मंगलवार, 12 नवंबर 2013

मौलिक भारत ने लिया‘मतदाता जागरूकता अभियान’ प्रारंभ करने का संकल्प

राजनीतिक दलों में लोकतंत्र लाए बिना विधानसभा व संसद में लोकतंत्र की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। जनजागृति के लोकतांत्रिक माध्यम से जनमत को तैयार कर व्यवस्था में व्यापक बदलाव का रास्ता अपनाया जा सकता है। मतदाता के रूप में अपने कर्तव्य व उत्तरदायित्व को समझाने के ध्येय के साथ अधिकतम लोगों को जागृत व सक्रिय करने हेतु सामाजिक संस्था "मौलिक भारत" ने कई संस्थाओं के साथ मिलकर ‘मतदाता जागरूकता अभियान’ प्रारंभ करने का संकल्प लिया है। लोकतंत्र की स्थापना व राजनीति को लोकनीति में बदलने हेतु सबसे आवश्यक है धोखतंत्र पर प्रहार। इसी भ्रम को समाप्त कर ही लोकतंत्र को वास्तविक अर्थों में स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारंभ की जा सकती है।मौलिक भारत ने इस हेतु कुछ महत्वपूर्ण बिषयों को अपने जनजागरण का आधार बनाया है. मौलिक भारत संस्था के राष्ट्रीय संयोजक अनुज अग्रवाल के अनुसार मतदाताओं के लिए हेल्पलाइन/काल सेंटर का निर्माण,दिल्ली एवं देश भर में मतदाता सूची में करोड़ों फर्जी नामों को हटवाना, करोड़ों लोग जिनके नाम मतदाता सूची में नहीं हैं उनके नाम शामिल करवाना, मतदान करने के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए तथा मुस्लिम/दलित व महिलाओं के वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल की प्रवृत्ति को मिटाने का प्रयास ,सरकारी अधिकारियों द्वारा राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ मिलीभगतकर फर्जी मतदाता, फर्जी मतदान की साजिशों का भांडाफोड़ करना,वोटिंग मशीनों की खामियों व सही उपयोग के प्रति मतदाता को जागरूककरना, मतदान की अनिवार्यता, यूआईडी की अनिवार्यता तथा यूआईडी के माध्यम से ही वोट डाले जायें इस प्रावधान के लिए माँग करना व जनमत तैयार करना,मतदान के समय ईवीएम में ऐसा साफ्टवेयर लगवाने की माँग करना जिससे प्रत्येक वोट देने के समय भी पता चल सके ताकि फर्जी मतदान अथवा अंतिम समय में लगातार बटन दबाकर फर्जी मतदान की गड़बड़ी को रोका जा सके। पूरे देश में एक ही दिन में पंचायत, नगर पालिका, विधानसभा एवं लोकसभा के चुनाव कराये जायें जिससे गड़बडि़यों एवं साजिशों को रोका जा सके, इसके लिए जनजागृति करना।वरीयता मतदान पद्धति को लागू किया जाये ताकि 50% से अधिक मत प्राप्त व्यक्ति ही चुनाव जीत सके।दलों में आंतरिक लोकतंत्र, उम्मीदवार का लोकतांत्रिक पद्धति से चयन/जन उम्मीदवार व जन घोषणा-पत्र को कानूनी मान्यता, असफल जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने की प्रक्रिया, उम्मीदवार की निश्चित समय तक सामाजिक सक्रियता के बाद चुनाव लड़ने की योग्यता, उम्र की सीमा, क्षेत्र बदलने पर प्रतिबंध, चुने जाने पर अपना कार्यकाल पूरा करने तक दूसरे चुनावों के लड़ने पर प्रतिबंध 80% समय अपने क्षेत्र में ही रहकर कार्य करना। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर नजर रखने हेतु निगरानी तंत्र, आयोग को दलों की मान्यता रद्द करने का अधिकार, सरकारी खर्च पर चुनाव, चुनाव आयोग के पास अपने बजट के कानूनी प्रावधान, दलों में आंतरिक लोकतंत्र के संवैधानिक प्रावधान ,आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर चुनाव आयोग को कानूनी कार्यवाही के अधिकार,अपराधी/भ्रष्टाचारी जनप्रतिनिधि/उम्मीदवार के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना तथा सही जनप्रतिनिधि/ उम्मीदवार के आंकलन के लिए मतदाताओं को जागरूक करना/आदर्श उम्मीदवार के लक्षणों को बताना तथा वोट बेचने/खरीदने के खेल को रोकने के उद्देश्य से दिल्ली के अधिकाधिक विधानसभा क्षेत्रों में 15 नवम्बर से 2 दिसंबर तक मौलिक भारत से जुड़े विभिन्न विशेषज्ञोंद्वारा हेतु जागरूकता लाने का कार्यक्रम किया जाएगा। मौलिक भारत के आरटीआई प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक गोपाल प्रसाद ने कहा है कि अब पार्टियों के टिकट लेना बड़ा खेल बन गया है। टिकट के इच्छुक व्यक्ति को अनेक जनसभाएं, कार्यक्रम, भोज, चंदा बाँटना, शराब पिलाना, पार्टी फंड में चंदा देना, प्रमुख नेताओं के घरों पर चक्कर काटना, उन्हें नकद धनराशि देना, स्थानीय स्तर पर चमचों-समर्थकों को पाल कर रखना, वोट बनवाना, विरोधियों के दांव-पेंच काटने के उपाय करना, चुनाव के समय वोटरों को नकद पैसे, शराब, भोजन इत्यादि देना, पोस्टर, बैनर, झंडे, बोर्ड, अखबारों-टीवी आदि में विज्ञापन देना, पत्रकारों को खरीद कर 'पेड न्यूज छपवाना, विभिन्न प्रभावी समूहों, जाति समूहों आदि को अपने पाले में करना, सरकारी मशीनरी को अपने पक्ष में करना जैसे तिकड़म करने पड़ते हैं। इस सब के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं।यदि भारत में जनतंत्र है, तो इस जनतंत्र के स्वरूप, कार्यतंत्र, व्यवस्था आदि का निधार्रण जननीति के द्वारा होना चाहिए या राजनीति के द्वारा? यदि निर्धारण का अधिकार जननीति के द्वारा होना चाहिए तो इसके लिए हमें जननेता चुनने चाहिए या राजनेता? आज ज्वलंत सवाल यह है कि संवैधानिक तौर पर भारत एक जनतंत्र या राजतंत्र? यदि भारत में जनतंत्र है, तो इस जनतंत्र के स्वरूप, कार्यतंत्र, व्यवस्था आदि का निधार्रण जननीति के द्वारा होना चाहिए या राजनींित के द्वारा? यदि निर्धारण का अधिकार जननीति के द्वारा होना चाहिए तो इसके लिए हमें जननेता चुनने चाहिए या राजनेता? जननेता यानी जनाधार वाला नेता अर्थात सही मायने में जनप्रतिनिधि। राजनेता यानी जो राज करना चाहता हो, जिसकी मानसिकता राजतांत्रिक हो।जननेता का चुनाव हो, इसके लिए भारत में चुनाव व्यवस्था है; कायदे-कानून हैं और उन्हे अंजाम देने के लिए चुनाव आयोग है। बावजूद इसके क्या आज हम वाकई जननेता चुन पा रहे हैं?चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधियों पर जनता का कोई नियंत्रण नहीं रहता।यह स्थिति किसी एक स्तर पर नहीं, कमोबेश हर स्तर पर है। ग्राम पंचायत,जिला पंचायत, शहरी निकाय और विधानसभा से लेकर लोकसभा तक; प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक। पंचायत स्तर पर पंचायत प्रधान को वापस बुलाने के अधिकार के बावजूद परिदृ्श्य अनियंत्रित जैसी ही है।क्या यह सच नहीं है कि हम अपने ही द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि द्वारा शासित हो रहे हैं?यदि हां, तो खामी कहां हैं? हमारे चुनने में या चुनाव प्रणाली या चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में? इसका जवाब तलाशना चाहिए।संभवत: सुधार की जरूरत तीनो स्तर पर है। मतदान जागरुकता के तमाम अभियानों के बावजूद क्या यह सच नहीं है कि हमारे मतदान का आधार जाति, धर्म, वर्ण, वर्ग और निजी लाभ, प्रलोभन के इर्द-गिर्द सिमट गया है?क्या यह सच नहीं है कि धर्म-जाति-वर्ग-वर्ण आदि की छूत लगाये बगैर सत्ता में आना किसी भी दल के लिए असंभव हो गया है?प्रश्न यह है कि मतदान के चुनाव का आधार क्या हो, यह चुनाव आयोग तय करता है, उम्मीदवार या मतदाता? क्या यह सच नहीं है कि आज की पूरी चुनाव प्रक्रिया धनबल, बाहुबल,मीडिया और संवेदनशील मुद्दों के जरिए प्रभावित की जा रही है?क्या यह सच नहीं है कि भारतीय जनतंत्र जनता नहीं, अपराधी, धनपति और कट्टर ताकतों द्वारा संचालित किया जा रहा है? जन, जननेता और जननीति तो कहीं प्रभावी भूमिका निभा ही नहीं पा रहे।इस बात को काफी शिद्दत से महसूस किया जा रहा है कि चुनाव से पहले औरचुनाव के बाद की जिम्मेदारियों को लेकर मतदाताओं को जागरुक व सशक्त करने के काम को पूरे पांच साल और संगठित तरीके से करने की जरूरत है। यह कैसे हो सकता है?क्या पूरे देश में मतदाता परिषदों का गठन और उन्हे चुनाव आयोग द्वारा अधिकारिक मान्यता की मांग इस दिशा में पहली सीढ़ी हो सकती है? सुधार की दूसरी जरूरत चुनाव प्रणाली और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में है। यह बात नई नहीं है। कई संगठनों द्वारा की गई शुरुआत जनमांग कैसे बने? जनसंसद इसमें अहम भूमिका निभा सकती है। चुनाव सुधार के मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर हमें बताना पड़ेगा कि वर्तमान चुनाव प्रणाली की सबसे बड़ी खामी क्या है?क्या यह प्रणाली धनबल, बाहुबल, परिवारवाद, जातिवाद जैसे अलोकतांत्रिक कदमों पर रोक लगाती है? क्या यह विवेकपूर्ण मतदान को प्रोत्साहित करती है? क्या यह जनता तथा संविधान के प्रति जनप्रतिनिधियों को कर्तव्यनिष्ठऔर जवाबदेह बनने के लिए बाध्य करने में सक्षम है? क्या यह राजनीतिक अस्थिरता, दलबदलू प्रवृति आदि अनैतिक प्रवृतियों को रोकने में कारगर है? यदि नहीं तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या इसे बदल जाना चाहिए? यदि हां! तो इसका सही विकल्प क्या है? गम्भीर चिंता का बिषय यह भी है कि धनबल कैसे रुके? चुनावी खर्च कैसे कम हो? पैसा देकर टिकट लेना; पैसा देकर वोट हासिल करना कैसे खत्म हो? क्या इस दिशा में कोई उपाय किए गये हैं? क्या वे कारगर साबित हो रहे हैं? क्या सरकार द्वारा उम्मीदवार का खर्च वहन करने से यह संभव है? क्या उम्मीदवार की बजाय दल चुनने का सुझाया फार्मूला इसमें सहयोगी हो सकता है? आज हमें सोचने के लिए मजबूर होना पद रहा है कि परिवारवाद कैसे रुके? क्या परिवारवाद रुकना चाहिए? यदि हां , तो क्या इसके लिए राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र कायम करना एक कदम हो सकता है? क्या एक परिवार से एक ही सदस्य को चुनाव लडऩे की अनुमति से यह हो सकता है? क्या एक परिवार के एक ही सदस्य को दल का पदाधिकारी का प्रावधान होने से कुछ नियंत्रण होना संभव है? क्या यह लोकतांत्रिक होगा? यदि हां! तो क्या ऐसा करने की कमान चुनाव आयोग को सौंपी जानी चाहिए या और किसी संवैधानिक संस्था की जरूरत महसूस होती है? क्या पार्टी व्हिप जैसे कदम किसी भी दल के आंतरिक लोकतंत्र के खिलाफ व्यवस्था हैं? क्या इस पर रोक लगनी चाहिए? आज हर जागरूक जनता यह सोच रही है कि अपराधियों का प्रवेश कैसे रुके? जिन पर आरोप पत्र दाखिल कर दिया हो, क्या उन सभी की चुनाव में उम्मीदवारी प्रतिबंधित हो या इस में भी कुछ सीमा बनाई जानी चाहिए। जैसे यदि आरोप पत्र ऐसे अपराध के लिए दाखिल किया हो, जिसकी सजा न्यूनतम पांच वर्ष हो आदि आदि। क्या ऐसे प्रतिबंध पंचायत से लेकर हर स्तर के चुनाव पर होने चाहिए? क्या स्वयंसेवी, सामाजिक, सहकारी संगठनों में भी इनकी उम्मीदवारी पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए? प्रतिबंध सिर्फ उम्मीदवारी के लिए होने चाहिए या ऐसे लोगों को मतदान व आम सदस्यता से ही वंचित किया जाना चाहिए? चुनाव पश्चात् जनप्रतिनिधियों पर मतदाता का नियंत्रण कैसे हो? क्या राइट टू रिकाल इस दिशा में सही कदम है? इस कदम का कोई व्यापक दुष्प्रभाव तो नहीं है? क्या जनघोषणा पत्र इस दिशा में सहयोगी हो सकता है? यदि हां! तो जनघोषणा लागू करने के लिए चुने गये जनप्रतिनिधि को बाध्य करने के लिए किन संवैधानिक प्रावधानों की आवश्यकता होगी? ग्रामसभा से लेकर लोकसभा स्तर तक मतदाता परिषदों का संवैधानिक ढांचा बने। मतदाता परिषदें अपने-अपने स्तर पर अगले पांच वर्ष के काम व योजना तय करें और जनप्रतिनिधि तथा अधिकारियों को उस स्तर पर उसी योजना के क्रियान्वयन की इजाजत हो। मतदाता परिषदों को उनके इलाके में खर्च हुए हर पैसे के पब्लिक ऑडिट का अधिकार हो। क्या यह व्यवस्था होनी चाहिए? क्या इससे लक्ष्य मिल जायेगा? पांच वर्ष से पहले दोबारा चुनाव कराने की नौबत न आये। यह कैसे हो? क्या एमएमपीएस इसका उपाय है? क्या बहुदलीय सरकारों के स्थान पर एकदलीय सरकारें होनी चाहिए? यदि हां, तो कैसे हो? क्या राज्य और राष्ट्र स्तरीय दलों की मान्यता के लिए तय मानदंडों में बदलाव से यह संभव है? क्या एमएमपीएस से यह संभव होगा? क्या चुनाव पश्चात् गठबंधन पर रोक लगनी चाहिए? यदि हां! क्यों और कैसे? हमें सोचना पड़ेगा कि क्या चुनाव में सीटों का आरक्षण होना चाहिए? विवेकपूर्ण मतदान प्रतिशत कैसे बढ़े? क्या मतदान से पहले और बाद जागरुकता के सतत् अभियान चलाने से बात बन सकती है? क्या नो कैंडिटेट वोट इसका सही उपाय है? क्या आवश्यक मतदान इसका उपाय है? क्या मतदान न करने वाले मतदाता को कुछ अति आवश्यक सुविधाओं से वंचित करके उसे मतदान के लिए बाध्य किया जाना चाहिए? यदि हां ! तो किन-किन सुविधाओं से? विवेकपूर्ण मतदान के मद्देनजर क्या चुनाव की आचार संहिता लागू होने के दौरान उसके उल्लंघन के दोषी उम्मीदवार के साथ-साथ उससे निजी लाभ लेने वाले मतदाता को घूस लेने का दोषी मानकर दंडित किया जाना चाहिए? क्या मतदान का वर्तमान तरीका और माध्यम ठीक व पर्याप्त है? क्या मतदाता की न्यूनतम उम्र ठीक है? एक साथ अधिसूचित चुनावों के लिए मतदान एक ही दिन में होने चाहिए या कई दिन में? मतदान के लिए मतदाताओं को एक ही दिन दिया जाना चाहिए या एक से ज्यादा दिन में किसी एक दिन आकर मतदान का विकल्प देने से कोई फायदा होगा? आखिर अपने जनप्रतिनिधि का कैसे मूल्यांकन करें? क्या आपका जनप्रतिनिधि अपने पद की गरिमा व जिम्मेदारी समझता है? क्या उसकी शिक्षा अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए पर्याप्त है? क्या उसने अपने चुनाव के समय चुनाव खर्चों के लिए निर्धारित धन से अधिक धन का उपयोग तो नहीं किया?उसकी आय के स्रोत क्या हैं?क्या वह पैसे/शराब व दावतों के बल पर चुनाव जीता है?क्या वह अपनी पद प्रतिष्ठा का प्रयोग अपने-अपने परिजनों, रिश्तेदार व दोस्तों के काम कराने के लिए तो नहीं करता?क्या उसकी संपत्ति अवैध धन/भूमि व्यापार आदि में आश्चर्यजनक वृद्धि तो नहीं हो रही?क्या वह स्थानीय हित व जनता की मांगों के लिए सरकारी अधिकारियों व सदन में आवास उठाता है? क्या वह चुनावी व पार्टी खर्चों के लिए चेक द्वारा जनता से दान लेता हे अथवा नकद धन स्वयं या व्यापारियों, उद्योगपतियों द्वारा लेता है? क्या वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के घर जन्म, विवाह आदि समारोह में नकद पैसे बांटता है? यदि हाँ तो उसके इन पैसों का स्रोत क्या है?क्या उसने पैसे देकर तो टिकिट नहीं खरीदा था?क्या चुनाव से पूर्व भी निरंतर जनता के सम्पर्क में रहता था और जनहित के मुद्दों पर संघर्ष और अपनी प्रभावी भूमिका निभाता रहा?क्या उसमें नेतृत्व के पर्याप्त गुण अथवा अपने पारिवारिक सम्बन्धों, धन, बाहुबल आदि के दम पर राजनीति में उतरा है? क्या उसे सरकारी योजनाओं, उनमें आवंटित धन तथा जनता तक उसकी निरन्तर पहुँच की जानकारी है?क्या उसने जनता की मूल समस्याओं और उनके समाधान की कोई रूपरेखा तैयार की है?कहीं वह धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा के आधार पर तो वोट नहीं मांगता?कहीं वह ठेकों में, सदन में मत देते समय तथा अपने द्वारा आवंटित विशेष निधि में कमीशन तो नहीं मांगता?क्या वह अपने राजनीतिक दल में आंतरिक लोकतंत्र की स्वायतता के प्रति संवेदनशील है और सामूहिक नेतृत्व, सबसे सलाह लेते हुए काम करना पसन्द करता है?क्या वह कार्यकुशल व क्षमतावान कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करता है तथा चमचागिरी व चापलूसी को अधिक महत्व देता है?कहीं वह राष्ट्रविरोधी नीतियों व गुटों को तो परोक्ष समर्थन व सहयोग तो नहीं दे रहा है? GOPAL PRASAD RTI ACTIVIST MOB:  09910341785 EMAIL: sampoornkranti@gmail.com

शनिवार, 2 नवंबर 2013

RTI Query by GOPAL PRASAD about movable/immovable properties of Indian Administrative Officers and Central Ministers

In reply of RTI Query about movable/immovable properties declared by all the officers of Indian Administrative Service ( IAS,IPS, IRS, IFS ), Chief Commissioner of Income Tax (CCA) is concerned with the details of IRS Officers only. The Details of movable /immovable properties as declared by all the IRS Officers is available on the website "www.irsofficersonline.gov.in". Thus the information sought by the applicant is in respect of information which is already available in public domain and the applicant is advised to refer "view IPR" on the departmental website www.irsofficeronline.gov.in . The CIC vide decision contained in F. No. CIC/AT/2006/00336 Dated 25.1.2006 has inter alia, held that once the information is in the public Domain , It cannot be said to be 'held' by the given public authority , It is not open to the appealant to ask the public authority to seek details or explain the procedures to him no obligation on PIO to provide such information in the connection of RTI query by Delhi based RTI Activist Gopal Prasad. In this regard PMO said details of movable /immovable properties as declared by all the Central Govt Ministers are available on the website - www.pmindia.nic.in Director Police and CPIO, Ministry of Home Affairs Prashant Nikam said that the latest available annual property returns of IPS Officers have been posted on the website of this ministry which can be accessed @ www.mha.nic.in\ IPS Officers Immovable Property Returns Information System\ View Immovable Property Returns filed by the officers. IPS Officers who have not submitted their Immovable property returns have been posted on the website of the ministry which can be accessed @ www.mha.nic.in\indian police service \ immovable property return \ IPS Officers immovable property returns information system\ list of those officers who are yet to submit their IPR for the year 2012. Action on Tax due of current Central Ministers and Ex Central Ministers;CPIO & Astt. Commissioner of Income Tax, Ratnagiri said the information sought for is a statistical data in respect of certain category of persons with specific criteria. Verification revealed that the specific statistical information sought for is not exit or held by the undersigned. The applicant has not sought for information in respect of any specific person but expected the information in general in respect of all the present or past Ministers of Govt. of India. As the information of such category of persons is not maintained separately supply of information would result in disproportionate diversion of resources of the undersigned. As per a guide on right to information act , 2005 circulated vide O.M. No. 1/4/2009-IR Dated 05/10/2009 of the Govt. of India , DOPT, a citizen has the right to seek such information which is held by the public authority . This right includes inspection of work , documents and records, takings notes, extracts on certified copies, taking certified samples of material held by the public authority or held under his control . The relevant clarifications from the guide are reproduced below. “10. A citizen has a right to seek such information from a public authority which is held by the public authority or which is held by the public authority or which is held under its control. This right includes inspection of work , documents and records , taking notes, extracts or certified copies of documents or records and taking certified samples of material held by the public authority or held under the control of the public authority. It is important to note that only such information can be supplied under the act which already exists and is held by the public authority or held under the control of the public authority. The public information officer is not supposed to create information or to interpret information or to solve the problems raised by the applicants or to furnish replies to hypothetical questions. 14. In some cases, the applicants expect the public information officer to give information in some particular proforma devised by them on the plea that they have a right to get information in the form in which it is sought. It need be noted that the provision in the act simply means that if the information is sought in the form of photocopy , it shall be provided in the form of photocopy , or if it is sought in the form of a floppy, it shall be provided in that form subject to the conditions given in the act. It does not mean that the PIO shall re-shape the information. This is substantiated by the definition of the term “ right to information as given in the act , according to which , it includes right to obtaining information in the form of diskettes, floppies, tapes, video cassettes or in any other electronic mode or through print outs provided such information is already stored in a computer or in any other device. Everywhere in the Act , the word “form” has been used to represent this meaning . 15. Some information seekers request the public information officers to cull out information from some documents and give such extracted information to them. A citizen has a right to get “material “ from a public authority which is held by or under the control of that public authority .The Act , however , does not require the Public Information Officer to deduce some conclusion from the “material” and supply the “conclusion” so deduced to the applicant . it means that the public information officer is required to supply the “material” in the form as held by the public authority , but not to do research on behalf of the citizen to deduce anything from the material and then supply it to him. Right to Information Vis-a Vis other Acts.’’ The issue has been elaborated by the Hon’ble Supreme Court in the matter of CBSE & Anr. Vs Aditya Bandhopadhyay and Ors.(Civil Appeal No. 6454 of 2011) as follow: “At this juncture, it is necessary to clear some misconceptions about the RTI Act. The RTI Act provides access to all information that is available and existing. This is clear from a combined reading of section 3 and the definitions of “Information” and “Right to Information” under clauses (f) and (j) of section 2 of the Act. If a public authority has any information in the form of data or analysed data or abstracts, or stastics, an applicant may access such information, subject to the exemptions in section 8 of the act. But where the information sought is not a part of the record of exemptions in section 8 of the act. But where such information is not required to be maintained under any law or the rules or regulations of the public authority , the act does not cast an obligation upon the public authority, to collect or conation such non available information and then furnish it to an applicant , A public Authority is also not required to furnish information which require drawing of inferences and / or making of assumptions. It is also not required to provide “advice” or “opinion” to an applicant, nor required to obtain and furnish any “opinion ‘’ or advice to an applicant. The reference to “opinion” or “advice “ in the definition of information in section 2(f) of the act , only refers to such material available in the records of the public authority. Many Public Authorities have, as a public relation exercise, provide advice , guidance and opinion to the citizens. But that is purely voluntary and should not be confused with any obligation under the RTI Act.” In reply of this RTI, Income Tax Officer said that you have not quoted the PAN in respect of assessee whose data /information is required by you. Income tax department maintains PAN based record only and unable to provide the information .in this connection to relevant portion of the guidelines issued by the Department of Personnel &Training vide F.No.1/2/2008-IR Dated 12/06/2008 which reads as under: " It may be noted that the act requires the supply of such information only which already exists and is held by the public authority or held under the control of the public authority . it is beyond the scope of the act for a public authority to create information .Collection of information , parts of which are available with different public authorities would amount to creation of information which a public authority under the act is not require to do. At the same time, since the information is not related to any one particular public authority it is not the case where application should be transferred under sub section 3 of section 6 of the act. it is pertinent to note that sub section 3 refers to 'another public authority' and not ' other public authorities ', use the singular form in the act in this regard is important to note.", Office of the deputy commissioner of income tax, Raipur Shital Shashwat Verma gave reference to decision of Hon'ble Supreme court in the case Girish Ramchandra Deshpande " income tax returns and related documents have been held to be personal information and exempt from disclosure u/s 8(1)(j) of the RTI Act." while office of the chief commissioner of income tax , Jaipur feel that view of the nature of personal information , the disclosure of which would result in unwarranted invasion of privacy, involvement of third parties and disclosure of such information serves no large public interest and being rejected in light of applicability of section 8(1)(g) and 8(1)(j)of RTI Act 2005. Joint commissioner of income tax range -31, New Delhi K V K Singh said " The query sought is sweeping in nature and collecting , collating this information for different types of assessees such as ministers of govt. of India & civil services officials viz. IAS,IPS, IFS, IRS, IIS all over the country would be time consuming and expensive . if the appellant ask for any specific information , the CPIO will furnish the same as the CPIO is responsible for providing information available in the office only and is not expected to collect and compile the information on the demands of the information seeker. The information as such cannot be provided and the application thus stands rejected." CPIO & DS (Admn-||) Ministry of Communications and IT,Department of Telecommunications D.P.Singh said that as per DoP&T guidelines issued vide their OM No. 1/4/2009-IR Dated 05.10.2009 an applicant should by the way of one application seek information in respect of one subject only .Therefore, it is requested to follow the guidelines in future and submit separate RTI applications for separate subjects. FOR INFORMATION SEEKERS, Method of seeking information : A citizen who desires to obtain any information under the act , should make an application to the public information officer of the concerned public authority in writing in English or Hindi or in the official language of the area in which the application is made . The application should be preside and specific. He should make payment of application fee at the time of submitting the application as prescribed in the fee rules. The applicant can send the application by post or through electric means or can deliver it personally in the office of the public authority .The application can also be sent through an assistant public information officer. Application to the concerned public Authority: The applicant should make application to the concerned Public Authority. It is advised that he should make all efforts to ascertain as to which is the Public Authority concerned with the information and should send application to the public information officer of that public authority. It is observed that some applicants seek information in respect of many subjects by way of one application .It creates problem for the public information officer as well as the applicant . The applicant should,therefore see to it that by way of one application , he seeks information in respect of one subject only. Fee for seeking Information: The applicant,along with the application should send application fee to the public information officer . In case of government of India prescribed application fee is Rs.10/- which can be paid through a demand draft or a banker's cheque or an Indian postal order payable to the accounts officer of the public authority. The payment of fee can also be made by way of cash to the accounts officer of the public authority or to the assistant public information officer against proper receipt. The applicant may also be required to pay further fee towards the cost of providing the information,details of which shall be intimated to the applicant by the public information officer. The fee so demanded can be paid the same way as application fee. If the applicant belongs to below poverty line (BPL) category, he is not required to pay any fee. However, he should submit a proof in support of his claim to belong to the below poverty line .The application not accompanied by the prescribed application fee or proof of the applicants belonging to below poverty line, as the case may be,shall not be a valid application under the act . Format of Application: There is no prescribed format of application for seeking information .The application can be made on plain paper. The application should,however, have the name and complete postal address of the applicant . Even in case where the information is sought electronically, the application should contain name and postal address of the applicant. Filing of Appeal: An applicant can file an appeal to the first appellate authority if information is not supplied to him within the prescribed time of thirty days or 48 hours, as the case may be, or is not satisfied with the information furnished to him. Such an appeal,should be filed within a month. …………………………………………………………………………………………………………………………. GOPAL PRASAD (RTI ACTIVIST ) House No. -210, Street No. -3, Pal Mohalla ,Near Mohanbaba Mandir , Mandawali, Delhi-92. Mob: 08743057056, 09910341785 ; Email: sampoornkranti@gmail.com

सूचना का अधिकार कानून को कमजोर करनेवाले राहुल सोनिया से जनता अनभिज्ञ : गोपाल प्रसाद

सूचना का अधिकार कानून (RTI) कानून 12 अक्टूबर, 2005 को लागू हुआ था . इस कानून कि धारा- 4 के तहत 6 महीने के अंदर ही सभी सरकारी विभागों को अपने विभाग की सभी सूचनाएं अपने वेबसाइट पर डालना था , परन्तु 6 महीने की जगह 8 बर्ष बीत जाने पर भी सभी सरकारी विभागों ने इस अनिवार्य विषय का पालन नहीं किया . केन्दीय सूचना आयोग एवं सभी प्रदेशों में सूचना आयुक्तों के निर्धारित पदों पर नियुक्ति ना होना , अधूरे- गलत व समय पर सूचना नहीं देने के कारण जनसूचना अधिकारियों पर लगे दंड की वसूली ना होना, आरटीआई आवेदकों को समय पर सूचना नहीं मिलने कि स्थिति में बढ़ाते अपील आवेदनों का निपटारा न होना , जनसूचना अधिकारियों को आरटीआई सेल हेतु पर्याप्त सुविधाएं एवं कर्मचारी मुहैया ना कराए जेन के पीछे यूपीए सरकार के असली रहनुमा सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी की सोची-समझी साजिश है. वास्तव में आरटीआई को सशक्त करने तथा उसे पूर्ण अधिकार संपन्न बनाने की इनकी कोई मंशा नहीं है , क्योंकि इससे सरकारों की कलाई खुल जाएगी . सभी जांच एजेंसियों पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अंकुश लगाकर शासन एवं प्रशासन कि पारदर्शिता , शुचिता को ख़त्म करके येन-केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज रहना ही इनका मुख्य मकसद है . अपने वोटबैंक बढ़ने हेतु यूपीए सरकार के असली कर्ताधर्ता सोनिया एवं राहुल सूचना के अधिकार कानून का श्रेय तो लेना चाहते हैं पर यह भूल जाते हैं कि वास्तव में यह क़ानून उनकी चाहत और मर्जी के बदौलत नहीं बल्कि 1990 के दशक में चले विभिन्न जनसंगठनों द्वारा लम्बे आंदोलन तथा प्रसिद्द सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे , अरुणा राय , शेखर सिंह के अथक प्रयासों के बाद देश के विभिन्न अदालतों में इस हेतु सर्वाधिक रिट याचिकाओं के दायर होने पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर तत्कालीन यूपीए सरकार को विवश होकर लागू करना पड़ा था . इस वास्तविकता से देश की जनता खासकर अमेठी- रायबरेली की जनता पूर्णरूपेण अनभिज्ञ है . केंद्र सरकार भारत निर्माण अभियान के जरिए सूचना का अधिकार कानून का श्रेय लेकर डुगडुगी बजने का प्रयास कर रही है . आरटीआई कानून के आठ साल पूर्व अस्तित्व में आ जाने के बावजूद देश की सभी जनता इस क़ानून से अवगत क्यों नहीं हो पाई है? जनता के एकमात्र कानून को प्रभावी बनाने के लिए इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने के साथ- साथ प्रचारित- प्रसारित क्यों नहीं किया गया ?आज सम्पूर्ण देश की जनता के साथ-साथ अमेठी- रायबरेली की जनता को यह जानने का हक़ है की सच्चाई क्या है? राजीव गांधी फाउंडेशन , नेहरु- इंदिरा से सम्बंधित ट्रस्टों के आय-व्यय , विकास कार्य व उपलब्धियों को सोनिया एवं राहुलजी स्वयं पहल कर आम जनता को बताएँ . क्या इससे सम्बंधित सम्पत्तियाँ उनकी निजी जागीर है? सम्पूर्ण सांसदकाल के दौरान इनके सांसद निधि कोष द्वारा किए गए खर्च , नहीं उपयोग की गई राशि , पूर्ण कार्य व अपूर्ण कार्य की भी जानकारी दिया जाना चाहिए, ताकि लोगों को इस सम्बन्ध में सूचना मांगना ही ना पड़े . ऐसा करने पर उनकी विश्वसनीयता निश्चित रूप से बढ़ेगी . अमेठी -रायबरेली की जनता को राहुल गांधी व सोनिया गांधी से सम्बंधित इन महत्वपूर्ण बिषयों की जानकारी व सूचना का ज्ञान अवश्य होना चाहिए . अमेठी में जागरूक नागरिक मंच के संयोजक अम्बिका प्रसाद त्रिपाठी , ऑल इंडिया मुस्लिम फेडरेशन के अमेठी जिलाध्यक्ष अब्दुल रहमान , युवा विकास संस्थान अमेठी के अध्यक्ष विकास तिवारी , पत्रकार रामशिरोमणि पाण्डेय , त्रिलोकचंद्र , रत्नेश मिश्र , विनोद शर्मा "सागर" , अमित कुमार पाल , सौम्य सिंह आदि ने तो गोपाल प्रसाद द्वारा चलाए गए सूचना का अधिकार जागरूकता अभियान को अमेठी के सम्पूर्ण इलाके में पहुंचाने का संकल्प भी लिया है .