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Showing posts from April, 2012

आरटीआई से ख़त्म हो सकता है भ्रष्टाचार और लालफीताशाही : गोपाल प्रसाद

सरकार, सरकारी योजनाएं और तमाम सरकारी गतिविधियाँ हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. आम आदमी से जुदा कोई भी मामला हो, प्रसाशन में बैठ कर भ्रष्ट, लापरवाह या अक्षम अधिकारियों के कारण सरकारी योजनाएं सिर्फ कागज का पुलिंदा बनकर रह जाती है. सन 1947 में मिली कल्पित आजादी के बाद से अब तक हम मजबूर थे, व्यवस्था को कोसने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे. परन्तु अब हम मजबूर नहीं है क्योंकि आज हमारे पास सूचना के अधिकार नामक औजार है, जिसका प्रयोग करके हम सरकारी विभागों में अपने रुके हुए काम आसानी से करवा सकते हैं. हमें सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की बारीकियों को पढ़ कर समझना और सामाजिक क्षेत्र में इसको अपनाना होगा. इस अधिनियम के तहत आवेदन करके हम किसी भी बिभाग से कोई भी जानकारी मांग सकते हैं और अधिकारी/विभाग मांगी गई सूचना को उपलब्ध करवाने हेतु बाध्य होगा यही बाध्यता/जवाबदेही न केवल पारदर्शिता के गारंटी है बल्कि इसमें भस्मासुर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार का उन्मूलन भी निहित है. यह अधिनियम आम आदमी के लिए आशा की किरण ही नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी लेकर आया है. इस अधिनियम रूपी औजार का प्रयोग …

हिंदुत्व के सर्वांग का प्रतिबिम्ब है सनातन पंचांग

सनातन संस्था चेन्नई द्वारा प्रकाशित वार्षिक सनातन पंचांग केवल पंचांग ही नहीं है अपितु हिंदुत्व के सर्वांग का प्रतिबिम्ब है. पंचांग के मुखपृष्ठ ईश्वरीय राज्य हिन्दू राष्ट्र के मूलतत्व (धर्मनिष्ठ, नीतिमान, निर्भय, राष्ट्राभिमानी) के बुनियाद पर जाति - प्रान्त त्यागकर धर्मबंधुत्व जाग्रत करने एवं राष्ट्रधर्म उत्कर्षार्थ हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का सन्देश दिया गया है.
अधर्माचरण, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, राष्ट्रद्रोह के अवरोधों को नकारते हुए हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा का सन्देश जोशपूर्ण अंदाज में मुखपृष्ठ पर छपा है . देवताओं के सात्विक चित्र , धार्मिक त्यौहार की जानकारी के साथ-साथ धर्म जागृतिप्रद मार्गदर्शन सभी पृष्ठों पर प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है. इस पंचांग में मकर सक्रांति पर तिल का प्रयोग व इस अवसर पर दान देने की परम्परा का भी बोध कराया गया है. सनातन संस्था एवं एस. आर. एफ. (आस्ट्रेलिया) के संयुक्त तत्वाधान में कार्यान्वित प्रकल्प की वेबसाइट www.spiritualresearchfoundation.org जिसका मूल उद्देश्य रोगों के लिए मूलभूत आध्यात्मिक कारणों पर करने योग्य उपाय, नैसर्गिक आपत्ति…

अभाविप से प्रेरित रहें हैं, आरटीआई कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद

शैक्षिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय समस्याओं पर किया लोक जागरण, लोकशिक्षण और लोकसंघर्ष के प्रयासों से ही ज्ञान-शील-एकता की साधना पथ पर चलने की प्रेरणा, वास्तव में हमें अखिल भारतीय परिषद् से मिली है. वर्ष 1987 - 89 में दरभंगा (बिहार) में इस संगठन से जुड़कर हमने काफी कुछ सीखा . हमारे आन्दोलन सहकर्मी राजेश अग्रवाल वर्तमान में बखरी (बेगुसराय) के हिंदुस्तान संवाददाता है. सहरसा कॉलेज में मैथली के विभागाध्यक्ष डा.रामनरेश सिंह जिनके माध्यम से हमने वाद- विवाद और भाषण कला सीखा, वे बाद में अभाविप के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के ध्येय से न हटते हुए निरंतर उसी दिशा में बढ़ने तथा व्यक्ति परिवर्तन से समाज परिवर्तन की सीख भी हमने हमें इसी परिवार से मिली है. उस वक्त हमने हजारों, लाखों विद्यार्थियों तक पंहुचने और उनको सामाजिक कार्य हेतु आह्वान करने का कार्य किया. व्यापक जनसंपर्क अभियान चला कर अभाविप को समाज में सर्वव्याप्त करने का प्रयास किया था परन्तु आज उसी संगठन की प्रेरणा पाकर विगत तीन वर्षों से '' एक आन्दोलन देश के लिए : सूचना का अधिकार क्रांति'' की उन्मुख हुआ. इ…

भारतीय संस्कृति में कला का प्रभाव - गोपाल प्रसाद

जिस भारतीय संस्कृति ने कभी सम्पूर्ण विश्व में अपना वर्चस्व स्थापित किया था, उस संस्कृति की स्वर्णिम सम्पदा का संरक्षण, प्रसारण तथा प्रचारण आधुनिक युग की महत्वपूर्ण आवश्यकता है. भौतिकवाद के विश्वव्यापी विकास के बाद आज सारी दुनियां को पुनः सांस्कृतिक मूल्यों की आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा है. वैसे भारत में विषम परिस्थितियों से टकराने के बावजूद आज भी संस्कृतिक परम्पराएं जीवित हैं और उनमें से अनेक भारतीय परम्पराएँ आधुनिक विश्व के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.
सर्वविदित है कि भागीरथ कठोर तपस्या करके पतितपावनी गंगा को पृथ्वी पर लाये थे. भागीरथ से पूर्व मनके पूर्वज अंशुमान तथा सगर भी प्रयत्न करते रहे थे. इसी प्रकार भरत ने कठोर तप करके गायन, वादन, नर्तन की त्रिवेणी को सार्वजानिक कल्याण के लिए लोक में प्रवाहित किया. कला की इस सुधामय सरिता ने लोकहृदय को आह्लाद और आनंद से लवरेज कर दिया. धर्म, जाति, वर्ग तथा प्रान्त के भेड़ों को भूलकर सारा लोक बरातों की इस भागीरथी में आनंद के महोत्सव मनाने लगा. भरतों ने सरे देश को सच्चे अर्थों में भावात्मक स्तर पर जोड़ा, क्योंकि भरतों की काला के स्रोत…