेंशन योजना में अनिवार्य रूप में 500 रूपए प्रतिमाह जमा करने की शर्त है, जिसके कारण करोड़ों गरीबों के योजना से वंचित रह जाने की आशंका है. वास्तव में यह बहुत बड़ी त्रुटि है ,क्योंकि इस योजना का निवेशक किसी भी स्थिति में जब योजना की धनराशि प्राप्त करेगा , उसे प्राप्त धनराशि पर टैक्स देना होगा , दूसरी तरफ पब्लिक प्रौविडैंड फंड जैसी बचत योजना में ऐसा कोई टैक्स नहीं लगता है . यही कठिनाईयाँ इस योजना में अडंगा डाल रही है. इसी कारणवश 1 मई 2009 से पूरे देश में जोरशोर से लागू की गयी पेंशन योजना का लाभ उठाने के लिए 15 मई 2009 तक केवल 100 लोग ही आ पाए.
कुल मिलाकर देखा जाए तो अब तक देश की कोई भी सरकार असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा के लिए कोई कारगर योजना नहीं ला पाई है. सभी योजनाओं में कोई न कोई वर्ग किसी न किसी कारणवश पीछे छूट गया है . जब भी कोई योजना सामने आती है तो वह काफी उपयोगी लगती है , परन्तु उसके क्रियान्वयन में व्यावहारिक कठिनाईयाँ होती है , जिसके कारण वह योजना प्रारंभ से ही अनुपयोगी साबित हो जाती है . अतः यह आवश्यक है की सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं को सफल बनाने के लिए बहुआयामी नीति बनाकर उसे आधार जैसे प्रोजेक्ट के साथ जोड़ दिया जाए, ताकि मंदी के दौर में चिंताग्रस्त श्रमिक वर्ग कुछ रहत महसूस कर सके. यूपीए सरकार सामाजिक सुरक्षा से सम्बंधित तमाम पिछली योजनाओं एवं विधेयकों की समीक्षा कर नई स्थिति एवं परिस्थिति के मद्देनजर जनोपयोगी योजना बनाए ताकि समाज के अंतिम पायदान के व्यक्ति को भी सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके . प्रधानमंत्री को योजनाओं की त्रुटियों को परखकर उन त्रुटियों को दूर करने एवं मॉनीटरिंग के वास्ते नए तंत्र बनाने की परम आवश्यकता है.

बुधवार, 7 सितंबर 2011

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की सूचना सही नहीं

भारत सरकार के महत्वपूर्ण मंत्रालय सूचना एवं प्रसारण की सूचना सही नहीं है क्योंकि सरकारी वेबसाईट nic .in ने इसका समय पर अपग्रेडेशन ही नहीं किया है .सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तो मात्र एक उदाहरण है , इस तरह के कई ऐसे मंत्रालय/विभाग हैं, जिनके वेबसाईट का समय पर अपग्रेडेशन नहीं हुआ है. इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के बाबजूद अपग्रेडेशन की गति कछुआ चल की भांति एवं पुरानी तकनीक पर ही आधारित है. nic .in समय पर अपग्रेडेशन हेतु सक्षम नहीं है. विश्वसनीय सूत्र के अनुसार nic कई विभागों को स्वयं समाधान देने के बजाय अपने पैनल के आईटी कंपनियों की सेवा की संस्तुति कर रही है, जो एक लम्बी प्रक्रिया है. पुरानी एवं गलत सूचना या जानकारी होने से आम नागरिक के साथ-साथ प्रशासनिक स्तर पर भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कई चिट्ठियों को विभाग द्वारा इसलिए वापस भेज दिया जाता है, क्योंकि वह पुराने अधिकारी / कर्मचारी के नाम प्रेषित होता है.कई अधिकारियों के नाम स्थानांतरण एवं सेवानिवृति के वाबजूद वेबसाईट में प्रदर्शित अधिकारियों की लिस्ट में शोभा बढ़ा रहे हैं. इससे सम्बंधित विभाग की अकर्मण्यता , गैर जिम्मेदारी तथा व्यवस्था में त्रुटि की झलक दिखाई देती है. उदाहरण स्वरुप सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग की वेबसाईट में ड्रामा की जगह पर रामा दिखाया जा रहा है. उप निदेशक प्रशासन के पद पर वरेआम मस्त को दिखाया जा रहा है , जबकि वे काफी पहले सेवानिवृत हो चुके हैं , वर्तमान में इस पद पर सहायक निदेशक प्रशासन निखिलेश चटर्जी पदस्थापित हैं . डा. विजय राघवन उप निदेशक एस एंड एल का तबादला हो चुका है. बी पाल चौधुरी उप निदेशक पी एंड सी का कोलकाता तबादला हो चुका है और इस पद पर ध्रुव अवस्थी पदस्थापित हैं . बलजीत सिंह सहायक निदेशक का भी चंडीगढ़ तबादला हो चुका है , जबकि मौजूदा सूची में अभी तक उनका नाम हटाया नहीं गया है . उप निदेशक (दिल्ली क्षेत्र) सुरेन्द्र प्रसाद एवं सहायक निदेशक मनोज बंसल का नाम तो है ही नहीं.
इस संबध में सूचना के अधिकार कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद ने आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी थी परन्तु दो माह बीत जाने के बाबजूद भी उन्हें उत्तर नहीं दिया गया है . वे कहते हैं की इससे सरकार के तंत्र एवं कार्यशैली का पता चलता है. प्रशासनिक सुधार एवं पारदर्शिता आज समय की मांग है , जिस ओर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है.