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Showing posts from March, 2014

अर्थ, काम और मोक्ष पर "धर्म "का सम्पूर्ण नियंत्रण

हमारी दृष्टि भारत के सनातन मूल्यों से ऊर्जा प्राप्त करती है , न कि किसी विदेशी समाज के संरचना के सिद्धांतों से।  हमने अपनी लम्बी सांस्कृतिक परंपरा के मूल स्वरों की सरल व्याख्या किया है , ताकि गूढ़ से गूढ़ विचार भी सहज रूप से स्पष्ट हो जाय।  भारत की राष्ट्रीयता किसी राजनीतिक एकीकरण के सिद्धांत से उपजी हुई अवधारणा नहीं है , वह तो सांस्कृतिक एकता की सहज उपज है।  वह किसी मौर्य , मुग़ल , अथवा ब्रिटिश साम्राज्य की देन नहीं है , वह तो एक लम्बी हिन्दू विरासत की देन है।  राज्य आते रहे , राज्य जाते रहे किन्तु हमारी सांस्कृतिक एकता का प्रवाह अक्षुण्ण बना रहा।  वह किसी राजा का मोहताज नहीं रहा।  किसी राजा के प्रश्रय अथवा उसके विरोध के कारण उसका उदय अथवा विकास नहीं हुआ और न ही  उसके कारण उसका ह्रास ही हुआ।  भारत की सांस्कृतिक एकता राज सापेक्ष नहीं , राज निरपेक्ष रही है।  अशोक और अकबर के साम्राज्यों ने भारत की एकता को नहीं बनाया।  इनमें से किसी ने भी अर्धशताब्दी तक भी राज नहीं किया , इसकी एकता के बीज तो इसके संत महात्माओं ने निरंतर बोएं हैं , राजाओं ने तो सिर्फ फसलें काटी हैं।  यह नहीं भूलना चाहिए कि …

जदयू भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष निखिल त्यागी भाजपा में क्यों शामिल हुए?

श्री राजनाथ सिंह एवं श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में  तथा युवाओं के हरदिल अजीज श्री अनुराग ठाकुर के  उपस्थिति   में युवाओं की  ऊर्जा को  सकारात्मक दिशा देने एवं समृद्ध  राष्ट्र निर्माण के लिए आज हम हजारों साथियों के साथ भाजपा में शामिल हो रहे हैं।             आजादी के 66 बर्ष बीत जाने के बाद भी सत्ता कि बागडोर प्रायः कांग्रेस के हाथ में ही रहा परन्तु   देश में बेरोजगारी की स्थिति घटने के बजाय बढती ही चली गई। जनसँख्या  बढती गई , बेरोजगारी बढती गई परन्तु सरकारी विभागों में नियुक्तियां तथा रोजगार सृजन थप रहा।  केंद्र सरकार की सुप्रसिद्ध संस्था कपार्ट को बंद करने का निर्णय लेना पड़ा , जिससे ग्रामीण विकास ठप पड़ गयी  है। हमारी केंद्र की  सरकार  देश की मूलभूत आवश्यकताओं की  पूर्ति के बजाय केवल डपोरशंखी वादों एवं दावों की घोषणाओं में ही व्यस्त रही।  अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए धर्म निरपेक्षता, साम्प्रदायिकता और आरक्षण जैसे मायावी शब्दों का सहारा लेकर देश के अवाम विशेषकर युवाओं को धोखा देने में पूरी यूपीए सरकार व्यस्त रही है।             देश को विकास के रास्ते पर ले जाने की आज परम आवश्यकता…

" हिन्दू" कोई संप्रदाय नहीं , एक " जीवनप्रणाली "

संस्कृति " स्वयं" में एक भावनात्मक संज्ञा है , जिसकी पहचान होती है उसमें पैदा हुए और उसे स्वयं जीते हुए लोगों के जीवनमूल्यों से जो उनके जीवन जीने की शैली का निर्धारण करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि " हिन्दू" कोई संप्रदाय नहीं है। वह एक " जीवनप्रणाली " है। वह व्यक्ति की पारिवारिक और सामाजिक जीवन पद्धति का निरूपण है। व्यक्ति के जीवन का कल प्रायः सौ बर्ष है और हिन्दू धर्म अथवा हिन्दू जीवन प्रणाली को इसी कालखंड में विभाजित करके उसके आदर्शों की संरचना हमने की है। चार आश्रमों अर्थात ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ , और सन्यास को 25, 25 बर्ष का समय दिया गया है। प्रत्येक में नारी पुरुष के सम्बन्धों के आदर्शों को विस्तार दिया गया है। मन , पत्नी, बहन , भाभी , ममी , बुआ आदि कितने ही रूपों में उसके कर्तव्यों की व्याख्या की गई है। पुरुष के भी ऐसे ही सम्बन्धों के आदर्शों का निरूपण हुआ है। यही नहीं स्त्री और पुरुष के सामाजिक उत्तरदायित्वों का भी पूरा- पूरा वर्णन किया गया है। इस सबके केंद्र में है शिक्षा के स्वरुप को व्याख्यायित करना। दुर्भाग्य से आज की शिक्षा प्रणाली स…

MAMTA SHARMA SAYS "SAVE WATER , SAVE DAUGHTER" IN VISHV MITR PARIWAR PROGRAM