सोमवार, 24 मार्च 2014

अर्थ, काम और मोक्ष पर "धर्म "का सम्पूर्ण नियंत्रण



हमारी दृष्टि भारत के सनातन मूल्यों से ऊर्जा प्राप्त करती है , न कि किसी विदेशी समाज के संरचना के सिद्धांतों से।  हमने अपनी लम्बी सांस्कृतिक परंपरा के मूल स्वरों की सरल व्याख्या किया है , ताकि गूढ़ से गूढ़ विचार भी सहज रूप से स्पष्ट हो जाय।  भारत की राष्ट्रीयता किसी राजनीतिक एकीकरण के सिद्धांत से उपजी हुई अवधारणा नहीं है , वह तो सांस्कृतिक एकता की सहज उपज है।  वह किसी मौर्य , मुग़ल , अथवा ब्रिटिश साम्राज्य की देन नहीं है , वह तो एक लम्बी हिन्दू विरासत की देन है।  राज्य आते रहे , राज्य जाते रहे किन्तु हमारी सांस्कृतिक एकता का प्रवाह अक्षुण्ण बना रहा।  वह किसी राजा का मोहताज नहीं रहा।  किसी राजा के प्रश्रय अथवा उसके विरोध के कारण उसका उदय अथवा विकास नहीं हुआ और न ही  उसके कारण उसका ह्रास ही हुआ।  भारत की सांस्कृतिक एकता राज सापेक्ष नहीं , राज निरपेक्ष रही है।  अशोक और अकबर के साम्राज्यों ने भारत की एकता को नहीं बनाया।  इनमें से किसी ने भी अर्धशताब्दी तक भी राज नहीं किया , इसकी एकता के बीज तो इसके संत महात्माओं ने निरंतर बोएं हैं , राजाओं ने तो सिर्फ फसलें काटी हैं।  यह नहीं भूलना चाहिए कि पूरी की पूरी सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के अधीन था , उससे ऊपर नहीं था।  यह व्यवस्था ही "धर्म"कहलायी जो चारों पुरुषार्थों में सबसे ऊपर थी -अर्थ, काम और मोक्ष पर सम्पूर्ण नियंत्रण "धर्म "का था।
    भारत में धर्म की परिभाषा संकीर्ण सम्प्रदाय के चौखटे में नहीं की गई थी।  वह सहज , सामान्य और नैसर्गिक सिद्धांतों की व्याख्या रही है , इसीलिए यह सार्वभौमिक है।  सभी मनुष्यों के लिए समान रूप से लागू होती है।  जैसे नदी का धर्म जल देना , वृक्ष का धर्म फल - फूल और वायु  देना है , उसी प्रकार से समाज का धर्म व्यक्ति के लिए सुख , सुविधा और सुरक्षा प्रदान करना है।  अतः हिन्दू धर्म मानव मात्र का धर्म है , किसी वर्ग विशेष का नहीं है।

( आरा के नर्मदेश्वर ओझा द्वारा लिखित पुस्तक -"राष्ट्रीयता सांस्कृतिक अवधारणा "के शुभाशंसा में संघ के पूर्व सहकार्यवाह सुदर्शनजी के  उदगार से साभार)

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