शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

तिरंगे और संविधान का हो दिल से सम्मान ! : गोपाल प्रसाद


प्रधान मंत्री जी ! पिछले 60 साल से हर साल 26 जनवरी को हमारे देश में गणतंत्र  दिवस मनाया जाता है। ये किस लिए और क्यों मनाया जाता है, मैं आज तक नहीं समझ पाया। हर साल दिखावे के लिए सेना के सारे अस्त्र  और शस्त्र  का  प्रदर्शन किया जाता है .  हमारे अदने  से  पड़ोसी मुल्क पाक ने  पिछले 64 साल(1948 से अब तक) से हमारे नाक में दम कर रखा है .हमारी 78000 वर्ग किलोमीटर  जमीन पर कब्ज़ा है। विशेष तौर पर 1971 के लड़ाई  में बांगलादेश बनने के बाद उसका मकसद देश को अस्थिर करना है और वो अपने मकसद में कुछ हद तक कामयाब रहा है . चाहे 26/11का मुंबई हमला हो चाहे कारगिल हो।  सीधे युद्ध  में तो वो भारत से मुकाबला नहीं कर सकता  मगर इस छद्म /अघोषित युद्ध में वो भारत का सिरदर्द बनकर चुनौती  दे रहा है। उसके  हौसले  इतने  बढ़ गए  है  कि  संसद पर हमले  की भी जुर्रत कर दी,  मगर हम कुछ न  कर सके । पीओके से  उग्रवाद के ट्रेनिंग कैंप चला  रहा है। हम सब जानते हैं , मगर कुछ नहीं कर सकते और  अपनी  साख नहीं बचा पा रहे  हैं। हमें अमेरिका का मुंह देखना पड़ता है। संसद पर हमला होता है और ये गणतंत्र सम्प्रुभूता संपन्न देश कुछ नहीं कर सकता।  एक  कदम  आगे  बढ़  कर  कारगिल  जैसे  घटना को  अंजाम  दे  दिया और हमें  अपने जमीन  वापस लेने के  लिए कुरबानियाँ  देनी पड़ी और  हम  विजय  दिवस  मना रहे हैं .  ये कैसी विजय है?  अब तक 10 हजार से ज्यादा  भारतीय उसके द्वारा पोषित और प्रायोजित उग्रवाद से मर चुके हैं .   बेशक 1965 और 1971  के युद्ध में हमने उसे  धूल  चटा  दी  मगर  वो  आस्तीन  का  सांप  है।  हमारा सब से बड़ा दुश्मन दाउद वहां बैठा है . सारी दुनियां   जानती है , मगर हम  कुछ  नहीं कर सकते।बांगलादेश   बनने से हमें क्या मिला? एक और पडोसी  दुश्मन पैदा हो गया। जहाँ  से लगातार बांगलादेशी घुसपैठ जारी है।  हमारी सीमायें सुरक्षित नहीं है . ये घुसपैठिये देश के आम नागरिकों के साथ घुल मिल गए हैं . ये घुसपैठिये  बम धमाके करते हैं, अपराध करते हैं; मगर वोटों की राजनीति के कारण हम कुछ नहीं कर सकते। ये  हमारे देश के नेताओं का वोट बैंक है , जो हमारे लिए  चिंता का विषय है .हमें बार- बार चीख चीख कर कहना पड़ता है कि, कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है। हमारी  विदेश नीति हमलोगों को  समझ में नही आती। हमारी  आर्थिक नीतियां  अमेरिका तय करता है। 
बॉर्डर पर क्या हो रहा है यह  रक्षा मंत्री को पता नहीं। जब घुसपैठ होतीहै या  हमारी चौकियों पर कब्ज़ा होता है तब पता चलता है। कारगिल में क्या हुआ ? एक गडरिये ने बताया था पाकिस्तान ने बंकर बना लिए हैं।  1962 में चीन के साथ युद्ध में भारत के 1382 सैनिक शहीद हुए,  1696 लापता हुए, 1047 गंभीर रूप से घायल हुए एवं  3968 युद्ध बंदी बना लिए गए। चीन के 80 हज़ार सैनिकों  के आगे  भारत के मात्र 10 हज़ार सैनिकों को  मुंह की खानी पड़ी और हमें  बदनामी झेलनी  पड़ी। भारतीय सैनिकों के पास न तो ठण्ड से बचने हेतु बर्फ  में पहनने वाले जूते थे और  ना ही कपड़े . वास्तव में हमारी  तैयारी नहीं थी। हमें अपनी जमीन छोड़नी  पडी।  सेना का मनोबल गिरा वो अलग से।  हमारे सैनिक आज भी चीन के सामने टिक नहीं पाएंगे . तत्कालीन राष्ट्रपति  डॉ राधाकृष्णन ने नेहरु की नीतियों की कड़ी आलॊचना की थी . नेहरूजी  ने अपनी गलती तो मानी मगर ये नेहरुजी  की गफलत का नतीजा था,  जो देश आज भी भुगत रहा है।  समय-समय  पर सेना के अधिकारियों ने नेहरुजी  को चेताया था, मगर नेहरुजी  ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया और  वे मौज -मस्ती में डूबे  रहे और  विदेशी दौरों पर लगे  रहे  कहा मैंने मेनन  (रक्षामंत्री)  से कह दिया है, वो देख लेंगे .इस प्रकार  हम चीन से हार गए।  आज भी  चीन हर बात में हेकड़ी दिखाता है।  नेहरु जी का " आराम हराम है" कितने खोखले नारे और सिद्धांत थे ; यह हमें आज पता चल रहा है। । मरते दम तक नेहरुजी को उसका अफ़सोस रहा और इस हार के कारणों की समीक्षा के लिए कई कमिटियाँ  बनी और रिपोर्ट आये, मगर हमने सबक नहीं  लिया। आज भी हालात बहुत अच्छे नहीं है। जमीनी हकीकत कुछ और है।  सैनिको को सुख सुविधाएं  नहीं मिल रहे हैं।  हम नैतिक रूप से चीन का मुकाबला नहीं कर सकते।  सेना को चरित्र की जरूरत है।  देशप्रेम की   बातें  छलावा है।  वो सेना जो किसी भी देश के लिए गर्व की  बात होती है, आज वही हमारे  शासकों द्वारा उपेक्षित है . हमारे सैनिकों  को उचित सम्मान और सैन्य साजो- सामान नहीं मिलता।क्योंकि एसी कमरों में बैठकर झूठी रिपोर्ट  बनाने वाले नौकरशाह और सेना के बड़े अधिकारी उनके लिए कुछ नहीं छोड़ते  क्योंकि इनका अपना पेट ही नहीं भरता,  हवस पूरी नहीं होती। सेना में जवानों की कमी है और जुगाड़ से रिटायर्ड अधिकारी पुनर्नियुक्ति  से  अपना काम चला रहे हैं। चैनलों  पर होने वाली बहस और चर्चाओं में सेना के विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों द्वारा ये साफ़ कहा जाता है कि हमारी सेना के पास चीन का सामना करने के लिए आधुनिक हथियार नहीं है। मगर हम गणतंत्र दिवस मना कर झूठी शेखी बघारते हैं। किस  काम के हैं ,ये साजो -सामान जो दुश्मन से लोहा न ले सके .  
                    पंजाब के  पूर्व गवर्नर सुरेन्द्र नाथ जो 7 अगस्त 1991 से 9 जुलाई 1994 तक पंजाब के राज्यपाल रहे और एक विमान दुर्घटना में परिवार के 9 सदस्यों के साथ उनका निधन हो गया, के घर से 800 करोड़ रूपए  मिले , जिस पर केंद्र सरकार ने कभी कोई टिप्पणी  नहीं की।  ये पैसा उन्हें केंद्र द्वारा दिए गए 4500 करोड़ रुपयों मे से था ,जो उन्हें उग्रवाद रोकने के लिए दिया गया था। ये एक IAS  अधिकारी रहे जो सेना के CISF  के DG  पद पर काबिज रहे और साथ ही UPSC  के सदस्य भी  रहे हैं । ये हमारे देश के नौकरशाहों और सेना के उच्च अधिकारियों का असली चेहरा है . 
 क्या केवल "जड़ा  याद करो कुर्बानी " गीत एक दिन बजा लेने से ही,  हमारे देश के शहीदों के प्रति कर्तव्य पूरा हो जाता है?  मीडिया कहता है कि  नेहरुजी इस गीत को सुन कर रो पड़े थे। वाह रे मीडिया ! कैसा गणतंत्र है ?
संविधान हमें रोजी रोटी और सम्मान से जीने का अधिकार देता है, मगर हकीकत कुछ और ही है।  किसान आत्महत्या कर रहे हैं।  जवान मर रहे हैं। एक शास्त्रीजी थे ,जो कहते थे "जय जवान- जय किसान ". शायद वही  एकमात्र प्रधानमंत्री थे , जिन्हें देश में किसानों  और जवानों  की चिंता थी, बाकी तो सब देश को  लूटने में लगे हैं। संविधान में अंग्रेजी और आरक्षण  को केवल 10 वर्षो तक के लिए लागू रखने के बात कही गयी थी,  मगर हमारे नेताओं ने अपने स्वार्थों के कारण  वोटों  के राजनीति  के कारण वोट बैंक के लिए सुरक्षित कर दिया। जबकि इस का लाभ समाज के केवल कुछ वर्गों को मिला और आज भी गरीबी से तंग आकर लोग आत्महत्या सपरिवार कर रहे हैं। जब कसाब को फांसी दी गयी तो एक बात जो सभी समाचारपत्रों में कही गई थी कि , गरीबी ने कसाब को उग्रवादी बनाया।  आज जब हम नक्सलवाद की बात करते हैं, तो ये क्यों भूल जाते हैं कि  ये भी इस देश के नागरिक हैं .  उनकी जमीनों पर कॉर्पोरेट ने कब्ज़ा कर लिया है और  उनकी रोज़ी रोटी छीन ली है। बदले में  न उन्हें नौकरी मिली न मुआवजा। इन्हें नक्सलवादी बनाने के लिए कौन जिम्मेवार है?  आज़ादी के 65 साल बाद भी हम आम आदमी को रोजी- रोटी नहीं दे सके  और तमाशे करने में  लगे रहे। कॉमनवेल्थ गेम करने में लगे रहे।  देश को लुटते और लुटाते रहे।  मगर संविधान में लिखे सिद्धांतों एवं मर्म  पर कभी ध्यान नहीं दिया। इनको लूटने से ही फुर्सत नहीं। नक्सलवादी  क्षेत्रों में सेना और CISF के जवानों  को बम से उड़ाया जा रहा है . यदि इन नक्सलवादियों  और कश्मीरियों को बजट  का 10 प्रतिशत  भी लाभ दिया गया  होता तो ,आज ये नहीं भटकते। हमारे गृह मंत्री धमाके के बाद मीटिंग पर करोड़ों रुपये खर्च कर देते हैं, मगर इन बेरोजगारों को आरक्षण का लाभ देकर समस्या को जड़ से खत्म नहीं करना चाहते।  हमारे नेताओं को  वोटों  की राजनीति  से  ही फुर्सत नहीं। 65 साल बाद भी आरक्षण के  नाम पर जहाँ एक परिवार के कई  लोग नौकरी का सुख भोग रहे हैं, वहीं बगैर आरक्षण वाले कई प्रतिभाशाली युवक बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। ये  कैसा गणतंत्र है ?
                       कॉमनवेल्थ खेलों ने साबित कर दिया के देश को दलाल और ठेकेदार चला रहे हैं , जिन्हें राजसत्ता का संरक्षण मिला हुआ है।  लालू ,माया, मुलायम, शिबू सोरेन, अमर सिंह जैसे राजनीतिज्ञ  तथा  समाजवादी और BSP जैसे सौदेबाजी करनेवाली पार्टियाँ  से जुगाड़ कर कांग्रेस देश को चला रही है।राजनीति  का अपराधीकरण हो गया है और अपराधियों का राजनीतिकरण।  लोग अपने गुस्से का इजहार अपने अपने तरीके से कर रहे हैं। 
प्रधानमंत्री गृह मंत्री और दूसरे मंत्रियों के खिलाफ लोगो का गुस्सा फूट रहा है . लोग अपने गुस्से का इजहार अपने- अपने तरीके से कर रहे हैं।  कोई मंत्रियों पर जूते फेंकता है तो कोई हमला करता है। वहीं कोई  सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकाल रहा है। 
                            आज स्थिति यह है कि दिन भर मेहनत करने के बावजूद भी लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं मिलती।  दूर दराज के इलाकों में खासकर बिहार के कई मुसहर परिवार के  लोग चूहे मार कर खा रहे हैं और दिल्ली की मुख्यमंत्री 600 रूपए की राशि  में  दिल्ली के 5 सदस्यों के परिवार के लिए राशन- पानी हेतु  काफी बताती हैं  . वहीं योजना आयोग 32 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले को गरीब नहीं मानता . ये  हमारे नेता और नौकरशाहों की सोच है, बौद्धिक ज्ञान है।  ये शायद हवा में ही उड़ते हैं , इन्हें  जमीनी हकीकत का कुछ भी नहीं पता। दिल्ली में  Police, RTO ,MCD , DDA , CPWD के एक -एक अधिकारी के पास करोड़ों की काली कमाई है . जहाँ गरीब ,और गरीब हो रहा है वहीं बेईमान और भ्रष्ट धन्नासेठ / धनकुबेर बन रहे हैं .  संविधान में लिखा था की गरीब और अमीर के बीच की खाई का अंतर कम हो,  मगर गणतंत्र ने क्या किया? इंदिराजी  16-17 साल राज कर गई ; गरीबी  हटाओ का नारा दिया ;मगर  गरीबी किसकी हटी?  कुर्सी पर बैठा हर शख्स लुटेरा बन गया और देश को लूटकर अमीर बन गया।  ये इस देश के अमीरों के सच्चाई है।  चाहे वो पोंटी  चड्ढा हो,  हसन अली हो, मायावती हो, मुलायम हो, चौटाला हो, कोड़ा हो, राजा हो, कलमाड़ी  हो। नेहरू खानदान के पास कितना पैसा है ,इसकी कल्पना  भी नहीं कर सकते  .
                  देश में जहां लोग गरीबी से तंग आकर सपरिवार आत्महत्या कर रहे हैं, वहीं  प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जनता को गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस और दूसरे त्योहारों पर  शुभकामनाएं  देकर अपना नैतिक कर्तव्य पूरा कर लेते हैं। नीति निर्देशक सिद्धांतों  का कभी किसी राज्य ने या केंद्र ने अनुसरण किया है? कहने को हमारा संविधान दुनियाँ  का सबसे बड़ा लिखित संविधान है , मगर दिखावे के लिए।  संविधान सभा ने "कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति  ने कुनबा जोड़ा" के उक्ति को चरितार्थ कर संविधान बना तो दिया मगर ये किस काम का ? शायद संसद में बैठे 50 प्रतिशत  लोगों ने तो कभी संविधान पढ़ा भी नहीं।  संसद में हर जनसेवक और जनप्रतिनिधि  को देशसेवा एवं गोपनीयता की  शपथ लेनी पड़ती है ,परन्तु ये क्या हर शख्स शपथ  खाकर देश के साथ गद्दारी कर रहा है, लूट रहा है।  चाहे 544 सांसद  हो,  40 लाख केंद्रीय कर्मचारी हो या फिर राज्य सरकारों के कर्मचारी। अधिकाशतः  इस अव्यवस्था के लिए दोषी हैं और  देश के साथ द्रोह कर रहे हैं,  गद्दारी कर रहे हैं। 
                इंग्लैंड में जहाँ  कोई लिखित संविधान नहीं  है ,हमसे सैकड़ों  साल आगे है। नार्वे के  सामने हम कहाँ टिकते हैं ? मगर वो हमसे बेहतर और विकसित हैं .  हमने संविधान को तमाशा बना दिया . कहने को विभिन्न देशों  के अच्छी -अच्छी सभी तत्व इसमें डाल दिए  गए , मगर संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ही अपने पद की मर्यादाओं का ख्याल नहीं रखते; चाहे वो तिवारी हो, राजा हो, चिदम्बरम हो ,ज्ञानी जैल सिंहजी  हों  या  राज्यपाल बूटा सिंह हों ।  अंग्रेजों के बनाये हुए कानून आज भी जारी  है, जो गुलामों के लिए बने थे। उससे पहले राजे- रजवाड़े इसी कानून से  राज करते थे . आज भी वो  किसी न किसी तरह  सता में काबिज हैं। 
               4 मार्च 2010 को   उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद में  कृपालु महाराज के आश्रम में केवल एक प्लेट, एक कटोरी और 20 रुपये के लिए, उमड़ी भक्तों की भीड़ से मची भगदड़ में 71 से अधिक लोग मारे गए ,वहीं  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों चाहे  मुलायम सिंह हो या मायावती, के  महलों और स्मारकों  पर करोड़ों  रुपये खर्च होते हैं।  यादव जी के लिए  तो उनके गाँव में हवाई पट्टी बनाए  जाते हैं।  दिल्ली के बाहर दूरदराज के इलाकों में ये आम बात है।  लोग घास- फूस की रोटी बना कर खाते हैं ,चूहे मारकर खा रहे है . क्या यही  है गणतंत्र का असली चरित्र चेहरा ?इन समस्याओं के निराकरण के बजाय हम गणतंत्र दिवस मानाने का ढोंग करते हैं। वास्तव में देखा जाय तो, ये भी तिरंगे का अपमान है। जब हम संसद में बैठे 544 लोगों को ईमानदार और जिम्मेवार नहीं बना सकते, 40 लाख बाबुओं को कर्तव्यनिष्ठ नहीं बना सकते अथवा सुधार  नहीं सकते, तो फिर आम आदमी से क्या उम्मीद? फिर आम आदमी से किस चरित्र और ईमानदारी की उम्मीद करे? देश में  घोटालों के जांच के लिए आयोग बनते हैं ,जाँच चलती है और करोड़ों  रुपये खर्च होते है और रिपोर्ट कूड़े में डाल दी जाती है। लिब्राहन आयोग जो  अयोध्या कांड के लिए बना था ,उसकी रिपोर्ट का क्या हुआ?  विदेशियों  के अंधाधुंध नक़ल करके हमने उनकी  सब बुराइयाँ तो ले  ली , मगर उनकी  एक भी  अच्छी न ले सके।  संविधान सभा ने बड़े- बड़े सपने लेकर संविधान बनाया परन्तु संवैधानिक पदों पर बैठे जन प्रतिनिधियों  और जनसेवकों ने इसे नकारा कर तमाशा बना दिया .संविधान की  प्रस्तावना में  क्या लिखा है ,ये  संसद में बैठे हमारे सांसदों ने शायद ही कभी पढ़ा हो।  जिन्हें आज़ादी चाहिए थी, उन्हें मिली नहीं और जिन्हें मिली , उन्हें उसकी कीमत नहीं पता . यही हमारी विडम्बना है।  संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों  को अपने पद की मर्यादा का ही ख्याल नहीं है। एक अनोखा देश जहाँ अधिकांश  शासक शपथ खाकर देश को लूट रहा है और अपने अंतरात्मा को मारकर समाजहित के खिलाफ काम करता है .
                आत्मसम्मान से जीने की मगर आत्मसम्मान कहाँ है ? आज़ादी के समय देशकी आबादी केवल 32 करोड़ थी और आज 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे है। अब ये नाटक बंद होना चाहिए . आज हमारे पास मेट्रोमैन  श्रीधरन जैसे कितने  कर्मठ नौकरशाह या नेता हैं , जिन्होंने देश के नवनिर्माण में उल्लेखनीय योगदान दिया है . यहसोचने की बात है। सभी  साधन होते हुए भी  हमने देश को नर्क बना दिया, जबकि दृढ़ इच्छाशक्ति  वाले दुबई जैसे देशॉ ने विकास की मिसाल कायम की है;जहाँ भारतबर्ष के बड़े-बड़े अधिकारी सिंगापुर में  ट्रेनिंग लेने जाते हैं . दुबई एवं सिंगापुर में प्रशासनिक दक्षता के कारण  विकास सर्वाधिक है और अपराध नहीं है। जबकि भारतबर्ष में सभी प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधन प्रचुर मात्रा में  होने के बाबजूद भी हम इनके मुकाबले कहीं नहीं ठहरते। हर कुर्सी पर तिवारी बैठा है ,अंजामे गुलिस्ता सामने है। 16 दिसम्बर की घटना से क्या हमें सबक नहीं लेना चाहिए? तिरंगे का सम्मान , संविधान का सम्मान दिल से होना चहिये . गणतंत्र को  नाटक  बनाना बंद होना चाहिए।  सुखराम ,तिवारी ,कांडा जैसे कितने नेता आज संसद और विधानसभा में हैं।  ये हमारी राजनीति  की वास्तविकता है।  बाहर से उजले खादी पहनने वालों की ये सच्ची पहचान है।  न्याय नैतिकता और निति विहीन राजनीति  ने देश को उस मोड़ पर ला  दिया है ,जहाँ ये फैसला करना मुश्किल हो जाता है कि  क्या  ये लोकतन्त और गणतंत्र का आड़ में राजतन्त्र तो नहीं है ,जहाँ जनता को केवल भेड़ - बकरियों की तरह हाँका  जाता है।  नेता अनर्गल बयान  देते हैं।  1947 में देश का बंटवारा  वास्तव में  नेहरू की प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा का परिणाम था,  जो उसके अनैतिक संबंधों  का परिणाम था। बंटवारे के दौरान 10 लाख से ज्यादा लोगो का  नरसंघार हुआ तथा  लाख से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार और लाखों हिन्दू महिलाये पाकिस्तान  में मुस्लिम बन कर रह गई।  देश की आज़ादी की नींव  ही बलात्कार एवं  कत्लेआम  और लूटमार पर पड़ी है। पहले अंग्रेज़ देश की अस्मिता पर चोट करते रहे। उससे पहले मुग़ल,  और   देश की अस्मिता को लूटते रहे मगर हम कुछ ना कर सके ण् ये सब तो हमें विरासत में मिले है  पिछले  65 साल से ये सब हो रहा है और  हम 15 अगस्त और 26 जनवरी मना कर अपना सीना चौड़ा करते हैं के हम आज़ाद हैं। शोषण तो हमारे समाज का एक अभिन्न अंग है। देश की  राजधानी  दिल्ली में जहाँ केवल 10 प्रतिशत  अपराधों की ही रिपोर्ट लिखी जाती है। फिर दूर- दराज के इलाकों में क्या हालात हैं ,इसका सहज रूप से  अंदाजा लगाया जा सकता है . पिछले 6 साल में उत्तरप्रदेश में बसपा और सपा के कम से कम 50  विधायकों  पर  बलात्कार  और शील भंग के आरोप लगे हैं .  ये सिलसिला आज भी जारी है। 
चाहे मधुमिता शुक्ला हो  चाहे भंवरी देवी हो; एनडी तिवारी हो या  गोपाल कांडा हो ,फर्क  सिर्फ इतना है कि  जहाँ समझौता और सहमति  हो वो अपराध नहीं है।  धनाढ्य  वर्ग पैसे  के बल पर वो सब कर रहा है जिसे हम बलात /जबरदस्ती कहते हैं  क्योंकि पैसे के आगे पुलिस और कानून सब बेबस हैं।  पंचतारा संस्कृति ने हमें चरित्रहीन और यौन कुंठित  बना दिया है।  अख़बारों  के विज्ञापनों चाहे वो मसाज पार्लरए एस्कोर्ट्स  ण्ण्ण्मजबण् और इन्टरनेट पर सेक्स रैकेट  सब बलात्कार  और सेक्स को बढ़ावा दे रहे हैं .सिने  तारिकाओं  का  नग्न प्रदर्शन दिखाता है कि  हम  पैसे के लिये कुछ भी कर सकते हैं।  नव वर्ष पर पंच सितारा होटलों में सिने अभिनेत्रियों के अश्लील डांस और ठुमके जिस पर  धनाढ्य वर्ग एक रात में लाखो रूपये वार देना चाहता है . वास्तव में समाज और देश का नैतिक पतन हैण् उच्चकुलीन  वर्ग पैसे और अपने रुतबे के दम पर ऐयाशियों में डूबा है,  जिसे हम दुनिया का सबसे पुराना धंधा मानते हैए कोठों की जगह कोठियों ने ले ली हे बलात्कार और सेक्स वर्कर में क्या अंतर है? केवल सहमति  का फर्क है। आज भी थाईलैंड;बैंकाक जैसे देशों  में बहुत से भारतीय केवल सेक्स दौरे के लिये जाते हैं . देश के कुलीन और संभ्रांत वर्ग  के लोग जो उच्च पदों पर बैठे है, विदेशी दौरों पर विदेशी शराब और शबाब के मोह से बच नहीं  पाते हैं।  राज्यों के सर्किट हाउस मंत्रियों और विधायकों के दौरों  के दौरान सरकारी कर्मचारियों को उनके लिए  रंगरलियों का इंतज़ाम करना पड़ता है . सरकारी  दफ्तरों में भी ये सब चल रहा है। बलात्कार के मामलों में बदनामी के डर से पीडिता सामने नही आती, वैसे ही सरकारी और प्राइवेट दफतरों में यौन शोषण के मामलों में पीड़िता  सामने नहीं  आती  बल्कि हालात से समझौता कर  जैसा देश -वैसा भेष की नीति  का अनुसरण कर लेती है। गोपाल  कांडा और गीतिका शर्मा  काण्ड हमारे समाज की इसी  सोच को दर्शाता  है। 
              आजादी के बाद देश में विकास हुआ , मगर नैतिकताहीन और चरित्रहीन विकास के युग में   कभी शास्त्री जी जैसे प्रधानमंत्री हुआ करते थे . वहीं  एन डी तिवारी जैसे प्रधानमंत्री पद के  दावेदार जो प्रधान मंत्री तो नहीं बन सके मगर वित्तमंत्री , मुख्य मंत्री और  राज्यपाल जैसे देश के गौरवशाली पदों को कलंकित करते रहे आज़ादी से पहले ठाकुर और राजे -रजवाड़े और उससे पहले  मुग़ल शासक और आक्रान्ता  देश की औरतों की अस्मिता से खेलते रहे और हम कुछ ना कर सके अब तो आदत पड गई है . नीचे तबके के लोगों में ये आम बात है .रात को दिल्ली के फुटपाथ पर सोने वालों मे ये सब चलता है और उच्च  ​​वर्ग के लोग क्लबों में जा कर अपनी हवस पूरी करते हैं। मध्यम वर्ग जरूर हो हल्ला करता है। आईपीएस  राठौड़, नटराजन, के पी एस गिल और ना जाने कितने लोग और शमित मुखर्जी जैसे न्यायाधीश मीडिया  स्तम्भ  भी आज रंगरलियों एवं  अय्याशियों से नहीं बचा है। अगर फांसी दी जाएगी तो उच्च  पदों पर बैठे  हजारों सफ़ेदपोश नंगे हो जायेंगे . सब में होड़ लगी है . इसी कारण लोकपाल नहीं आ सका . मुगलों के पतन के लिये केवल एक मोहमद शाह रंगीला कारण था, मगर आज देश में हर कुर्सी पर रंगीला नज़र आ रहा है।  कौन सा स्तंभ आज रंगरलियों और अय्याशियों से बचा है?   कारण  अपराधी उच्च पदों पर बैठे हैं और अपराधियों को राज्य का संरक्षण प्राप्त है . हसन अली , पोंटी चड्ढा जैसे लोग राज्य के संरक्षण से पनप रहे  हैं और आज हर आदमी सांसद और विधायक बन कर ही देश की सेवा करना चाहता है।  और तो और  कई सिविल सेवक भी अपने मातहत  काम करने वालों को मौका मिलते ही शोषण  करते हैं।  निजी संस्थाओं की बात हो या  बंबई की बारगर्ल्स  की बात हो या हैदराबाद में अरब देशों के शेखों द्वारा कमसिन मुस्लिम लड़कियों के  निकाह पर  सरकार चुप है- तमाशबीन है , वहीं  नेता धन लूटने  में लगे हैं। 
                                      दामिनी मामले ने  हमें ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि  अगर हम आज भी नहीं चेते तो आने वाले 50 सालों में विदेशी सभ्यता और संस्कृति  की अंधी नक़ल  और फ्री सेक्स, लिव  इन रिलेशन में शायद हम पश्चिम से भी आगे निकल जाये और  ये  देश  सेक्स.एडिक्ट लोगों का देश बन जाए। ये देश दलालों का देश न बन जाये ,जिस पर मुझे भी कविता लिखने पड़े। जहाँ कुर्सी पर बैठा हर आदमी पैसे की लिए हर मर्यादा को तोड़ने  के लिए तैयार है  और जिसका सिद्धांत है- "भाड़ में जाए देश और जनता" .साहिर ने लिखा था "ये बस्ती है  मुर्दा परस्तों की बस्ती; यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती". व्यक्ति  पूजा और मरे हुए लोगों के पुण्यतिथियों  तथा  जन्मदिन मनाने में करोड़ों  खर्च  तो कर देते हैं ,मगर जिन्दा लोगों  को रोजी- रोटी नसीब नहीं होती। भारतीय संस्कृति में "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रम्यंते  तत्र देवताः " कहा गया है।  मगर यहाँ क्या हो रहा है ? राक्षस राज में नारियों का  सम्मान लुट रहा है। भूखे भेड़िए  शोषण कर रहे हैं। 
सजा का सुझाव : जिस प्रकार यदि किसी अंग में जहर फ़ैल  जाए तो पूरे शरीर  को बचाने के लिये उस अंग को काट कर फैंक देना उचित है,  उसी  प्रकार ऐसी विकृत मानसिकता वाले  व्यक्ति को समाज से अलग कर देना भी उचित है . जिस प्रकार अंग्रेज अपराधियों को काला पानी की सजा देते थे,   ऐसे अपराधी को खाना-पीना और सब प्रकार की जरूरी सुविधाए तो दी जाये परन्तु वो पुनः  इस प्रकार का दुष्कर्म न करे, इसलिए उसका सामाजिक बहिष्कार हो। 
विवाह : यदि पीड़िता उचित समझे और आरोपी तैयार हो और वो अपने सामाजिक कर्तव्यों का निर्वाह ठीक से करने का वचन दे तो परिस्थितियों को ध्यान में रख कर दोनों की सहमति  से विवाह का प्रावधान हो।
धन की सहायता : यदि पीड़िता निर्धन है और आरोपी  धनवान है और पीड़िता को एकमुश्त अथवा मासिक भत्ता दे सकता है तो अन्य परिस्थितियों में दोनों के सामाजिक एवम वैवाहिक स्थिति को ध्यान में रखकर आर्थिक मदद का प्रावधान हो।
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लेखक गोपाल प्रसाद आरटीआई एक्टिविस्ट हैं एवं यह उनके निजी विचार हैं। 
संपर्क: 09289723144,08743057056.
email : gopalprasadrtiactivist@gmail.com , sampoornkranti@gmail.com

बुधवार, 2 जनवरी 2013

नव बर्ष में लें नव संकल्प : गोपाल प्रसाद



वर्तमान स्थिति एवं परिस्थिति के अनुसार  सभी नागरिकों को नव बर्ष में नव संकल्प लेने  हेतु अग्रसर होना चाहिए। आज आवश्यकता है कि  नीति के साथ नीयत भी बदले। इसके लिए हम स्वयं से करें बदलाव की शुरुआत और सबकी जिम्मेवारी तय हो। प्रत्येक नागरिक को उसके अधिकार और कर्तव्य की जानकारी सरकारी एवं सामाजिक स्तर  से हो, ऐसी व्यवस्था बने। अंग्रेजों के समय से चले आ रहे  साम्राज्यवादी , शोषक कानून की समीक्षा तथा संशोधनों पर अबिलम्ब कारवाई हो। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने हेतु अतिशीघ्र कड़े कानून बनाकर उसपर त्वरित अमल हो। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने हेतु अतिशीघ्र कड़े कानून बनाकर त्वरित कारवाई हो। कालाधन वापस लाकर सभी कालाधन जमाकर्ताओं के नाम उजागर किये जाए तथा इससे सम्बंधित समयसीमा ख़त्म हो। 
     महिलाओं की सुरक्षा हेतु हर संभव उपाय सुनिश्चित किए जाय एवं यौन हिंसा से सम्बंधित अब तक के सभी मामलों की सुनवाई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में हो। पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल द्वारा बलात्कारियों के मृत्युदंड माफ करने के जघन्यतम फैसले पर वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी विचार करें, इसका दबाब जनता द्वारा बनाया जाय। समाज का अवमूल्यन एवं कुसंस्कृति पर रोक लगाने हेतु हर स्तर  पर प्रयास हो। न्यायपालिका एवं पुलिस में खाली पड़े पदों पर अबिलम्ब नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो। अश्लील एवं भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने हेतु सख्ती से पालन हो। फिल्मों , धारावाहिकों, विज्ञापनों एवं प्रचार के सभी माध्यमों में महिला देह प्रदर्शन एवं अश्लीलता परोसने वाले सभी कुत्सित प्रयास बंद हो। न्यायपालिका एवं पुलिस व्यवस्था में सुधार हेतु  अब तक प्राप्त सभी आयोगों की रिपोर्ट पर अमल हो एवं उन सुझावों पर त्वरित कारवाई शुरू हो . न्यायपालिका दो शिफ्ट में चले , जिससे मुकदमों की सुनवाई त्वरित गति से हो सके। कानून का कठोरता पूर्वक पालन हो , यह हर स्तर  पर सुनिश्चित किए जाए। सरकार की सोच एवं नीति व्यापारी की तरह नहीं बल्कि जनकल्याण की हो। समाज में अशिक्षा, अपराध , अंधविश्वास के विरुद्ध जनजागरूकता लाया जाए तथा प्रेम, सौहार्द्र, शांति, सद्भाव कायम करने हेतु हर स्तर  पर कमेटियां गठित हों। समाज के उपेक्षित तबकों, महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों के प्रति आदर, सहानुभूति, सहयोग, करुणा  एवं दया की भावना विकसित करने हेतु सबों का योगदान हो। मानवाधिकार हनन एवं भ्रष्टाचार  के हर संभव मामले उजागर किए जाए। यह तभी संभव होगा जब सभी सरकारी योजनाओं एवं सरकारी नीतियों पर जनता की मॉनीटरिंग  की प्रयास की शुरुआत हो। हर स्तर के पर्यावरण  प्रदूषण (वायु, ध्वनि, जल) के साथ -साथ वैचारिक प्रदूषण न्यूनतम किए जाने हेतु सामूहिक प्रयास हो . लोकसभा, विधानसभा के सभी चुनाव हेतु उम्मीदवारों हेतु न्यूनतम  शैक्षणिक योग्यता,अधिकतम  उम्रसीमा तय किए जाए तथा हत्या, बलात्कार या  यौन हिंसा और धोखाधड़ी के अभियुक्तों ( चाहे वे जमानत पर ही क्यों न छोटे हों, के चुनाव लड़ने पर रोक लगे। इस हेतु एवं चुनाव सुधार  हेतु बने आयोगों की अनुशंसाओं पर अबिलम्ब प्रतिपादन हो। उपरोक्त सभी सुझावों हेतु लंबित सभी विधेयकों को संसद में पारित किए जाए। वास्तव में भारत के सभी मूल समस्याओं का तभी निदान हो सकेगा। 
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लेखक गोपाल प्रसाद आरटीआई  एक्टिविस्ट हैं।

बलात्कार और अश्लील विज्ञापनों में मीडिया की भूमिका : गोपाल प्रसाद



मीडिया का नैतिक कर्तव्य है की समाज में फैली हुई कुरीतियों से समाज को सजग करे, देश और समाज के हित के लिए जनता को जागरूक करे ; परन्तु ऐसा लगता है की धन कमाने की अंधी दौड़ में लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ अपनी सभी मर्यादाओं को लाँघ रहा है। सभी समाचार पत्रों में संपादक प्रतिदिन  बड़ी-बड़ी पांडित्यपूर्ण सम्पादकीय लिख कर जनमानस को अपनी लेखनी की शक्ति से अवगत करते हैं परन्तु व्यावहारिक रूप में ऐसा लगता है की पैसा कमाने के लिए सभी कायदे कानूनों को तक पर रख दिया गया है . सभी समाचारपत्रों में अश्लील एवं अनैतिक विज्ञापनों की भरमार है , जिससे समाज के लोग गुमराह होते हैं . समाचारपत्र केवल एक लाइन लिखकर लाभान्वित हो जाता है . क्या कभी किसी समाचारपत्र ने ऐसे विज्ञापनों की सत्यता को जांचने की कोशिश की ? क्या ऐसे अश्लील और अनैतिक विज्ञापनों को समाचारपत्रों में छपने भर से वह अपनी जिम्मेवारी से मुक्त हो सकता है?
 ऐसे बहुत से विज्ञापन हैं जिनमें कोई पता नहीं होता , केवल मोबाईल नंबर दे दिया जाता है क्योंकि लाख कोशिश करने के बाबजूद भी ऐसे विज्ञापनदाताओं ने अपना पता नहीं बताया। इस तरह की कई शिकायतें थाने में दर्ज भी कराई  गई है , परतु उस पर कारवाई नहीं के बराबर होता है। ऐसे विज्ञापनदाता जनता से धन ऐंठकर चम्पत हो जाते हैं। क्या इनके दुराचार में मीडिया भी बराबर का भागीदार नहीं है? संपादक को चरित्रवान एवं देश व समाज के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए , तभी उनके सम्पादकीय  की गरिमा का आभास जन मानस को हो सकेगा और उनके विद्वता का लाभ देश और समाज को मिल सकेगा।
     आज सामाजिक पतन के लिए काफी हद तक मीडिया भी जिम्मेदार है . यदि इन्टरनेट की बात छोड़ दें तो, इस प्रकार के गुमराह करने वाले विज्ञापनों से की जाने वाली कमाई से देश में और खासकर महानगरों में बलात्कार जैसी घटनाएँ नहीं होंगी तो और क्या होगा?
पच्चीस बर्ष पहले भी जब पंजाब केसरी समाचारपत्र में विदेशी महिलाओं के अश्लील फोटो छपते थे तो कई सजग पाठकों ने इसका विरोध भी किया था परन्तु यह आज तक जारी है। खास बात यह है कि बहुत से लोग केवल इसी कारण  इस समाचारपत्र को पसंद करते हैं . अब तो प्रायः सभी अखबार यही कर रहे हैं। खेद की बात है कि  हर आदमी धनवान बनना चाहता है , चाहे उसके लिए समाज और देश को कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। जब हम निर्मल बाबा और दूसरे धर्म के ठेकेदारों , भ्रष्ट नेताओं को कोसते हैं ,तो संपादक मंडल को भी अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है कि हम क्यों पेड़ न्यूज़ और भ्रामक विज्ञापन के द्वारा चंद लोगों के लाभ के लिए
समाज के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? समाज के कई भद्र कुलीन व्यक्ति इन धोखेबाज लोगों के शिकार होते हैं, परन्तु अपनी बदनामी से बचने के लिए आवाज नहीं उठाते, आवश्यकता है कि  जनहित में छद्म ग्राहक बनकर इनकी गतिविधियाँ जानकर उसका भंडाफोड़ करने के लिए सजग लोग अग्रसर हों। क्या संपादक मंडल राष्ट्रहित में  लिंगवर्धन , मसाज पार्लर , महिलाओं से दोस्ती जैसे भ्रामक विज्ञापनों  पर रोक लगाने का भरसक प्रयास करेगे?
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लेखक गोपाल प्रसाद स्वतंत्र पत्रकार एवं आरटीआई एक्टिविस्ट है।
संपर्क: gopalprasadrtiactivist@gmail.com, sampoornkranti@gmail.com
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