बुधवार, 25 अप्रैल 2012

आरटीआई से ख़त्म हो सकता है भ्रष्टाचार और लालफीताशाही : गोपाल प्रसाद

सरकार, सरकारी योजनाएं और तमाम सरकारी गतिविधियाँ हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. आम आदमी से जुदा कोई भी मामला हो, प्रसाशन में बैठ कर भ्रष्ट, लापरवाह या अक्षम अधिकारियों के कारण सरकारी योजनाएं सिर्फ कागज का पुलिंदा बनकर रह जाती है. सन 1947 में मिली कल्पित आजादी के बाद से अब तक हम मजबूर थे, व्यवस्था को कोसने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे. परन्तु अब हम मजबूर नहीं है क्योंकि आज हमारे पास सूचना के अधिकार नामक औजार है, जिसका प्रयोग करके हम सरकारी विभागों में अपने रुके हुए काम आसानी से करवा सकते हैं. हमें सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की बारीकियों को पढ़ कर समझना और सामाजिक क्षेत्र में इसको अपनाना होगा. इस अधिनियम के तहत आवेदन करके हम किसी भी बिभाग से कोई भी जानकारी मांग सकते हैं और अधिकारी/विभाग मांगी गई सूचना को उपलब्ध करवाने हेतु बाध्य होगा यही बाध्यता/जवाबदेही न केवल पारदर्शिता के गारंटी है बल्कि इसमें भस्मासुर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार का उन्मूलन भी निहित है. यह अधिनियम आम आदमी के लिए आशा की किरण ही नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी लेकर आया है. इस अधिनियम रूपी औजार का प्रयोग करके हम अपनी आधी- अधूरी आजादी को मुकम्मल आजादी बना सकते हैं. "भगत सिंह ने क्रांति को जनता के हक़ में सामाजिक एवं राजनैतिक बदलाब के रूप में देखा था. उन्होंने कहा था कि क्रांति एक ऐसा करिश्मा है जिससे प्रकृति भी स्नेह करती है . क्रांति बिना सोची समझी हत्याओं और आगजनी की दरिन्दगी भरी मुहिम नहीं है और न ही क्रांति मायूसी से पैदा हुआ दर्शन ही है. लोगों के परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है." भगत सिंह के इन्हीं प्रेरक वाक्यों के सन्दर्भ में कहें तो यह अकाट्य सत्य है की सब जगह पारदर्शिता हो जाए तो आधी से अधिक समस्याएँ खुद ब खुद हल हो जाएंगी , जरूरत केवल जनजागरण की है . अभी तक आरटीआई(Right to information / सूचना का अधिकार )में ऐसा कोई मैकेनिज्म ही नहीं बनाया गया जिससे पता चल सके की किस आवेदक को सूचना मिली या नहीं मिली और न ही सम्बंधित विभाग / सेक्शन मांगी गयी सूचना के जबाब की प्रतिलिपि ही आरटीआई सेल में देने की नैतिक जिम्मेदारी ही पूरी करते हैं . अधिकांश जगह आरटीआई सेल में कर्मचारियों की भयंकर कमी है . आरटीआई के तहत आवेदनों का ढेर लगता जा रहा है, लेकिन कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के मामले में प्रशासन उदासीन है , दूसरे आरटीआई की सूखी सीट पर आने को कर्मचारी तैयार ही नहीं होते और जो कर्मचारी इस सेल में आने के लिए उत्सुक भी हैं उन्हें विभिन्न कारणों से यहाँ लगाया ही नहीं जाता . सूचना अधिकारियों के उपर भी काम का अत्यधिक बोझ है . सूचना अधिकारियों को अपने दैनिक कार्यों के साथ-साथ आरटीआई का कार्य भी देखना पड़ता है और इसी दोहरे बोझ की वजह से आरटीआई कार्य भी अत्यधिक प्रभावित होता है .आरटीआई सेल में कोई समन्वयक (को-ऑर्डिनेटर )ही नहीं है जिससे यह सुनिश्चित हो सके की आवेदक को 30 दिनों के भीतर सही सूचना प्राप्त हुई या नहीं. सामाजिक परिवर्तन सदा ही सुविधा संपन्न लोगों के दिलों में खौफ पैदा करता रहा है . आज सूचना का अधिकार भी धीरे -धीरे ही सही परन्तु लगातार सफलता की और बढ़ रहा है . पुरानी व्यवस्था से सुविधाएँ भोगने वाला तबका भी इस अधिनियम का पैनापन ख़त्म करने की कोशिश में शुरू से ही रहा है . कुछ सूचना आयुक्तों के रवैये से ऐसा लगता है कि कहीं इस कानून की लुटिया ही न डूब जाए. कई महीने इंतजार के बाद भी मांगी गयी सूचनाएं नहीं मिलाती या फिर अधूरी और भ्रामक मिलाती है . उसके बाद भी यदि कोई आवेदक सूचना आयोग में जाने की हिम्मत भी करता है , तब भी कई आयुक्त प्रशासन के खिलाफ कोई करवाई नहीं करते . कुल मिलकर मानना ही होगा की हम तमाम कोशिशों के बाबजूद आज भी उसी जगह खड़े है , जहाँ दशक पहले खड़े थे. क्या हम मान लें की क्रांतिकारियों की कुर्बानियां बेकार हुई जिनके लिए आजाद हिंदुस्तान से आजादी के बाद वाला हिंदुस्तान ज्यादा महत्वपूर्ण था . प्रश्न है की "क्या क्रांतिकारियों को दी गयी यातनाएं उन्हें झुका पाई ? ठीक उसी तरह हमारा उत्पीडन या कोई भी असफलता हमारे इरादों को नहीं तोड़ सकती है . सूचना अधिकार से जुड़े कार्यकर्त्ता इस अधिकार का और भी मजबूती से प्रयोग करेंगे क्योंकि यह देश हमारा है , सरकार भी हमारी है , इसलिए अपने घर को साफ रखने की जिम्मेवारी भी हमारी ही है. राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने कहा था की सरकारी व्यवस्था से भ्रष्टाचार और लालफीताशाही दूर कर बेहतर शासन हासिल करना भारत का सपना रहा है और आरटीआई कानून के व्यापक एवं सजग इस्तेमाल के जरिए इसे हकीकत में बदला जा सकता है. सरकार से सवाल पूछने का अधिकार पहले सांसदों और विधायकों को था , वह इस कानून ने हर आम नागरिक को दे दिया है. राष्ट्रपति ने कहा था की लोकतंत्र में सरकार जनता की होती है . जनता जब चाहे , उसे हर योजना की तरक्की के बरे में सही - सही जानकारी मिलनी चाहिए. आरटीआई ने यह तो मुमकिन कर ही दिया है . इस कानून के व्यापक और सजग इस्तेमाल से देश को भ्रष्टाचार और लाल फीताशाही से मुक्त करने का सपना भी पूरा हो सकता है बशर्ते की इसका इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ हो. आरटीआई कानून ने भारत को एक आदर्श लोकतंत्र बनने की दिशा में गति तेज करने का कार्य किया है . भारत में यह कानून लागू होने के बाद नेपाल, बंगलादेश तथा भूटान ने भी इसे अपने यहाँ लागू किया है. लोकतंत्र में जनता की भागीदारी के लिए पारदर्शिता एवं जबाबदेही की मांग के अभियान को और अधिक गतिशील करने हेतु आरटीआई से सम्बंधित कई पुस्तकें अब बाजार में उपलब्ध हैं . जनहित में इसको पढ़ने, पढ़ाने एवं और अधिक प्रचारित- प्रसारित करने की आवश्यकता है . (लेखक आरटीआई के कार्यकर्त्ता हैं एवं यह उनके निजी विचार हैं.) GOPAL PRASAD (RTI Activist) House No.210, St. No.3, Pal Mohalla, Mandawali, Delhi-110092. Mobile:9289723144 E-Mail : gopal.eshakti@gmail.com sampoornkranti@gmail.com Blog : http://sampoornkranti.blogspot.com

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

हिंदुत्व के सर्वांग का प्रतिबिम्ब है सनातन पंचांग

सनातन संस्था चेन्नई द्वारा प्रकाशित वार्षिक सनातन पंचांग केवल पंचांग ही नहीं है अपितु हिंदुत्व के सर्वांग का प्रतिबिम्ब है. पंचांग के मुखपृष्ठ ईश्वरीय राज्य हिन्दू राष्ट्र के मूलतत्व (धर्मनिष्ठ, नीतिमान, निर्भय, राष्ट्राभिमानी) के बुनियाद पर जाति - प्रान्त त्यागकर धर्मबंधुत्व जाग्रत करने एवं राष्ट्रधर्म उत्कर्षार्थ हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का सन्देश दिया गया है.
अधर्माचरण, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, राष्ट्रद्रोह के अवरोधों को नकारते हुए हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा का सन्देश जोशपूर्ण अंदाज में मुखपृष्ठ पर छपा है . देवताओं के सात्विक चित्र , धार्मिक त्यौहार की जानकारी के साथ-साथ धर्म जागृतिप्रद मार्गदर्शन सभी पृष्ठों पर प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है. इस पंचांग में मकर सक्रांति पर तिल का प्रयोग व इस अवसर पर दान देने की परम्परा का भी बोध कराया गया है. सनातन संस्था एवं एस. आर. एफ. (आस्ट्रेलिया) के संयुक्त तत्वाधान में कार्यान्वित प्रकल्प की वेबसाइट www.spiritualresearchfoundation.org जिसका मूल उद्देश्य रोगों के लिए मूलभूत आध्यात्मिक कारणों पर करने योग्य उपाय, नैसर्गिक आपत्ति, मृत्यु उपरांत के जीवन आदि विषय पर आध्यात्मिक शोध व अखिल मानवजाति के लिए उपयुक्त साधना विषयक मार्गदर्शन भी इस पंचांग में दिया गया है.
चार सहस्त्र लोगों में एक शौचालय, अन्न-जल जैसी सुविधाओं के आभाव से ग्रस्त विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं की नरक यातना को '' हिन्दू जनजागृति समिति'' द्वारा छायाचित्र प्रदर्शनी के माध्यम से जनप्रबोधन की जानकारी भी दी गयी है. इसके अनुसार 19 जनवरी 1990 के दिन धर्मांध आतंकवादियों ने कश्मीरी हिन्दुओं को ''धर्मान्तर करो या मरने के लिए तैयार हो जाओ या अपनी स्त्रियों को यहीं रखकर चले जाओ'' जैसी धमकी दी जाने ओ अपनी रक्षा हेतु कश्मीर से निकले साढ़े चार लाख हिन्दुओं के 22 वर्षों से जम्मू और दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में यातनामय जीवन बिताने की सनसनीखेज सच्चाई को उजागर किया है.

अभाविप से प्रेरित रहें हैं, आरटीआई कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद

शैक्षिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय समस्याओं पर किया लोक जागरण, लोकशिक्षण और लोकसंघर्ष के प्रयासों से ही ज्ञान-शील-एकता की साधना पथ पर चलने की प्रेरणा, वास्तव में हमें अखिल भारतीय परिषद् से मिली है. वर्ष 1987 - 89 में दरभंगा (बिहार) में इस संगठन से जुड़कर हमने काफी कुछ सीखा . हमारे आन्दोलन सहकर्मी राजेश अग्रवाल वर्तमान में बखरी (बेगुसराय) के हिंदुस्तान संवाददाता है. सहरसा कॉलेज में मैथली के विभागाध्यक्ष डा.रामनरेश सिंह जिनके माध्यम से हमने वाद- विवाद और भाषण कला सीखा, वे बाद में अभाविप के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के ध्येय से न हटते हुए निरंतर उसी दिशा में बढ़ने तथा व्यक्ति परिवर्तन से समाज परिवर्तन की सीख भी हमने हमें इसी परिवार से मिली है. उस वक्त हमने हजारों, लाखों विद्यार्थियों तक पंहुचने और उनको सामाजिक कार्य हेतु आह्वान करने का कार्य किया. व्यापक जनसंपर्क अभियान चला कर अभाविप को समाज में सर्वव्याप्त करने का प्रयास किया था परन्तु आज उसी संगठन की प्रेरणा पाकर विगत तीन वर्षों से '' एक आन्दोलन देश के लिए : सूचना का अधिकार क्रांति'' की उन्मुख हुआ. इस अवधि में केंद्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों ने तीन हजार से अधिक आर टी आई फ़ाइल कर चुका हूँ. हमारा मुख्य उद्देश्य जनता को मिले अधिकार को जन -जन तक पंहुचाना, उस के माध्यम से संपूर्ण क्रांति का आह्वान करना है. विभागों में आरटीआई के माध्यम से सूचना निकालकर विभागीय नाकामियों व भ्रष्टाचार को उजागर करना ही नहीं बल्कि समाज को जागरूक बना कर उसे वास्तविकता का एहसास दिलाना ही हमारा एक सूत्री कार्यक्रम है. कार्य कठिन तो है परन्तु असंभव नहीं. व्यवस्था परिवर्तन हेतु जनजागरूकता एवं पारदर्शिता और संवाद के साथ-साथ समन्वय भी आवश्यक है. हमें गर्व है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के बाद अखिल भारतीय साहित्य परिषद् से भी जुड़ने का मौका प्राप्त हुआ. मातृभाषा मैथिली व मातृभूमि दरभंगा के विकास के लिए कर्मक्षेत्र दिल्ली से ही अनेक सपने संजोये हैं. हमें अभिमान है कि अखिल भारतीय साहित्य परिषद् में श्री सूर्यकृष्ण , श्री श्रीधर पराडकर, डा. बलबंत भाई जानी, डा. कृष्णचंद गोस्वामी, डा. रीता सिंह, डा. कांता शर्मा, अनिल मित्तल आदि का सानिध्य प्राप्त हुआ. जिनके कार्यप्रणाली से प्रेरित होकर हमने कुछ अलग एवं प्रभावी प्रकल्प पर कार्य करने की ठानी. स्वाधीनता के पश्चात् अपने भारत देश की हजारों वर्षों की गौरवशाली एवं वैभव संपन्न परम्पराओं को ध्यान में रख कर उसे पुनः आधुनिक, विकसित एवं परिस्थितिजन्य दोषों से मुक्त करने का सपना सारा देश देख रहा था. ऐसे ही कुछ युवाओं ने इन सपनों को साकार करने के लिए देश के महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय परिसरों को अपना केंद्र बनाकर अखिल भारतीय परिषद् ABVP के नाम से गतिविधियाँ प्रारंभ की.फिर ये यात्रा रुकी नहीं , अनंत बाधाएँ जरूर आई , निरंतर पीढीयाँ बदली, परन्तु कार्य निरंतर छः दसकों से बढ़ता जा रहा है. हर पीढी में संख्यात्मक वृद्धि ,विस्तार गतिविधियाँ और विशेषकर देशभक्ति का जज्बा एवं समाज के प्रति आत्मीयता अधिकाधिक उभरती जा रही है तथा संकल्प दृढ होता जा रहा है. यह धारा तो आगे बढ़ेगी , अधिक विस्तृत , अधिक तेज तथा और अधिक कल्याणकारी बनती जाएगी . उस धारा को गंगा की भांति समझाना ठीक होगा ताकि पूरा समाज इसके महत्त्व को पहचाने , तथा यह प्रभावी रूप से बिना कोई रूकावट के प्रवाहित रहे , यही वर्तमान समय की मांग है.
देश एवं समाज के हित में सार्थक कार्य करना है तो दलगत राजनीति एवं विध्वंसक मार्गों को छोड़कर रचनात्मक कार्य करना ही योग्य है ,आन्दोलन भी होंगे लेकिन उनका उद्येश्य रचनात्मक होना आवश्यक है.अतः इस निष्कर्ष पर आया कि आरटीआई को ही वर्तमान समय के सर्वोत्तम मार्ग के रूप में स्वीकार किया जाए . यह एक लम्बी श्रृंखला बन गयी , जिसने आम छात्रों को महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय परिसरों में अच्छा माहौल प्रदान किया , यह मौका उनके लिए प्रेरक व् दिशादर्शक बन गया . सैकड़ों ऐसे कार्यकर्त्ता जिन्होंने इस कार्य को आगे बढाया वे स्वयं भी सार्वजानिक जीवन के लिए वरदान साबित हुए हैं . बहुत ऐसे विद्यार्थी एवं युवा हैं जो देश के लिए कुछ करने के लिए तैयार हैं , बस जरूरत उनको अवसर प्रदान करने भर की है .
भारत के उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश श्रीमान बालकृष्णन कुछ दिन पूर्व केरल के निजी चैनल से वार्तालाप कर रहे थे.संवाददाता ने उनसे जनहित याचिकाओं के बारे में पूछा,तो उनका जबाब था की अधिकतम याचिकाओं में तथ्य एवं अध्ययन का अभाव एवं नकारात्मकता रहती है , परन्तु अभी एक सकारात्मक , अध्ययनपूर्ण एवं पीड़ितों को न्याय देने के उद्देश्य से याचिका आई है. इस में विशेष बात यह है की यह याचिका छात्र संगठन " अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् "ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति छात्रावासों के सर्वे के आधार पर उन्हें न्याय देने के उद्येश्य से दाखिल की थी.
आज देश आगे बढ़ाना चाहता है , सभी क्षेत्र में शीर्ष पर आना चाहता है . हर युवा प्रयास कर रहा है, देश के लिए छोटी सी उपलब्धि पर भी लोग खुशी मनाना चाहते हैं . कल्पना चावला का आकाशयान में सहभाग हो या भारत की मिसाईल क्षेत्र की प्रगति हो. डा.ए.पी.जे.कलाम जैसा वैज्ञानिक ऐसी ईच्छाओं की पूर्ति करनेवाला प्रतीक बनकर पेरणास्पद आदर्श बन कर उभर आता है. अ.भा.वि.प. ऐसा सपना देखने के लिए प्रेरित करती है, सहायक बनती है. अब बदली दुनिया में भारत के युवा काफी कुछ कर सकते हैं . आर्थिक दृष्टि से संपन्न होना , यह एक स्वाभाविक ईच्छा सभी के मन में है. दुनिया में जितनी बातें हैं वह सब कुछ पाने की ईच्छा है . दुनिया की सभी सुविधा भारत में हो , मेरे जीवन में भी वह आए यह विचार भी प्रबल है . यह विचार भी जरूरी समझा जा रहा है की हमारी पहचान क्या है ? क्या हम एक गरीब , पिछड़े देश के लोग हैं या भविष्य के सबसे संपन्न एवं प्रभावशाली देश के लोग हैं . दूसरों की कृपा पर जीने वाले देश के लोग है या स्वयंसिद्ध देश के लोग हैं. अपनी बुद्धि से व्यक्तिगत कुछ पाकर दूसरे का विकास करनेवाले लोग हैं या स्वयं कष्ट सहकर अपने देश को विकसित करनेवाले हैं . ऐसे कई प्रश्न हमारे नौजवानों के मन में आते हैं . हमारे देश के रीति- रिवाज , परम्पराएं भी काफी शालीन हैं जो दुनियां के लिए भी अनुकरणीय हैं. क्या हमारे लिए आधुनिक समय में इनके साथ चलाना संभव है?
भारत के नौजवानों ने आजादी के आन्दोलन में महती भूमिका निभाई . अब उन्हें देश को आगे बढ़ने में रचनात्मक भूमिका भी निभानी है. कई नई अच्छी परम्पराएं भी स्थापित करनी होगी. भारत को भारत रहना है तो अपने तरीके ढूँढने होंगे . अपने स्वाभाव व स्वधर्म के अनुरूप भविष्य की गतिविधियाँ निश्चित करनी होंगी और यह प्रयास कोई सरकार या किसी एक संगठन के करने से पर्याप्त नहीं होगा , सभी को शामिल होना होगा . कोंई देश तभी विकास की तरफ बढ़ पता है , जब उसकी युवा शक्ति सक्रिय होती है. डा. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम अपनी पुस्तक "तेजस्वी मन" में लिखते हैं ( कौन सी बातें है जो हमसे छूट रही है? कौन सी बात है जो ठीक करना जरूरी है? समस्या हमारी सोंच में है. हम स्वयं के स्वार्थ की पूर्ति में धन्य मानने की प्रवृति से निकल नहीं पाते.
व्यक्तिगत जीवन में संयमित साधनों से संतुष्टि सराहनीय है लेकिन देश व समाज को तो आगे बढ़ाना ही चाहिए परन्तु कई बार होता विपरीत है . हम देश के बारे में तो ज्यादा सोंचते नहीं लेकिन व्यक्तिगत साधन जुटाने में पूरी शक्ति लगा देते हैं . हम सभी देश के विकास में अपनी थोड़ी- थोड़ी शक्ति भी लगा देंगे तो , देश तेज गति से आगे बढेगा तथा हर प्रकार के लोगों को खुशहाली भी मिलेगी. हमें खुशी से जीना है तो देश की व्यवस्थाएं ठीक रखनी होगी . सामान्य रूप से साक्षरता की भी समस्या आप लेते हैं तो, यह निरक्षरता कितने करोड़ लोगों के जीवन को दुर्बल व पराबलम्बी कर देती है. उनके जीवन को कितना संकटमय बना देती है . जिस देश में करोड़ो ऐसे लोग हों उसे हम कैसे विकसित कर सकते है? सरकारी तंत्र पर निर्भर रहकर क्या कभी यह समस्या हल होगी ? संभव नहीं लगता क्योंकि शासन पर जनता ऐसी दबाब ही नहीं बना पाती जो या तो अनपढ़ हो या अनपढ़ों के प्रति उदासीन हो . हमारे देश का युवा अगर संकल्प लेकर प्राथमिकता से इसके समाधान में जुट जाए , तो सरकारी तंत्र भी सक्रिय होकर कार्य करना प्रारंभ कर देगा . देश में बहुत सारे मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल खुलने जा रहें हैं लेकिन हमारे अच्छे डॉक्टर मिलकर भी स्वास्थ्य व्यवस्था एवं स्वास्थ्य के स्तर को ऊपर उठाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं .ऐसे प्रेरित डॉक्टर समाज को चाहिए जो इस दिशा में कुछ कार्य करें , तभी देश विकसित होगा. ऐसे कई प्रकार से जितना हम सोचते हैं , तो एक बात एकदम स्पष्ट हो जाती है कि महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय परिसरों में ऐसा वातावरण उत्पन्न होना जरूरी है कि हमारे छात्र , परिसरों में एवं बाहर निकलने के पश्चात देशभक्ति एवं समाज के प्रति आत्मीयता से ओतप्रोत होकर अपने क्षेत्र में कार्यरत रहें तथा उस क्षेत्र का नेतृत्व करें. हमारे देश में हर व्यक्ति को रोटी , कपड़ा , माकन शिक्षा एवं चिकित्सा जैसी प्राथमिक सुविधाएँ प्राप्त हों तथा सामाजिक सम्मान और आगे बढ़ने का सामान मौका भी मिल सके ऐसा माहौल रहे . व्यवस्थाएं ऐसी हों जिसमें सभी को न्याय मिले . यह देश वैभवशाली बनने के साथ ही रक्षा कि दृष्टि से संपन्न बने . समाज में सामाजिक व व्यक्तिगत जीवन मूल्यों एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति कि रक्षा हो . ऐसे परस्पर स्नेहपूर्ण एवं पूरक भाव रखनेवाला समाज जो विश्वबंधुत्व का भाव रखता हो तथा साथ में अपनी मातृभूमि हेतु जीने मरने के लिए लालायित हो इस राष्ट्र के लिए आवश्यक है. यह राष्ट्र तो पुराना है लेकिन पूर्वजों के अमूल्य ज्ञान की रक्षा करते हुए हमें आधुनिक एवं संपन्न बनाना है . सामाजिक कुप्रथाएँ एवं गलत परम्पराओं से आनेवाली पीढी को मुक्त रखने का समाज का संकल्प ले, ऐसा वातावरण अपेक्षित है .
परिषद् ने अपने स्थापना कल से ही एक छात्र संगठन के रूप में विभिन्न प्रकार से अपना दायित्व निभाना प्रारंभ किया . जैसी देश व समाज कि आवश्यकता हो , वैसे परिषद् के कार्यकर्त्ता कार्य में जुटे रहे . साथ ही हजारों छात्रों का समय- समय पर जागरण किया व उन्हें भी ऐसे कार्य में सहभागी होने का आह्वान किया .विद्यार्थी परिषद् के सभी कार्यकर्त्ता भी भाग्यशाली हैं कि उन्हें स्वाधीन भारत में देश के लिए कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ है . कई संगठन आए और बिखर गए विवादस्पद हुए या दिशाहीन हो गए परन्तु विद्यार्थी परिषद् गत 60 बर्षों से सतत अपने कार्य में निष्ठापूर्वक लगी है . परिषद् में भी कई पीढीयाँ बदल गयी लेकिन उसी उत्साह एवं निष्ठा से हर पीढी के छात्र कार्य करते रहे हैं . इसी का परिणाम है कि बीते बर्षों में संगठन का विस्तार भी हुआ तथा प्रभाव एवं विश्वसनीयता में सतत वृद्धि गत 60 बर्षों में होती रही . आज परिषद् के कार्यकर्त्ता वे वर्तमान हों या पूर्व सभी इस संगठन पर गर्व कर सकते हैं तथा आज भी संगठन उनके लिए प्रेरणास्पद है . विद्यार्थियों के लिए कई निराशाओं के बीच विद्यार्थी परिषद् जैसा नौजवानों का संगठन आशा एवं विश्वास का कारण बना है . यही कारण है कि लगातार देश के कोने में छात्रो ने परिषद् कार्य को भारी पतिसाद दिया ,उसमें सहभागी हुए, समर्थक बने तथा समाज भी लगातार तन -मन-धन से ऐसे कार्य का खुलकर सहयोग कर रहा है . इसीलिए विद्यार्थी परिषद् का कार्य देश के हर हिस्से में पहुंचा है एवं प्रभावी होता जा रहा है. परिषद् का कार्य किसी लहर , राजनैतिक सत्ता , धनबल, बाहुबल , आकर्षक नारे एवं घोषणा या झूठे प्रचारों के आधार पर नहीं बढ़ा है अपितु हजारों कार्यकर्ताओं के परिश्रम , निष्ठा, कष्ट एवं कर्तव्य तथा बलिदान के आधार पर बढ़ता गया है . इसलिए 60 बर्ष पूर्ति पर हमें उन्हें याद करना जरूरी है , जिन्होंने भारत माता की जय, वन्दे मातरम के नारों को साकार करने में अपने श्रम , धन तथा आवश्यकता पड़ने पर प्राण भी न्योच्छावर कर दिए. ऐसे लोगों की नींव पर खड़ा होने से ही यह संगठन मजबूत एवं विश्वसनीय बना है. देश व समाज पर जब भी किसी प्रकार की विपत्ति आई तो परिषद् के कार्यकर्त्ता सीना तानकर खड़े हुए व सभी प्रकार से परिस्थिति से डटकर मुकाबला किया. "पहले देश की सुरक्षा , देशवासियों के दुखदर्द की चिंता महत्वपूर्ण है "- इसी सूत्रवाक्य को हमने सूचना के अधिकार आन्दोलन का मुख्य आधार बनाया है.
(लेखक सूचना के अधिकार कार्यकर्त्ता हैं )

भारतीय संस्कृति में कला का प्रभाव - गोपाल प्रसाद

जिस भारतीय संस्कृति ने कभी सम्पूर्ण विश्व में अपना वर्चस्व स्थापित किया था, उस संस्कृति की स्वर्णिम सम्पदा का संरक्षण, प्रसारण तथा प्रचारण आधुनिक युग की महत्वपूर्ण आवश्यकता है. भौतिकवाद के विश्वव्यापी विकास के बाद आज सारी दुनियां को पुनः सांस्कृतिक मूल्यों की आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा है. वैसे भारत में विषम परिस्थितियों से टकराने के बावजूद आज भी संस्कृतिक परम्पराएं जीवित हैं और उनमें से अनेक भारतीय परम्पराएँ आधुनिक विश्व के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.
सर्वविदित है कि भागीरथ कठोर तपस्या करके पतितपावनी गंगा को पृथ्वी पर लाये थे. भागीरथ से पूर्व मनके पूर्वज अंशुमान तथा सगर भी प्रयत्न करते रहे थे. इसी प्रकार भरत ने कठोर तप करके गायन, वादन, नर्तन की त्रिवेणी को सार्वजानिक कल्याण के लिए लोक में प्रवाहित किया. कला की इस सुधामय सरिता ने लोकहृदय को आह्लाद और आनंद से लवरेज कर दिया. धर्म, जाति, वर्ग तथा प्रान्त के भेड़ों को भूलकर सारा लोक बरातों की इस भागीरथी में आनंद के महोत्सव मनाने लगा. भरतों ने सरे देश को सच्चे अर्थों में भावात्मक स्तर पर जोड़ा, क्योंकि भरतों की काला के स्रोत भाव और रसों से ही फूटे थे.
अंग्रेजों ने जिस विचारधारा को जन्म दिया, उसके पीछे उनकी चाल थी. वे दुनिया की सभ्यता को ईशा के जन्म के आस - पास जोड़ना चाहते थे. भारतीय प्राचीन ग्रंथों के सम्बन्ध में तो उनका दृष्टिकोण और भी संकीर्ण था. वे नहीं चाहते थे कि भारतवासियों को गुलाम बना कर, गुलामों कि सभ्यता को अपनी सभ्यता से बेहतर सिद्ध होने दें, इसलिए लार्ड मैकाले ने अपने शिष्य मैक्स मूलर से भारत के संस्कृत ग्रंथों का समय बहुत बाद का घोषित कराया. खास बात यह भी है कि अन्य विद्वानों ने मैक्स मूलर की बात को प्रमाणिक मान लिया.
आज यह समस्या और भी जटिल हो गयी है क्योंकि आज देश या विदेश में नाट्यशास्त्र की जो भी पांडुलिपियाँ प्राप्त है उनमें 500 वर्ष से अधिक पुरानी कोई पाण्डुलिपि नहीं है. इससे पूर्व की सारी पांडुलिपियाँ जाने कब और कैसे विनष्ट हो चुकी है.वेद भारत के प्राचीन एवं महत्वपूर्ण ग्रन्थ होते हुए भी भारत में भावात्मक एकता स्थापित करने का काम नहीं कर सके. वेद द्विजातीय थे. अतः उन्होंने सवर्णों और अवर्णों के बीच एक दीवार खींच दी, दूसरे वे धर्मग्रन्थ थे. अतः केवल धार्मिक जनता के आराध्य थे, जो धर्म की मर्यादा को सर्वोपरि मानते थे. देश के अनाड़ियों ने वैदिक यज्ञ विधान को कभी स्वीकार नहीं किया. महर्षि पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण कि रचना की. वह देश में इतनी लोकप्रिय हुई उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम तक उनकी व्याकरण को स्वीकार किया गया. इसका कोई भी विकल्प विद्वान लोग तब से आज तक नहीं खोज पाए. इस दृष्टि से वेदों कि तुलना में पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का प्रभाव देश को एकसूत्र में बांधने कि दिशा में अधिक सार्थक सिद्ध हुआ, किन्तु व्याकरण का सम्बन्ध भी देश के शिक्षित वर्ग से था. लोग के सामान्य प्राणियों को न संस्कृत से मतलब था और न उसकी व्याकरण के नियमों से. इस दृष्टि से नाट्यशास्त्र का महत्व सर्वोपरि है. उसने वर्ण और वर्ग की दीवारों को तोड़ कर शिक्षित और अशिक्षितों का फासला मिटा कर, एक ऐसी लोकरंजनकारी काला को जन्म दिया, जिसका सम्बन्ध राजा से लेकर प्रजा तक था, आचार्य से लेकर शिष्य तक था, अभिजात्य वर्ग से लेकर अशिक्षित वर्ग तक था. वैदिक परम्परा ने कालांतर में शैव, शाक्त, बौद्ध तथा जैन धर्म को मानने वालों के बीच एक दीवार खरी करके अपने को एक वर्ग विशेष तक सीमित कर दिया, इसी प्रकार अन्य धर्मों तथा मतों के मनाने वालों में भी एक दुसरे के प्रति कभी सहिष्णुता तथा स्नेह नहीं हो सका. वही नाट्यशास्त्र में शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन तथा अन्य मतों को मानने वालों को एक सूत्र में बांध दिया. गायन, वादन, नर्तन के प्रदर्शन के समय सरे मतावलंबी एक साथ बैठ कर इनका आनद लेते थे. और आज भी लेते है.
भरतों ने भारतीये संस्कृति के रचनात्मक पक्ष को सुदृढ़ करने में असाधारण और अद्वितीय योगदान दिया है. वर्ण व्यवश्ता के कठोर कल में भरतों ने शूद्रों के अधिकार के रक्षा हेतु ''पंचम'' वेद कि सृष्टि की. भरतों कि महानता इसमें थी कि भरतों की महानता इसमें थी कि उन्होंने सवर्णों की न निंदा की और न उनके प्रतिकूल कोई आचरण किया. भरतों ने सवर्णों के विरुद्ध एक ललित आन्दोलन छेड़ा. एक नए आधार को ग्रहण कर लोक की चित्तवृति को कलात्मक सौदर्य की ओर आकर्षित किया. उनकी कला सम्पदा के लालित्यपूर्ण वैभव ने जन - मन के ह्रदय पर सहज ही अधिकार कर लिया और समाज का हर छोटा वर्ग उनकी कला का प्रेमी हो गया . बिना भेद- भाव के समाज के हर वर्ग का प्राणी उनका प्रशंसक बन गया . उस युग की परिस्थितियों में यह कोई छोटा कम नहीं था . भारतों का यह प्रयास इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है . भारतों का यह उपकार इस देश की संस्कृति पर एक ऋण है, जिसे आज सांस्कृतिक क्षेत्र के लोगों को चुकाना है . भारतों का यह प्रयास आज के आदमी के लिए एक आदर्श प्रेरणा है , जिसके द्वारा देश को भावात्मक सूत्र के द्वारा पुनः जोड़ा जा सकता है.
धर्म और भाषाओँ ने मनुष्य को संकीर्णता के घेरे में बंधकर उसे छोटा किया है. कला ने विभिन्न धर्मों के माननेवालों को एक मंच पर एकत्रित किया है. कला के क्षेत्र में अमजद खां , इलियाज़ खां हिन्दुओं के समारोहों में मुस्कुराते हुए जाते हैं और पंडित जसराज , राम्च्तुर्मल्लिक, पंडित भीमसेन जोशी मुसलमानों के उर्स में सज्जा पेश करने जाते हैं . भावात्मक एकता का इससे बड़ा उदहारण और क्या हो सकता है?
कला की लालित्यपूर्ण अभिव्यक्ति की परंपरा भारतीय चित्रकला में भी उतारकर आयी. भारतीय चित्रकला ने तो न केवल नाट्यशास्त्र में वर्णित करणों और अन्गहारों से प्रेरणा ली अपितु शास्त्र में वर्णित अन्य विषयों को भी समाहित किया . राजपूताना शैली की चित्रकला देखें अथवा कांगड़ा शैली की , किशनगढ़ शैली को देखें अथवा पहाड़ी शैली की या मुग़ल शैली की, सभी में नायक- नायिकाओं के मनोरम चित्रण किए गए हैं . इनकी पृष्ठभूमि में सौन्दर्य की किरणें फैलानेवाला ग्रन्थ भारतों का नाट्यशास्त्र ही है.
भारत की धातु कला पर भी नाट्यशास्त्र का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देता है. धातु निर्मित प्राचीन मूर्तियों में चाहे नटराज शंकर की मूर्ति हो अथवा नृत्य करते गणेश की. रमणियों की मूर्ति हो या किसी अन्य की . उनमें कलात्मक सौन्दर्य की छटा दिखाई देती है . मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त नर्तकी की मूर्ति इस कथन की सत्यता का उदहारण है. आज तक धातु की बनी वस्तुओं पर खुदाई से जो कलात्मक भावपूर्ण आकृतियाँ बनाई जाती है, उनपर प्राचीन मूर्तिकला का प्रभाव है और प्राचीन मूर्तिकला नाट्यशास्त्र से प्रभावित है. मूर्तियों का लयात्मक विन्यास तथा कलात्मक सज- सज्जा हमें उसी परंपरा से जोड़ती है . इस दृष्टि से देखा जय तो भारतों के नाट्यशास्त्र ने सरे देश को काव्य , गायन, वादन, नर्तन, शिल्प के माध्यम से भावात्मक एकता के सूत्र में जोड़ा है. भारतों की कला सृष्टि इतनी सशक्त , सौदार्यशाली और कमनीय थी की देश के प्रत्येक क्षेत्र के साधकों के लिए वह अपरिहार्य बन गयी . लोगों को लगा की जैसे उसके प्रयोग के बिना उनकी कला अपांग और अपूर्ण रह जाएगी . अतः सारे देश ने एक सिरे से दूसरे सिरे तक उसे बिना भेदभाव के ग्रहण किया और देश में एकरूपता का जयघोष किया .
नवचेतनावादी वर्ग के लोगों की बुद्धि जैसे -जैसे समय के साथ प्रौढ़ होती गयी, उनके अनुभव और दृष्टिकोण में अंतर आने लगा , उन्होंने रस की सत्ता को स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया . रस का अर्थ है - मन को अच्छा लगनेवाला या यों कहें की किसी रचना में निहित उसका सौन्दर्य और उस सौन्दर्य की अभिव्यक्ति की प्रक्रिया . अब पुनः वह समय आ गया जब रस के महत्त्व को लोग मानने लगे हैं. इधर भारतीय पुरातन संस्कृति के प्रति पुनः सारे देश में जागरण की लहर दौड़ चुकी है. लोगों की मानसिकता में बहुत अंतर उत्पन्न हो गया है. अब लोग विदेश की आयातित परम्पराओं से उबकर भारत की पुरातन स्वर्णिम सम्पदा से जुड़ने लगे हैं.